Reality Check (Hindi)


अभी भी वही पुराने घिसे पिटे बिजनेस आइडियाज लेकर बैठे हो क्या। अगर आप भी उन लोगों में से हैं जो सोचते हैं कि सिर्फ एक अच्छा ऑफिस और फैंसी विजिटिंग कार्ड बिजनेस बना देता है तो बधाई हो आप अपनी बर्बादी की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। दुनिया आगे निकल रही है और आप अभी भी कंपटीशन के पैरों की धूल चाट रहे हैं।

आज हम गाई कावासाकी की बुक रियलिटी चेक से वो कड़वे सच जानेंगे जो आपके स्टार्टअप के भ्रम को तोड़कर आपको असली ग्रोथ की तरफ ले जाएंगे। यह आर्टिकल आपके बिजनेस करने के तरीके को पूरी तरह से बदल देगा और आपको कंपटीशन से मीलों आगे खड़ा कर देगा।


लेसन १ : एग्जीक्यूशन की असली वैल्यू (आइडिया सस्ता है, काम महंगा है)

अगर आपके पास एक करोड़ का बिजनेस आइडिया है तो मुबारक हो। क्योंकि दुनिया में कम से कम दस हजार और लोग उसी वक्त वही सेम चीज सोच रहे हैं। गाई कावासाकी अपनी बुक रियलिटी चेक में सबसे पहले इसी गुब्बारे में सुई मारते हैं। हम इंडियंस की सबसे बड़ी बीमारी यही है कि हम आइडिया को तिजोरी में छुपाकर रखते हैं जैसे कि वो कोई कोहिनूर हीरा हो। सच तो यह है कि आइडिया की अपनी कोई औकात नहीं होती जब तक कि आप उसे जमीन पर रगड़कर सच न कर दें। आपने देखा होगा कि कुछ लोग बस प्लान बनाते रह जाते हैं। आज यह करेंगे, कल वो करेंगे और अगले साल तो सीधा अंबानी को टक्कर देंगे। लेकिन हकीकत में उनका सबसे बड़ा अचीवमेंट सिर्फ एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाना होता है।

एग्जीक्यूशन का मतलब है पसीना बहाना। मान लीजिए आप एक नई चाय की दुकान खोलना चाहते हैं। अब आप बैठकर यह रिसर्च कर रहे हैं कि कप का कलर क्या होगा या वेटर की यूनिफॉर्म कैसी दिखेगी। भाई साहब, असली काम तो चाय बनाना और उसे पिलाना है। अगर आपकी चाय में दम नहीं है तो आप चाहे सोने के कप में पिला दो, ग्राहक वापस नहीं आएगा। स्टार्टअप की दुनिया में लोग अक्सर फैंसी ऑफिस और बड़े बड़े टाइटल्स के पीछे भागते हैं। उन्हें लगता है कि सीइओ लिख लेने से बैंक बैलेंस बढ़ जाएगा। पर असली सीइओ वही है जो जरूरत पड़ने पर खुद झाड़ू भी उठा सके और क्लाइंट के नखरे भी झेल सके।

कंपटीशन को हराने का सबसे आसान तरीका यह नहीं है कि आप उनसे बेहतर सोचें। बल्कि यह है कि आप उनसे ज्यादा काम करें। जब आपका कंपटीटर सो रहा हो, तब आप अपने प्रोडक्ट की कमियां सुधार रहे हों। जब वो पार्टी कर रहा हो, तब आप अपने कस्टमर का फीडबैक ले रहे हों। गाई कहते हैं कि जो लोग सिर्फ बातें करते हैं वो इतिहास पढ़ते हैं और जो लोग काम करते हैं वो इतिहास रचते हैं। इसलिए अपने उस महान आइडिया को डायरी से बाहर निकालिए। उसे टेस्ट करिए। फेल होइए और फिर से शुरू करिए। क्योंकि बिना काम किए तो सिर्फ ख्याली पुलाव ही पकते हैं और उनसे पेट नहीं भरता। अगर आप अभी भी सिर्फ सोचने में बिजी हैं तो यकीन मानिए आप उस रेस में दौड़ रहे हैं जिसका कोई फिनिश लाइन नहीं है। असली खिलाड़ी वही है जो मैदान में उतरकर धूल फांकता है।


