क्या आप अभी भी अपने दादा जी के जमाने के घिसे-पिटे तरीके से अपना बिजनेस चला रहे हैं? अगर हाँ, तो बधाई हो, आप अपनी बर्बादी की स्क्रिप्ट खुद लिख रहे हैं। दुनिया रॉकेट की रफ्तार से आगे निकल गई और आप अभी भी बैलगाड़ी के टायर बदल रहे हैं। माइकल हैमर और जेम्स चैम्पी की यह किताब आपको बताएगी कि क्यों आपकी मेहनत बेकार जा रही है। चलिए जानते हैं वो ३ बड़े सबक जो आपके डूबते हुए काम को एक रिवॉल्यूशन बना सकते हैं।
Lesson : छोटे टास्क नहीं, पूरा प्रोसेस बदलो
क्या आपने कभी गौर किया है कि हमारे यहाँ सरकारी दफ्तरों में काम कैसे होता है? एक फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक जाने में उतना ही समय लेती है जितना एक इंसान को पैदल तीर्थ यात्रा करने में लगता है। माइकल हैमर और जेम्स चैम्पी अपनी किताब रीइंजीनियरिंग द कॉर्पोरेशन में सबसे पहले इसी बीमारी पर चोट करते हैं। वो कहते हैं कि ज्यादातर कंपनियां आज भी अठारहवीं सदी के एडम स्मिथ के सिद्धांतों पर चल रही हैं। हम काम को इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट देते हैं कि कोई भी इंसान पूरे प्रोसेस की जिम्मेदारी नहीं लेता। सबको बस अपने छोटे से टास्क से मतलब होता है।
मान लीजिए आप एक ऑनलाइन शॉपिंग एप से बिरयानी मंगवाते हैं। अब एक बंदा सिर्फ चावल उबालेगा, दूसरा सिर्फ मसाला मिलाएगा, तीसरा सिर्फ चिकन चेक करेगा और चौथा सिर्फ पैकिंग देखेगा। अगर इनमें से एक भी बंदा छुट्टी पर गया या उसने काम धीमा किया, तो आपकी बिरयानी आपके घर तब पहुंचेगी जब आपको भूख की जगह नींद आ रही होगी। यही हाल आज के कॉर्पोरेट वर्ल्ड का है। हम टास्क सुधारने में लगे रहते हैं, जबकि समस्या पूरे प्रोसेस में होती है।
लेखक कहते हैं कि अगर आपको सच में रिवॉल्यूशन लाना है, तो आपको यह सोचना बंद करना होगा कि काम कैसे हो रहा है। इसके बजाय यह सोचिए कि काम क्यों हो रहा है? क्या इस स्टेप की सच में जरूरत है? अक्सर हम एक खराब प्रोसेस को तेज करने के लिए उसमें नई टेक्नोलॉजी डाल देते हैं। यह वैसा ही है जैसे आप एक पुरानी खटारा साइकिल पर रॉकेट का इंजन लगा दें। साइकिल उड़ेगी नहीं, बस बहुत तेजी से बिखर जाएगी। रीइंजीनियरिंग का मतलब है जीरो से शुरुआत करना। पुराने नक्शे को फाड़कर फेंक देना और एक नया रास्ता बनाना जहाँ कस्टमर को वैल्यू मिले, न कि सिर्फ फाइलों का ढेर।
जब आप टास्क के बजाय प्रोसेस पर ध्यान देते हैं, तो आप उन फालतू की कड़ियों को हटा देते हैं जो काम को धीमा करती हैं। एक समझदार मैनेजर वो नहीं है जो अपने एम्प्लॉई को कोल्हू का बैल बना दे, बल्कि वो है जो पूरा कोल्हू ही बदल दे ताकि मेहनत कम और तेल ज्यादा निकले। अगर आपका बिजनेस भी कछुए की चाल चल रहा है, तो समझ जाइये कि आप सिर्फ टास्क मैनेजर बन कर रह गए हैं। अब वक्त है प्रोसेस इंजीनियर बनने का।
Lesson : पुरानी परंपराओं का श्राद्ध करो और नए नियम बनाओ
क्या आपके ऑफिस में भी कोई ऐसा काम है जो सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि 'सालों से ऐसा ही होता आया है'? माइकल हैमर और जेम्स चैम्पी कहते हैं कि यह 'परंपरा' ही आपके बिजनेस की सबसे बड़ी दुश्मन है। अक्सर कंपनियां उन पुराने नियमों की गुलाम बन जाती हैं जो आज के दौर में पूरी तरह एक्सपायर हो चुके हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई इंसान आज भी अपने घर के बाहर पीसीओ (PCO) का बोर्ड लगाकर बैठा हो और उम्मीद करे कि लोग सिक्के लेकर फोन करने आएंगे। भाई साहब, दुनिया बदल गई है, अब सबके हाथ में ५जी (5G) वाला स्मार्टफोन है!
