Power Thinking (Hindi)


क्या आप भी वही घिसी पिटी पुरानी सोच लेकर चल रहे हैं और फिर रोते हैं कि प्रमोशन क्यों नहीं मिला। बधाई हो। आप अपनी मेहनत और टाइम दोनों को कचरे के डिब्बे में डाल रहे हैं। बिना पॉवर थिंकिंग के आप लीडर नहीं बस एक कन्फ्यूज्ड फॉलोअर ही रहेंगे।

आज हम जॉन मैन्जीरी की बुक पॉवर थिंकिंग से वो सीक्रेट्स जानेंगे जो आपके दिमाग को एक सुपर कंप्यूटर बना देंगे। चलिए देखते हैं वो ३ लेसन जो आपकी लीडरशिप और लाइफ को पूरी तरह बदल देंगे।


लेसन १ : मेटाकॉग्निशन — अपने दिमाग का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में लें

सोचिए, आप एक अंधेरी गली में गाड़ी चला रहे हैं और आपको पता ही नहीं कि हेडलाइट कैसे ऑन करनी है। ज्यादातर लोग अपनी लाइफ और करियर की गाड़ी ऐसे ही चला रहे हैं। उनके दिमाग में क्या चल रहा है उन्हें खुद नहीं पता। जॉन मैन्जीरी इसे ही बदलने की बात करते हैं। वह कहते हैं कि एक असली लीडर बनने के लिए आपको मेटाकॉग्निशन सीखना होगा। अब यह कोई भारी भरकम रॉकेट साइंस नहीं है। इसका सिंपल मतलब है अपने खुद के सोचने के तरीके के बारे में सोचना। यानी जब आप गुस्सा करते हैं या कोई फैसला लेते हैं तो आपको पता होना चाहिए कि आपके दिमाग के किस कोने से यह ख्याल आया है।

जरा उस शर्मा जी के लड़के को देखिए जो ऑफिस में हर छोटी बात पर ऐसे चिढ़ जाता है जैसे किसी ने उसकी बिरयानी में इलायची डाल दी हो। वह बस रिएक्ट करता है सोचता नहीं। अगर वह मेटाकॉग्निशन का इस्तेमाल करता तो उसे समझ आता कि उसका गुस्सा काम की वजह से नहीं बल्कि सुबह की ठंडी चाय की वजह से है। जब आप अपने थॉट्स को एक ऑब्जर्वर की तरह देखते हैं तब आप रिएक्ट करना बंद कर देते हैं और रिस्पॉन्स देना शुरू करते हैं। लीडरशिप का पहला रूल यही है कि अगर आप अपने दिमाग को लीड नहीं कर सकते तो आप अपनी टीम को क्या खाक लीड करेंगे।

अक्सर हम लूप में सोचते रहते हैं। कल क्या होगा। उसने ऐसा क्यों कहा। अगर ऑफिस में बॉस ने एक बार टेढ़ी नजर से देख लिया तो हम अपनी पूरी वसीयत और रिटायरमेंट प्लान को खतरे में मान लेते हैं। पॉवर थिंकिंग कहती है कि रुको और अपने थॉट्स को चेक करो। क्या यह डर सच है या सिर्फ आपके दिमाग की एक घटिया फिल्म है। जब आप अपनी थिंकिंग प्रोसेस को मॉनिटर करते हैं तो आप उन बेकार के कचरा थॉट्स को बाहर फेंक सकते हैं जो आपकी प्रोग्रेस को रोक रहे हैं।

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप जिम जाते हैं। पहले दिन ही आप १०० किलो का डंबल नहीं उठाते। पहले आप अपनी फॉर्म सुधारते हैं। मेटाकॉग्निशन आपके दिमाग की वही फॉर्म है। जब आप यह जान लेते हैं कि आप कैसे सोचते हैं तो आप अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना सकते हैं। एक लीडर कभी यह नहीं कहता कि मुझे सब पता है। एक लीडर कहता है कि मुझे पता है कि मेरा दिमाग इस वक्त डरा हुआ है और मुझे इस डर को कैसे मैनेज करना है।

तो अगली बार जब आपको लगे कि आपकी दुनिया खत्म होने वाली है तो एक पल के लिए रुकिए। अपने आपसे पूछिए कि यह थॉट कहाँ से आया। क्या यह लॉजिकल है या सिर्फ पुरानी आदत। जैसे ही आप अपने थॉट्स के पीछे का कारण समझने लगेंगे आप भीड़ से अलग दिखने लगेंगे। लोग आपकी शांति और सूझबूझ के दीवाने हो जाएंगे। लेकिन याद रखिए यह तो बस शुरुआत है। जब तक आप प्रॉब्लम को सुलझाने का सही तरीका नहीं सीखेंगे तब तक यह शांति भी किसी काम की नहीं। और यहीं से शुरू होता है हमारा अगला पड़ाव।


