Overachievement (Hindi)


आप अभी भी स्मार्ट गोल्स बना रहे हैं और खुद को स्ट्रेस फ्री रखने की कोशिश कर रहे हैं। बधाई हो आप अपनी लाइफ बर्बाद करने की सही राह पर हैं। जब दुनिया के टॉप परफॉरमर प्रेशर में मजा ले रहे हैं तब आप शांति ढूंढ रहे हैं। यह एवरेज सोच आपको कही नहीं ले जाएगी।

आज हम जॉन एलियट की किताब ओवरअचीवमेंट से वह सीक्रेट्स जानेंगे जो आम लोगों की समझ से बाहर हैं। यह आर्टिकल आपकी परफॉरमेंस की पुरानी सोच को पूरी तरह बदल देगा और आपको एक्सेप्शनल बना देगा। आइये इन ३ पावरफुल लेसन को गहराई से समझते हैं।


लेसन १ : द ट्रस्टिंग माइंडसेट: सोचना बंद करो और करना शुरू करो

क्या आपको याद है जब आप पहली बार साइकिल चलाना सीख रहे थे। तब आप हैंडल को ऐसे पकड़ते थे जैसे वह आपकी जान बचाएगा और आपका पूरा ध्यान इस पर होता था कि गिरना नहीं है। नतीजा क्या हुआ। आप धड़ाम से नीचे गिरे। लेकिन आज जब आप बाइक या कार चलाते हैं तो क्या आप सोचते हैं कि कब क्लच दबाना है या कब गियर बदलना है। नहीं न। आप फोन पर बात कर लेते हैं या बगल वाले की बुराई भी कर लेते हैं और गाड़ी अपने आप सही चलती रहती है। यही है ट्रस्टिंग माइंडसेट का जादू।

जॉन एलियट कहते हैं कि दुनिया के सबसे बड़े ओवरअचीवर्स ट्रेनिंग के वक्त तो बहुत सोचते हैं लेकिन परफॉरमेंस के वक्त अपना दिमाग घर पर छोड़कर आते हैं। इसे वह ट्रेनिंग माइंडसेट बनाम ट्रस्टिंग माइंडसेट कहते हैं। ट्रेनिंग माइंडसेट वह है जो आप ऑफिस की मीटिंग से पहले या एग्जाम की तैयारी के वक्त इस्तेमाल करते हैं। वहां आपको कमियां निकालनी चाहिए और लॉजिक लगाना चाहिए। लेकिन जब मैदान में उतरने की बारी आए तो खुद का जज बनना बंद कर दीजिये।

दिक्कत यह है कि हम में से ज्यादातर लोग परफॉर्म करते समय भी खुद को इंस्ट्रक्शन देते रहते हैं। जैसे कि प्रेजेंटेशन देते वक्त आप अंदर ही अंदर खुद से कह रहे होते हैं कि हाथ ज्यादा मत हिलाना या आवाज़ ऊंची रखना। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी को रास्ता बता रहे हों और वह ड्राइवर आपसे पूछे कि क्लच कितने इंच दबाना है। अगर वह इतना सोचेगा तो एक्सीडेंट पक्का है।

एक्सेप्शनल लोग जानते हैं कि उन्होंने जितनी मेहनत करनी थी वह कर ली है। अब बस उन्हें अपने शरीर और टैलेंट को रास्ता देने की ज़रूरत है। आपने देखा होगा कि जब आप किसी बहुत ज़रूरी काम को लेकर बहुत ज्यादा कॉन्शियस हो जाते हैं तो आप वही गलती कर बैठते हैं जिससे आप डर रहे थे। इसे चोकिंग कहते हैं। और मज़े की बात यह है कि आप जितना ज्यादा परफेक्शन के पीछे भागेंगे आप उतना ही गंदा परफॉर्म करेंगे।

अगर आप चाहते हैं कि आपका काम दूसरों से अलग दिखे तो खुद पर शक करना बंद कीजिये। अपनी स्किल्स पर भरोसा रखिये जैसे आप अपने फेफड़ों पर भरोसा रखते हैं कि वह सांस ले ही लेंगे। जब आप सोचना छोड़ देते हैं तभी आपकी असली क्रिएटिविटी बाहर आती है। अगर आप हर स्टेप पर खुद का इंटरव्यू लेंगे कि भाई तू सही कर रहा है या नहीं तो आप कभी भी उस फ्लो स्टेट में नहीं पहुँच पाएंगे जहाँ दुनिया के टॉप १ परसेंट लोग रहते हैं। तो अगली बार जब प्रेशर वाला काम आए तो अपने दिमाग को छुट्टी दीजिये और अपने हुनर को बोलने दीजिये।


