क्या आप भी उन मैनेजर्स में से हैं जो खुद तो लंच ब्रेक में दो घंटे गायब रहते हैं पर टीम से एक एक मिनट का हिसाब मांगते हैं? बधाई हो, आप अपनी कंपनी की बर्बादी का रास्ता एकदम सही पकड़े हैं। बिना इन सीक्रेट्स के आप सिर्फ बॉस बनेंगे, लीडर नहीं, और आपकी टीम आपके पीछे सिर्फ मीम्स बनाएगी, काम नहीं।
आज हम डेविड माइस्टर की बुक प्रैक्टिस वॉट यू प्रीच के उन धांसू लेसन्स की बात करेंगे जो आपको एक असली हाई अचीवमेंट कल्चर बनाने में मदद करेंगे। तैयार हो जाइए क्योंकि अब आपके मैनेजमेंट का तरीका हमेशा के लिए बदलने वाला है।
Lesson : वॉक द टॉक - कथनी और करनी का अंतर खत्म करो
अगर आप एक मैनेजर हैं और आपको लगता है कि आप मीटिंग रूम में बड़े बड़े भाषण देकर अपनी टीम को मोटिवेट कर लेंगे, तो आप शायद किसी पुरानी सदी की ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म में जी रहे हैं। आज की जनरेशन बहुत स्मार्ट है। डेविड माइस्टर अपनी बुक में सबसे पहले यही समझाते हैं कि असली लीडरशिप वह नहीं है जो आप फाइल्स में लिखते हैं, बल्कि वह है जो आप रोज ऑफिस में करते हैं।
सोचिए एक ऐसा सीन, जहां मैनेजर साहब सुबह 11 बजे ऑफिस आते हैं, हाथ में कॉफी का मग होता है और वो सीधे अपनी केबिन में जाकर दरवाजा बंद कर लेते हैं। लेकिन शाम को 6 बजे जब टीम घर जाने की तैयारी करती है, तब उन्हें याद आता है कि वर्क कल्चर और डेडीकेशन पर एक लंबा लेक्चर देना है। वो चिल्लाकर कहते हैं कि हमें समय का पाबंद होना चाहिए। अब आप ही बताइए, क्या टीम उनकी बात सुनेगी? बिल्कुल नहीं। टीम का हर मेंबर मन ही मन सोच रहा होगा कि सर पहले आप तो टाइम पर आइए।
डेविड माइस्टर कहते हैं कि एम्प्लोयी हमेशा अपने बॉस को एक माइक्रोस्कोप से देखते हैं। अगर आप कहते हैं कि क्लाइंट की इज्जत करो, लेकिन आप खुद क्लाइंट्स का मजाक उड़ाते हैं, तो आपकी टीम भी वही करेगी। यह वैसा ही है जैसे कोई फिटनेस कोच समोसे खाते हुए आपको डाइट चार्ट समझा रहा हो। क्या आप उसकी बात मानेंगे? शायद आप उसकी बात सुनकर हंसेंगे और घर जाकर खुद भी समोसे ही खाएंगे।
हाई अचीवमेंट कल्चर बनाने के लिए आपको खुद को एक उदाहरण बनाना पड़ता है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी टीम ईमानदारी से काम करे, तो आपको सबसे पहले अपनी गलतियां माननी सीखनी होंगी। अगर आप चाहते हैं कि लोग नए आइडियाज लेकर आएं, तो आपको पहले उनके छोटे से छोटे आइडिया को बिना जज किए सुनना होगा।
अक्सर मैनेजर्स को लगता है कि पावर का मतलब है दूसरों पर हुकुम चलाना। लेकिन माइस्टर के हिसाब से पावर का असली मतलब है दूसरों को इंस्पायर करना। जब आप खुद वही काम करते हैं जो आप दूसरों से चाहते हैं, तो टीम को लगता है कि आप उनके साथ मैदान में खड़े हैं, ना कि किसी ऊंचे पहाड़ पर बैठकर सिर्फ ऑर्डर दे रहे हैं। यह भरोसा ही एक साधारण ऑफिस को एक हाई परफॉर्मिंग टीम में बदल देता है। याद रखिए, आपकी टीम वही नहीं करती जो आप कहते हैं, वह वही करती है जो आप करते हैं। इसलिए अपनी जुबान से ज्यादा अपने एक्शन पर ध्यान दीजिए।
