अगर आपको लगता है कि फैंसी इंग्लिश नाम और भारी डिस्काउंट देकर आप कस्टमर को अपना गुलाम बना लेंगे तो मुबारक हो आप अपनी बर्बादी का टिकट खुद काट रहे हैं। दुनिया आगे निकल रही है और आप अभी भी वही घिसे पिटे नुस्खे अपनाकर अपने बिजनेस की कब्र खोद रहे हैं।
आज हम सिंपली बेटर बुक के जरिए समझेंगे कि कैसे बिना किसी दिखावे के असली बिजनेस खड़ा किया जाता है। चलिए जानते हैं वो 3 बड़े लेसन जो आपकी सोच बदल देंगे और आपको मार्केट का असली खिलाड़ी बनाएंगे।
लेसन १ : फैंसी आइडिया छोड़ो और बेसिक चीजों पर ध्यान दो
आजकल के नए नवेले बिजनेस ओनर और स्टार्टअप वाले लड़के अपने ऑफिस में बैठकर ऐसी ऐसी योजनाएं बनाते हैं जैसे कल ही मंगल ग्रह पर दुकान खोल लेंगे। उनको लगता है कि अगर उन्होंने अपनी ऐप में चार नए एनिमेटेड बटन डाल दिए या अपनी सर्विस का नाम कोई टेढ़ा मेढ़ा लैटिन शब्द रख दिया तो कस्टमर लाइन लगा कर खड़ा हो जाएगा। लेकिन सच तो यह है कि कस्टमर को आपके उन चमकते हुए बटनों से घंटा फर्क नहीं पड़ता। पेट्रिक बारवाइज और सीन मीहन इस बुक में साफ़ कहते हैं कि दुनिया के सबसे सफल बिजनेस कोई जादू नहीं करते बल्कि वो सिर्फ अपनी बेसिक सर्विस को इतना मजबूत रखते हैं कि कस्टमर कहीं और जाने की सोच ही न सके।
सोचिए आप एक रेस्टोरेंट में जाते हैं जहाँ वेटर्स ने बड़ी महंगी सूट पहनी है और छत पर सोने का झूमर लगा है। लेकिन जैसे ही आप पनीर टिक्का खाते हैं आपको लगता है कि आप गलती से रबड़ चबा रहे हैं। क्या आप वहां दोबारा जाएंगे? बिल्कुल नहीं। आप शायद उस ढाबे पर जाना पसंद करेंगे जहाँ बैठने के लिए शायद प्लास्टिक की टूटी कुर्सी मिले लेकिन खाना ऐसा हो कि आत्मा तृप्त हो जाए। यही असली बिजनेस है। लोग अक्सर अपनी मार्केटिंग में करोड़ों रुपये फूंक देते हैं लेकिन अपनी प्रोडक्ट की क्वालिटी चेक करना भूल जाते हैं।
आजकल की दुनिया में हर कोई यूनिक बनने की होड़ में लगा है। हर किसी को कुछ ऐसा करना है जो पहले कभी न हुआ हो। भाई मेरे पहले वो तो कर लो जो हर कोई मांग रहा है। अगर आप एक ई कॉमर्स साइट चलाते हैं तो कस्टमर को इस बात से मतलब नहीं है कि आपका लोगो किस डिजाइनर ने बनाया है। उसे सिर्फ इस बात से मतलब है कि सामान टाइम पर आए और जैसा फोटो में दिखा था वैसा ही निकले। अगर आप यह बेसिक काम भी ढंग से नहीं कर पा रहे हैं तो आपकी यूनिकनेस का अचार डालेगा क्या कस्टमर?
