Six Sigma (Hindi)


अगर आप अभी भी अपनी किस्मत और रैंडम आइडियाज के भरोसे करोड़पति बनने के सपने देख रहे हैं तो बधाई हो आप फेल होने की तैयारी कर रहे हैं। दुनिया की टॉप कंपनियां सिक्स सिग्मा का इस्तेमाल करके नोट छाप रही हैं और आप अभी भी वही पुरानी गलतियां दोहरा कर अपना कीमती समय और पैसा बर्बाद कर रहे हैं। यह कड़वा सच सुनने के बाद चलिए जानते हैं वो ३ सीक्रेट लेसन्स जो आपकी बिजनेस और पर्सनल लाइफ को पूरी तरह बदल देंगे।


Lesson : परफेक्ट बनने का मतलब ३.४ की जादुई संख्या

अगर आप सोचते हैं कि ९९ परसेंट काम सही करना बहुत बड़ी अचीवमेंट है तो शायद आप एक बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। सिक्स सिग्मा की भाषा में ९९ परसेंट परफेक्ट होना असल में एक बड़ी असफलता है। सोचिए अगर एक पायलट ९९ परसेंट बार सही लैंडिंग करे और बाकी १ परसेंट बार प्लेन क्रैश कर दे तो क्या आप उस एयरलाइन में बैठना चाहेंगे? बिल्कुल नहीं। आप कहेंगे कि भाई मुझे अपनी जान प्यारी है। ठीक इसी तरह बिजनेस में भी १ परसेंट की गलती का मतलब है करोड़ों का नुकसान और कस्टमर का भरोसा टूटना।

सिक्स सिग्मा का असली मतलब है डिफेक्ट्स को जड़ से उखाड़ फेंकना। यह किताब कहती है कि आपको अपने काम को उस लेवल पर ले जाना होगा जहां १० लाख मौकों में से सिर्फ ३।४ बार ही गलती की गुंजाइश हो। सुनकर थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन दुनिया की टॉप कंपनियां जैसे मोटोरोला और जीई इसी फार्मूले पर राज कर रही हैं।

चलिए इसे एक रियल लाइफ उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए राहुल नाम का एक लड़का अपनी गर्लफ्रेंड के लिए हर महीने १० गिफ्ट्स खरीदता है। अब राहुल भाई साहब थोड़े लापरवाह हैं। वह सोचते हैं कि यार ९ बार तो गिफ्ट सही लाया हूं बस १ बार ही तो गलत साइज का सूट ले आया इसमें इतना गुस्सा क्यों? अब राहुल को कौन समझाए कि वो १ परसेंट की गलती उनकी पूरी रिलेशनशिप की रेटिंग गिरा रही है। अगर राहुल सिक्स सिग्मा अपनाते तो वह गिफ्ट खरीदने से पहले डेटा चेक करते उसकी पसंद को मापते और फिर ऐसा गिफ्ट लाते कि गलती की कोई जगह ही न बचती।

बिजनेस में भी हम अक्सर छोटे मोटे डिफेक्ट्स को यह कहकर नजरअंदाज कर देते हैं कि अरे इतना तो चलता है। लेकिन भाई साहब यही चलता है वाला एटीट्यूड आपके प्रॉफिट को दीमक की तरह चाट रहा है। जब आप अपने प्रोसेस को इतना शार्प कर लेते हैं कि गलतियां न के बराबर रह जाएं तब असली पैसा अंदर आना शुरू होता है।

सिक्स सिग्मा हमें सिखाता है कि क्वालिटी कोई इत्तेफाक नहीं है। यह एक जिद्दी कोशिश है हर उस कमी को ढूंढ निकालने की जो आपके काम को रोक रही है। जब आप अपनी एफिशिएंसी को इस लेवल पर ले जाते हैं तो आपका कॉम्पिटिशन आपसे कोसों दूर रह जाता है। क्योंकि बाकी लोग अभी भी ९९ परसेंट की खुशी मना रहे होंगे और आप उस ३।४ की जादुई संख्या के साथ मार्केट लीडर बन चुके होंगे।

प्रोसेस को सुधारना बोरिंग लग सकता है लेकिन जब बैंक बैलेंस बढ़ता है तो वही बोरियत सबसे ज्यादा एक्साइटिंग लगने लगती है। याद रखिए अगर आप अपने काम में जीरो डिफेक्ट का लक्ष्य नहीं रख रहे हैं तो आप असल में फेल होने का लक्ष्य रख रहे हैं।


