क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो पिछले ५ साल से सिर्फ बिजनेस शुरू करने का प्लान बना रहे हैं क्योंकि रिस्क लेने से आपकी रूह कांपती है? मुबारक हो! आप अपनी पूरी सेविंग्स और कीमती समय गँवा रहे हैं जबकि आपके पड़ोस वाला लड़का बिना रिस्क लिए नोट छाप रहा है। अगर आप अब भी पुराने खयालात में फंसे रहे तो हाथ मलते रह जाएंगे। बॉब रीस और हावर्ड स्टीवनसन की यह किताब आपको सिखाएगी कि कैसे बिना सब कुछ दांव पर लगाए आप बड़ा खेल खेल सकते हैं। चलिए देखते हैं इस किताब के ३ जादुई लेसन।
Lesson : अपने पैसे से ज्यादा दूसरों के दिमाग और रिसोर्स पर खेलें (ओपीएम और ओआर)
क्या आपको लगता है कि बिजनेस शुरू करने के लिए बैंक से करोड़ों का लोन लेना या अपनी पुश्तैनी जमीन बेचना जरूरी है? अगर हाँ, तो मुबारक हो, आप ९० परसेंट फेल होने वाले स्टार्टअप्स की कैटेगरी में फिट बैठ रहे हैं। बॉब रीस और हावर्ड स्टीवनसन कहते हैं कि असली खिलाड़ी वह नहीं जो अपना सब कुछ दांव पर लगा दे, बल्कि वह है जो अदर्स पीपल्स मनी (OPM) और अदर्स पीपल्स रिसोर्सेज (OR) का इस्तेमाल करना जानता हो।
इसे एक सिंपल उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिये आपको अपनी एक नई टी-शर्ट ब्रांड शुरू करनी है। अब एक तरीका तो यह है कि आप अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर एक फैक्ट्री डालें, मशीनें खरीदें और वर्कर रखें। और फिर ६ महीने बाद पता चले कि आपकी डिजाइन तो किसी को पसंद ही नहीं आई! बधाई हो, अब आप उस फैक्ट्री में बैठकर खुद की रिजेक्टेड टी-शर्ट्स पहनकर आंसू पोंछ सकते हैं।
लेकिन "लो रिस्क" वाला स्मार्ट बंदा क्या करेगा? वह सबसे पहले मार्केट में जाकर देखेगा कि किस प्रिंटिंग प्रेस के पास खाली समय है। वह उनसे बात करेगा और कहेगा, "भाई, तुम्हारी मशीनें रात को खाली रहती हैं, मुझे बस ५० शर्ट प्रिंट करके दे दो।" वह खुद की दुकान खोलने के बजाय इंस्टाग्राम या किसी दोस्त की वेबसाइट का सहारा लेगा। इसे कहते हैं बिना अपनी जेब खाली किये बड़ा गेम खेलना।
बॉब रीस ने खुद यही किया था। उन्होंने जब अपना "पिक्शनरी" गेम हिट कराया, तो उन्होंने खुद की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट नहीं खोली। उन्होंने उन लोगों को पकड़ा जिनके पास पहले से डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क था। उन्होंने रिस्क को बांट दिया।
अक्सर हमारे यहाँ लोग "ईगो" में आकर सोचते हैं कि "सब कुछ मेरा होना चाहिए"। अरे भाई, अगर सब कुछ तुम्हारा होगा, तो नुकसान भी सिर्फ तुम्हारा ही होगा। क्या आप चाहते हैं कि आपके मोहल्ले के लोग आपको "बिजनेसमैन" के बजाय "वो दिवालिया अंकल" के नाम से जानें? अगर नहीं, तो रिसोर्स को आउटसोर्स करना सीखें।
आज के डिजिटल युग में तो यह और भी आसान है। अगर आपको कोर्स बेचना है, तो खुद का सर्वर क्यों बनाना? उडेमी या यूट्यूब का इस्तेमाल कीजिये। अगर खाना बेचना है, तो बड़ा रेस्टोरेंट खोलने से पहले क्लाउड किचन मॉडल अपनाइये। इस किताब का सबसे बड़ा मंत्र यही है कि अपनी एसेट्स कम रखिये और अपनी पहुंच ज्यादा। जब आपके पास खोने के लिए कम होता है, तब आपके पास जीतने की भूख ज्यादा होती है।
याद रखिये, बिजनेस में हीरो वो नहीं जो सबसे ज्यादा रिस्क लेता है, हीरो वो है जो सबसे कम रिस्क में सबसे ज्यादा प्रॉफिट घर ले जाता है। बाकी सब तो बस फिल्मों में अच्छा लगता है।