इस किताब का सबसे बड़ा सच यही है कि 'सिंपली बेटर' होना यानी दूसरों से बस थोड़ा सा बेहतर और भरोसेमंद होना ही आपको मार्केट का राजा बना देता है। जब आपकी सर्विस प्रेडिक्टेबल होती है तो कस्टमर का भरोसा बढ़ता है। भरोसा बढ़ता है तो वो आपको अपनी पूरी खानदान और दोस्तों को रिकमेंड करता है। लेकिन नहीं हमें तो दुनिया बदलनी है चाहे खुद का काम ढेला भर का न हो। अगर आप भी इसी कैटेगरी में आते हैं तो यकीन मानिए आप बिजनेस नहीं बल्कि अपनी ईगो का महल बना रहे हैं जो पहली ही मंदी की लहर में ढह जाएगा।
अगले लेसन में हम देखेंगे कि कैसे अपने ईगो को साइड में रखकर कस्टमर की वो बातें सुनी जाती हैं जो वो कभी बोलता ही नहीं है।
लेसन २ : कस्टमर की आवाज सुनो ना कि अपनी झूठी तारीफें
ज्यादातर कंपनियों के मालिक अपने ऑफिस के एयर कंडीशनर वाले केबिन में बैठकर यह तय करते हैं कि कस्टमर को क्या चाहिए। उन्हें लगता है कि उनके पास जो भारी भरकम डिग्री है और जो उन्होंने पीपीटी बनाई है वही परम सत्य है। अगर कोई एम्प्लॉई आकर कह भी दे कि सर कस्टमर को यह चीज पसंद नहीं आ रही तो उसे ऐसे देखा जाता है जैसे उसने कोई अपराध कर दिया हो। सिंपली बेटर बुक हमें यह समझाती है कि असली सच मार्केट की धूल में मिलता है ना कि आपके आलीशान बोर्डरूम की मीटिंग में।
सोचिए आप एक मोबाइल कंपनी चला रहे हैं। आपने एक ऐसा फोन बनाया जिसमें दुनिया भर के फीचर्स हैं यहाँ तक कि वो फोन चाय भी बना सकता है। लेकिन उसे चलाने के लिए इंसान को स्पेस साइंटिस्ट होना जरूरी है क्योंकि उसका इंटरफेस इतना मुश्किल है। अब आप अपनी मार्केटिंग टीम पर चिल्ला रहे हैं कि सेल क्यों नहीं हो रही। भाई साहब अगर आपने एक बार दुकान पर खड़े होकर किसी आम आदमी को वो फोन इस्तेमाल करते देखा होता तो आपको समझ आता कि उसे चाय बनाने वाला फोन नहीं बल्कि एक ऐसा फोन चाहिए था जो हैंग न हो। लेकिन आपको तो अपनी अकल पर इतना भरोसा था कि आपने कस्टमर की जरूरत को कचरे के डिब्बे में डाल दिया।
मार्केट में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो कस्टमर से फीडबैक मांगते हैं ताकि अपनी तारीफ सुन सकें और दूसरे वो जो वाकई सुधार करना चाहते हैं। अगर आप सिर्फ इसलिए सर्वे करवाते हैं ताकि आप अपनी एनुअल रिपोर्ट में लिख सकें कि 90 परसेंट लोग हमसे खुश हैं तो आप खुद को धोखा दे रहे हैं। असली खिलाड़ी वो है जो उन 10 परसेंट लोगों के पास जाता है जो गाली दे रहे हैं। क्योंकि वही लोग आपको बताएंगे कि आपके प्रोडक्ट में कहाँ छेद है जहाँ से पैसा और कस्टमर दोनों बाहर निकल रहे हैं।
कस्टमर की आवाज सुनने का मतलब यह नहीं है कि आप उनकी हर फालतू डिमांड पूरी करें। इसका मतलब है उनके दर्द को समझना। कई बार कस्टमर को खुद नहीं पता होता कि उसे क्या चाहिए लेकिन उसे यह जरूर पता होता है कि उसे क्या परेशान कर रहा है। अगर आप उसकी परेशानी का हल निकाल देते हैं तो वो आपका फैन बन जाता है। लेकिन हम तो अपनी ही धुन में मगन रहते हैं। हमें लगता है कि अगर हम अपनी वेबसाइट का रंग नीला कर देंगे तो लोग दीवाने हो जाएंगे। असल में कस्टमर को फर्क नहीं पड़ता कि वेबसाइट नीली है या पीली बस वो ढंग से काम करनी चाहिए।
