Loyalty Rules! (Hindi)


क्या आपको सच में लगता है कि डिस्काउंट कूपन बांटकर आप कस्टमर का दिल जीत लेंगे? कितनी मासूमियत है यह! आपके कस्टमर्स आपसे उतना ही प्यार करते हैं जितना एक नेता चुनाव के बाद अपनी जनता से। अगर आप लॉयल्टी की असली पावर नहीं समझते तो समझो आप अपने बिजनेस की कब्र खुद खोद रहे हैं।

आज के इस दौर में जहां लोग एक सेकंड में ब्रांड बदल देते हैं वहां वफादारी कमाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। इसलिए आज हम लॉयल्टी रूल्स किताब से वह सीक्रेट्स जानेंगे जो आपके बिजनेस और रिश्तों को पत्थर की तरह मजबूत बना देंगे। चलिए इन 3 पावरफुल लेसन को विस्तार से समझते हैं।


Lesson : द गोल्डन रूल - जैसा करोगे वैसा भरोगे

आजकल के बिजनेस और लीडरशिप की दुनिया में लोग खुद को बहुत शाणा समझते हैं। उनको लगता है कि कस्टमर को बढ़िया सी मार्केटिंग की चाशनी में डुबोकर कुछ भी बेच देंगे और वह उम्र भर उनके पीछे दुम हिलाता रहेगा। पर भाई साहब असलियत इससे कोसों दूर है। लेखक फ्रेडरिक रीचफील्ड कहते हैं कि लॉयल्टी का सबसे पहला और बड़ा नियम वही है जो हमारी दादी नानी हमें बचपन में सिखाती थीं जिसे हम गोल्डन रूल कहते हैं। यानी दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम चाहते हो कि दूसरे तुम्हारे साथ करें। अब आप कहेंगे कि इसमें नया क्या है? नया यह है कि हम इसे भूल चुके हैं।

सोचिए आप एक मोबाइल स्टोर पर जाते हैं। वहां का सेल्समैन आपको चिपकाने की कोशिश करता है कि यह फोन ले लो इसमें रात को सूरज निकलता है। आप उसकी चिकनी चुपड़ी बातों में आकर फोन खरीद लेते हैं और घर जाकर पता चलता है कि वह तो डब्बा है। क्या आप दोबारा उस दुकान पर जाएंगे? कभी नहीं। बल्कि आप तो मोहल्ले के दस लोगों को और मना करेंगे कि वहां मत जाना वह तो लुटेरा है। यही वह जगह है जहां हम गलती करते हैं। बिजनेस में लॉयल्टी का मतलब यह नहीं है कि आपने एक बार माल बेच दिया। असली वफादारी तब शुरू होती है जब आप कस्टमर के फायदे को अपने फायदे से ऊपर रखते हैं।

भारतीय मार्केट में तो यह और भी मजेदार है। यहाँ लोग भरोसा खरीदने आते हैं सामान नहीं। अगर आप किसी को चूना लगा रहे हैं तो समझ लीजिए कि आपने सिर्फ एक सेल नहीं खोई बल्कि आपने अपनी मार्केट में इज्जत की भी बलि दे दी है। एक सच्चा लीडर वही है जो अपने कस्टमर और अपनी टीम के साथ ईमानदारी बरते। अगर आप चाहते हैं कि लोग आपके साथ वफादार रहें तो पहले आपको उनके प्रति वफादार होना पड़ेगा। यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है पर फिर भी बड़े बड़े सीइओ इसे समझने में फेल हो जाते हैं क्योंकि उनकी नजर सिर्फ अगले महीने के प्रॉफिट पर होती है।

जब आप किसी के साथ वैसा ही बर्ताव करते हैं जैसा आप खुद के लिए चाहते हैं तो एक जादुई चीज होती है जिसे भरोसा कहते हैं। और भाई साहब आज के जमाने में भरोसा वह चीज है जो सबसे महंगी बिकती है। अगर आपने भरोसा जीत लिया तो आपको डिस्काउंट देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लोग खुद चलकर आपके पास आएंगे क्योंकि उन्हें पता है कि यहाँ उन्हें धोखा नहीं मिलेगा। लेकिन याद रहे यह कोई वन टाइम डील नहीं है। आपको हर रोज हर ट्रांजेक्शन में इस गोल्डन रूल को निभाना होगा। अगर एक बार भी फिसले तो समझो खेल खत्म।

