क्या आप भी उन महान लोगो में से हैं जो मीटिंग शुरू होते ही लोगो को गहरी नींद की लोरी सुना देते हैं। मुबारक हो आपकी बोरिंग प्रेजेंटेशन ने आधे ऑफिस का करियर और बाकी आधे का चैन छीन लिया है। बिना सही स्किल्स के बोलना सिर्फ शोर मचाना है।
आज हम मार्क विस्कप की किताब प्रेजेंटेशन एस ओ एस से वह सीक्रेट्स जानेंगे जो आपकी घबराहट को कॉन्फिडेंस में बदल देंगे। यह तीन पावरफुल लेसन्स आपको एक साधारण स्पीकर से एक प्रो कम्युनिकेटर बना देंगे जिसे हर कोई सुनना चाहेगा।
लेसन १ : ऑडियंस के फायदे की बात करें
कल्पना कीजिए कि आप एक डेट पर गए हैं और सामने वाला इंसान पिछले दो घंटे से सिर्फ अपनी जिम की डाइट और अपने प्रमोशन की बातें कर रहा है। आपको कैसा लगेगा। शायद आप मन ही मन भगवान से प्रार्थना करेंगे कि कोई इमरजेंसी आ जाए और आप वहां से भाग सकें। ऑफिस की प्रेजेंटेशन में भी हम अक्सर यही गलती करते हैं। हम स्टेज पर खड़े होकर यह चिल्लाते रहते हैं कि हमारी कंपनी कितनी महान है और हमने कितनी मेहनत की है। हकीकत तो यह है कि आपकी ऑडियंस को आपकी मेहनत से कोई लेना देना नहीं है। उन्हें बस एक ही बात की चिंता होती है और वह है कि इसमें मेरा क्या फायदा है।
मार्क विस्कप कहते हैं कि जब तक आप सामने वाले के स्वार्थ को नहीं छुएंगे तब तक वह आपकी बात सुनने का नाटक तो करेगा पर असल में वह अपने मन में रात के खाने का मेनू प्लान कर रहा होगा। लोग बहुत मतलबी होते हैं और एक अच्छे प्रेजेंटर को इस मतलब का फायदा उठाना आना चाहिए। अगर आप सेल्स के आंकड़े दिखा रहे हैं तो यह मत कहिए कि कंपनी का रेवेन्यू दस परसेंट बढ़ गया है। इसके बजाय यह कहिए कि अगर हम यह टारगेट पूरा करते हैं तो आप सबको इस साल बढ़िया बोनस मिलेगा। देखिए कैसे सबकी आंखों की चमक वापस आ जाती है। जैसे ही आप अपनी बात को उनके पर्सनल फायदे से जोड़ते हैं लोग फोन छोड़कर आपकी बात पर ध्यान देने लगते हैं।
मान लीजिए आपको अपनी टीम को एक नया सॉफ्टवेयर सिखाना है जो थोड़ा मुश्किल है। अगर आप उन्हें सिर्फ उसके फीचर्स बताएंगे तो आधे लोग आधे घंटे में सो जाएंगे। लेकिन अगर आप अपनी बात ऐसे शुरू करें कि दोस्तों यह नया टूल आपके डेली काम के दो घंटे बचा लेगा और आप ऑफिस से जल्दी घर जा पाएंगे तो हर कोई उस सॉफ्टवेयर को सीखने के लिए उतावला हो जाएगा। प्रेजेंटेशन देना कोई ज्ञान बांटना नहीं है बल्कि यह एक डील है। आप उनकी अटेंशन मांग रहे हैं और बदले में आपको उन्हें कोई फायदा देना होगा। अगर आपके पास देने के लिए कोई वैल्यू या फायदा नहीं है तो बेहतर है कि आप स्टेज पर न जाएं और लोगो का कीमती समय बर्बाद न करें।
अक्सर देखा गया है कि लोग अपनी प्रेजेंटेशन में खुद को हीरो दिखाने की कोशिश करते हैं। जबकि असली जादू तब होता है जब आप ऑडियंस को हीरो बनाते हैं। आप केवल एक गाइड हैं जो उन्हें रास्ता दिखा रहा है। जैसे ही आप मैं शब्द को छोड़कर आप शब्द पर फोकस करते हैं आपकी बात का असर दस गुना बढ़ जाता है। याद रखिए कोई भी इंसान अपनी लाइफ में आने वाली प्रॉब्लम्स का सोल्यूशन चाहता है। अगर आपकी प्रेजेंटेशन उनकी किसी एक छोटी सी मुश्किल को भी आसान कर देती है तो आप उनकी नजर में सुपरस्टार बन जाएंगे। इसलिए अगली बार जब आप बोलने के लिए खड़े हों तो यह मत सोचिए कि आप क्या कहना चाहते हैं बल्कि यह सोचिए कि वह क्या सुनना चाहते हैं।
