Strategic Negotiation (Hindi)


अगर आप अभी भी दुकानदार से सौ रूपये कम कराने के लिए अपनी इज्जत का कचरा कर रहे है तो मुबारक हो आप अपनी लाइफ की सबसे बड़ी डील्स खोने के लिए तैयार बैठे है। लोग करोड़ो का डिस्काउंट लेकर निकल जाते है और आप बस चाय के पैसे बचाकर खुद को शातिर समझ रहे है।

क्या आप जानते है कि बिना सही स्ट्रैटेजी के मोलभाव करना केवल समय की बर्बादी है। आज हम ब्रायन डाइटमेयर की बुक से वो ४ स्टेप्स समझेंगे जो आपको एक मास्टर नेगोशिएटर बना देंगे जिससे आप हर डील अपने नाम कर पाएंगे।


लेसन १ : अपनी लिमिट्स और वैल्यू को सेट करना सीखो

नेगोशिएशन की टेबल पर बैठना एक जंग की तरह है और बिना हथियार के जंग में जाना सिर्फ सुसाइड होता है। बहुत से लोग सोचते है कि बस वहा जाकर अपनी मीठी बातो से सामने वाले को पिघला देंगे। भाई साहब ये कोई कॉलेज की कैंटीन नहीं है जहा आप स्माइल देकर एक्स्ट्रा समोसा ले लेंगे। यहा असली दुनिया में लोग आपकी कमजोरी सूंघ लेते है। ब्रायन डाइटमेयर कहते है कि सबसे बड़ी गलती जो लोग करते है वो है अपनी बैटना यानी बी ए टी एन ए (Best Alternative to a Negotiated Agreement) को न जानना। सीधे शब्दो में कहे तो अगर ये डील नहीं हुई तो आपके पास दूसरा प्लान क्या है। अगर आपके पास कोई प्लान बी नहीं है तो समझो आप सामने वाले के रहम और करम पर हो।

सोचिए आप एक नई नौकरी का इंटरव्यू देने गए है। एच आर पूछता है कि आपकी सैलरी कितनी होनी चाहिए। अब अगर आपको पता ही नहीं कि मार्केट में आपकी वैल्यू क्या है तो आप बस वहा बैठ कर छत के पंखे गिनेंगे। आप कहेंगे कि सर जो आपको ठीक लगे दे दो। बस यही आपने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली। सामने वाला समझ गया कि ये बंदा तो सेल में लगा हुआ सामान है जो कम दाम में भी बिक जाएगा। असल में आपको पता होना चाहिए कि आपकी स्किल की कीमत क्या है और वो कम से कम कितनी रकम है जिस पर आप राजी होंगे। इसे कहते है रिजर्वेशन प्राइस। अगर कंपनी उससे एक रुपया भी कम दे तो आपको उठकर चले आना चाहिए। लेकिन लोग डरते है। उन्हें लगता है कि अगर मना किया तो भूखे मर जाएंगे। यही डर आपकी हार है।

असली मास्टर वो होता है जिसे अपनी कीमत पता होती है। उसे पता होता है कि वो टेबल पर क्या लेकर आ रहा है। जैसे मान लीजिए आप अपना पुराना फोन बेच रहे है। आपको पता है कि मार्केट में वो १० हजार का बिकेगा। अब कोई ग्राहक आकर कहता है कि भाई ४ हजार में दे दो तो क्या आप उसे फोन देंगे। बिलकुल नहीं। आप उसे रास्ता दिखा देंगे। क्यों। क्योंकि आपके पास १० हजार का दूसरा ऑप्शन है। बिजनेस में भी यही लॉजिक चलता है। अगर आपके पास कोई और रास्ता नहीं है तो सामने वाला आपको निचोड़ लेगा। इसलिए नेगोशिएशन शुरू करने से पहले अपनी लिमिट तय करो। एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खींचो जिसे आप खुद भी पार न करे। जब आप इस कॉन्फिडेंस के साथ बात करते है तो सामने वाले को समझ आ जाता है कि आप कोई कच्चे खिलाड़ी नहीं है। आपकी बॉडी लैंग्वेज बदल जाती है और आपकी बातो में वो वजन आता है जो बड़ी डील्स क्लोज करने के लिए जरूरी है। अपनी वैल्यू को गिरवी रखकर की गई डील कभी सक्सेस नहीं होती।


