आप अपनी पूरी लाइफ एक चूहे की तरह बस भागते ही रह जाएंगे और अंत में आपके हाथ सिर्फ थकान और अधूरापन लगेगा। अगर आपको लगता है कि सिर्फ पैसा कमाना ही सक्सेस है तो मुबारक हो आप अपनी जिंदगी बर्बाद करने की राह पर बिल्कुल सही जा रहे हैं।
जस्ट इनफ किताब हमें सिखाती है कि असली कामयाबी की भूख कभी खत्म नहीं होती जब तक आप इसके असली पिलर्स को न समझ लें। आइए इस आर्टिकल में उन 3 लेसन्स को गहराई से समझते हैं जो आपकी वर्क और लाइफ दोनों को पूरी तरह बदल देंगे।
लेसन १ : सक्सेस के चार पिलर्स और बैलेंस का असली खेल
अक्सर हम सबको लगता है कि अगर बैंक बैलेंस में सात जीरो आ जाएं तो लाइफ सेट हो जाएगी। हम पागलों की तरह काम करते हैं और अपनी हेल्थ और रिश्तों की बलि चढ़ा देते हैं। लेकिन लॉरा नैश और हॉवर्ड स्टीवेन्सन कहते हैं कि यह सक्सेस नहीं बल्कि एक जाल है। असली सक्सेस एक वन-डायमेंशनल गेम नहीं है। यह तो एक ऐसी थाली है जिसमें दाल, चावल, सब्जी और अचार सबका होना जरूरी है। अगर सिर्फ चावल ही खाते रहोगे तो बोरियत तो होगी ही और न्यूट्रिशन भी नहीं मिलेगा। किताब में सक्सेस के चार पिलर्स बताए गए हैं: खुशी, उपलब्धि, प्रभाव और विरासत।
मान लीजिए आपका एक दोस्त है जिसका नाम है शर्मा जी। शर्मा जी अपनी कंपनी के टॉप परफॉर्मर हैं। उनका प्रमोशन हो रहा है और बोनस भी तगड़ा मिल रहा है। इसे हम कहेंगे उपलब्धि यानी अचीवमेंट। लेकिन क्या शर्मा जी खुश हैं। ऑफिस के चक्कर में उन्होंने अपनी कमर का बैंड बजवा लिया है और उनके बच्चे उन्हें अंकल बोलकर बुलाते हैं क्योंकि वो घर पर दिखते ही नहीं। यहाँ उनकी खुशी गायब है। अब बात करते हैं प्रभाव यानी इम्पैक्ट की। शर्मा जी इतना कमा रहे हैं लेकिन क्या वो किसी की मदद कर पा रहे हैं। क्या उनका काम समाज में कोई बदलाव ला रहा है। और अंत में आती है विरासत यानी लिगेसी। क्या उनके जाने के बाद लोग उन्हें एक चिड़चिड़े बॉस की तरह याद रखेंगे या एक ऐसे इंसान की तरह जिसने दूसरों का हाथ थामा।
ज्यादातर लोग सिर्फ उपलब्धि के पीछे भागते हैं और बाकी तीन पिलर्स को कचरे के डिब्बे में डाल देते हैं। यह वैसा ही है जैसे आप अपनी गाड़ी के चार टायरों में से सिर्फ एक में ही हवा भरते रहें। नतीजा क्या होगा। गाड़ी चलेगी नहीं बल्कि घिसटेगी और बीच रास्ते में धुआं छोड़ देगी। सक्सेस का मतलब यह नहीं है कि आप हर चीज में 100 परसेंट स्कोर करें। अगर आप ऐसा करने की कोशिश करेंगे तो आप जल्दी ही पागलखाने के चक्कर काटते नजर आएंगे। असल में आपको हर पिलर में बस इतना हासिल करना है जो आपके लिए पर्याप्त हो।
लोग अक्सर दूसरों की लाइफ देखकर अपनी सक्सेस नापते हैं। पड़ोसी ने नई एसयूवी ले ली तो आपको अपनी छोटी कार में शर्म आने लगती है। भले ही आपकी कार आपको ऑफिस और घर सही सलामत पहुंचा रही हो। यह तुलना ही हमारे मानसिक सुकून की सबसे बड़ी दुश्मन है। किताब हमें सिखाती है कि जब तक आप खुद के लिए यह तय नहीं करेंगे कि आपके लिए कितना पर्याप्त है तब तक आप एक अंतहीन रेस का हिस्सा बने रहेंगे। यह वैसा ही है जैसे एक बफे में जाकर आप सब कुछ खाने की कोशिश करें और अंत में पेट खराब करके घर लौटें। सक्सेस का मतलब है अपनी लिमिट्स को समझना और उन चार पिलर्स के बीच एक ऐसा बैलेंस बनाना जिससे आपको रात को चैन की नींद आए और सुबह उठने का मन करे।