अगले लेसन में हम देखेंगे कि कैसे यह सब कुछ एक दिन का काम नहीं है बल्कि एक ऐसी तपस्या है जो कभी खत्म नहीं होती।
लेसन ३ : हर दिन थोड़ा बेहतर बनो वरना मार्केट से बाहर होने के लिए तैयार रहो
ज्यादातर लोग बिजनेस को 100 मीटर की रेस समझते हैं। उनको लगता है कि एक बार अच्छी सेल हो गई या एक बार प्रोडक्ट हिट हो गया तो अब पूरी जिंदगी बैठकर नोट छापेंगे। ऐसे ही लोगों के लिए मार्केट में 'नोकिया' और 'कोडक' जैसे उदाहरण पड़े हैं जो अपनी कामयाबी के नशे में ऐसे चूर हुए कि उन्हें पता ही नहीं चला कब दुनिया उनसे कोसों आगे निकल गई। सिंपली बेटर होने का असली मतलब यह नहीं है कि आप एक दिन में कोई तीर मार दें बल्कि इसका मतलब है कि आप हर दिन अपनी सर्विस में 1 परसेंट सुधार करने की जिद रखें।
सोचिए आपके मोहल्ले में दो नाई की दुकानें हैं। एक वो जो पिछले 20 साल से वही पुराना जंग लगा उस्तरा और फटा हुआ तौलिया इस्तेमाल कर रहा है और बात ऐसे करता है जैसे आप पर एहसान कर रहा हो। दूसरी तरफ एक नया लड़का है जो शायद बहुत बड़ा एक्सपर्ट नहीं है लेकिन वो हर हफ्ते अपनी दुकान में कुछ नया छोटा सा बदलाव करता है। कभी साफ तौलिया कभी बेहतर खुशबू वाला लोशन तो कभी बस आपकी पसंद का गाना बजा देता है। आप किसके पास जाएंगे? जाहिर है उस नए लड़के के पास क्योंकि वो 'सिंपली बेटर' होने की कोशिश कर रहा है।
बिजनेस में ठहर जाने का मतलब है मर जाना। अगर आप आज वही कर रहे हैं जो आपने पिछले साल किया था तो समझ लीजिए कि आपका कॉम्पिटिटर आपको कच्चा चबाने की तैयारी कर चुका है। सुधार करने के लिए आपको हमेशा करोड़ों के इन्वेस्टमेंट की जरूरत नहीं होती। कई बार सुधार सिर्फ अपनी डिलीवरी स्पीड बढ़ाने में होता है या कस्टमर के फोन कॉल को 10 सेकंड जल्दी उठाने में होता है। लेकिन हमारे यहाँ के मालिकों को लगता है कि छोटे सुधारों से क्या होगा हमें तो सीधा आसमान फाड़ना है। भाई साहब आसमान बाद में फाड़ना पहले अपनी सर्विस के छेद तो भर लो।
इस किताब का सबसे कड़वा सच यही है कि मार्केट कभी किसी का इंतजार नहीं करता। अगर आप आलस में डूबे रहेंगे और सोचेंगे कि कस्टमर तो अपना ही है कहीं नहीं जाएगा तो यकीन मानिए वो उसी दिन आपको छोड़ देगा जिस दिन उसे आपसे 2 रुपये सस्ती या थोड़ी बेहतर सर्विस कहीं और मिलेगी। वफादारी सिर्फ बातों में अच्छी लगती है बिजनेस में सिर्फ 'वैल्यू' चलती है। इसलिए अपनी कुर्सी से उठिए और देखिए कि आज आप ऐसा क्या छोटा सा काम कर सकते हैं जो आपके कस्टमर के चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कान ले आए।
सिंपली बेटर कोई रॉकेट साइंस नहीं है। यह सिर्फ एक ईमानदारी भरा तरीका है बिजनेस करने का। अपनी नींव मजबूत रखिए कस्टमर की तकलीफ को अपनी तकलीफ समझिए और हर दिन खुद को कल से बेहतर बनाइये। क्या आप तैयार हैं अपने बिजनेस की फालतू सजावट छोड़कर असलियत पर काम करने के लिए? आज ही नीचे कमेंट में बताएं कि आप अपने काम में वो कौन सी एक छोटी चीज है जिसे कल से 'सिंपली बेटर' बनाने वाले हैं। याद रखिए छोटे कदम ही बड़े बदलाव की शुरुआत करते हैं।
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