वफादारी कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप पैसे देकर खरीद सकें। इसे तो कमाना पड़ता है और इसे कमाने का इकलौता रास्ता है ईमानदारी। अगर आप अपनी टीम को संडे को भी बिना एक्स्ट्रा पैसे के काम पर बुला रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि वे आपके लिए जान दे देंगे तो आप दुनिया के सबसे बड़े मुगालते में जी रहे हैं। वफादारी दो तरफा रास्ता है। अगर आप देना नहीं जानते तो पाने की उम्मीद भी मत रखिए। इसलिए आज से ही चालाकी छोड़िए और असली इंसान बनिए। क्योंकि अंत में वही टिकता है जिसकी नीयत साफ होती है।


Lesson : नेट प्रमोटर स्कोर - क्या लोग आपकी तारीफ के कसीदे पढ़ रहे हैं?

अब बात करते हैं उस चीज की जिसे सुनकर बड़े बड़े मैनेजर्स को पसीने आ जाते हैं यानी एनपीएस या नेट प्रमोटर स्कोर। लेखक कहते हैं कि अगर आप यह जानना चाहते हैं कि आपका बिजनेस कल जिंदा रहेगा या नहीं तो बस अपने कस्टमर से एक छोटा सा सवाल पूछिए। क्या आप हमारे बारे में अपने दोस्तों या रिश्तेदारों को बताएंगे? अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें क्या बड़ी बात है। भाई साहब यही तो असली परीक्षा है। जैसे मोहल्ले की चाची किसी शादी में पनीर की सब्जी की बुराई करती हैं वैसे ही अगर आपका कस्टमर आपके बारे में चुप है तो समझ लीजिए आपका बिजनेस वेंटिलेटर पर है।

हमारे यहाँ अक्सर क्या होता है? दुकानदार सोचता है कि कस्टमर ने पैसे दे दिए और सामान लेकर चला गया तो बस काम खत्म। लेकिन असली खेल तो उसके बाद शुरू होता है। लेखक ने कस्टमर्स को तीन कैटगरी में बांटा है। पहले होते हैं प्रमोटर्स जो आपके ब्रांड के ऐसे दीवाने होते हैं जैसे कोई एक्टर के फैन। वे फ्री में आपकी मार्केटिंग करते हैं। दूसरे होते हैं पैसिव्स जो बस ठीक ठाक खुश हैं पर जैसे ही पड़ोस वाली दुकान पर दो रुपये कम मिलेंगे वे कलटी मार लेंगे। और तीसरे होते हैं डिट्रैक्टर्स जो आपसे इतने दुखी हैं कि वे इंटरनेट पर आपके नाम का मातम मनाने को तैयार बैठे हैं।

सोचिए आपने किसी नए रेस्टोरेंट से ऑनलाइन खाना मंगवाया। खाना ठंडा निकला और ऊपर से उसमें नमक भी नहीं था। अब आप क्या करेंगे? आप वहां रिव्यू सेक्शन में जाकर अपनी पूरी भड़ास निकालेंगे और कसम खाएंगे कि सात पुश्तों तक वहां से कोई ऑर्डर नहीं करेगा। यह है एक डिट्रैक्टर की पावर। वहीं दूसरी तरफ अगर रेस्टोरेंट वाला खुद फोन करके माफी मांगे और कहे कि हम आपको नया खाना फ्री में भेज रहे हैं तो शायद आप उसके फैन बन जाएं। यही वह पॉइंट है जहाँ लॉयल्टी जन्म लेती है।

