Loyalty.com (Hindi)


क्या आप अभी भी अपने कस्टमर्स को डिस्काउंट के नाम पर भीख बांट रहे हैं और फिर भी वे आपको छोड़कर कॉम्पिटिटर के पास भाग रहे हैं? सच तो यह है कि आपकी पुरानी मार्केटिंग सड़ी हुई कचौड़ी जैसी है जिसे कोई चखना भी नहीं चाहता। अगर आप डेटा और रिलेशनशिप का असली खेल नहीं समझे तो आपका बिजनेस बहुत जल्द इतिहास की किताबों में दफन हो जाएगा।

आज के इस आर्टिकल में हम फ्रेडरिक नेवेल की मशहूर किताब लॉयल्टी डॉट कॉम से ३ ऐसे पावरफुल लेसन्स सीखेंगे जो आपके बिजनेस को इंटरनेट के इस नए दौर में एक ब्रांड बना देंगे।


Lesson : डेटा ही असली सोना है और आप कोयला बेच रहे हैं

अगर आप आज भी अपने कस्टमर को सिर्फ एक मोबाइल नंबर या ईमेल आईडी समझते हैं, तो मुबारक हो, आप बिजनेस नहीं बल्कि एक पुरानी सरकारी ऑफिस की फाइल चला रहे हैं। फ्रेडरिक नेवेल अपनी किताब लॉयल्टी डॉट कॉम में साफ कहते हैं कि इंटरनेट के इस नए दौर में डेटा का मतलब सिर्फ जानकारी जमा करना नहीं, बल्कि कस्टमर के दिल की धड़कन को समझना है। पुराने जमाने में दुकानदार को पता होता था कि शर्मा जी की बहू को कौन सा अचार पसंद है या गुप्ता जी कब अपनी एनिवर्सरी मनाते हैं। आज वही काम डेटा को करना है, लेकिन हम क्या कर रहे हैं? हम बस बिना सोचे समझे सबको एक जैसा मैसेज पेल रहे हैं।

मान लीजिए आप एक फिटनेस एप चलाते हैं। अब एक बंदा है जो सुबह ५ बजे उठकर दौड़ता है और दूसरा वो है जो रात को १२ बजे पिज्जा ऑर्डर करता है। अगर आप दोनों को एक ही डिस्काउंट कूपन भेज रहे हैं कि आओ जिम ज्वाइन करो, तो आप अपनी बेइज्जती खुद करवा रहे हैं। सुबह दौड़ने वाले को प्रोटीन शेक का ऑफर चाहिए और रात को जागने वाले को शायद स्लीप ट्रैकर या हेल्दी डाइट चार्ट की जरूरत है। अगर आप उसे गलत चीज बेचेंगे, तो वह आपका नोटिफिकेशन वैसे ही हटा देगा जैसे लड़कियां अनजान लड़कों की फ्रेंड रिक्वेस्ट डिलीट करती हैं।

मार्केटिंग में डेटा का इस्तेमाल वैसा ही है जैसे बिरयानी में नमक। थोड़ा सा ज्यादा हुआ तो कड़वा, और कम हुआ तो बेस्वाद। नेवेल समझाते हैं कि डेटाबेस मार्केटिंग का मतलब यह नहीं कि आप कस्टमर की जासूसी करें, बल्कि यह है कि आप उनके पिछले व्यवहार से यह अंदाजा लगाएं कि उन्हें अगली बार क्या चाहिए। अगर आप यह नहीं कर रहे, तो आप अंधेरे में तीर चला रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि मछली की आँख में लगेगा। सच तो यह है कि बिना सही डेटा एनालिसिस के आप मार्केटिंग नहीं, बल्कि बस शोर मचा रहे हैं।

आज के दौर में अटेंशन स्पैन वैसे ही कम है जैसे किसी भी फ्री के वेबिनार में लोगों का जोश। अगर आपने पहले ३ सेकंड में कस्टमर को यह महसूस नहीं कराया कि यह ऑफर खास उसके लिए है, तो वह आपके ब्रांड को कचरे के डिब्बे में डाल देगा। डेटा से यह समझिए कि आपका सबसे वफादार कस्टमर कौन है और वह आपसे क्या उम्मीद करता है। याद रखिए, हर कस्टमर राजा नहीं होता, कुछ तो बस मुफ्त की चटनी चखने आते हैं। आपको अपने असली हीरों को पहचानना होगा और उन्हें वीआईपी फील कराना होगा। जब तक आप डेटा को सोना समझकर उसे तराशेंगे नहीं, तब तक आप मार्केट में सिर्फ कोयला ही बेचते रह जाएंगे।


