MBA in a Box (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो लाखों की फीस भरकर एमबीए की डिग्री तो ले आए पर असल बिजनेस के नाम पर आज भी ढाबे वाले से कम प्रॉफिट कमा रहे हैं। आपकी महंगी डिग्री और भारी भरकम किताबें शायद धूल चाट रही हैं क्योंकि असली मार्केट में किताबी ज्ञान नहीं बल्कि प्रैक्टिकल दिमाग चलता है जो आपके पास शायद है ही नहीं।

इस आर्टिकल में हम जोएल कुर्ट्जमैन की फेमस किताब एमबीए इन ए बॉक्स से वो 3 लेसन सीखेंगे जो आपको किसी महंगे कॉलेज में नहीं सिखाए जाते। यह समरी आपके बिजनेस और करियर को देखने का नजरिया हमेशा के लिए बदल देगी।


लेसन १ : कॉम्पिटिटिव एडवांटेज - भीड़ से अलग दिखने का असली राज

अगर आपको लगता है कि सिर्फ एक दुकान खोल लेना या एक स्टार्टअप शुरू कर देना बिजनेस है तो शायद आप किसी गहरी नींद में सो रहे हैं। असलियत तो यह है कि मार्केट एक ऐसा कुरुक्षेत्र है जहाँ आपके जैसे हजारों योद्धा तलवारें लेकर खड़े हैं। अब सवाल यह है कि कस्टमर आपकी दुकान पर क्यों आएगा। क्या आपके पास कोई जादुई चिराग है। नहीं। जोएल कुर्ट्जमैन इस किताब में साफ कहते हैं कि अगर आपके पास सस्टेनेबल कॉम्पिटिटिव एडवांटेज नहीं है तो आपका बिजनेस बस एक चलती फिरती लाश है।

मान लीजिए आपने अपने मोहल्ले में एक मोमो का ठेला लगाया। अब आपके मोमो अच्छे हैं पर अगले ही हफ्ते शर्मा जी ने आपसे थोड़ा बड़ा ठेला लगा लिया और दो रुपये दाम कम कर दिए। अब आप क्या करेंगे। रोएंगे या दाम और कम करेंगे। अगर आप दाम कम करते हैं तो आप प्रॉफिट खो रहे हैं और अगर नहीं करते तो कस्टमर। इसे कहते हैं कॉम्पिटिशन के जाल में फंसना। असली कॉम्पिटिटिव एडवांटेज वो होता है जिसे शर्मा जी क्या उनका पूरा खानदान भी कॉपी न कर सके।

शायद आपके मोमो की चटनी का वो सीक्रेट मसाला जो सिर्फ आपकी दादी को पता है या फिर आपकी सर्विस का वो स्टाइल जो कस्टमर को अपनापन महसूस कराए। बिजनेस में सिर्फ सस्ता होना काफी नहीं है क्योंकि आपसे सस्ता कोई न कोई हमेशा मिल जाएगा। आपको कुछ ऐसा ढूंढना होगा जो सिर्फ और सिर्फ आपके पास हो। लोग अक्सर एमबीए की बड़ी बड़ी टर्म्स में खो जाते हैं पर वे भूल जाते हैं कि बिजनेस दिमाग से नहीं बल्कि उस यूनिक वैल्यू से चलता है जो आप टेबल पर लाते हैं।

अगर आपका प्रोडक्ट ऐसा है जिसे कल कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा कॉपी कर ले तो समझ जाइए कि आपकी उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। यह लेसन हमें सिखाता है कि अपनी स्ट्रेंथ को पहचानो और उसे इतना मजबूत बनाओ कि वो एक किला बन जाए। जब तक आप भीड़ का हिस्सा बने रहेंगे तब तक आप सिर्फ सर्वाइव करेंगे पर जिस दिन आपने अपनी यूनिक पहचान बना ली उस दिन आप मार्केट को लीड करेंगे। याद रखिए कि मार्केट में शेर और बकरी दोनों होते हैं पर घास सिर्फ बकरी खाती है और शेर अपना रास्ता खुद बनाता है।

अगले लेसन में हम देखेंगे कि कैसे सिर्फ अच्छे आइडियाज से काम नहीं चलता बल्कि उन आइडियाज को जमीन पर उतारने वाले लोग ही आपकी असली ताकत होते हैं। यह सफर अभी और भी दिलचस्प होने वाला है।