लेखक बड़े मजे से समझाते हैं कि रीइंजीनियरिंग का मतलब 'सुधार' करना नहीं, बल्कि 'बदलाव' करना है। अगर आप अपनी पुरानी कार का टायर बदल रहे हैं या उसे नया पेंट कर रहे हैं, तो आप बस उसे ठीक कर रहे हैं। लेकिन अगर आप कार बेचकर एक इलेक्ट्रिक स्कूटर ले लेते हैं क्योंकि आपको ट्रैफिक से बचना है, तो यह रीइंजीनियरिंग है। अक्सर मैनेजर्स पुरानी फाइलों, पुराने अप्रूवल प्रोसेस और पुरानी मीटिंग्स को ढोते रहते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने ये सब बंद कर दिया, तो शायद ऑफिस में प्रलय आ जाएगी।
असल में, आधे से ज्यादा नियम तो इसलिए बनाए गए थे ताकि किसी एक गलती को रोका जा सके जो शायद दस साल पहले हुई थी। अब उस एक गलती के चक्कर में आपने पूरे प्रोसेस की स्पीड जेल के कैदी जैसी कर दी है। रीइंजीनियरिंग कहती है कि हिम्मत जुटाओ और उन पुराने नियमों को डस्टबिन में डालो। अगर कोई स्टेप वैल्यू ऐड नहीं कर रहा है, तो वो कचरा है। चाहे वो आपके बॉस का पसंदीदा तरीका ही क्यों न हो।
सोचिए, अगर एक बैंक आज भी आपसे कहे कि पैसे निकालने के लिए आपको पहले टोकन लेना होगा, फिर तीन अलग-अलग बाबू से साइन कराने होंगे और फिर शाम को वापस आना होगा, तो क्या आप वहां जाएंगे? बिल्कुल नहीं! आप उस बैंक में जाएंगे जहाँ एक क्लिक पर काम होता है। पुराने नियम आपको सेफ महसूस कराते हैं, लेकिन वो आपको धीरे-धीरे खत्म कर देते हैं। बिजनेस में रिवॉल्यूशन लाने के लिए आपको एक 'डिस्ट्रॉयर' बनना पड़ेगा। पुराने मलबे को साफ किए बिना नई इमारत नहीं खड़ी हो सकती। तो अगली बार जब कोई कहे कि 'हमारे यहाँ तो ऐसे ही होता है', तो समझ जाना कि अब रीइंजीनियरिंग का वक्त आ गया है।
Lesson : टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल स्पीड के लिए नहीं, स्मार्टनेस के लिए करो
क्या आपने कभी किसी को देखा है जो हाथ से पंखा झलने के बजाय बिजली का पंखा तो ले आया, लेकिन उसे चलाने के लिए फिर से हाथ का ही इस्तेमाल कर रहा है? सुनने में बड़ा अजीब लगता है ना? लेकिन माइकल हैमर और जेम्स चैम्पी कहते हैं कि ज्यादातर कंपनियां टेक्नोलॉजी के साथ यही मजाक कर रही हैं। लोग कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर्स तो खरीद लेते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल सिर्फ अपने पुराने, थके हुए और बेकार प्रोसेस को थोड़ा सा तेज करने के लिए करते हैं। यह वैसा ही है जैसे आप अपने घर के पुराने कबाड़ को एक ई-कॉमर्स वेबसाइट पर बेचने की कोशिश करें। कबाड़ तो कबाड़ ही रहेगा, बस अब वो डिजिटल हो गया है!