लेसन २ : जस्ट इनफ का कांसेप्ट और परफेक्ट बनने का भूत
हम सभी के अंदर एक छोटा सा परफेक्शनिस्ट बैठा होता है जो कहता है कि या तो टॉप करो या फिर मैदान ही छोड़ दो। यह एप्रोच सुनने में तो बहुत कूल लगती है लेकिन हकीकत में यह आपकी लाइफ का कबाड़ा कर देती है। किताब हमें सिखाती है कि हर चीज में नंबर वन बनने की जिद आपको कहीं का नहीं छोड़ेगी। अगर आप ऑफिस में सबसे बेस्ट एम्प्लॉई बनना चाहते हैं और साथ ही साथ सबसे बेस्ट पिता, सबसे बेस्ट जिम फ्रीक और सबसे बेस्ट कुक भी बनना चाहते हैं तो बधाई हो आप जल्दी ही हॉस्पिटल के बेड पर मिलेंगे। लॉरा नैश कहती हैं कि हमें परफेक्ट नहीं बल्कि पर्याप्त यानी जस्ट इनफ बनने पर ध्यान देना चाहिए।
मान लीजिए आप एक पेंटर हैं। अब आप एक ऐसी पेंटिंग बनाना चाहते हैं जो दुनिया की सबसे खूबसूरत हो। आप उस पर सालों लगा देते हैं और हर छोटे बिंदु को ठीक करने में लगे रहते हैं। नतीजा क्या होता है। न तो आपकी पेंटिंग पूरी होती है और न ही आप दूसरी पेंटिंग्स बना पाते हैं। वहीं दूसरा पेंटर है जो अपनी पेंटिंग को एक लेवल तक ले जाकर कहता है कि बस यह अब देखने में काफी अच्छी है और इसे पूरा कर देता है। वह अपनी लाइफ के बाकी हिस्सों जैसे परिवार और दोस्तों को भी समय दे पाता है। आपको क्या लगता है कि कौन ज्यादा खुश है। जाहिर है दूसरा वाला क्योंकि उसने जस्ट इनफ की पावर को समझ लिया है।
आजकल के सोशल मीडिया के दौर में हमें लगता है कि हमारी लाइफ एक फिल्म की तरह परफेक्ट होनी चाहिए। ब्रेकफास्ट की फोटो से लेकर काम करने के डेस्क तक सब कुछ चमकता हुआ दिखना चाहिए। लेकिन असल लाइफ में डेस्क पर फाइलों का ढेर होता है और चाय का कप आधा खाली होता है। अगर आप हर छोटी चीज को कंट्रोल करने की कोशिश करेंगे तो आप अपनी लाइफ को जी नहीं पाएंगे बल्कि बस उसे मैनेज करते रह जाएंगे। जस्ट इनफ का मतलब यह नहीं है कि आप मेहनत करना छोड़ दें या आलसी बन जाएं। इसका मतलब है यह जानना कि कब रुकना है।
जस्ट इनफ एक ऐसी सीमा है जहाँ आप अपनी उपलब्धि से संतुष्ट होते हैं और आपके पास दूसरे जरूरी काम के लिए एनर्जी बचती है। अगर आप दिन के 18 घंटे काम करके करोड़ों कमा रहे हैं लेकिन उस पैसे को खर्च करने के लिए आपके पास वक्त नहीं है या उसे एन्जॉय करने के लिए शरीर में ताकत नहीं है तो वह पैसा सिर्फ कागज का टुकड़ा है। सक्सेसफुल लोग जानते हैं कि उन्हें अपनी एनर्जी को कैसे डिवाइड करना है। वे हर बॉल पर छक्का मारने की कोशिश नहीं करते बल्कि मैच जीतने पर ध्यान देते हैं। जब आप पर्याप्त की कला सीख लेते हैं तो आप उस मानसिक दबाव से आजाद हो जाते हैं जो आपको हर वक्त और ज्यादा पाने के लिए उकसाता रहता है। लाइफ कोई ऐसी रेस नहीं है जिसे आपको जीतना है बल्कि यह एक सफर है जिसे आपको एन्जॉय करना है।
लेसन ३ : जुगलिंग नहीं सीक्वेंसिंग और लाइफ का टाइम टेबल