Lesson : एथिक्स और प्रॉफिट का गहरा कनेक्शन - सिर्फ पैसा ही सब कुछ नहीं
क्या आपको भी लगता है कि बिजनेस का मतलब सिर्फ और सिर्फ पैसा छापना है? अगर हां, तो शायद आप उस पुराने जमाने के विलेन हैं जो नोटों की गड्डी पर बैठकर हंसता था। डेविड माइस्टर अपनी रिसर्च में एक बहुत ही कड़वा सच बताते हैं। वो कहते हैं कि जो कंपनियां सिर्फ प्रॉफिट के पीछे भागती हैं, वो अक्सर जल्दी ही अपनी साख खो देती हैं। असली पैसा तो वहां है जहां वैल्यूज और एथिक्स की कद्र होती है।
मान लीजिए आपके पड़ोस में दो हलवाई की दुकानें हैं। एक हलवाई है जो सिर्फ मुनाफे के चक्कर में घटिया तेल और मिलावटी मावा इस्तेमाल करता है। वो आपको मीठी बातों से फंसा तो लेता है, लेकिन एक बार उसकी मिठाई खाने के बाद आपका पेट खराब हो जाता है। क्या आप दोबारा वहां जाएंगे? शायद कभी नहीं। वहीं दूसरा हलवाई है जो चाहे थोड़ा महंगा बेचे, लेकिन क्वालिटी से समझौता नहीं करता। वो शायद रातों रात करोड़पति न बने, लेकिन उसकी दुकान पर हमेशा भीड़ लगी रहेगी।
ऑफिस का माहौल भी कुछ ऐसा ही है। जब एक मैनेजर अपनी टीम को सिखाता है कि क्लाइंट को बेवकूफ बनाकर टारगेट पूरा करना ही सक्सेस है, तो वो अपनी ही टीम के अंदर एक झूठ का जहर भर रहा होता है। डेविड माइस्टर कहते हैं कि एथिक्स कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे सिर्फ दीवार पर फ्रेम करके टांग दिया जाए। यह तो आपके काम करने के तरीके में झलकना चाहिए।
जब आपकी टीम को पता होता है कि उनका बॉस गलत काम के खिलाफ खड़ा होगा, तो उनमें एक अलग ही लेवल का कॉन्फिडेंस आता है। वो अपने काम पर गर्व करते हैं। और जब लोग अपने काम पर गर्व करते हैं, तो वो बेहतर परफॉर्म करते हैं। बेहतर परफॉरमेंस का सीधा मतलब है खुश क्लाइंट्स और खुश क्लाइंट्स का मतलब है लंबी चलने वाली कमाई।
कुछ मैनेजर्स को लगता है कि ईमानदारी दिखाने से बिजनेस स्लो हो जाता है। भाई साहब, स्लो तो वो होता है जब आपके ऊपर केस हो जाए या मार्केट में आपकी इज्जत मिट्टी में मिल जाए। ईमानदारी तो वो फ्यूल है जो आपकी कंपनी के इंजन को बिना आवाज किए सालों साल चलाता है। इसलिए अगर आप चाहते हैं कि आपका बैंक बैलेंस बढ़ता रहे, तो अपनी टीम को यह मत सिखाइए कि कैसे शॉर्टकट लेना है, बल्कि यह सिखाइए कि कैसे सही रास्ते पर चलकर जीतना है। क्योंकि अंत में, लोग ब्रांड से नहीं, भरोसे से जुड़ते हैं।
Lesson : टीम का जोश और फाइनेंशियल सक्सेस - खुश एम्प्लोयी मतलब मोटा मुनाफा