लेखक समझाते हैं कि असली रीइंजीनियरिंग तब होती है जब आप टेक्नोलॉजी को एक 'इनेबलर' की तरह देखते हैं। टेक्नोलॉजी का काम सिर्फ पुराने काम की स्पीड बढ़ाना नहीं है, बल्कि वो काम करना है जो पहले मुमकिन ही नहीं था। पुराने जमाने में अगर किसी को लोन चाहिए होता था, तो उसे दस चक्कर काटने पड़ते थे क्योंकि डाटा फाइलों में बंद था। आज बैंक के पास वो टेक्नोलॉजी है जो एक सेकंड में आपकी पूरी क्रेडिट हिस्ट्री देख सकती है। लेकिन अगर आज भी बैंक आपसे वही दस फॉर्म भरवा रहा है जो वो १९८० में भरवाता था, तो समझ लीजिए कि उस बैंक ने टेक्नोलॉजी तो ली है, पर अकल नहीं लगाई।
अक्सर हम नई मशीनें लगा लेते हैं लेकिन अपने एम्प्लॉई को वही पुराने घिसे-पिटे रूल्स फॉलो करने को कहते हैं। इससे होता क्या है? एम्प्लॉई की फ्रस्ट्रेशन बढ़ती है और कस्टमर का सिरदर्द। रीइंजीनियरिंग कहती है कि इंफॉर्मेशन को हर उस इंसान तक पहुँचाओ जो फैसला ले सकता है। जब आपके पास डेटा है, तो आपको हर छोटी बात के लिए अपने बॉस की परमिशन की जरूरत क्यों है? टेक्नोलॉजी का असली मजा तब है जब वो मिडिल-मैन और फालतू की कागजी कार्रवाई को खत्म कर दे।
याद रखिए, डिजिटल इंडिया के दौर में अगर आपका बिजनेस प्रोसेस अभी भी एनालॉग की तरह सुस्त है, तो आप बस एक 'स्मार्ट दिखने वाले' पुराने ख्यालात के इंसान हैं। टेक्नोलॉजी को अपने काम करने का तरीका बदलने का मौका दें, न कि सिर्फ फाइलों को ईमेल में बदलने का। जब आप प्रोसेस और टेक्नोलॉजी का सही तालमेल बिठा लेते हैं, तो आपका बिजनेस एक रॉकेट बन जाता है जो कंपटीशन को बहुत पीछे छोड़ देता है। तो क्या आप तैयार हैं अपने पुराने सॉफ्टवेयर और उससे भी पुराने दिमाग को अपडेट करने के लिए?
माइकल हैमर और जेम्स चैम्पी की यह किताब हमें सिखाती है कि बिजनेस में 'थोड़ा बहुत सुधार' काफी नहीं है। अगर आपको आज की इस गला-काट प्रतियोगिता में टिकना है, तो आपको अपने पुराने ढाँचे को गिराकर एक नया रिवॉल्यूशन लाना होगा। यह सफर मुश्किल हो सकता है, लेकिन यकीन मानिए, पुराने मलबे में दबे रहने से बेहतर है कि आप एक नई और बुलंद इमारत खड़ी करें।
अब आपकी बारी है! क्या आपके बिजनेस या काम में भी कोई ऐसा प्रोसेस है जो आपको इरिटेट करता है? क्या आप उस पुराने ढर्रे को तोड़ने की हिम्मत रखते हैं? हमें कमेंट्स में जरूर बताएं कि आप अपने काम में क्या 'रीइंजीनियर' करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अभी भी पुराने तरीके से काम करके थक रहे हैं। याद रखिए, बदलाव से डरिए मत, क्योंकि बदलाव ही तरक्की का दूसरा नाम है!
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