लेसन २ : स्ट्रेस को एन्जॉय करना: प्रेशर आपका दुश्मन नहीं दोस्त है

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो प्रेशर देखते ही ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। और दूसरे वो जिन्हें जितना ज्यादा दबाया जाए वो उतना ही ज्यादा चमकते हैं। जॉन एलियट कहते हैं कि अगर आप ओवरअचीवर बनना चाहते हैं तो आपको स्ट्रेस मैनेजमेंट की सारी किताबें कचरे के डिब्बे में डाल देनी चाहिए। क्योंकि स्ट्रेस मैनेज करने की ज़रूरत उसे होती है जो डरपोक होता है। असली खिलाड़ी तो स्ट्रेस का सेवन करते हैं।

हमेशा हमें सिखाया जाता है कि शांत रहो और रिलैक्स करो। लेकिन क्या आपने कभी किसी शेर को शिकार करने से पहले योगा करते देखा है। या क्या आपने कभी किसी रॉक स्टार को स्टेज पर जाने से पहले नींद की गोली खाते देखा है। बिल्कुल नहीं। जब आपका दिल ज़ोर से धड़कता है और हाथ थोड़े कांपते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप डर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि आपकी बॉडी फाइट मोड में आ गई है और आपको जीतने के लिए तैयार कर रही है।

मान लीजिये आपको अपनी क्रश से बात करनी है। आपके पेट में तितलियाँ उड़ रही हैं और गला सूख रहा है। अब एक एवरेज इंसान सोचेगा कि भाई मैं तो बहुत नर्वस हूँ और शायद मुझे अभी बात नहीं करनी चाहिए। लेकिन एक ओवरअचीवर इसी घबराहट को सिग्नल मानता है कि बॉस अब मौका आ गया है। वह उस एनर्जी का इस्तेमाल अपनी बात को दमदारी से रखने में करता है।

ज्यादातर लोग स्ट्रेस से इसलिए भागते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि स्ट्रेस उनकी हेल्थ खराब कर देगा। लेकिन सच तो यह है कि स्ट्रेस आपको मारता नहीं है बल्कि आपकी परफॉरमेंस को बूस्ट देता है। अगर लाइफ में कोई चैलेंज न हो और कोई प्रेशर न हो तो आप सोफे पर पड़े हुए उस आलू की तरह बन जाएंगे जिसका काम सिर्फ रिमोट दबाना है। ओवरअचीवर्स जानबूझकर ऐसी सिचुएशन में कूदते हैं जहाँ उनके पसीने छूटें। क्योंकि उन्हें पता है कि असली ग्रोथ वहीं होती है जहाँ कम्फर्ट खत्म होता है।

जब आप प्रेशर को एन्जॉय करने लगते हैं तो आपकी घबराहट एक्साइटमेंट में बदल जाती है। आप यह सोचना बंद कर देते हैं कि अगर मैं फेल हो गया तो क्या होगा। इसके बजाय आप यह सोचते हैं कि आज तो मैदान में आग लगा दूंगा। जो लोग रिलैक्सेशन के पीछे भागते हैं वो अक्सर बोरियत के शिकार हो जाते हैं। और यकीन मानिए बोरियत स्ट्रेस से कहीं ज्यादा खतरनाक बीमारी है।

इसलिए अगली बार जब आपको लगे कि काम का बहुत प्रेशर है तो घबराइए मत। एक गहरी सांस लीजिये और खुद से कहिये कि आज तो मजा आने वाला है। यह प्रेशर ही है जो कोयले को हीरा बनाता है। अगर आप हमेशा ठंडे पड़े रहेंगे तो आप सिर्फ एक पत्थर बनकर रह जाएंगे। प्रेशर को अपनी ऑक्सीजन बनाइये और देखिये कि आप कैसे वो काम कर जाते हैं जो कल तक नामुमकिन लग रहे थे।