लेसन २ : पीपल मैनेजमेन्ट और लीडरशिप - चपरासी से सीईओ तक का तालमेल

अक्सर लोग सोचते हैं कि बिजनेस का मतलब सिर्फ पैसा और इन्वेंट्री का हिसाब रखना है। लेकिन सच तो यह है कि अगर आपकी टीम में दम नहीं है तो आपका करोड़ों का आईडिया भी कचरे के डिब्बे में जाएगा। जोएल कुर्ट्जमैन इस किताब में बड़े प्यार से समझाते हैं कि लीडरशिप का मतलब यह नहीं है कि आप कुर्सी पर बैठकर हुक्म चलाएं और बाकी सब आपकी आरती उतारें। असली लीडर वो है जो अपनी टीम के टैलेंट को पहचान कर उसे सही दिशा दे सके।

मान लीजिए आपकी एक छोटी सी टेक कंपनी है और आपने एक बहुत ही होनहार डेवलपर को काम पर रखा है। अब आप उस बेचारे के सिर पर हर दो मिनट में जाकर खड़े हो जाते हैं और पूछते हैं कि भाई कोड कितना हुआ। या फिर आप उसे बताते हैं कि कोडिंग कैसे करनी है जबकि आपको खुद एक्सेल शीट ढंग से चलानी नहीं आती। इसे कहते हैं माइक्रो मैनेजमेन्ट और यह किसी भी टैलेंटेड इंसान को भगाने का सबसे फास्ट तरीका है।

बिजनेस में लोग आपके सबसे बड़े एसेट होते हैं पर अगर आप उन्हें सही से मैनेज नहीं करेंगे तो वही आपकी सबसे बड़ी लायबिलिटी बन जाएंगे। एक अच्छा लीडर वो नहीं है जो सबसे ज्यादा होशियार दिखने की कोशिश करता है बल्कि वो है जो अपने से ज्यादा होशियार लोगों को एक साथ काम पर लगा देता है। अगर आप सोचते हैं कि आप अकेले ही पूरी दुनिया जीत लेंगे तो बधाई हो आप एक बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। सिकंदर के पास भी एक बहुत बड़ी आर्मी थी वरना वो अकेले सिर्फ अपने घर की सफाई ही कर पाता।

इंडिया में अक्सर बॉस को लगता है कि डरा धमका कर काम करवाना ही लीडरशिप है। लेकिन डर से सिर्फ काम होता है कमाल नहीं। जब आपकी टीम आपको रिस्पेक्ट करती है और आपकी विजन पर भरोसा करती है तब जाकर वो बिजनेस बड़ा बनता है जिसे आप सपना कहते हैं। आपको यह समझना होगा कि हर कर्मचारी की अपनी एक कहानी और अपनी एक मोटिवेशन होती है। किसी को पैसा चाहिए तो किसी को पहचान।

अगर आप एक ऐसे लीडर हैं जो क्रेडिट खुद ले जाता है और गलती होने पर टीम को सूली पर चढ़ा देता है तो समझ लीजिए कि आपके जहाज में छेद हो चुका है। इस लेसन का सार यही है कि पहले लोगों को बनाओ फिर वो लोग आपके बिजनेस को बनाएंगे। जब आप अपनी टीम का ख्याल रखते हैं तो वो आपके कस्टमर्स का ख्याल रखते हैं। यह एक सिंपल चेन है पर पता नहीं क्यों लोग इसे समझने के बजाय कॉम्प्लेक्स मैनेजमेंट थ्योरीज में उलझे रहते हैं।

जैसे एक फिल्म में हीरो के साथ साथ विलेन और कॉमेडियन का होना भी जरूरी है वैसे ही एक परफेक्ट टीम में अलग अलग स्किल्स वाले लोगों का होना जरूरी है। बस आपको उनका सही डायरेक्टर बनना है। अब जब आप समझ गए हैं कि लोगों को कैसे संभालना है तो चलिए अगले लेसन में देखते हैं कि आखिर उस कस्टमर को कैसे पटाना है जिसके लिए हम यह सारा तामझाम कर रहे हैं।


लेसन ३ : कस्टमर सेंट्रिक मार्केटिंग - दिल जीतोगे तो जेब अपने आप भरेगी

मार्केटिंग का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में क्या आता है। चमचमाते होर्डिंग्स या फिर वो टीवी एड्स जिनमें हीरो पहाड़ से कूदकर कोल्ड ड्रिंक पी रहा होता है। लेकिन जोएल कुर्ट्जमैन हमें हकीकत का आईना दिखाते हैं। वो कहते हैं कि मार्केटिंग वो नहीं है जो आप चिल्ला चिल्लाकर दुनिया को बताते हैं बल्कि मार्केटिंग वो है जो कस्टमर आपके बारे में अपने दोस्तों को बताता है। अगर आप आज भी ये सोच रहे हैं कि सिर्फ अच्छा प्रोडक्ट बना लेना काफी है तो यकीन मानिए आप उस पुराने जमाने के आशिक हैं जो खत लिखकर जवाब का इंतज़ार करता रहता है।

