क्या आप भी उन महान लीडर्स में से हैं जो सोचते हैं कि दुनिया वैसी ही रहेगी जैसी १९९० में थी। अगर आप अब भी पुराने घिसे पिटे तरीकों से अपनी टीम चला रहे हैं तो मुबारक हो आप अपनी कंपनी को खुद अपने हाथों से डुबो रहे हैं। जब पूरी मार्केट रॉकेट की स्पीड से बदल रही है तब आपका कछुए की चाल चलना आपको सिर्फ बर्बादी की तरफ ले जाएगा। इस केओस वाली दुनिया में अगर आपने खुद को नहीं बदला तो आप सिर्फ एक पुराना किस्सा बनकर रह जाएंगे।
लेकिन फिक्र मत कीजिये क्योंकि डैरिल कोनर की यह बुक आपको उस गड्ढे से बाहर निकालेगी जहाँ आप अनजाने में गिर रहे हैं। आज हम इस बुक के वो ३ जादुई लेसन समझेंगे जो आपकी डूबती नैया को पार लगा सकते हैं।
लेसन १ : केओस को गले लगाना और डर को डस्टबिन में डालना
आज की दुनिया ऐसी है कि आप सुबह उठकर चाय की चुस्की लेते हैं और पता चलता है कि मार्केट में कोई नया एआई आ गया जिसने आपकी दस साल पुरानी स्ट्रेटेजी की धज्जियां उड़ा दीं। डैरिल कोनर कहते हैं कि अगर आप इस केओस यानी इस उथल पुथल से डर रहे हैं तो आप बिलकुल वैसे ही हैं जैसे कोई इंसान बारिश में खड़ा होकर बादलों को डांट रहा हो कि वे बरस क्यों रहे हैं। भाई साहब बादल तो बरसेंगे ही क्योंकि उनका काम ही वही है। लीडरशिप का असली मतलब यह नहीं है कि आप सब कुछ कंट्रोल करें बल्कि असली मतलब यह है कि जब सब कुछ आपके कंट्रोल से बाहर हो तब आप कितने मजे में रास्ता ढूंढते हैं।
जरा सोचिये उस मैनेजर के बारे में जो आज भी मानता है कि साल में एक बार मीटिंग करके और भारी भरकम पीपीटी दिखाकर वह दुनिया जीत लेगा। उसे लगता है कि बदलाव एक मेहमान है जो कभी कभार आएगा और चाय पीकर चला जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि बदलाव अब आपका वो रिश्तेदार है जो अपना सारा बोरिया बिस्तर लेकर आपके घर में ही बस गया है। अब या तो आप उसके साथ तालमेल बिठा लो या फिर चिढ़ते रहो। कोनर समझाते हैं कि केओस कोई दुश्मन नहीं है बल्कि यह एक फिल्टर है। यह फिल्टर उन लोगों को मार्केट से बाहर फेंक देता है जो खुद को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं।
मान लीजिये आप एक टैक्सी कंपनी चलाते हैं और अचानक मार्केट में ओला या उबर जैसे एप्स आ जाते हैं। अब आपके पास दो रास्ते हैं। पहला रास्ता यह कि आप सड़क पर बैठकर धरना दें और रोना रोयें कि जमाना कितना खराब हो गया है और लोग अब हाथ देकर टैक्सी क्यों नहीं रोकते। दूसरा रास्ता यह है कि आप अपनी सोच को अपडेट करें और समझें कि कस्टमर को अब आराम और टेक्नोलॉजी चाहिए। जो लोग पहले रास्ते पर रहे वे आज इतिहास के पन्नों में खो चुके हैं और जो केओस को गले लगाकर बदल गए वे आज भी गेम में बने हुए हैं।
अक्सर लीडर्स को लगता है कि अगर उन्होंने एक फिक्स्ड प्लान बना लिया तो सब कुछ सेट है। पर भाई साहब प्लान तो लोग शादी का भी बनाते हैं लेकिन ऐन वक्त पर पनीर की सब्जी कम पड़ ही जाती है। असली लीडर वो है जो पनीर कम पड़ने पर रायता फैलाना नहीं बल्कि उसे मैनेज करना जानता है। केओस का मतलब है कि चीजें वैसी नहीं होंगी जैसी आपने सोची थीं और यही असलियत है। जब आप इस सच को स्वीकार कर लेते हैं तो आपका आधा स्ट्रेस तो वैसे ही खत्म हो जाता है। आप पैनिक करने के बजाय यह सोचने लगते हैं कि अब आगे क्या करना है।
