क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो दिन भर गधे की तरह मेहनत करते हैं लेकिन रिजल्ट के नाम पर हाथ में सिर्फ थकावट और जीरो प्रोग्रेस आती है? अगर आप हर छोटी लड़ाई जीतने के चक्कर में अपना कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं तो मुबारक हो आप फेल होने की राह पर हैं।
आज के इस आर्टिकल में हम पीटर किलिंग और थॉमस मलनैट की किताब मस्ट विन बैटल्स से वो ३ बड़े लेसन सीखेंगे जो आपको हर फालतू काम छोड़कर सिर्फ अपनी असली जीत पर फोकस करना सिखाएंगे ताकि आप भी एक विनर की तरह जियें।
लेसन १ : असली जंग की पहचान करो या हारने के लिए तैयार रहो
आजकल के कॉर्पोरेट जगत या बिजनेस की दुनिया में लोग खुद को इतना बिजी दिखाते हैं जैसे नासा का अगला रॉकेट यही लॉन्च करने वाले हैं। सुबह ९ बजे से रात के ९ बजे तक मीटिंग पर मीटिंग और ईमेल का ऐसा अंबार जैसे कोई सरकारी दफ्तर हो। लेकिन अगर ध्यान से देखें तो इनमें से ८० परसेंट काम सिर्फ कचरा होते हैं। मस्ट विन बैटल्स का सबसे पहला और कड़वा लेसन यही है कि अगर आप हर छोटी-मोटी समस्या को अपनी पर्सनल जंग बना लेंगे तो असली जीत कभी आपके पास नहीं फटकेगी। असली लीडर वो नहीं है जो हर छेद को भरने की कोशिश करे बल्कि वो है जिसे पता हो कि कौन सी दीवार गिरानी है और कौन सा किला जीतना है।
मान लीजिए आपकी लाइफ एक क्रिकेट मैच है। अब अगर आप हर आती-जाती बॉल पर बल्ला घुमाएंगे तो बाउंड्री लगना तो दूर आप बहुत जल्दी आउट होकर पवेलियन में समोसे खाते नजर आएंगे। लोग अक्सर अपनी एनर्जी उन प्रोजेक्ट्स पर बर्बाद करते हैं जिनका रिजल्ट जीरो होता है। जैसे वो ऑफिस का दोस्त जो प्रिंटर ठीक करने में २ घंटे लगा देता है जबकि उसे करोड़ों की डील पर काम करना चाहिए था। इसे ही कहते हैं अपनी कुल्हाड़ी को गलत पेड़ पर चलाना।
किताब कहती है कि आपको अपनी उन ३ या ५ लड़ाइयों को पहचानना होगा जो आपके बिजनेस या करियर का नक्शा बदल सकती हैं। इसे ही मस्ट विन बैटल कहा जाता है। बाकी सब सिर्फ शोर है जिसे इग्नोर करना सीखना ही असली टैलेंट है। अगर आप एक मैनेजर हैं और अपनी टीम के साथ हर छोटी बात पर बहस कर रहे हैं कि कॉफी की मशीन कहाँ रखी जाएगी तो यकीन मानिए आप हार रहे हैं। आपके लिए असली जंग वो होनी चाहिए जिससे कंपनी का रेवेन्यू बढ़े या कस्टमर खुश हो।
लोग अक्सर डर की वजह से असली लड़ाइयों से बचते हैं। उन्हें लगता है कि बड़े गोल्स सेट किए और फेल हो गए तो बेइज्जती होगी। इसलिए वो छोटी-छोटी जीत में खुश रहते हैं। यह वैसी ही बात हुई कि आप अपनी शादी की तैयारी छोड़कर इस बात पर रिसर्च कर रहे हैं कि मेहमानों को दी जाने वाली टॉफी का रैपर कौन से कलर का होगा। सार्केस्टिक बात तो यह है कि जब आप हारते हैं तो कोई यह नहीं पूछता कि आपने कितनी छोटी लड़ाइयां जीतीं। दुनिया सिर्फ ये देखती है कि आपने वो बड़ा कप उठाया या नहीं।
इसलिए अपनी लिस्ट बनाइये। उस लिस्ट में से फालतू के ताम-झाम को बाहर फेंकिये। अगर आपकी टीम को ये नहीं पता कि इस साल की सबसे बड़ी प्राथमिकता क्या है तो आप एक ऐसी बस चला रहे हैं जिसके ड्राइवर को रास्ता नहीं पता और सवारी को ये नहीं पता कि जाना कहाँ है। असली जंग को पहचानना ही आपको भीड़ से अलग करता है। जब आप फोकस करना सीख जाते हैं तो आपकी ताकत कई गुना बढ़ जाती है। याद रखिये जो हर जगह जीतने की कोशिश करता है वो असल में कहीं भी नहीं जीतता।
लेसन २ : दिल और दिमाग का कनेक्शन वरना टीम है सिर्फ एक इल्यूजन