लेसन २ : सामने वाले के चश्मे से दुनिया देखो

ज्यादातर लोग नेगोशिएशन को एक कुश्ती का मैच समझते है। उन्हें लगता है कि बस सामने वाले को पटकनी देनी है और अपना फायदा निकाल कर भाग जाना है। लेकिन भाई साहब ये कोई मछली मार्केट नहीं है जहा आप चिल्लाकर जीत जाएंगे। ब्रायन डाइटमेयर हमे समझाते है कि असली पावर गेम तो तब शुरू होता है जब आप ये समझ जाते है कि सामने वाले की कमजोरी क्या है। नेगोशिएशन का मतलब सिर्फ बोलना नहीं होता बल्कि ध्यान से सुनना और समझना होता है। अगर आप सिर्फ अपनी डिमांड्स की लिस्ट लेकर बैठे है तो आप एक रोबोट से ज्यादा कुछ नहीं है। आपको ये पता लगाना होगा कि सामने वाला आखिर चाहता क्या है और वो किस बात से डरा हुआ है। जब आप उनकी समस्या का हल बन जाते है तो वो खुद चलकर आपके पास आते है।

मान लीजिए आप एक फ्रीलांसर है और किसी क्लाइंट के साथ प्रोजेक्ट डिस्कस कर रहे है। आप कह रहे है कि मुझे ५० हजार चाहिए क्योंकि मेरी मेहनत बहुत है। क्लाइंट कह रहा है कि बजट सिर्फ ३० हजार है। अब अगर आप बस पैसो पर अड़े रहेंगे तो बात बिगड़ जाएगी। लेकिन अगर आप थोड़ा दिमाग लगाए और पूछे कि उन्हें असल में क्या चाहिए। पता चलता है कि उन्हें काम बहुत जल्दी चाहिए क्योंकि उनका कोई बड़ा इवेंट आने वाला है। अब यहा आपको उनकी नब्ज मिल गई। आप कह सकते है कि सर मै आपको ये काम २ दिन पहले दे दूंगा ताकि आप चैन की नींद सो सके पर उसके लिए मुझे एक्स्ट्रा एफर्ट्स लगेंगे और ५० हजार ही फाइनल होगा। अब क्लाइंट को पैसा नहीं बल्कि अपना मानसिक सुकून दिख रहा है। वो तुरंत मान जाएगा। इसे कहते है वैल्यू क्रिएट करना।

लोग अक्सर अपनी ईगो के चक्कर में सामने वाले की जरूरत को नजरअंदाज कर देते है। आपको एक जासूस की तरह काम करना होगा। सामने वाले से ऐसे सवाल पूछो जिसका जवाब वो हां या ना में न दे सके। उनसे पूछो कि ये प्रोजेक्ट उनके लिए क्यों जरूरी है। वो पिछले वेंडर से क्यों परेशान थे। जब वो अपनी भड़ास निकालेंगे तो समझो आपको चाबी मिल गई। नेगोशिएशन में जो सबसे ज्यादा सवाल पूछता है वही ड्राइवर की सीट पर बैठा होता है। अगर आप बस अपनी तारीफ के पुल बांधते रहेंगे तो सामने वाला बोर होकर सो जाएगा। आपको उनके दर्द की दवा बनना है। जब उन्हें लगेगा कि आप उनका फायदा सोच रहे है तो वो अपना डिफेंस कम कर देंगे। फिर आप जो भी डील ऑफर करेंगे वो उन्हें एक जैकपॉट की तरह लगेगी। याद रखिए एक अच्छा सौदा वो नहीं है जिसमे आप जीत जाए बल्कि वो है जिसमे सामने वाले को लगे कि वो जीत गया है। यही वो असली जादू है जो बड़े बड़े बिजनेस टाइकून हर रोज इस्तेमाल करते है और दुनिया को लगता है कि वो बस लकी है।