लेसन २ : स्ट्रेटेजिक प्रॉब्लम सॉल्विंग — मुश्किलों का पोस्टमार्टम करना सीखें

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। पहले वो जो समस्या आने पर ऐसे हाथ-पांव फूलने लगते हैं जैसे मोहल्ले के कुत्ते ने पीछे से पैंट पकड़ ली हो। दूसरे वो जो समस्या को देखकर मुस्कुराते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि हर ताले की एक चाबी होती है। जॉन मैन्जीरी कहते हैं कि पॉवर थिंकिंग वाला लीडर कभी भी आग बुझाने का काम नहीं करता बल्कि वह आग लगने की वजह को ही जड़ से खत्म कर देता है। इसे कहते हैं स्ट्रेटेजिक प्रॉब्लम सॉल्विंग। ज्यादातर लोग प्रॉब्लम के लक्षणों का इलाज करते हैं उसकी असली बीमारी का नहीं।

सोचिए आपके घर की छत टपक रही है। एक आम आदमी बाल्टी लाकर नीचे रख देगा और खुश हो जाएगा कि फर्श गीला नहीं हो रहा। यह है आपकी शॉर्ट टर्म थिंकिंग। लेकिन एक पॉवर थिंकर छत पर चढ़ेगा और देखेगा कि दरार कहाँ है। वह उस दरार को भरेगा ताकि बाल्टी की जरूरत ही न पड़े। ऑफिस हो या बिजनेस हम अक्सर बाल्टी ही बदलते रहते हैं। सेल्स कम हो रही है तो और एड्स चला दो। टीम काम नहीं कर रही तो उन पर चिल्ला दो। अरे भाई थोड़ा रुकिए और सोचिए कि असली दरार कहाँ है। क्या आपका प्रोडक्ट बेकार है या आपकी टीम को सही ट्रेनिंग ही नहीं मिली।

हमारे पड़ोस के वर्मा जी को ही देख लीजिए। उनका बिजनेस मंदा चल रहा था तो उन्होंने ज्योतिष के पास जाकर अपनी अंगूठियों की संख्या बढ़ा ली। अब हाथ में दस किलो सोना तो आ गया पर कस्टमर फिर भी नहीं आए। क्यों। क्योंकि प्रॉब्लम उनकी किस्मत में नहीं उनके घटिया कस्टमर सर्विस में थी। पॉवर थिंकिंग आपको इमोशन्स से हटकर डेटा और लॉजिक पर फोकस करना सिखाती है। जब आप इमोशनल होकर फैसला लेते हैं तो आप प्रॉब्लम को सुलझाते नहीं बल्कि उसे और उलझा देते हैं।

एक अच्छा लीडर अपनी टीम को यह नहीं कहता कि जाओ और इस प्रॉब्लम को ठीक करो। वह कहता है कि आओ देखते हैं कि यह प्रॉब्लम दोबारा क्यों नहीं होनी चाहिए। वह समस्या के टुकड़े करता है। उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटता है और फिर हर हिस्से पर सर्जिकल स्ट्राइक करता है। यह थिंकिंग आपको पैनिक मोड से निकालकर एक्शन मोड में ले आती है। जब आप स्ट्रेटेजिकली सोचते हैं तो आप भविष्य की परेशानियों को आज ही देख लेते हैं।

याद रखिए, मुश्किल वक्त में शांत रहकर सही दिशा में सोचना ही आपको असली बाजीगर बनाता है। अगर आप हर छोटी बात पर विचलित हो जाएंगे तो लोग आप पर भरोसा कैसे करेंगे। प्रॉब्लम सॉल्विंग का मतलब सिर्फ हल ढूंढना नहीं है बल्कि हल ऐसा होना चाहिए जो टिकाऊ हो। लेकिन क्या होगा अगर आप सब कुछ प्लान कर लें और अचानक हालात ही बदल जाएं। क्या आपकी थिंकिंग इतनी लचीली है कि वह नए सांचे में ढल सके। इसी लचीलेपन की बात हम अगले लेसन में करेंगे।


