क्या आप भी उन लीडर्स में से हैं जो अपनी टीम की कमियां ढूंढने में इतने बिजी हैं कि खुद की और टीम की असली ताकत का कचरा कर रहे हैं। मुबारक हो, आप फेलियर की राह पर सबसे आगे खड़े हैं। अपनी स्ट्रेंथ को नजरअंदाज करके आप सिर्फ एक थके हुए बॉस बन रहे हैं जिसे कोई फॉलो नहीं करना चाहता।
आज हम टॉम रथ और बैरी कॉन्ची की बुक स्ट्रेंथ्स बेस्ड लीडरशिप से वे सीक्रेट्स समझेंगे जो आपको एक बॉस से असली लीडर बनाएंगे। चलिए जानते हैं वे 3 लेसन जो आपकी लीडरशिप और टीम की किस्मत बदल देंगे।
लेसन १ : अपनी स्ट्रेंथ्स पर फोकस करना न कि कमियों को सुधारना
अक्सर हमारे समाज में एक अजीब सा रिवाज है। अगर बच्चा मैथ में १०० में से ९५ लाता है और पेंटिंग में सिर्फ ४०, तो घरवाले पेंटिंग का टीचर नहीं बल्कि मैथ का ट्यूशन लगवा देते हैं। लीडरशिप में भी हम यही गलती करते हैं। हम उन चीजों को ठीक करने में अपनी पूरी जवानी निकाल देते हैं जिनमें हम पैदाइशी कच्चे हैं। टॉम रथ साफ कहते हैं कि अगर आप अपनी कमियों को सुधारने में पूरी लाइफ लगा देंगे, तो आप सिर्फ 'औसत' बन पाएंगे, 'एक्सेप्शनल' नहीं।
सोचिए एक मछली है जो पेड़ पर चढ़ने की ट्रेनिंग ले रही है। वह रोज सुबह उठकर बंदरों के साथ वर्कशॉप अटेंड करती है। क्या होगा। शाम तक वह सिर्फ एक डिप्रेस्ड मछली बनेगी जो खुद को बेकार समझती है। जबकि उसकी असली ताकत पानी में तैरना था। लीडरशिप का पहला रूल यही है कि आपको अपनी 'नेचुरल स्ट्रेंथ' को पहचानना होगा। क्या आप बातों के जादूगर हैं। क्या आप डेटा को देखकर भविष्य बता सकते हैं। या फिर आप मुश्किल समय में लोगों को शांत रखने में माहिर हैं।
ज्यादातर बॉस सोचते हैं कि उन्हें हर फील्ड में मास्टर होना चाहिए। वे फाइनेंस भी देखेंगे, कोडिंग भी सिखाएंगे और ऑफिस की कॉफी मशीन ठीक करने भी पहुंच जाएंगे। यह लीडरशिप नहीं, यह रायता फैलाना है। एक महान लीडर वह नहीं होता जिसके पास हर सवाल का जवाब हो, बल्कि वह होता है जिसे अपनी ताकत पता हो और वह उसे निखारने के लिए जी जान लगा दे।
मान लीजिए आप एक टीम लीडर हैं और आपकी सबसे बड़ी ताकत 'स्ट्रैटेजी' बनाना है, लेकिन आप अपना पूरा दिन ईमेल के रिप्लाई करने और एडमिन के छोटे छोटे काम निपटाने में बर्बाद कर रहे हैं। आप अपनी टीम के साथ साथ खुद का भी नुकसान कर रहे हैं। आप उस सचिन तेंदुलकर की तरह काम कर रहे हैं जो नेट प्रैक्टिस छोड़कर पिच पर झाड़ू लगा रहा है। मजाक लग रहा है न। लेकिन असल जिंदगी में हम यही कर रहे हैं।
किताब हमें सिखाती है कि अपनी कमजोरी को मैनेज करना सीखें, उसे मिटाने के पीछे न भागें। अगर आपको ऑर्गनाइज्ड रहना नहीं आता, तो एक ऐसा असिस्टेंट रखिए जो इसमें माहिर हो। अपनी एनर्जी वहां लगाइए जहां आप बेस्ट हैं। जब आप अपनी स्ट्रेंथ पर काम करते हैं, तो आपका कॉन्फिडेंस आसमान छूता है और टीम को भी एक ऐसा लीडर मिलता है जो अपनी दिशा को लेकर क्लियर है। अपनी कमियों को गले लगाना ठीक है, लेकिन उनमें घर बनाकर रहना बेवकूफी है।