दुनिया हमें सिखाती है कि आपको मल्टीटास्किंग का मास्टर होना चाहिए। एक हाथ में लैपटॉप, दूसरे में बच्चे का डायपर और कान पर फोन लगा होना चाहिए। इसे लोग 'जुगलिंग' कहते हैं। लेकिन सच तो यह है कि इंसान कोई सर्कस का जोकर नहीं है जो एक साथ पांच गेंदें हवा में घुमाता रहे। कभी न कभी एक गेंद तो नीचे गिरेगी ही और अक्सर वह गेंद आपकी हेल्थ या आपके रिश्ते होते हैं। लॉरा नैश और हॉवर्ड स्टीवेन्सन कहते हैं कि लाइफ में जुगलिंग करने के बजाय 'सीक्वेंसिंग' पर ध्यान दो। इसका मतलब है कि एक समय पर एक ही चीज को अपनी प्रायोरिटी बनाओ।
कल्पना कीजिए आप एक बहुत बड़े शेफ बनना चाहते हैं और साथ ही साथ आपको दुनिया भी घूमनी है और एक किताब भी लिखनी है। अगर आप ये तीनों काम एक ही महीने में करने की कोशिश करेंगे तो आप न तो अच्छी बिरयानी बना पाएंगे और न ही आपकी किताब के पन्ने भरे जाएंगे। आप बस एयरपोर्ट के चक्कर काटते हुए फ्रस्ट्रेट होते रहेंगे। सीक्वेंसिंग कहती है कि पहले दो साल अपनी कुकिंग पर फोकस करो और शेफ बनो। जब वहां चीजें सेट हो जाएं तब ट्रेवलिंग शुरू करो और फिर अपने अनुभवों पर किताब लिखो। लाइफ एक लंबी फिल्म है, इसे एक छोटे से ट्रेलर में समेटने की कोशिश मत कीजिए।
हमारे समाज में एक प्रेशर है कि 25 की उम्र में नौकरी, 28 में शादी और 30 तक अपना घर होना ही चाहिए। इस चक्कर में लोग लाइफ के मजे लेना भूल जाते हैं। वे बस चेकलिस्ट टिक करने में लगे रहते हैं। सीक्वेंसिंग हमें आजादी देती है कि हम अपनी लाइफ को अपने हिसाब से जिएं। अगर आप अभी अपने करियर के पीक पर हैं तो हो सकता है कि आप अपनी हॉबीज को थोड़ा कम समय दें। और यह बिल्कुल ठीक है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप अपनी हॉबीज को हमेशा के लिए मार दें। बस उनका नंबर थोड़ा बाद में आएगा।
बहुत से लोग सोचते हैं कि अगर वो आज मेहनत नहीं करेंगे तो वो पीछे रह जाएंगे। इसी डर यानी फोमो के चक्कर में वो अपनी लाइफ के सबसे खूबसूरत साल ऑफिस की कुर्सी पर बैठकर बिता देते हैं। वे सोचते हैं कि रिटायरमेंट के बाद घूमेंगे, लेकिन तब तक घुटने जवाब दे चुके होते हैं। सीक्वेंसिंग हमें सिखाती है कि कब रुकना है और कब गियर बदलना है। लाइफ के हर पड़ाव की अपनी डिमांड होती है। कभी काम को आगे रखना पड़ता है तो कभी परिवार को। स्मार्ट इंसान वो नहीं है जो सब कुछ एक साथ पकड़ता है, बल्कि वो है जिसे पता है कि किस समय कौन सी चीज छोड़नी है।
याद रखिए कि सक्सेस का कोई फिक्स फॉर्मूला नहीं है। यह आपकी अपनी बनाई हुई एक रेसिपी है। जस्ट इनफ का मतलब है अपनी भूख को पहचानना और उतना ही खाना जितना हजम हो सके। अगर आप दूसरों की थाली देखकर अपना पेट भरेंगे तो बदहजमी होना तय है। अपनी लाइफ के खुद डायरेक्टर बनिए और हर सीन को पूरी शिद्दत से जिएं। अब वक्त है रुकने का, सोचने का और अपनी सक्सेस को नए सिरे से डिफाइन करने का। क्या आप तैयार हैं अपनी शर्तों पर एक कामयाब जिंदगी जीने के लिए। फैसला आपके हाथ में है।
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