लेसन ३ : डेटा को अपना ढाल और सवालों को तलवार बनाओ

नेगोशिएशन की टेबल पर भावनाएं वैसी ही है जैसे क्रिकेट के मैदान पर ओस। ये आपका हाथ फिसला देती है और आप मैच हार जाते है। ब्रायन डाइटमेयर साफ़ कहते है कि अगर आप इमोशनल होकर बात करेंगे तो सामने वाला आपको कच्चा चबा जाएगा। अक्सर लोग क्या करते है। वो कहते है कि सर प्लीज मान जाइये ना मेरी बहुत मजबूरी है। भाई साहब ये सुनकर सामने वाला आपको पैसे नहीं देगा बल्कि आपको कमजोर समझकर और दबाएगा। असली नेगोशिएटर मजबूरी नहीं बल्कि मजबूरी के पीछे का लॉजिक और डेटा दिखाता है। जब आप नंबर्स की भाषा में बात करते है तो बहस की गुंजाइश खत्म हो जाती है। डेटा वो सच है जिसे कोई झुठला नहीं सकता। अगर आप किसी को बता रहे है कि आपकी सर्विस से उनका रिवेन्यू २० परसेंट बढ़ सकता है तो ये एक फैक्ट है जिसे ठुकराना उनके लिए बेवकूफी होगी।

मान लीजिए आप अपने बॉस से सैलरी बढ़ाने की बात कर रहे है। अगर आप कहेंगे कि सर महंगाई बहुत बढ़ गई है और घर का किराया देना मुश्किल है तो बॉस कहेंगे कि भाई महंगाई तो सबके लिए बढ़ी है। लेकिन अगर आप अपनी एक साल की अचीवमेंट्स की फाइल टेबल पर रखते है और दिखाते है कि आपने कंपनी के लिए ५० लाख का एक्स्ट्रा बिजनेस जनरेट किया है तो अब बात बदल गई। यहा आप भीख नहीं मांग रहे बल्कि अपना हक मांग रहे है। डेटा आपके कॉन्फिडेंस को आसमान पर ले जाता है। इसके साथ ही आपको सही सवाल पूछने की कला आनी चाहिए। नेगोशिएशन में चुप रहना भी एक बहुत बड़ी पावर है। जब सामने वाला कोई ऐसी ऑफर दे जो आपको पसंद न हो तो बस शांति से उनकी तरफ देखिये। ये सन्नाटा उन्हें बेचैन कर देगा और वो खुद ही अपनी ऑफर को सुधारने की कोशिश करने लगेंगे।

सवालों का इस्तेमाल इस तरह कीजिये कि सामने वाला खुद ही अपना रास्ता ढूंढने लगे। अगर वो कहता है कि ये बहुत महंगा है तो उससे पूछिए कि आप इसकी तुलना किससे कर रहे है। जब वो जवाब देगा तो आपको पता चल जाएगा कि उसकी असल चिंता क्या है। नेगोशिएशन का मतलब ये नहीं कि आप बस अपनी बात थोपे। इसका मतलब है कि आप एक ऐसा रास्ता बनाए जहा दोनों तरफ के डेटा और लॉजिक का मिलन हो। जब आप तैयारी के साथ जाते है तो आपकी आवाज में वो कड़कपन होता है जो किसी भी डील को क्लोज करने के लिए काफी है। याद रखिये कि एक सफल इंसान और एक नाकाम इंसान के बीच का फर्क सिर्फ इतना है कि सफल इंसान को पता होता है कि कब बोलना है और कब अपने डेटा को बोलने देना है। अपनी तैयारी को कभी कम मत आंकिए क्योंकि यही वो चाबी है जो कामयाबी के बंद दरवाजे खोलती है।


जिंदगी हर कदम पर आपसे मोलभाव करती है। कभी ये आपके समय का सौदा करती है तो कभी आपके सपनों का। अगर आप आज नेगोशिएशन की ये कला नहीं सीखेंगे तो कल आपको उन चीजों के लिए भी समझौता करना पड़ेगा जो आपके हक की है। याद रखिये कि दुनिया आपको वो नहीं देती जो आप डिजर्व करते है बल्कि वो देती है जो आप नेगोशिएट कर सकते है। आज ही अपनी वैल्यू पहचानिए और तैयारी के साथ मैदान में उतरिये।

क्या आप अपनी अगली डील के लिए तैयार है। कमेंट में अपनी राय दे और इस आर्टिकल को उस दोस्त के साथ शेयर करे जो हमेशा कम दाम में मान जाता है। आपका एक शेयर किसी की जिंदगी बदल सकता है।

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