Lesson : असली मार्केट टेस्टिंग का जादू — हवा में महल बनाना बंद कीजिये
क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो रात को सोते समय एक क्रांतिकारी बिजनेस आइडिया सोचते हैं और सुबह उठकर सीधा ऑफिस रेंट पर लेने निकल जाते हैं? अगर हाँ, तो बधाई हो, आप अपनी बर्बादी के दस्तावेज पर खुद साइन कर रहे हैं। बॉब रीस और हावर्ड स्टीवनसन का दूसरा सबसे बड़ा सबक है — मार्केट टेस्टिंग। यह सुनने में भारी भरकम लगता है, लेकिन असल में यह आपकी इज्जत और पैसा बचाने का सबसे देसी तरीका है।
इसे एक मजेदार उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिये आपको लगता है कि आपके शहर में लोग "करेले का शरबत" बहुत पसंद करेंगे क्योंकि यह सेहत के लिए अच्छा है। अब एक तरीका तो यह है कि आप ५ लाख का लोन लें, एक शानदार दुकान सजाएं, और "करेला किंग" का बोर्ड लगा दें। उद्घाटन के दिन आपके ३ दोस्त आएंगे, फ्री में शरबत पिएंगे, मुंह बनाएंगे और चले जाएंगे। अगले दिन से आप अपनी दुकान में मक्खियां मारेंगे और खुद वही कड़वा शरबत पीकर अपनी किस्मत को कोसेंगे। क्या आप वाकई ऐसा चाहते हैं?
स्मार्ट बंदा क्या करेगा? वह सबसे पहले सिर्फ २ किलो करेले खरीदेगा, घर पर जूस बनाएगा और सुबह पार्क में जाकर लोगों को ५-५ रुपये के छोटे कप में चखाएगा। अगर लोग उसे थूक दें, तो मुबारक हो! आपने सिर्फ २०० रुपये में यह जान लिया कि आपका आइडिया कचरा है। आपका ५ लाख का लोन और २ साल की मेहनत बच गई। इसे कहते हैं लो रिस्क, हाई रिवॉर्ड।
बॉब रीस कहते हैं कि जब तक आपके पास कस्टमर का कन्फर्म ऑर्डर न हो, तब तक आप बिजनेस में नहीं हैं, आप सिर्फ एक "खयाली पुलाव" बना रहे हैं। उन्होंने खुद पिक्शनरी गेम के लिए तब तक कोई बड़ी इन्वेंट्री नहीं बनाई जब तक उन्हें बड़े रिटेलर्स से आर्डर नहीं मिल गए।
अक्सर इंडियन स्टार्टअप्स में लोग "परफेक्शन" के पीछे भागते हैं। उन्हें लगता है कि जब तक वेबसाइट एकदम चमकदार नहीं होगी या ऑफिस में एसी नहीं लगेगा, तब तक बिजनेस शुरू नहीं होगा। अरे भाई, कस्टमर को आपकी एसी की हवा नहीं, आपके प्रोडक्ट की वैल्यू चाहिए। अगर आप कचरा बेच रहे हैं, तो सोने की थाली में परोसने से भी वो बिकेगा नहीं।
छोटे लेवल पर टेस्ट करने का फायदा यह है कि आप अपनी गलतियों से जल्दी और सस्ते में सीख जाते हैं। अगर कोई चीज काम नहीं कर रही, तो उसे तुरंत बदल दीजिये। इसे स्टार्टअप की भाषा में "पिवट" करना कहते हैं, और देसी भाषा में "जुगाड़" बिठाना।
तो अगली बार जब आपके दिमाग में कोई बड़ा आइडिया आए, तो सीधा बैंक मत दौड़िए। पहले अपने घर की बालकनी या व्हाट्सएप ग्रुप से उसे टेस्ट कीजिये। अगर वहां से हरी झंडी मिले, तभी आगे का कदम उठाइये। याद रखिये, समंदर की गहराई नापने के लिए दोनों पैर पानी में नहीं डाले जाते, एक उंगली ही काफी है।
Lesson : कस्टमर सेंट्रिक अप्रोच — अपनी पसंद नहीं, उनकी डिमांड पर राज करें
क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो खुद को बहुत बड़ा विजनरी समझते हैं? आपको लगता है कि आपने जो 'पिंक कलर का इलेक्ट्रॉनिक झाड़ू' बनाया है, वो दुनिया बदल देगा? मुबारक हो! आप उस भीड़ का हिस्सा बन रहे हैं जो अपने ईगो के चक्कर में घर के बर्तन बेचने पर मजबूर हो जाती है। बॉब रीस और हावर्ड स्टीवनसन का तीसरा और सबसे कड़वा सबक यह है कि बिजनेस आपके बारे में नहीं, बल्कि आपके कस्टमर के बारे में है।