लेसन २ : पिचिंग का असली जादू (कम बोलो, काम का बोलो)

अगर आप सोचते हैं कि साठ मिनट तक लगातार अंग्रेजी झाड़ने से इन्वेस्टर आपकी झोली पैसों से भर देगा तो आप गलतफहमी के शिकार हैं। गाई कावासाकी कहते हैं कि पिचिंग करना किसी को सुलाने का बहाना नहीं होना चाहिए। लोग अक्सर अपनी प्रेजेंटेशन में इतने स्लाइड भर देते हैं जैसे कि वो कोई रामायण लिख रहे हों। हकीकत तो यह है कि दस मिनट बाद ही सुनने वाले का दिमाग यह सोचने लगता है कि घर जाकर खाने में क्या बनेगा। पिचिंग का मतलब अपनी तारीफ के पुल बांधना नहीं है बल्कि सामने वाले को यह बताना है कि आप उनकी जिंदगी की कौन सी आग बुझाने वाले हैं।

गाई कावासाकी का एक बहुत ही फेमस रूल है जिसे वो 10-20-30 रूल कहते हैं। इसका सीधा मतलब है कि आपकी प्रेजेंटेशन में सिर्फ 10 स्लाइड होनी चाहिए। उसे पेश करने में 20 मिनट से ज्यादा का समय नहीं लगना चाहिए। और सबसे जरूरी बात, फॉन्ट का साइज 30 से कम नहीं होना चाहिए। अब हमारे यहाँ के होनहार क्या करते हैं। वो एक ही स्लाइड पर इतना छोटा छोटा लिख देते हैं कि उसे पढ़ने के लिए माइक्रोस्कोप की जरूरत पड़ जाए। अगर आपकी पिच को समझने के लिए किसी को अपनी आंखें गड़ानी पड़ रही हैं तो समझ लीजिए कि आपने आधा मैच तो वहीं हार दिया।

मान लीजिए आप एक ऐसा ऐप बना रहे हैं जो लोगों को घर बैठे गोलगप्पे डिलीवर करे। अब आपको इन्वेस्टर को यह नहीं बताना कि गोलगप्पे का इतिहास क्या है या पानी में कितने परसेंट नमक है। उसे बस यह जानना है कि लोगों को भूख लगेगी तो वो आपका ऐप क्यों खोलेंगे। अगर आप उसे बीस मिनट तक आलू की क्वालिटी पर लेक्चर देंगे तो वो आपको पैसे नहीं बल्कि बाहर का रास्ता दिखाएगा। पिचिंग में हुक होना बहुत जरूरी है। ऐसा कुछ जो सुनते ही सामने वाले की कुर्सी सीधी हो जाए।

कुछ लोग अपनी पिच में खुद को अगला स्टीव जॉब्स बताने लगते हैं। भाई साहब, पहले एक ढंग का प्रोडक्ट तो बना लो। बिना नीव के महल बनाने की कोशिश करोगे तो सिर्फ धूल ही हाथ आएगी। असलियत तो यह है कि इन्वेस्टर आपके कॉन्फिडेंस से ज्यादा आपके लॉजिक को देखता है। अगर आप अपनी बात को सादगी से नहीं समझा सकते तो इसका मतलब है कि आप खुद ही क्लियर नहीं हैं। अपनी पिच को इतना क्रिस्प और मजेदार रखिए कि सामने वाले को लगे कि अगर इसने आपके साथ काम नहीं किया तो वो बहुत बड़ी डील मिस कर देगा। याद रखिए, कम बोलना एक कला है और सही बोलना एक पावर है।


लेसन ३ : फालतू के खर्चों से बचें (दिखावे की दुनिया और खाली जेब)

अगर आपको लगता है कि एक आलीशान ऑफिस, लेदर की कुर्सियां और एक महंगी कॉफी मशीन खरीदने से आप रातों रात एक बड़े बिजनेसमैन बन जाएंगे, तो शायद आप रियलिटी चेक का सबसे बड़ा लेसन मिस कर रहे हैं। गाई कावासाकी बहुत ही सफाई से यह समझाते हैं कि स्टार्टअप के शुरुआती दिनों में पैसा भगवान से भी बढ़कर होता है। लेकिन हमारे यहाँ के नए नवेले आंत्रप्रेन्योर को तो बस स्वैग की पड़ी होती है। वो इन्वेस्टर के पैसों से सबसे पहले एक ऐसा ऑफिस लेते हैं जिसमें वो खुद भी रास्ता भटक जाएं। भाई साहब, अगर आपका काम दमदार है तो आप गैराज से भी दुनिया हिला सकते हैं, और अगर काम में दम नहीं है तो बुर्ज खलीफा की छत पर बैठकर भी आप सिर्फ चाय ही पिएंगे।