सच्चाई तो यह है कि आज के जमाने में शोर बहुत है। हर कोई चिल्ला चिल्लाकर कह रहा है कि मेरा प्रोडक्ट बेस्ट है। लेकिन लोग आपकी बात पर यकीन नहीं करते। लोग उस दोस्त की बात पर यकीन करते हैं जिसने आपका सर्विस इस्तेमाल की है। अगर आपका नेट प्रमोटर स्कोर अच्छा है तो आपको करोड़ों के विज्ञापन देने की जरूरत नहीं है। आपके कस्टमर्स ही आपकी सेल्स टीम बन जाएंगे। लेकिन अगर आप सिर्फ यह देख रहे हैं कि आज गला कितना भरा है तो आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं।

नेट प्रमोटर स्कोर सिर्फ एक नंबर नहीं है यह आपकी कंपनी की सेहत का एक्स रे है। यह बताता है कि लोग आपसे दिल से जुड़े हैं या मजबूरी में। अक्सर लोग कहते हैं कि हमारे पास बहुत बड़ा कस्टमर बेस है। पर भाई साहब वह बेस है या सिर्फ एक भीड़? भीड़ को वफादार बनाने के लिए आपको उनके अनुभवों पर काम करना होगा। आपको यह समझना होगा कि एक खुश कस्टमर दस नए लोग लाता है पर एक दुखी कस्टमर सौ लोगों को भगा देता है। इसलिए चालाकी छोड़िए और फीडबैक पर ध्यान दीजिए।

अंत में बात वही आती है कि आप कितना सच बोल रहे हैं। क्या आपकी सर्विस वैसी ही है जैसा आपने वादे किए थे? अगर नहीं तो एनपीएस का मीटर कभी ऊपर नहीं जाएगा। याद रखिए वफादारी का सर्टिफिकेट कस्टमर देता है आप खुद नहीं। अगर आपके पास ऐसे लोग हैं जो आपकी पीठ पीछे भी आपकी तारीफ करते हैं तो समझ लीजिए आपने बिजनेस का सबसे बड़ा मेडल जीत लिया है। वरना तो दुनिया भरी पड़ी है ऐसे ब्रांड्स से जो आए और कब गायब हो गए किसी को पता भी नहीं चला।


Lesson : एम्प्लॉई लॉयल्टी - घर के भेदी को विभीषण मत बनने दो

अब थोड़ा आईना देखते हैं। हम अक्सर कस्टमर को राजा कहते हैं लेकिन अपने एम्प्लॉई को गुलाम की तरह ट्रीट करते हैं। लेखक फ्रेडरिक रीचफील्ड यहाँ एक कड़वा सच बताते हैं। अगर आपके ऑफिस में काम करने वाले लड़के और लड़कियां दुखी हैं तो वे आपके कस्टमर को कभी सुखी नहीं रख सकते। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप घर में लड़ाई करके बाहर किसी पार्टी में जाकर जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश करें। आपका चेहरा आपकी पोल खोल ही देगा। असली वफादारी की शुरुआत काउंटर के पीछे से होती है न कि काउंटर के सामने से।

सोचिए आप किसी बैंक में जाते हैं। वहां का कैशियर आपसे ऐसे बात करता है जैसे आपने उससे उसकी किडनी मांग ली हो। उसका चेहरा देखकर ही लगता है कि वह अपनी नौकरी से नफरत करता है। अब आप खुद बताइए क्या आप उस बैंक में दोबारा जाना चाहेंगे? बिल्कुल नहीं। लेकिन उस बेचारे कैशियर की भी क्या गलती? शायद उसके बॉस ने उसे सुबह ही सुनाया होगा या उसकी सैलरी तीन महीने से अटकी होगी। जब एक एम्प्लॉई को लगता है कि कंपनी को उसकी परवाह नहीं है तो उसे कंपनी के कस्टमर की परवाह क्यों होगी? वह तो बस अपनी शिफ्ट खत्म होने का इंतजार करेगा।