इसे एक मजेदार और देसी उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिये आपको साउथ इंडियन खाना बहुत पसंद है। आप सोचते हैं कि शहर के सबसे पॉश इलाके में एक 'इडली पैलेस' खोलेंगे जहाँ सिर्फ सफेद इडलियां मिलेंगी। आप अपनी सारी सेविंग्स लगा देते हैं, शेफ बुलाते हैं और दुकान सजाते हैं। लेकिन ३ महीने बाद पता चलता है कि उस इलाके के लोग तो 'चीज गार्लिक डोसा' और 'मसाला वड़ा' ढूंढ रहे हैं। आपकी सादी इडली कोई फ्री में भी नहीं पूछ रहा। अब आप अपनी इडलियों को क्रिकेट की गेंद बनाकर खेल सकते हैं या फिर मार्केट की सुन सकते हैं।
स्मार्ट बिजनेसमैन वह है जो दुकान खोलने से पहले गली-गली जाकर पूछता है कि "भाई, तुम्हें नाश्ते में क्या कमी खल रही है?" बॉब रीस कहते हैं कि जब आप कस्टमर की प्रॉब्लम सॉल्व करते हैं, तो आपको मार्केटिंग पर करोड़ों खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती। लोग खुद चलकर आपके पास आते हैं।
किताब में बताया गया है कि रिस्क तब बढ़ जाता है जब आप अपनी 'पसंद' को मार्केट पर थोपने की कोशिश करते हैं। हाई रिवॉर्ड तब मिलता है जब आप मार्केट की 'जरूरत' को पकड़ लेते हैं। बॉब रीस ने जब पिक्शनरी गेम को प्रमोट किया, तो उन्होंने इसे सीधे बच्चों को नहीं बेचा। उन्होंने इसे उन ग्रुप्स में टेस्ट किया जहाँ लोग सोशल होना चाहते थे। उन्होंने देखा कि लोग बोर हो रहे हैं और उन्हें एक फन एक्टिविटी चाहिए। उन्होंने उस खाली जगह (Gap) को भरा।
अक्सर हमारे यहाँ स्टार्टअप्स में लोग "एप" बनाने के पीछे पागल रहते हैं। "भाई, मेरा एक एप होगा, उसमें ये बटन होगा, वो फीचर होगा।" अरे भाई, पहले ये तो देख लो कि क्या किसी को उस एप की जरूरत भी है? क्या लोग अपना कीमती डेटा और समय तुम्हारे उस बटन को दबाने में खर्च करेंगे?
अगर आप वाकई लो रिस्क में बड़ा बिजनेस खड़ा करना चाहते हैं, तो "सेल्समैन" बनने के बजाय "सॉल्यूशन प्रोवाइडर" बनिए। अपने कस्टमर के जूते में पैर डालकर देखिये कि उन्हें चुभन कहाँ हो रही है। जब आप उस चुभन को मिटा देंगे, तो वो आपको मुंह मांगी कीमत देंगे।
बिजनेस कोई रॉकेट साइंस नहीं है, यह बस लोगों की सेवा करने का एक जरिया है जिससे आप पैसे कमाते हैं। अगर आपकी सेवा में दम है, तो रिवॉर्ड अपने आप हाई हो जाएगा। ईगो को जेब में रखिये और मार्केट की डिमांड को सिर माथे पर। तभी आप असली 'बिजनेस टायकून' बन पाएंगे।
तो दोस्तों, बॉब रीस और हावर्ड स्टीवनसन की यह किताब हमें बस एक ही बात सिखाती है — पागलपन भरा रिस्क लेना बहादुरी नहीं, बेवकूफी है। असली समझदारी कम से कम संसाधनों में बड़े से बड़ा धमाका करने में है। अब समय है अपनी डायरी निकालने का और यह सोचने का कि आप अपने आइडिया को आज ही ५०० रुपये में कैसे टेस्ट कर सकते हैं।
क्या आप अब भी उस 'परफेक्ट टाइम' का इंतज़ार करेंगे या आज ही अपना छोटा सा कदम उठाएंगे? कमेंट में लिखिये अपना वो बिजनेस आइडिया जिसे आप बिना रिस्क के शुरू करना चाहते हैं। इस आर्टिकल को उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो सिर्फ प्लान बनाता है पर शुरू नहीं करता। चलिए मिलकर इंडिया को स्टार्टअप हब बनाते हैं!
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