लेसन २ : डेटा नहीं कहानियां सुनाएं
क्या आपको स्कूल के वह मैथ्स वाले सर याद हैं जो ब्लैकबोर्ड पर नंबर्स का पहाड़ खड़ा कर देते थे। शायद नहीं। लेकिन वह दादी की कहानियां आज भी याद होंगी जिनमें एक चालाक खरगोश ने शेर को कुएं में गिरा दिया था। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारा दिमाग नंबर्स को प्रोसेस करने के लिए नहीं बल्कि कहानियों को महसूस करने के लिए बना है। जब आप अपनी प्रेजेंटेशन में सिर्फ एक्सेल शीट के सेल्स और ग्राफ्स दिखाते हैं तो आप अपनी ऑडियंस को एक ऐसा टास्क दे रहे हैं जिसे करने में उन्हें बहुत जोर आता है। और सच तो यह है कि लोग मेहनत करने के लिए नहीं बल्कि इंस्पायर होने के लिए आपकी बात सुनते हैं।
मार्क विस्कप कहते हैं कि डेटा के पास दिमाग होता है पर कहानियों के पास दिल होता है। अगर आप लोगो का दिल नहीं जीत सकते तो आप उनका दिमाग कभी काबू नहीं कर पाएंगे। मान लीजिए आप अपनी कंपनी की सेफ्टी पॉलिसी समझा रहे हैं। अगर आप सिर्फ रूल्स पढ़ेंगे तो लोग उसे एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देंगे। लेकिन अगर आप एक ऐसे कर्मचारी की कहानी सुनाएं जिसने एक छोटी सी गलती की वजह से अपना हाथ खो दिया था और अब उसका परिवार किन मुश्किलों से गुजर रहा है तो हर कोई उस नियम को जिंदगी भर नहीं भूलेगा। कहानी में वो दम होता है जो सूखे फैक्ट्स में कभी नहीं हो सकता।
अक्सर मीटिंग्स में लोग खुद को बहुत ज्यादा प्रोफेशनल दिखाने के चक्कर में रोबोट बन जाते हैं। वह ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जिसे सुनकर डिक्शनरी भी शर्मा जाए। लेकिन यकीन मानिए सादगी में ही असली ताकत है। एक अच्छी कहानी में इमोशन होता है और थोडा सा ड्रामा भी। आपको ऑस्कर लेवल की एक्टिंग नहीं करनी है बस अपनी बात को एक इंसानी चेहरा देना है। अगर आपका प्रोजेक्ट फेल हुआ तो बजाय यह कहने के कि मार्केट कंडीशन खराब थी आप अपनी टीम को अपनी उस रात की कहानी सुनाइए जब आप टेंशन के मारे सो नहीं पाए थे। जब आप अपनी कमियां और अपनी मेहनत कहानियों के जरिए बताते हैं तो लोग आपसे जुड़ाव महसूस करते हैं।
कहानी सुनाने का मतलब यह नहीं है कि आप फिल्म की स्क्रिप्ट सुनाने लगें। इसका मतलब है कि आप अपनी बात को एक शुरुआत एक मिडिल और एक अंत दें। यह वैसा ही है जैसे आप अपने दोस्त को कल रात हुए किसी एक्सीडेंट के बारे में बताते हैं। आप पहले माहौल बनाते हैं फिर सस्पेंस लाते हैं और आखिर में एक सीख देते हैं। प्रेजेंटेशन में भी यही फार्मूला काम करता है। डेटा को हमेशा सपोर्टिंग रोल में रखिए और अपनी कहानी को मेन हीरो बनाइए। याद रखिए लोग आपकी स्लाइड पर लिखे नंबर्स भूल जाएंगे पर आपने उन्हें कैसा महसूस कराया वह उन्हें हमेशा याद रहेगा।
लेसन ३ : छोटी और सटीक बात का जादू