लेसन ३ : लक्ष्य से ज्यादा प्रोसेस पर ध्यान: मंजिल नहीं रास्ते का मजा लो

क्या आपने कभी उन लोगों को देखा है जो पहाड़ की चोटी पर पहुँचने के लिए इतनी जल्दी में होते हैं कि वो रास्ते के खूबसूरत नज़ारे देखना ही भूल जाते हैं। और जब वो ऊपर पहुँचते हैं तो बस एक सेल्फी लेकर वापस आ जाते हैं। उनकी पूरी ख़ुशी सिर्फ उस एक पल पर टिकी होती है। अगर आप भी अपनी लाइफ में सिर्फ रिजल्ट्स और गोल्स के पीछे भाग रहे हैं तो आप एक बहुत बड़े धोखे में जी रहे हैं। जॉन एलियट कहते हैं कि ओवरअचीवर्स के लिए कोई आखरी मंजिल होती ही नहीं है। उनके लिए तो काम करना ही सबसे बड़ा रिवॉर्ड है।

ज़रा सोचिये कि आप एक कॉमेडी फिल्म देख रहे हैं। क्या आप फिल्म इसलिए देखते हैं कि बस आखिरी सीन पता चल जाए और फिल्म खत्म हो। नहीं न। आप हर एक जोक और हर एक सीन का मजा लेते हैं। लाइफ और काम भी बिल्कुल वैसे ही होने चाहिए। लेकिन हमारी दिक्कत यह है कि हम प्रेजेंटेशन देते वक्त ये सोचते हैं कि बॉस क्या बोलेगा और जिम जाते वक्त ये सोचते हैं कि सिक्स पैक कब बनेंगे। इस चक्कर में न तो प्रेजेंटेशन अच्छी होती है और न ही जिम में मन लगता है।

मान लीजिये आप किसी शादी में खाना खाने गए हैं। अब अगर आपका पूरा ध्यान सिर्फ इस पर है कि कब प्लेट खत्म होगी और आप घर जाएंगे तो आप उस पनीर की सब्जी का स्वाद कभी नहीं ले पाएंगे। आप बस उसे निगल रहे होंगे। ओवरअचीवर्स खाने के हर एक दाने का स्वाद लेते हैं। वो जानते हैं कि अगर प्रोसेस सही है और आप उसमें डूबे हुए हैं तो रिजल्ट तो झक मारके पीछे आएगा ही।

ज्यादातर मोटिवेशनल गुरु आपको कहेंगे कि अपने गोल को दीवार पर चिपका दो और दिन रात उसके बारे में सोचो। जॉन एलियट कहते हैं कि यह सबसे बड़ी बेवकूफी है। जब आप हर वक्त गोल के बारे में सोचते हैं तो आप असल में खुद को डरा रहे होते हैं कि अगर यह नहीं मिला तो क्या होगा। इससे पैदा होती है एंग्जायटी। जबकि एक्सेप्शनल लोग अपने काम को एक खेल की तरह देखते हैं। वो इसलिए नहीं खेलते कि उन्हें जीतना है बल्कि इसलिए खेलते हैं क्योंकि उन्हें खेलने में बहुत मजा आता है।

जब आप प्रोसेस से प्यार करने लगते हैं तो आप हारने से नहीं डरते। क्योंकि अगर आप हार भी गए तो भी आपने उस काम को एन्जॉय किया जो आप कर रहे थे। यह माइंडसेट आपको अटूट बना देता है। आप किसी के दबाव में काम नहीं करते बल्कि अपनी मर्जी से बेस्ट देते हैं। जो लोग सिर्फ मेडल के लिए दौड़ते हैं वो अक्सर रेस के बाद रुक जाते हैं। लेकिन जो दौड़ने के लिए दौड़ते हैं वो पूरी जिंदगी फिट और खुश रहते हैं।

तो भाई स्मार्ट गोल्स बनाना बंद कीजिये और आज के काम को अपनी लाइफ का सबसे मज़ेदार हिस्सा बनाइये। जब आप काम के पीछे पागल होना छोड़कर काम में खोना सीख जाते हैं तभी आप असली ओवरअचीवर बनते हैं। याद रखिये कि जिंदगी कोई रेस नहीं है जिसे जल्दी खत्म करना है बल्कि यह एक परफॉरमेंस है जिसे जी भरकर जीना है।


तो, क्या आप तैयार हैं अपनी औसत जिंदगी को पीछे छोड़कर एक ओवरअचीवर बनने के लिए। आज से ही अपनी स्किल्स पर भरोसा करना शुरू करें और प्रेशर को अपना दोस्त बना लें। नीचे कमेंट में लिखिये कि आप इन ३ लेसन में से कौन सा लेसन कल से अपनी लाइफ में लागू करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हमेशा स्ट्रेस में रहता है। आइये मिलकर अपनी परफॉरमेंस को एक नई ऊंचाई पर ले जाएं।

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