Lesson : डेटा कभी झूठ नहीं बोलता

सिक्स सिग्मा का दूसरा सबसे बड़ा पिलर है डेटा। इस किताब का साफ़ कहना है कि अगर आपके पास डेटा नहीं है तो आप बस एक ऐसे इंसान हैं जिसके पास सिर्फ एक ओपिनियन यानी राय है। और राय तो सबकी होती है पर राय से घर नहीं चलता जनाब। हम अक्सर बिजनेस में फैसले लेते समय अपने गट्स या अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं। पर सच तो यह है कि आपकी अंतरात्मा को मैथ और स्टेटिस्टिक्स की उतनी समझ नहीं है जितनी एक एक्सेल शीट को होती है।

जो चीज मापी नहीं जा सकती उसे कभी सुधारा भी नहीं जा सकता। अगर आप अपनी प्रोग्रेस को ट्रैक नहीं कर रहे हैं तो आप असल में अंधेरे में तीर चला रहे हैं। सिक्स सिग्मा आपको सिखाता है कि हर प्रॉब्लम को नंबर्स में बदलो। जब आप किसी समस्या को नंबर के रूप में देखते हैं तो उसका समाधान भी मैथमेटिकल हो जाता है।

इसे एक मजेदार उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए हमारे शर्मा जी का एक रेस्टोरेंट है जिसका नाम है 'शर्मा जी के चटपटे समोसे'। अब शर्मा जी को लगता है कि उनके समोसे इसलिए नहीं बिक रहे क्योंकि चटनी में नमक कम है। उन्होंने अपनी अंतरात्मा की सुनी और चटनी में मुट्ठी भर नमक झोंक दिया। रिजल्ट क्या हुआ? जो दो-चार कस्टमर आते थे वो भी भाग गए।

अब अगर शर्मा जी सिक्स सिग्मा वाले बंदे होते तो वो क्या करते? वो पहले डेटा निकालते। वो चेक करते कि कितने लोग समोसा आधा छोड़ रहे हैं? कितने लोग समोसे की पपड़ी फेंक रहे हैं? कितने लोग चटनी मांग ही नहीं रहे? डेटा से पता चला कि भाई साहब दिक्कत नमक में नहीं थी बल्कि समोसे का साइज इतना बड़ा था कि लोग उसे पूरा खा ही नहीं पा रहे थे। शर्मा जी ने साइज छोटा किया दाम थोड़ा कम किया और बस फिर क्या था? दुकान पर भीड़ लग गई।

यही है डेटा की ताकत। जब आप डेटा का इस्तेमाल करते हैं तो आप इमोशन्स को साइड में रख देते हैं। बिजनेस में ईगो बहुत बड़ी दुश्मन है। हमें लगता है कि हमारा आइडिया बेस्ट है। पर डेटा आपको आईना दिखाता है। सिक्स सिग्मा में एम यानी मेजर और ए यानी एनालाइज इसीलिए सबसे जरूरी स्टेप्स हैं।

बिना डेटा के स्ट्रेटजी बनाना वैसा ही है जैसे बिना एड्रेस के जीपीएस चलाना। आप कहीं न कहीं तो पहुँचेंगे पर वहां नहीं जहाँ आपको जाना था। डेटा आपको बताता है कि लीकेज कहाँ है। पैसा कहाँ बर्बाद हो रहा है? टाइम कहाँ खराब हो रहा है? जब आप इन लीक्स को नंबर्स के साथ बंद करते हैं तो आपकी एफिशिएंसी रॉकेट की तरह ऊपर जाती है।

तो अगली बार जब आपको लगे कि आपका काम नहीं चल रहा है तो सिर पकड़ कर मत बैठिए। पेन और पेपर उठाइए और डेटा इकट्ठा करना शुरू कीजिए। क्योंकि जब नंबर्स बोलना शुरू करते हैं तो बहाने अपने आप चुप हो जाते हैं।


Lesson : प्रोसेस ही असली किंग है

सिक्स सिग्मा की फिलॉसफी बहुत सिंपल है। अगर आपका आउटपुट यानी रिजल्ट खराब आ रहा है तो गुस्सा अपने एम्प्लॉई या अपनी किस्मत पर मत निकालिए। बल्कि अपने प्रोसेस को झाँककर देखिए। यह किताब कहती है कि एक घटिया प्रोसेस अच्छे से अच्छे टैलेंटेड इंसान को भी फेल कर सकता है। और एक शानदार प्रोसेस एक एवरेज इंसान से भी वर्ल्ड क्लास काम करवा सकता है। सक्सेस कोई तुक्का या लॉटरी नहीं है बल्कि एक सही सिस्टम का नतीजा है।