Lesson : लॉयल्टी खरीदी नहीं जाती, इसे इज्जत देकर कमाया जाता है

अगर आप सोच रहे हैं कि १० परसेंट का डिस्काउंट कूपन फेंक कर आप कस्टमर को अपना गुलाम बना लेंगे, तो भाई साहब, आप गलतफहमी के शिकार हैं। फ्रेडरिक नेवेल अपनी किताब लॉयल्टी डॉट कॉम में बड़े प्यार से समझाते हैं कि डिस्काउंट से आने वाला कस्टमर वैसा ही है जैसे शादी में आया वो बिन बुलाया मेहमान, जो सिर्फ पनीर की सब्जी और मुफ्त की आइसक्रीम के लिए रुकता है। जैसे ही उसे कहीं और ज्यादा बड़ा रसगुल्ला दिखेगा, वह आपको छोड़कर वहां कट लेगा। असली लॉयल्टी तो वह है जब आपका कॉम्पिटिटर फ्री में सामान बांटे, फिर भी आपका कस्टमर कहे कि नहीं भाई, मुझे तो उसी दुकान से लेना है क्योंकि वहां मुझे अपनापन मिलता है।

मान लीजिए आप हर रोज एक ही चाय की टपरी पर जाते हैं। वहां का चाय वाला आपको देखते ही कहता है, भाई साहब, आज अदरक थोड़ी ज्यादा डालूं क्या? बस, खत्म! उस चाय वाले ने आपको ५ रुपये के डिस्काउंट से नहीं, बल्कि उस एक लाइन से अपना बना लिया। अब अगर बगल में कोई स्टारबक्स जैसा शोरूम भी खुल जाए, तो भी आप उस टपरी वाले को नहीं छोड़ेंगे। क्यों? क्योंकि वहां आपकी पसंद की कद्र है। लेकिन आजकल की कंपनियां क्या कर रही हैं? वो आपको एक नंबर समझती हैं। आप उनके ऐप पर १० हजार खर्च कर दो, फिर भी वो आपको वही जेनेरिक मैसेज भेजेंगे, हे यूजर, कूपन कोड WELCOME10 इस्तेमाल करो। भाई, मैं पुराना कस्टमर हूं, मुझे वेलकम क्यों कर रहे हो? मुझे तो थैंक्यू बोलना चाहिए था!

नेवेल कहते हैं कि इंटरनेट के दौर में रिश्ता बनाना और भी मुश्किल हो गया है क्योंकि अब चेहरा सामने नहीं होता। अब आपका डेटा और आपका बर्ताव ही आपकी शक्ल है। अगर आप अपने वफादार कस्टमर को भी वही ट्रीटमेंट दे रहे हैं जो आप कल आए नए बंदे को दे रहे हैं, तो आप उसे बेइज्जत कर रहे हैं। वफादारी का मतलब है एक लॉन्ग टर्म रिलेशनशिप, वन नाइट स्टैंड नहीं। अगर आप सिर्फ ट्रांजेक्शन पर ध्यान देंगे, तो आप एक सेल्समैन बनकर रह जाएंगे। लेकिन अगर आप कस्टमर की लाइफ में वैल्यू ऐड करेंगे, तो आप एक ब्रांड बन जाएंगे।

आजकल की मार्केटिंग में लोग फनल और कन्वर्जन के पीछे ऐसे भागते हैं जैसे लड़के जिम में डोले बनाने के पीछे। लेकिन भाई, डोले तो बन जाएंगे, दिल कैसे जीतोगे? असली खेल रिटेंशन का है। एक नए कस्टमर को लाने में ५ गुना ज्यादा पैसा खर्च होता है जितना एक पुराने कस्टमर को रोकने में लगता है। लेकिन हमारी ईगो इतनी बड़ी है कि हम पुराने को भूलकर नए के पीछे भागते रहते हैं। यह वैसी ही बेवकूफी है जैसे घर की मुर्गी को दाल बराबर समझकर बाहर चिकन टिक्का ढूंढना। अगर आप अपने मौजूदा कस्टमर्स को खास महसूस नहीं करा सकते, तो आपकी लॉयल्टी स्कीम बस रद्दी का एक टुकड़ा है। इज्जत दो, वैल्यू दो और फिर देखो कैसे आपका कस्टमर आपका मार्केटिंग मैनेजर बनकर दुनिया को आपके बारे में बताता है।