आप किसी ऐसी दुकान पर गए होंगे जहाँ दुकानदार आपको सामान कम और अपनी दुख भरी दास्तान ज्यादा सुनाता है या फिर वो सेल्समैन जो आपको वो चीज चिपकाने की कोशिश करता है जिसकी आपको जरूरत ही नहीं है। क्या आप दोबारा वहां जाएंगे। बिल्कुल नहीं। असली मार्केटिंग का मतलब है कस्टमर की उस प्रॉब्लम को पकड़ना जिसे वो खुद भी शायद ठीक से नहीं समझ पा रहा। जब आप कस्टमर को ये महसूस कराते हैं कि आप उसका फायदा चाहते हैं न कि सिर्फ अपनी जेब भरना तब आप एक ट्रांजैक्शन नहीं बल्कि एक रिश्ता बना रहे होते हैं।

आज के सोशल मीडिया के दौर में कस्टमर बहुत चालाक हो गया है। वो आपकी मार्केटिंग की चिकनी चुपड़ी बातों को सेकंडों में पकड़ लेता है। अगर आपका फोकस सिर्फ सेल पर है तो आप एक सेल्समैन हैं पर अगर आपका फोकस सॉल्यूशन पर है तो आप एक मार्केटर हैं। लोग प्रोडक्ट नहीं खरीदते बल्कि वो एक फीलिंग या एक सॉल्यूशन खरीदते हैं। एप्पल सिर्फ फोन नहीं बेचता वो एक स्टेटस बेचता है और डोमिनोज सिर्फ पिज्जा नहीं बेचता वो ३० मिनट की भूख का सुकून बेचता है।

अक्सर बिजनेस ओनर अपनी ही तारीफ के पुल बांधते रहते हैं कि मेरा प्रोडक्ट ये है मेरी सर्विस वो है। भाई साहब कस्टमर को आपके 'मैं' में कोई इंटरेस्ट नहीं है। उसे बस ये जानना है कि इसमें 'मेरा' क्या फायदा है। अगर आप उसकी लाइफ को 1% भी आसान बना सकते हैं तो वो खुशी खुशी आपको पैसे देगा। यहाँ सार्काज्म की बात ये है कि कंपनियां करोड़ों रुपये एड्स पर खर्च कर देती हैं पर अपने कस्टमर केयर पर बैठने वाले चिड़चिड़े इंसान को तमीज से बात करना नहीं सिखा पातीं।

जब तक आप अपने कस्टमर के जूते में पैर डालकर नहीं देखेंगे तब तक आपको पता नहीं चलेगा कि कांटा कहाँ चुभ रहा है। मार्केटिंग का असली जादू तब होता है जब कस्टमर को लगे कि यार ये ब्रांड तो बिल्कुल मेरे जैसा सोचता है। तो अब वक्त आ गया है कि आप अपने प्रोडक्ट के फीचर्स गिनवाना बंद करें और कस्टमर की वैल्यू पर ध्यान दें। क्योंकि इस गेम में वही जीतता है जिसका कस्टमर उसके लिए एडवर्टाइजमेंट करता है।


एमबीए इन ए बॉक्स हमें ये सिखाती है कि बिजनेस कोई रॉकेट साइंस नहीं है बल्कि ये कॉमन सेंस का सही इस्तेमाल है। अपनी एक अलग पहचान बनाइए अपनी टीम को परिवार की तरह संभालिए और अपने कस्टमर के दिल में जगह बनाइए। अगर आपने इन तीन चीजों पर काम कर लिया तो आपको किसी भारी भरकम डिग्री की जरूरत नहीं पड़ेगी।

क्या आप भी अपने बिजनेस या करियर में वही पुरानी गलतियां कर रहे हैं। नीचे कमेंट्स में बताएं कि इन ३ लेसन्स में से कौन सा लेसन आपकी आँखें खोलने वाला था। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो बिना प्लान के स्टार्टअप खोलने का सपना देख रहा है। याद रखिए सीखना बंद तो जीतना बंद।

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