दुनिया में सबसे बड़ा झूठ यह है कि ज्यादा बोलने वाला इंसान ज्यादा समझदार होता है। असलियत तो यह है कि अगर आप आधे घंटे की बात को पांच मिनट में नहीं कह सकते तो इसका मतलब है कि आपको खुद नहीं पता कि आप क्या कहना चाहते हैं। प्रेजेंटेशन के दौरान हम अक्सर इस डर में रहते हैं कि अगर हम जल्दी चुप हो गए तो लोग समझेंगे कि हमें कुछ आता ही नहीं है। इस चक्कर में हम एक ही बात को दस बार घुमाकर बोलते हैं और तब तक बोलते रहते हैं जब तक कि सबसे पीछे बैठा आदमी खर्राटे न मारने लगे। मार्क विस्कप बहुत साफ कहते हैं कि कम बोलना एक सुपरपावर है।
सोचिए आप किसी लिफ्ट में हैं और आपके पास अपने बॉस को एक करोड़ का आईडिया समझाने के लिए सिर्फ तीस सेकंड हैं। क्या आप वहां भूमिका बांधेंगे या सीधे मुद्दे की बात करेंगे। प्रेजेंटेशन भी एक तरह की लिफ्ट पिच ही है। लोगो का अटेंशन स्पैन आज कल एक सोने की मछली से भी कम हो गया है। अगर आपने शुरू के दो मिनट में उन्हें इम्प्रेस नहीं किया तो वह अपने फोन पर रील स्क्रॉल करना शुरू कर देंगे। एक प्रोफेशनल स्पीकर की पहचान यह नहीं है कि उसने कितनी स्लाइड्स दिखाईं बल्कि यह है कि उसने कितनी स्लाइड्स की जरूरत ही महसूस नहीं होने दी।
सटीक बोलने का मतलब है कि आप अपनी बात से सारा कचरा बाहर निकाल दें। बिना मतलब के विशेषण और भारी भरकम शब्दों का इस्तेमाल करना बंद करें। जब आप कम और काम की बात बोलते हैं तो आपकी हर लाइन की वैल्यू बढ़ जाती है। यह वैसा ही है जैसे एक परफ्यूम की छोटी सी शीशी पूरे कमरे को महका देती है जबकि पानी की बाल्टी का कोई खास असर नहीं होता। अपनी प्रेजेंटेशन को एक धारदार हथियार की तरह बनाइए जो सीधा निशाने पर लगे। अगर आप अपनी बात खत्म कर चुके हैं तो जबरदस्ती स्टेज पर खड़े न रहें। चुप हो जाना भी कम्युनिकेशन का एक बहुत बड़ा हिस्सा है।
अंत में बस इतना याद रखिए कि प्रेजेंटेशन देना कोई सजा नहीं बल्कि एक मौका है। यह मौका है अपनी बात को लोगो के दिलों तक पहुंचाने का। अगर आप अपनी ऑडियंस की इज्जत करेंगे और उनका समय बचाएंगे तो वह भी आपकी इज्जत करेंगे। बोलना तो हर किसी को आता है पर कब चुप होना है यह सिर्फ एक असली लीडर जानता है। अपनी घबराहट को एक तरफ रखिए और बस इन तीन लेसन्स को याद रखिए। आप देखेंगे कि कैसे लोग आपकी मीटिंग खत्म होने के बाद तालियां बजाना बंद नहीं करेंगे। अब समय है कि आप अपनी अगली प्रेजेंटेशन को एक यादगार अनुभव बनाएं और लोगो को अपनी बातों का दीवाना कर दें।
तो, क्या आप अपनी अगली मीटिंग में फिर से वही पुराना बोरिंग लेक्चर देने वाले हैं या फिर इन जादुई तरीकों से सबका दिल जीतने के लिए तैयार हैं। याद रखिए आपकी आवाज में वो ताकत है जो बदलाव ला सकती है। नीचे कमेंट्स में मुझे जरूर बताएं कि प्रेजेंटेशन देते समय आपको सबसे ज्यादा डर किस बात का लगता है। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जिसकी प्रेजेंटेशन सुनकर अक्सर आपको नींद आ जाती है। चलिए साथ मिलकर अपनी बातचीत के अंदाज को बदलते हैं।
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