कोनर के मुताबिक अगर आपकी आर्गेनाइजेशन में थोडा बहुत शोर शराबा और कन्फ्यूजन नहीं है तो समझ लीजिये कि आप तरक्की नहीं कर रहे हैं बल्कि आप एक ऐसी जगह हैं जहाँ सब कुछ रुक चुका है। रुकी हुई चीज अक्सर सड़ जाती है चाहे वो पानी हो या आपकी कंपनी। इसलिए केओस से भागिये मत बल्कि उसके बीच में खड़े होकर मुस्कुराना सीखिये। जब आपकी टीम आपको शांत और मुस्कुराते हुए देखती है तो उन्हें भी लगता है कि शायद सब कुछ ठीक हो जाएगा चाहे बाहर तूफान ही क्यों न आया हो।
लेसन २ : चेंज रिजीलिएंस यानी झटके सहने की फौलादी ताकत
जब हम बदलाव की बात करते हैं तो ज्यादातर लोग ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे उन्होंने भूत देख लिया हो। कोनर कहते हैं कि असल समस्या बदलाव नहीं है बल्कि आपकी उसे सहने की ताकत यानी रिजीलिएंस की कमी है। मान लीजिये आप जिम गए और पहले ही दिन १०० किलो का वजन उठाने की कोशिश की। नतीजा क्या होगा। अगले दिन आप बेड से हिल भी नहीं पाएंगे और ऊपर से पूरी दुनिया को कोसेंगे। बिजनेस में भी यही होता है। जब कोई बड़ा संकट आता है तो वही कंपनियां बचती हैं जिनकी मसल्स यानी उनकी टीम मानसिक रूप से मजबूत होती है।
अक्सर ऑफिसों में क्या होता है। जैसे ही बॉस कोई नया सॉफ्टवेयर या नया नियम लाता है आधे लोग तो कोने में जाकर गॉसिप शुरू कर देते हैं कि अब तो नौकरी गई। उन्हें लगता है कि कंपनी उन्हें परेशान करने के लिए नए तरीके ढूंढ रही है। भाई साहब कंपनी को आपको परेशान करने में कोई इंटरेस्ट नहीं है उसे बस मार्केट में टिके रहना है। रिजीलिएंस का मतलब है कि जब हालात आपको जमीन पर पटक दें तो आप कितनी जल्दी धूल झाड़कर वापस खड़े होते हैं। अगर आप गिरने के बाद वहीं बैठकर रोने लगे कि चोट लग गई तो कम्पटीशन वाला आपको कुचलकर आगे निकल जाएगा।
मान लीजिये एक रेस्टोरेंट है जो सालों से सिर्फ दाल मखनी बेच रहा है। अचानक लोग हेल्थ कॉन्शियस हो गए और सलाद मांगने लगे। अब उस रेस्टोरेंट का मालिक अगर यह कहे कि मेरा दादा भी दाल बेचता था और मैं भी वही बेचूँगा तो वह जल्द ही अपना शटर गिरा देगा। लेकिन अगर उसकी टीम रिजीलिएंट है तो वे तुरंत अपनी मेनू बदलेंगे और खुशी खुशी सलाद सर्व करेंगे। इसे कहते हैं फ्लेक्सिबिलिटी। अगर आप लोहे की रॉड की तरह सख्त रहेंगे तो ज्यादा दबाव पड़ने पर टूट जाएंगे लेकिन अगर आप रबर की तरह लचीले रहेंगे तो कितना भी खिंचाव आए आप वापस अपने शेप में आ जाएंगे।
कोनर एक बहुत बड़ी बात कहते हैं कि रिजीलिएंस रातों रात नहीं आती। इसके लिए आपको अपनी टीम का भरोसा जीतना पड़ता है। अगर आपकी टीम को लगता है कि मुसीबत के वक्त आप उनका साथ छोड़ देंगे तो वे कभी रिजीलिएंट नहीं बनेंगे। वे बस अपनी जान बचाने में लगे रहेंगे। एक लीडर के तौर पर आपका काम है उन्हें यह यकीन दिलाना कि तूफान चाहे कितना भी बड़ा हो हम सब एक ही नाव में हैं। जब लोगों को सुरक्षा का एहसास होता है तभी वे अपनी पूरी ताकत से बदलाव का सामना कर पाते हैं।