अगर आपको लगता है कि आपकी टीम के लोग सिर्फ आपकी केबिन के बाहर पड़ी हुई रद्दी मशीनें हैं जिन्हें बस तेल और बिजली (यानी सैलरी) चाहिए, तो यकीन मानिए आप मैनेजमेंट के नाम पर कॉमेडी कर रहे हैं। डेविड माइस्टर ने अपनी स्टडी में यह साबित कर दिया है कि जिस ऑफिस की हवा में खुशहाली और जोश होता है, वहां का बैंक बैलेंस हमेशा ग्रीन रहता है।
इसे एक क्रिकेट मैच की तरह देखिए। एक ऐसी टीम है जिसके खिलाड़ी एक दूसरे से बात तक नहीं करते और कप्तान हर छोटी बात पर गाली देता है। दूसरी तरफ एक ऐसी टीम है जहां हर खिलाड़ी एक दूसरे की जीत पर नाचता है। अब आप ही बताइए, वर्ल्ड कप कौन जीतेगा? जाहिर है, वही टीम जिसमें जोश और एकता है। ऑफिस में भी यही लॉजिक काम करता है। अगर आपकी टीम सुबह ऑफिस आते वक्त मुंह लटकाए रहती है और शाम के 6 बजने का इंतजार किसी जेल की कैदी की तरह करती है, तो समझ लीजिए कि आपकी कंपनी की ग्रोथ आईसीयू में है।
डेविड माइस्टर समझाते हैं कि जब एम्प्लोयी खुद को कंपनी का हिस्सा समझते हैं, तो वो सिर्फ काम नहीं करते, वो जादू करते हैं। वो क्लाइंट की समस्या को अपनी समस्या समझते हैं। लेकिन यह जोश आता कहां से है? यह आता है एक ऐसे माहौल से जहां उन्हें सुना जाए और उनकी सराहना की जाए। कुछ मैनेजर्स को लगता है कि तारीफ करने से एम्प्लोयी सिर पर चढ़ जाएंगे। अरे भाई साहब, वो इंसान हैं, कोई सॉफ्टवेयर अपडेट नहीं जो बिना फीडबैक के चलते रहेंगे।
हद तो तब होती है जब बॉस साल के अंत में दिवाली बोनस के नाम पर सिर्फ एक डिब्बा सोनपापड़ी पकड़ा देता है और उम्मीद करता है कि टीम अगले साल कंपनी को चांद पर ले जाएगी। जोश बढ़ाने के लिए आपको उनके करियर और उनकी खुशी में इन्वेस्ट करना होगा। जब एक एम्प्लोयी को लगता है कि कंपनी उसका ख्याल रख रही है, तो वो अपना 200 परसेंट देता है। और जब हर कोई अपना बेस्ट देता है, तो क्लाइंट्स खुशी से झूम उठते हैं और पैसे की बारिश अपने आप होने लगती है।
प्रैक्टिस वॉट यू प्रीच सिर्फ एक बुक नहीं है, यह एक आईना है। यह हमें दिखाती है कि एक अच्छा मैनेजर बनने के लिए पहले एक अच्छा इंसान बनना जरूरी है। जो कहते हो वो करके दिखाओ, ईमानदारी को अपना हथियार बनाओ और अपनी टीम को दिल से जीतो। सफलता आपके पीछे भागेगी नहीं, बल्कि आपके साथ कदम से कदम मिलाकर चलेगी।
तो दोस्तों, क्या आप आज से ही अपने ऑफिस में वो बदलाव लाने के लिए तैयार हैं जो आप दूसरों में देखना चाहते हैं? याद रखिए, एक महान कल्चर की शुरुआत आपसे होती है। नीचे कमेंट्स में हमें बताइए कि आपके हिसाब से एक अच्छे मैनेजर की सबसे बड़ी खूबी क्या होनी चाहिए? इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो हाल ही में मैनेजर बने हैं, ताकि वो बॉस नहीं, बल्कि लीडर बन सकें।
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