Lesson : पर्सनलाइजेशन का जादू—हर कोई खुद को शाहरुख खान समझना चाहता है

अगर आप आज भी अपने हजारों कस्टमर्स को एक ही जैसा 'हैप्पी दिवाली' वाला मैसेज भेज रहे हैं, तो समझ लीजिए कि आप अपनी मार्केटिंग की कब्र खुद खोद रहे हैं। फ्रेडरिक नेवेल की किताब लॉयल्टी डॉट कॉम का सबसे बड़ा सबक यही है कि इंटरनेट के इस दौर में अगर आप 'पर्सनलाइज्ड' नहीं हैं, तो आप गायब हैं। दुनिया में हर इंसान चाहता है कि उसे खास समझा जाए। जब कोई ब्रांड आपको आपकी पसंद की चीज बिल्कुल सही वक्त पर दिखा देता है, तो आपको लगता है कि भाई, ये तो जादू है! लेकिन असल में वो जादू नहीं, डेटा और समझदारी का सही मेल है।

मान लीजिए आपकी एक जूते की दुकान है। अब एक कस्टमर पिछले साल आपसे ८ नंबर का रनिंग शूज ले गया था। अब एक साल बाद आप उसे मैसेज भेजते हैं—हे राहुल, आपके पुराने रनिंग शूज अब शायद घिस गए होंगे, हमारे पास ८ नंबर में एक नया प्रो-एथलीट मॉडल आया है, क्या आप देखना चाहेंगे? अब सोचिए राहुल के दिल पर क्या बीतेगी! उसे लगेगा कि भाई, ये दुकानदार तो मेरा सगा भाई निकला, इसे मेरा साइज और मेरी पसंद सब याद है। वहीं दूसरी तरफ, अगर आप उसे मैसेज भेजें—धमाका सेल! लेडीज सैंडल पर ५० परसेंट ऑफ! तो राहुल आपको ब्लॉक करने में एक सेकंड भी नहीं लगाएगा। आप उसे सैंडल बेच रहे हैं और वो बेचारा मैराथन की तैयारी कर रहा है। यही फर्क है एक जीनियस मार्केटर और एक नौसिखिया सेल्समैन में।

नेवेल कहते हैं कि वन टू वन मार्केटिंग का मतलब यह नहीं कि आप हर कस्टमर के घर जाकर चाय पिएं। इसका मतलब है कि आप अपनी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके उसे यह महसूस कराएं कि आप उसे जानते हैं। जैसे नेटफ्लिक्स आपको वही फिल्में दिखाता है जो आपको पसंद आ सकती हैं, वैसे ही आपका बिजनेस भी कस्टमर की जरूरतों को पहले से भांप लेना चाहिए। आजकल की दुनिया में लोगों के पास वक्त कम है और डिस्ट्रैक्शन ज्यादा। अगर आप उन्हें वही दिखाएंगे जो वो देखना चाहते हैं, तो वो आपकी उंगली पकड़कर आपके पीछे-पीछे आएंगे।

पर्सनलाइजेशन का मतलब सिर्फ नाम लिखना नहीं होता। आजकल तो स्कैमर भी नाम लिखकर ईमेल भेजते हैं। असली पर्सनलाइजेशन का मतलब है उनकी समस्याओं का समाधान देना। अगर किसी ने आपसे पिछले महीने अपनी गाड़ी की सर्विस कराई थी, तो अगले महीने उसे याद दिलाना कि भाई, टायर चेक कराने का टाइम आ गया है, यह असली सेवा है। अगर आप कस्टमर के लिए उनकी लाइफ आसान नहीं बना रहे, तो आप बस उनके फोन की मेमोरी भर रहे हैं। याद रखिए, आज का कस्टमर बहुत होशियार है, उसे मास मार्केटिंग वाले कचरे से नफरत है। उसे चाहिए इज्जत, उसे चाहिए कद्र, और उसे चाहिए वो चीज जो सिर्फ उसके लिए बनी हो। अगर आप उसे 'खास' फील करा सकते हैं, तो वो आपको अपनी वफादारी का सर्टिफिकेट खुद ही दे देगा।


तो दोस्तों, लॉयल्टी डॉट कॉम का सार यही है कि बिजनेस सिर्फ पैसे का लेन-देन नहीं, बल्कि रिश्तों का एक डिजिटल ताना-बाना है। अगर आप डेटा को इज्जत देंगे, वफादारी को कमाएंगे और हर कस्टमर को वीआईपी जैसा महसूस कराएंगे, तो दुनिया की कोई भी मंदी आपको हिला नहीं पाएगी। अपने बिजनेस को सिर्फ एक दुकान मत बनाइए, उसे एक अनुभव बनाइए।

अब आपकी बारी है! नीचे कमेंट्स में बताएं कि क्या आप भी उन फालतू मार्केटिंग मैसेज से परेशान हैं जो आपके किसी काम के नहीं होते? और क्या आप अपने बिजनेस में इनमें से कौन सा लेसन आज से ही लागू करने वाले हैं? इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो आज भी पुराने जमाने की मार्केटिंग में अटका हुआ है। चलिए, मिलकर इस नए दौर की मार्केटिंग को समझते हैं!

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