आपने कई बार देखा होगा कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के बोर्डरूम में सूट-बूट पहनकर लोग ऐसे बैठते हैं जैसे दुनिया का सारा ज्ञान इन्हीं की जेब में है। सब एक-दूसरे की बात पर सिर हिलाते हैं लेकिन जैसे ही मीटिंग खत्म होती है सब अपने-अपने केबिन में जाकर एक-दूसरे की बुराई शुरू कर देते हैं। पीटर किलिंग और थॉमस मलनैट कहते हैं कि अगर आपकी टीम सिर्फ दिमाग से आपके साथ है और दिल से नहीं तो आपकी मस्ट विन बैटल शुरू होने से पहले ही खत्म हो चुकी है। इसे कहते हैं इमोशनल और इंटेलेक्चुअल एंगेजमेंट का अभाव।
जरा सोचिए आप एक फुटबॉल टीम के कोच हैं। आपने खिलाड़ियों को ब्लैकबोर्ड पर पूरा मैप समझा दिया कि गोल कैसे करना है। खिलाड़ियों ने समझ भी लिया। इसे कहते हैं दिमाग का इस्तेमाल। लेकिन अगर मैदान में उतरते वक्त उनका मन ही नहीं है या वो एक-दूसरे को पास ही नहीं देना चाहते तो क्या वो जीतेंगे? बिल्कुल नहीं। वो बस मैदान में टहलकर वापस आ जाएंगे। आजकल के ऑफिसों में भी यही होता है। बॉस चिल्ला-चिल्ला कर टारगेट समझाता है और एम्प्लॉई मन ही मन सोचता है कि भाई तू चुप हो जा मुझे बस घर जाकर नेटफ्लिक्स देखना है।
असली जीत तब मिलती है जब टीम के हर मेंबर को ये महसूस हो कि ये लड़ाई उसकी अपनी है। जब तक आप लोगों के इमोशंस को अपने गोल से नहीं जोड़ते तब तक वो सिर्फ उतना ही काम करेंगे जिससे उनकी नौकरी बची रहे। वो एक्स्ट्रा मेहनत कभी नहीं करेंगे। सार्केस्टिक बात तो ये है कि कई लीडर्स को लगता है कि सिर्फ ज्यादा सैलरी देने से लोग मोटिवेटेड रहेंगे। भाई साहब पैसा बिल भर सकता है पर जुनून पैदा नहीं कर सकता। अगर पैसे से सब होता तो दुनिया की हर अमीर कंपनी का हर प्रोजेक्ट हिट होता।
मान लीजिए आपकी टीम एक नया ऐप लॉन्च कर रही है। अगर टीम को सिर्फ ये पता है कि कोडिंग कैसे करनी है तो वो बस एक रोबोट की तरह कोड लिख देंगे। लेकिन अगर उन्हें ये पता है कि ये ऐप किसी की जिंदगी आसान बना सकता है और इस जीत में उनका नाम होगा तो वो अपनी नींद कुर्बान कर देंगे। इसे कहते हैं दिल से जुड़ना। बिना दिल के जुड़ाव के कोई भी बड़ा मिशन सिर्फ कागजों पर ही अच्छा लगता है।
ज्यादातर लीडर्स ये गलती करते हैं कि वो सिर्फ इंस्ट्रक्शन देते हैं। वो ये भूल जाते हैं कि सामने वाला भी एक इंसान है जिसके अपने सपने और डर हैं। अगर आप अपनी टीम के बीच बैठकर उनके मतभेदों को सुलझा नहीं सकते और उन्हें एक कॉमन गोल के लिए एक्साइटेड नहीं कर सकते तो आप लीडर नहीं सिर्फ एक महंगे चौकीदार हैं। जब टीम के बीच तालमेल होता है तो असंभव काम भी मजाक लगने लगते हैं। लेकिन जब तालमेल नहीं होता तो एक छोटी सी ईमेल भेजना भी माउंट एवरेस्ट चढ़ने जैसा भारी लगता है।
सच्चाई तो ये है कि जंग हथियारों से नहीं बल्कि हौसलों से जीती जाती है। और हौसला तब आता है जब आपके पीछे खड़ा इंसान आप पर भरोसा करता हो। अगर आपके ऑफिस में लोग एक-दूसरे की टांग खींचने में बिजी हैं तो समझ जाइये कि आपकी नाव में छेद है और समंदर बहुत गहरा है। इसलिए अपनी टीम के दिमाग के साथ-साथ उनके दिल का दरवाजा खटखटाना सीखिए। जब सब एक ही सुर में गाएंगे तभी संगीत पैदा होगा वरना सिर्फ शोर सुनाई देगा।
लेसन ३ : तालमेल का तमाशा छोड़ो और एक यूनिट बनो
क्या आपने कभी किसी ऐसी शादी देखी है जहाँ दूल्हे के पिता और दुल्हन के चाचा के बीच इस बात पर युद्ध छिड़ा हो कि पनीर की सब्जी में नमक कम है? शादी का मेन गोल था जोड़े को आशीर्वाद देना पर सब बिजी हैं एक-दूसरे को नीचा दिखाने में। ठीक ऐसा ही हाल हमारे कॉर्पोरेट ऑफिसेस और बिजनेस टीम्स का होता है। मस्ट विन बैटल्स का तीसरा और सबसे जरूरी लेसन है टीम का आपसी अलाइनमेंट। किताब साफ कहती है कि अगर लीडरशिप टीम के अंदर ही कोल्ड वॉर चल रही है तो बाहर की जंग जीतने का सपना देखना छोड़ दीजिये।