फालतू के खर्चों का मतलब सिर्फ पैसा उड़ाना नहीं है, बल्कि अपना फोकस गलत जगह लगाना भी है। लोग अक्सर अपनी कंपनी का लोगो डिजाइन करवाने में तीन महीने लगा देते हैं। जैसे कि लोगो देखते ही लोग पागलों की तरह सामान खरीदने लगेंगे। असलियत तो यह है कि जब तक आपका प्रोडक्ट मार्केट में वैल्यू नहीं दे रहा, तब तक आपका लोगो सिर्फ एक ड्राइंग कॉम्पिटिशन का हिस्सा है। गाई कहते हैं कि आपको तब तक कंजूसी करनी चाहिए जब तक कि आपका बिजनेस खुद अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए। अपनी टीम को बड़े बड़े सपने दिखाने के बजाय उन्हें काम करने के लिए एक सॉलिड वजह दीजिए।

कुछ लोग बिजनेस शुरू करने से पहले ही अपनी टीम के लिए ब्रांडेड टी शर्ट और हुडी छपवा लेते हैं। अभी तक एक भी रुपया कमाया नहीं है पर पूरी टीम ऐसे घूमती है जैसे कि गूगल का हेडक्वार्टर उनके घर के पीछे ही हो। यह सब कुछ सिर्फ आपके ईगो को शांति देता है, आपके बैंक बैलेंस को नहीं। अगर आप अपनी जेब को टाइट नहीं रखेंगे तो बहुत जल्द आपके पास सिर्फ वो टी शर्ट ही बचेगी और पहनने वाला कोई नहीं होगा। बिजनेस चलाने के लिए आपको माइंडसेट एक बनिए जैसा रखना चाहिए जो पाई पाई का हिसाब रखता है।

असली मार्केटिंग वो नहीं है जो आप होर्डिंग्स पर पैसा फेंक कर करते हैं। असली मार्केटिंग वो है जब आपका कस्टमर आपकी तारीफ करते हुए नहीं थकता। गाई कावासाकी का मानना है कि अगर आप अपने प्रोडक्ट को बेहतरीन बनाने में पैसा लगाएंगे तो आपको एडवरटाइजिंग की जरूरत कम पड़ेगी। इसलिए अगली बार जब आप किसी फैंसी चीज पर पैसा खर्च करने का सोचें, तो खुद से पूछिए कि क्या इससे मेरे कस्टमर को कोई फायदा होगा। अगर जवाब ना है, तो वो पैसा बचाकर अपने प्रोडक्ट की क्वालिटी बढ़ाने में लगाइए। याद रखिए, चमक दमक वाली दुकानें अक्सर जल्दी बंद हो जाती हैं, लेकिन क्वालिटी वाला माल सदियों तक बिकता है।


गाई कावासाकी की यह बुक हमें सिखाती है कि बिजनेस कोई सपना नहीं बल्कि एक कड़वी हकीकत है जिसे सिर्फ मेहनत और सही स्ट्रैटेजी से जीता जा सकता है। अगर आप आज भी सिर्फ बहाने बना रहे हैं या फालतू की चीजों में उलझे हैं, तो रुकिए और खुद को एक रियलिटी चेक दीजिए। क्या आप सच में आगे बढ़ना चाहते हैं या सिर्फ भीड़ का हिस्सा बने रहना चाहते हैं। आज ही अपने सबसे बड़े आईडिया पर काम करना शुरू करें, चाहे वो कितना ही छोटा क्यों न हो।

कमेंट में बताएं कि इन तीनों लेसन में से कौन सा लेसन आपकी लाइफ की सिचुएशन से सबसे ज्यादा मैच करता है। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो सिर्फ बड़ी बड़ी बातें करता है पर काम कुछ नहीं करता। चलिए, अब बातें बंद और काम शुरू।

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