लेसन २ : टीम की जरूरतों को समझना यानी लोग आपको फॉलो क्यों करें
क्या आपने कभी सोचा है कि लोग कुछ लीडर्स के लिए अपनी जान देने को तैयार रहते हैं और कुछ को देखकर सिर्फ लंच ब्रेक का इंतजार करते हैं। असल में लीडरशिप कोई ओहदा नहीं है जो आपको प्रमोशन के साथ मिल गया। यह एक रिश्ता है। किताब के हिसाब से लोग किसी को फॉलो तब करते हैं जब उन्हें चार चीजें मिलती हैं भरोसा, करुणा, स्थिरता और उम्मीद। अगर आप अपनी टीम को यह नहीं दे पा रहे, तो आप लीडर नहीं, सिर्फ एक सैलरी बांटने वाले अंकल हैं।
सबसे पहली चीज है भरोसा। अगर आपकी टीम को लगता है कि आप मुसीबत पड़ने पर उन्हें बस के नीचे फेंक देंगे, तो वे आपके लिए कभी दिल से काम नहीं करेंगे। भरोसा कोई जादू की छड़ी नहीं है जो एक दिन में चल जाए। यह उन छोटे छोटे वादों से बनता है जो आप निभाते हैं। मान लीजिए आपने वादा किया था कि संडे को काम नहीं होगा, लेकिन आपने शनिवार रात ११ बजे जूम मीटिंग का लिंक भेज दिया। बधाई हो, आपने भरोसे का कत्ल कर दिया है। टीम अब आपको एक लीडर नहीं, बल्कि एक विलेन की तरह देखेगी।
दूसरी चीज है करुणा। लोग रोबोट नहीं हैं। उनके घर में दिक्कतें होती हैं, उनका ब्रेकअप होता है और कभी कभी उनका बस काम करने का मन नहीं होता। एक खड़ूस बॉस सोचेगा कि यह सब बहाने हैं। लेकिन एक असली लीडर जानता है कि इंसानियत ही सबसे बड़ी स्ट्रेंथ है। अगर आप अपने एम्प्लॉई की परेशानी में उसके साथ खड़े नहीं हो सकते, तो जब कंपनी पर मुसीबत आएगी, वह भी पतली गली से निकल लेगा। यह गिव एंड टेक का गेम है।
तीसरी चीज है स्थिरता। अगर आपका मूड हर दो घंटे में बदलता रहता है और आप हर मंडे को एक नई कंपनी पॉलिसी ले आते हैं, तो आपकी टीम हमेशा डरी रहेगी। स्थिरता का मतलब है कि टीम को पता हो कि उनका लीडर मुश्किल वक्त में घबराएगा नहीं। जब जहाज डूब रहा हो और कैप्टन ही जोर जोर से चिल्लाने लगे, तो पैसेंजर्स का क्या होगा। आपको उस शांत समुद्र की तरह होना चाहिए जिसकी गहराई पर टीम को यकीन हो।
और आखिरी है उम्मीद। एक लीडर का काम अंधेरे कमरे में टॉर्च दिखाना है। अगर आप ही कहेंगे कि मार्केट खराब है और कंपनी बंद होने वाली है, तो आपकी टीम रिज्यूमे अपडेट करना शुरू कर देगी। आपको उन्हें यह यकीन दिलाना होगा कि आज भले ही मुश्किल है, लेकिन कल बेहतर होगा। लेकिन ध्यान रहे, यह उम्मीद असली होनी चाहिए, वह खोखले मोटिवेशनल स्पीकर वाली नहीं जिसे सुनकर लोग सिर्फ तालियां बजाते हैं। जब आप ये चार चीजें देते हैं, तब लोग आपको फॉलो करते हैं क्योंकि वे चाहते हैं, इसलिए नहीं कि उन्हें सैलरी बचानी है।
लेसन ३ : टीम में बैलेंस बनाना यानी परफेक्ट लीडर नहीं परफेक्ट टीम