ज्यादातर कंपनियों में सीनियर मैनेजर्स के अपने-अपने अलग साम्राज्य होते हैं। मार्केटिंग वाला सेल्स वाले को अपना दुश्मन समझता है और ऑपरेशंस वाले को लगता है कि बाकी सब तो बस ऑफिस में पिकनिक मनाने आते हैं। ये लोग एक ही कंपनी का आईकार्ड पहनते हैं पर काम ऐसे करते हैं जैसे अलग-अलग देशों के जासूस हों। सार्केस्टिक बात तो ये है कि ये सब बाहर से बहुत प्रोफेशनल दिखने की एक्टिंग करते हैं लेकिन अंदर ही अंदर एक-दूसरे की फाइलों में आग लगाने का मौका ढूंढते हैं। अगर आपकी लीडरशिप टीम एक ही पेज पर नहीं है तो आपकी स्ट्रेटेजी सिर्फ एक रद्दी कागज का टुकड़ा है।
कल्पना कीजिये आप एक नाव में बैठे हैं और आपके पास ४ चप्पू चलाने वाले लोग हैं। २ लोग आगे की तरफ चप्पू चला रहे हैं और २ लोग पीछे की तरफ। नाव की जगह वही रहेगी पर सबको लगेगा कि वो बहुत मेहनत कर रहे हैं और पसीना बहा रहे हैं। इसे ही कहते हैं बिना तालमेल की मेहनत। एक असली मस्ट विन बैटल जीतने के लिए सबको अपनी ईगो को डस्टबिन में डालना पड़ता है। आपको ये तय करना होगा कि कंपनी का गोल आपके पर्सनल प्रमोशन या डिपार्टमेंट के बजट से कहीं ज्यादा बड़ा है।
रियल लाइफ में अक्सर लोग मीटिंग्स में 'हां' बोल देते हैं पर बाहर निकलते ही 'पर' और 'लेकिन' की दुकान खोल लेते हैं। इस किताब के लेखक कहते हैं कि लीडर्स के बीच कड़वी और सीधी बातचीत होना बहुत जरूरी है। जब तक आप टेबल पर बैठकर एक-दूसरे की आँखों में आँखें डालकर सच नहीं बोलेंगे तब तक असली तालमेल नहीं आएगा। ये वैसी ही बात है जैसे किसी फटे हुए ढोल को आप जोर-जोर से बजाकर ये उम्मीद करें कि उसमें से मधुर संगीत निकलेगा। पहले उस ढोल को ठीक करना होगा।
जब एक टीम के बीच सच्चा अलाइनमेंट होता है तो रिसोर्सेज का सही इस्तेमाल होता है। तब आपको बार-बार ये नहीं पूछना पड़ता कि कौन क्या कर रहा है। विश्वास का लेवल इतना हाई होता है कि आप अपनी पीठ दिखाकर भी लड़ाई लड़ सकते हैं क्योंकि आपको पता है कि आपका पार्टनर आपके पीछे खड़ा है। लेकिन अगर आपको अपने ही साथ वाले से डर लग रहा है तो आप दुश्मन से क्या खाक लड़ेंगे? एकता में बल है ये बात हम बचपन से सुन रहे हैं पर इसे ऑफिस में लागू करना ही सबसे बड़ा टास्क है।
सफलता किसी एक इंसान का शो नहीं होती। ये उन लोगों की मेहनत का नतीजा होती है जो एक ही दिशा में अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। अगर आप अपनी टीम के बीच के मतभेदों को खत्म करके उन्हें एक मस्ट विन बैटल के लिए तैयार कर लेते हैं तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती। हार और जीत के बीच का असली फर्क सिर्फ यही है कि आप अकेले लड़ रहे हैं या एक मजबूत मुट्ठी बनकर।
तो, क्या आप तैयार हैं अपनी उन फालतू की लड़ाइयों को छोड़कर असली जंग जीतने के लिए? याद रखिये वक्त बहुत कम है और गोल्स बहुत बड़े। आज ही अपनी टीम के साथ बैठिये और अपनी मस्ट विन बैटल्स को पहचानिये। अगर आप अभी नहीं जागे तो कल आप भी उन्हीं लोगों की भीड़ का हिस्सा होंगे जो सिर्फ मेहनत करना जानते हैं पर जीतना नहीं। इस आर्टिकल को अपने उस टीम मेंबर या दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो हर फालतू काम में बिजी रहता है और उसे बताइये कि असली विनर कैसे बनते हैं। कमेंट्स में अपनी सबसे बड़ी जंग के बारे में जरूर बताइये।
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