ज्यादातर लीडर्स सोचते हैं कि सिर्फ अच्छी सैलरी दे देने से लोग वफादार और मजबूत हो जाएंगे। पर यह तो वही बात हुई कि आप अपनी कार में महंगा पेट्रोल डलवा रहे हैं लेकिन उसका इंजन ही खराब है। इंजन है आपकी कंपनी का कल्चर। अगर कल्चर में डर और राजनीति भरी है तो छोटी सी प्रॉब्लम भी पहाड़ जैसी लगेगी। रिजीलिएंस तब आती है जब आप अपनी गलतियों से सीखते हैं और उन्हें सेलिब्रेट करते हैं। अगर कोई फेल हो गया तो उसे सूली पर चढ़ाने के बजाय यह पूछिए कि भाई अगली बार हम क्या अलग करेंगे। जब फेलियर का डर खत्म होता है तभी असली ताकत बाहर आती है।
लेसन ३ : निंबल कल्चर यानी बिजली जैसी फुर्ती वाला सिस्टम
अगर आपकी कंपनी एक विशाल समुद्री जहाज जैसी है जिसे मोड़ने के लिए दस मील पहले से प्लानिंग करनी पड़ती है तो यकीन मानिए आप डूबने वाले हैं। आज के दौर में आपको एक तेज रफ्तार मोटरबोट बनना पड़ेगा जो लहरों के साथ तुरंत अपनी दिशा बदल सके। डैरिल कोनर इसी को 'निंबल आर्गेनाइजेशन' कहते हैं। निंबल होने का मतलब यह नहीं है कि आप बस तेज भागें बल्कि इसका मतलब यह है कि आप सही दिशा में और बिना किसी हिचकिचाहट के भागें।
अक्सर बड़े कॉर्पोरेट ऑफिसों में क्या होता है। एक छोटा सा फैसला लेने के लिए दस ईमेल भेजे जाते हैं और पाँच मीटिंग्स बुलाई जाती हैं। अंत में जब तक फैसला लिया जाता है तब तक वो मौका ही हाथ से निकल चुका होता है। यह तो वही बात हुई कि आपके घर में आग लगी है और आप फायर ब्रिगेड को फोन करने से पहले सोसाइटी के प्रेसिडेंट से परमिशन मांग रहे हैं। भाई साहब जब तक परमिशन आएगी तब तक सिर्फ राख ही बचेगी। एक निंबल कल्चर में लोगों के पास पावर होती है कि वे मौके पर चौका मार सकें।
मान लीजिये एक सेल्स टीम को पता चलता है कि क्लाइंट को एक खास सर्विस चाहिए जो आपकी कंपनी फिलहाल नहीं देती। एक सुस्त कंपनी का सेल्समैन कहेगा कि मैं हेड ऑफिस से पूछकर बताऊंगा और हेड ऑफिस अगले तीन महीने तक रिसर्च करेगा। तब तक क्लाइंट किसी छोटी और फुर्तीली कंपनी के साथ डील फाइनल कर चुका होगा। निंबल कंपनी का बंदा वहीँ बैठकर अपनी टीम से बात करेगा और शाम तक क्लाइंट को नया प्रपोजल दे देगा। मार्केट में अब बड़ा मछली छोटी मछली को नहीं खाती बल्कि तेज मछली सुस्त मछली को खा जाती है।
कोनर समझाते हैं कि फुर्ती लाने के लिए आपको अपने अंदर के 'कंट्रोल फ्रीक' को मारना होगा। अगर आप हर छोटी चीज खुद ही चेक करना चाहते हैं तो आप अपनी कंपनी के लिए सबसे बड़ी रुकावट बन रहे हैं। लीडरशिप का काम रास्ता साफ करना है न कि रास्ते में खुद खड़ा हो जाना। जब आप अपनी टीम पर भरोसा करते हैं और उन्हें फैसले लेने की आजादी देते हैं तब आपकी आर्गेनाइजेशन में वो बिजली वाली फुर्ती आती है। हाँ शुरू में कुछ गलतियां होंगी लेकिन वो गलतियां उस सुस्ती से बेहतर हैं जो आपकी कंपनी को धीरे धीरे मार रही है।
केओस और बदलाव कोई दुश्मन नहीं बल्कि आपके लिए एक टेस्ट हैं। जो लीडर इन लेसन्स को अपनी लाइफ में उतार लेता है वह सिर्फ सर्वाइव नहीं करता बल्कि राज करता है। तो क्या आप तैयार हैं अपनी पुरानी और थकी हुई सोच को छोड़कर एक नई और निंबल शुरुआत करने के लिए। याद रखिये समय किसी का इंतज़ार नहीं करता और बिजनेस की दुनिया तो बिलकुल भी नहीं।
तो उठिये और अपनी टीम के साथ मिलकर उस बदलाव की लहर पर सवार हो जाइये क्योंकि किनारों पर बैठने वालों को सिर्फ रेत मिलती है और लहरों से लड़ने वालों को मोती। आज ही तय कीजिये कि आप एक पुरानी याद बनना चाहते हैं या आने वाले कल की सबसे बड़ी मिसाल।
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