अक्सर हम रिजल्ट्स के पीछे भागते हैं लेकिन प्रोसेस को नजरअंदाज कर देते हैं। हम चाहते हैं कि वजन १० किलो कम हो जाए पर सुबह उठकर क्या एक्सरसाइज करनी है और क्या खाना है उसका कोई फिक्स्ड सिस्टम नहीं होता। बिजनेस में भी यही कहानी है। हम चाहते हैं कि सेल बढ़ जाए पर लीड्स कैसे जनरेट करनी हैं और कस्टमर से कैसे बात करनी है उसका कोई सेट रूटीन नहीं होता। सिक्स सिग्मा आपको 'हाउ' यानी कैसे पर फोकस करना सिखाता है।

चलिए इसे एक देसी उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए हमारा दोस्त पिंटू एक चाय की दुकान खोलता है। पहले दिन पिंटू ने बड़े प्यार से चाय बनाई और सबको बहुत पसंद आई। दूसरे दिन पिंटू का मूड थोड़ा खराब था तो उसने अदरक कम डाली और पानी ज्यादा। चाय का स्वाद बिगड़ गया और कस्टमर कम हो गए। तीसरे दिन पिंटू ने जोश में आकर इतनी इलायची डाल दी कि चाय कड़वी हो गई।

पिंटू भाई साहब परेशान हैं कि यार बिजनेस नहीं चल रहा। अब अगर पिंटू सिक्स सिग्मा माइंडसेट अपनाते तो वो क्या करते? वो एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर यानी एसओपी बनाते। ५०० मिलीलीटर दूध में १० ग्राम चाय पत्ती और २ ग्राम अदरक। बस। अब चाहे पिंटू का ब्रेकअप हुआ हो या उसकी लॉटरी लगी हो चाय का स्वाद हमेशा एक जैसा रहेगा। यही है प्रोसेस की पावर। जब आपका प्रोसेस सेट होता है तो क्वालिटी अपने आप कंसिस्टेंट हो जाती है।

सिक्स सिग्मा में डीएमएआईसी यानी डिफाइन, मेजर, एनालाइज, इम्प्रूव और कंट्रोल का एक पूरा ढांचा दिया गया है। यह सिर्फ भारी भरकम शब्द नहीं हैं बल्कि आपके बिजनेस को ऑटोपायलट पर डालने के स्टेप्स हैं। जब आप एक बार सही प्रोसेस ढूंढ लेते हैं तो आपको बार-बार चक्का आविष्कार करने की जरूरत नहीं पड़ती। आप बस उस प्रोसेस को रिपीट करते हैं और पैसा अपने आप छपने लगता है।

ज्यादातर लोग शॉर्टकट के चक्कर में प्रोसेस को बाईपास करने की कोशिश करते हैं। पर याद रखिए शॉर्टकट आपको एक बार जिता सकता है पर बार-बार नहीं। एक मजबूत प्रोसेस आपको मार्केट के उतार-चढ़ाव से बचाता है। जब आपकी टीम को पता होता है कि स्टेप वन के बाद स्टेप टू क्या है तो कंफ्यूजन खत्म हो जाता है और एफिशिएंसी बढ़ जाती है।

तो भाई साहब अगर आप चाहते हैं कि आपका काम आपकी गैरमौजूदगी में भी वैसा ही चले जैसा आप चाहते हैं तो प्रोसेस पर ध्यान दीजिए। क्योंकि लोग बदल सकते हैं पर एक अच्छी तरह से डिजाइन किया गया प्रोसेस कभी धोखा नहीं देता।


सिक्स सिग्मा सिर्फ बड़ी कंपनियों के लिए नहीं है बल्कि यह हर उस इंसान के लिए है जो अपनी लाइफ और काम को बेहतर बनाना चाहता है। ३.४ की जादुई संख्या को याद रखिए डेटा पर भरोसा कीजिए और एक ऐसा प्रोसेस बनाइए जो कभी फेल न हो। अब सोचना बंद कीजिए और आज ही अपने काम में वो एक ऐसी गलती ढूंढिए जिसे आप डेटा की मदद से ठीक कर सकते हैं। क्या आप आज से ही अपने बिजनेस में सिक्स सिग्मा माइंडसेट अपनाने के लिए तैयार हैं? नीचे कमेंट में 'यस' लिखिए और अपनी पहली जीत हमारे साथ शेयर कीजिए।

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