भारतीय कंपनियों में एक बड़ी बीमारी है जिसे कहते हैं माइक्रो मैनेजमेंट। बॉस को लगता है कि अगर वह हर पांच मिनट में एम्प्लॉई के सर पर खड़ा नहीं होगा तो काम नहीं होगा। यह वफादारी को मारने का सबसे आसान तरीका है। वफादारी तब पैदा होती है जब आप अपने लोगों को इज्जत देते हैं और उन पर भरोसा करते हैं। जब एक एम्प्लॉई को लगता है कि वह कंपनी का एक हिस्सा है न कि सिर्फ एक मशीन का पुर्जा तब वह अपने काम को अपनी जान बना लेता है। वह कस्टमर की मदद इसलिए नहीं करता क्योंकि उसे कहा गया है बल्कि इसलिए करता है क्योंकि उसे गर्व है कि वह आपकी कंपनी का हिस्सा है।

आजकल के स्टार्टअप कल्चर में लोगों को लगता है कि ऑफिस में एक टेबल टेनिस की टेबल रख देने से और फ्री कॉफी पिलाने से लॉयल्टी बढ़ जाएगी। भाई साहब एम्प्लॉई को कॉफी नहीं बल्कि इज्जत और ग्रोथ चाहिए। अगर आप उन्हें डराकर काम करवाएंगे तो वे आपके साथ तब तक ही हैं जब तक उन्हें दूसरा ऑफर लेटर नहीं मिल जाता। जैसे ही मौका मिलेगा वे पतली गली से निकल लेंगे और आप फिर से नई हायरिंग का विज्ञापन देते फिरेंगे। यह जो बार-बार लोगों का छोड़कर जाना है न यही आपके बिजनेस के प्रॉफिट को दीमक की तरह चाट जाता है।

एक सच्चा लीडर वह है जो अपनी टीम के लिए ढाल बनकर खड़ा होता है। जब आप अपने एम्प्लॉई की मुश्किल वक्त में मदद करते हैं तो आप उनके दिल में जगह बना लेते हैं। और जिस दिन आपने अपने एम्प्लॉई का दिल जीत लिया उस दिन समझ लीजिए कि आपने मार्केट की आधी जंग जीत ली। क्योंकि एक खुश और वफादार टीम वह जादू कर सकती है जो करोड़ों का मार्केटिंग बजट भी नहीं कर सकता। वे खुद आगे बढ़कर कस्टमर की समस्याओं को सुलझाएंगे और आपके ब्रांड की इमेज को चमकाएंगे।

तो आर्टिकल का सार यह है कि वफादारी कोई ऐसी चीज नहीं है जो आप बाहर से मांग सकें। यह एक चक्र है जो अंदर से शुरू होता है। अपने एम्प्लॉई का ख्याल रखिए वे आपके कस्टमर का ख्याल रखेंगे और कस्टमर आपके बिजनेस का ख्याल रखेगा। अगर आप इस चैन को तोड़ेंगे तो आपका बिजनेस ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। इसलिए चालाकी और शॉर्टकट छोड़िए। इंसान बनिए और इंसानों की कद्र करना सीखिए। यही लॉयल्टी रूल्स का सबसे बड़ा और आखिरी सच है।


वफादारी कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि एक चॉइस है। चाहे आपका बिजनेस छोटा हो या बड़ा अगर आपकी नीयत साफ नहीं है तो आप कभी भी लंबी रेस के घोड़े नहीं बन पाएंगे। आज ही रुकिए और सोचिए कि क्या आप अपने लोगों और अपने कस्टमर्स के साथ वह गोल्डन रूल निभा रहे हैं? अगर नहीं तो आज ही बदलाव की शुरुआत करें।

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि किसी ब्रांड की अच्छी सर्विस की वजह से आप उसके पक्के फैन बन गए हों? या फिर किसी ने आपको ऐसा चूना लगाया कि आपने वहां दोबारा कदम नहीं रखा? कमेंट्स में अपनी कहानी जरूर शेयर करें ताकि दूसरों को भी कुछ सीखने को मिले। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो अपना नया बिजनेस शुरू करने जा रहा है। याद रखिए वफादारी ही असली दौलत है।

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