अक्सर लीडर्स को एक सुपरहीरो बनने का शौक होता है। उन्हें लगता है कि उन्हें हर काम में परफेक्ट होना चाहिए। वे चाहते हैं कि वे बहुत अच्छे कम्युनिकेटर भी हों, जबरदस्त एनालिस्ट भी हों और सबसे बड़े विजनरी भी। सच तो यह है कि ऐसा 'ऑल इन वन' लीडर सिर्फ फिल्मों में मिलता है। असल जिंदगी में एक महान लीडर वह नहीं होता जो खुद परफेक्ट हो, बल्कि वह होता है जो अपनी कमियों को दूसरों की स्ट्रेंथ से भर देता है। किताब कहती है कि आपको एक 'वेल राउंडेड' टीम बनानी चाहिए, न कि खुद 'वेल राउंडेड' बनने की कोशिश करनी चाहिए।
सोचिए अगर क्रिकेट टीम में ११ के ११ खिलाड़ी सिर्फ ओपनिंग बैट्समैन हों, तो क्या होगा। वे ४०० रन तो बना लेंगे, लेकिन जब बॉलिंग की बारी आएगी, तो सामने वाली टीम उन्हें गली क्रिकेट की तरह धोएगी। लीडरशिप भी बिल्कुल ऐसी ही है। टॉम रथ ने लीडरशिप की चार मुख्य कैटेगरी बताई हैं एक्जीक्यूटिंग, इन्फ्लुएंसिंग, रिलेशनशिप बिल्डिंग और स्ट्रैटेजिक थिंकिंग। अगर आपकी टीम में सिर्फ स्ट्रैटेजी बनाने वाले लोग भरे हैं, तो प्लानिंग तो कमाल की होगी, लेकिन काम जमीन पर कभी शुरू ही नहीं होगा क्योंकि 'एक्जीक्यूट' करने वाला कोई नहीं है।
एक स्मार्ट लीडर अपनी टीम को एक पहेली की तरह जोड़ता है। अगर आप खुद थोड़े इंट्रोवर्ट हैं और स्टेज पर जाकर भाषण देने से घबराते हैं, तो अपनी टीम में एक ऐसा बंदा रखिए जो अपनी बातों से आग लगा दे। अगर आप बहुत इमोशनल हैं और कड़े फैसले नहीं ले पाते, तो अपने साथ एक ऐसा एनालिटिकल दिमाग रखिए जो सिर्फ डेटा और लॉजिक पर बात करे। यह कमजोरी नहीं, यह स्मार्टनेस है। अपनी ईगो को साइड में रखकर यह मानना कि कोई दूसरा आपसे बेहतर काम कर सकता है, एक असली लीडर की सबसे बड़ी पहचान है।
अक्सर ऑफिस में जलन का माहौल होता है क्योंकि लीडर्स को लगता है कि अगर उनका जूनियर उनसे ज्यादा चमक गया, तो उनकी कुर्सी खतरे में पड़ जाएगी। यह सोच आपको कभी बड़ा नहीं बनने देगी। एक सफल लीडर वह है जो अपनी टीम के हर मेंबर को उसकी नेचुरल स्ट्रेंथ के हिसाब से रोल देता है। जब एक इंसान वह काम करता है जिसमें वह कुदरती तौर पर अच्छा है, तो उसे मोटिवेट करने की जरूरत नहीं पड़ती, वह खुद ही रॉकेट की तरह भागता है।
निया आपको आपकी हार के लिए नहीं, बल्कि इस बात के लिए याद रखेगी कि आपने अपने साथ कितने लोगों को बड़ा बनाया। लीडरशिप का मतलब अकेले पहाड़ चढ़ना नहीं है, बल्कि पूरी टीम को चोटी तक ले जाना है। अपनी ताकत पहचानिए, दूसरों की ताकत का सम्मान कीजिए और एक ऐसी टीम बनाइए जिसे हराना नामुमकिन हो।
तो क्या आप आज भी अपनी कमियों को रोने में वक्त बर्बाद करेंगे या अपनी असली ताकत को पहचान कर दुनिया जीतने निकलेंगे। अपनी टीम के उन मेंबर्स को पहचानिए जो आपसे बेहतर हैं और उन्हें आगे बढ़ने का मौका दीजिए। अगर यह आर्टिकल आपकी सोच में थोड़ा भी बदलाव लाया हो, तो इसे अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो बॉस तो बन गया है, पर लीडर बनना अभी बाकी है। कमेंट में बताएं कि आपकी सबसे बड़ी स्ट्रेंथ क्या है।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#Leadership #Teamwork #Success #SelfImprovement #BookSummary
_