लेसन ३ : अडैप्टेबिलिटी — वक्त की रफ्तार के साथ खुद को बदलना सीखें

दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है कि कल का 'सुपरहिट' आज का 'पुराना कबाड़' बन जाता है। जॉन मैन्जीरी अपनी किताब में साफ कहते हैं कि एक लीडर की सबसे बड़ी ताकत उसकी अडैप्टेबिलिटी होती है। अगर आप जिद्दी हैं और कहते हैं कि मैं तो वैसे ही सोचूंगा जैसे दस साल पहले सोचता था तो यकीन मानिए आप डायनासोर की तरह गायब होने की तैयारी कर रहे हैं। पॉवर थिंकिंग का मतलब सिर्फ स्मार्ट होना नहीं है बल्कि लचीला होना है। आपको अपनी थिंकिंग के सांचे को वक्त के हिसाब से मोल्ड करना आना चाहिए।

जरा उस पुराने टाइपराइटर रिपेयर करने वाले के बारे में सोचिए जो कंप्यूटर के आने पर भी जिद्द पर अड़ा रहा कि मैं तो सिर्फ कुंजियाँ ही ठीक करूँगा। आज वह कहाँ है। शायद किसी कोने में धूल फांक रहा होगा। वहीं जिसने समय रहते कीबोर्ड और सॉफ्टवेयर को अपना लिया वह आज आईटी कंपनी चला रहा है। बदलाव आपको डरा सकता है लेकिन वह आपको बड़ा भी बनाता है। अगर आप नए आइडियाज के लिए अपने दिमाग के खिड़की-दरवाजे बंद रखेंगे तो ताजी हवा अंदर कैसे आएगी। एक लीडर वही है जो तूफान आने पर दीवार नहीं बनाता बल्कि पवन चक्की खड़ी कर देता है ताकि उस हवा से भी बिजली बना सके।

हमारे आसपास कई ऐसे लोग हैं जो अपनी ईगो के कारण नई चीजें नहीं सीखते। उन्हें लगता है कि सब कुछ जानना ही पावर है जबकि सच तो यह है कि अन-लर्न करना यानी पुरानी बेकार की बातों को भूलना और नया सीखना असली पावर है। पॉवर थिंकिंग आपको यह सिखाती है कि जब प्लान 'ए' फेल हो जाए तो घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि अल्फाबेट में और भी २५ अक्षर बाकी हैं। अडैप्टेबिलिटी का मतलब हार मानना नहीं है बल्कि अपनी स्ट्रैटेजी को री-कैलकुलेट करना है जैसे गूगल मैप्स करता है जब आप गलत मोड़ ले लेते हैं।

जब आप अडैप्टेबल बनते हैं तो आप अपनी टीम के लिए एक मिसाल बन जाते हैं। मुश्किल वक्त में जब पूरी टीम डरी होती है तब आपकी शांत और लचीली सोच उन्हें भरोसा दिलाती है कि हम रास्ता ढूंढ लेंगे। बदलाव कड़वा हो सकता है लेकिन इसका फल हमेशा मीठा होता है। लीडरशिप कोई मंजिल नहीं है जिसे आपने पा लिया और बैठ गए। यह एक निरंतर चलने वाली थिंकिंग प्रोसेस है। जो अपनी सोच को अपडेट नहीं करता उसका करियर आउटडेट हो जाता है।


पॉवर थिंकिंग कोई जादुई छड़ी नहीं है जो एक रात में सब बदल देगी। यह एक प्रैक्टिस है। अपने थॉट्स को समझना (मेटाकॉग्निशन), समस्याओं की जड़ तक जाना (स्ट्रेटेजिक प्रॉब्लम सॉल्विंग) और समय के साथ खुद को बदलना (अडैप्टेबिलिटी) ही आपको एक साधारण इंसान से एक महान लीडर बनाता है। तो क्या आप आज से अपनी पुरानी सोच को विदा करने के लिए तैयार हैं। याद रखिए आपका दिमाग ही आपका सबसे बड़ा औजार है। इसे जंग मत लगने दीजिए। आज ही अपनी थिंकिंग को अपग्रेड कीजिए और देखिए कैसे दुनिया आपके पीछे चलने के लिए बेताब हो जाती है।

अगर आपको आज के इन लेसन्स ने सोचने पर मजबूर किया है तो कमेंट में 'POWER' लिखें और बताएं कि आप अपनी कौन सी एक पुरानी आदत आज बदलना चाहते हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जिसे लीडर बनने का शौक तो है पर वह मेहनत से डरता है। चलिए साथ मिलकर एक बेहतर लीडरशिप वाली कम्युनिटी बनाते हैं।

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