आप अभी भी अगले 'परफेक्ट' आईडिया का इंतज़ार कर रहे हैं जबकि दुनिया आपसे कोसों आगे निकल चुकी है। अपनी नौकरी से नफरत करना और ख्याली पुलाव पकाना बंद कीजिये क्योंकि आपका आलस ही आपके स्टार्टअप का सबसे बड़ा दुश्मन है। अगर 54 घंटों में कंपनी खड़ी करना आपको जादू लगता है तो मुबारक हो आप फेल होने की रेस में सबसे आगे खड़े हैं।
आज हम मार्क नेगर और क्लिंट नेल्सन की बुक स्टार्टअप वीकेंड से वो सीक्रेट्स जानेंगे जो आपके सुस्त दिमाग को झकझोर कर रख देंगे। अगले कुछ मिनटों में आप सीखेंगे कि कैसे सिर्फ बातों के घोड़े दौड़ाना बंद करके असलियत में अपना बिजनेस एम्पायर शुरू किया जाता है।
लेसन १ : बातें कम और काम ज्यादा - एक्शन ही असली राजा है
दोस्तो, हम सब की एक बहुत गन्दी आदत है। हम चाय की टपरी पर बैठकर या ऑफिस के लंच ब्रेक में दुनिया बदलने वाले स्टार्टअप आइडियाज डिस्कस करते हैं। हमें लगता है कि हमारा आईडिया इतना क्रांतिकारी है कि मार्क जुकरबर्ग को भी पसीने आ जाएंगे। लेकिन सच तो यह है कि जब तक आप उस आईडिया पर काम शुरू नहीं करते तब तक उसकी वैल्यू जीरो है। स्टार्टअप वीकेंड हमें सिखाता है कि प्लानिंग के नाम पर हफ़्तों बर्बाद करना सिर्फ एक बहाना है। अगर आपके पास कोई आईडिया है तो उसे अगले 54 घंटों में टेस्ट कीजिये।
सोचिये आप एक ऐसी ऐप बनाना चाहते हैं जो लोगों को घर बैठे ताजी सब्जियां पहुंचाए। अब आप बैठकर छह महीने तक मार्केट रिसर्च कर सकते हैं या फिर आप आज ही पांच पड़ोसियों के दरवाजे खटखटाकर पूछ सकते हैं कि क्या वो आपसे सब्जी खरीदेंगे। पहले वाले तरीके में आप शायद एक बढ़िया प्रेजेंटेशन बना लेंगे लेकिन दूसरे वाले तरीके में आपके पास पहले दिन से ही असली कस्टमर होंगे। भारत में अक्सर लोग सोचते हैं कि जब तक ऑफिस में बढ़िया फर्नीचर और हाई स्पीड इंटरनेट नहीं होगा तब तक बिजनेस शुरू नहीं हो सकता। यह सब फालतू की बातें हैं। असलियत में स्टार्टअप गैरेज से नहीं बल्कि आपके एक्शन लेने की हिम्मत से शुरू होता है।
ज्यादातर लोग अपने आईडिया को लेकर इतने पजेसिव होते हैं जैसे वो उनकी प्रॉपर्टी हो। उन्हें डर लगता है कि कोई उनका आईडिया चुरा लेगा। भाई साहब यकीन मानिए किसी के पास इतना खाली समय नहीं है कि वो आपके आधे अधूरे प्लान को चुराए। यहाँ हर कोई अपने काम में बिजी है। असली जीत उसकी नहीं होती जिसके पास सबसे अच्छा आईडिया है बल्कि उसकी होती है जो उसे सबसे पहले और सबसे अच्छे तरीके से चला कर दिखाता है। अगर आप सिर्फ प्लान बना रहे हैं और उसे एग्जीक्यूट नहीं कर रहे तो आप बिजनेस नहीं कर रहे बल्कि आप सिर्फ दिन में सपने देख रहे हैं।
सच कहूँ तो लोग अपनी शादी की प्लानिंग में जितना दिमाग लगाते हैं अगर उसका आधा भी अपने बिजनेस के प्रोटोटाइप में लगा दें तो आज हर गली में एक यूनिकॉर्न स्टार्टअप खड़ा हो। लोग लोगो बनाने और वेबसाइट के कलर चुनने में हफ्ते बिता देते हैं जबकि उनके पास एक भी पेइंग कस्टमर नहीं होता। स्टार्टअप वीकेंड का मंत्र साफ़ है। निकलिए बाहर और अपनी सर्विस को टेस्ट कीजिये। अगर लोग उसे खरीदना चाहते हैं तो बधाई हो आपके पास एक बिजनेस है। वरना वापस अपनी नौ से पांच की डेस्क पर बैठ जाइये और बॉस की डांट खाइये।
एक्शन लेने का मतलब यह नहीं है कि आप अंधे होकर कहीं भी कूद पड़ें। इसका मतलब है कि आप एक मिनिमम वायबल प्रोडक्ट यानी एमवीपी तैयार करें। यह आपके आईडिया का वो सबसे छोटा और कच्चा रूप है जिसे लोग इस्तेमाल कर सकें। अगर आप एक कार बनाना चाहते हैं तो पहले एक टायर बनाइये और देखिये कि क्या वो घूमता भी है या नहीं। सीधी सी बात है कि बड़ी बातें करने से बैंक बैलेंस नहीं बढ़ता। पसीना बहाने और जमीन पर उतरने से ही सफलता का रास्ता खुलता है।
लेसन २ : टीम का पावर हाउस - अकेले चने से भाड़ नहीं फूटता
अक्सर हमारे अंदर का 'सुपरमैन' जाग जाता है और हमें लगता है कि कोडिंग भी मैं कर लूंगा, मार्केटिंग भी मैं देख लूंगा और चाय भी मैं ही बना लूंगा। लेकिन स्टार्टअप वीकेंड का कड़वा सच यह है कि एक अकेला इंसान सिर्फ एक फ्रीलांसर बनकर रह जाता है, फाउंडर नहीं। अगर आपको लगता है कि आप स्टीव जॉब्स और वोज्नियाक दोनों का रोल अकेले निभा लेंगे तो यकीन मानिए आप बहुत जल्दी हॉस्पिटल के बेड पर नजर आएंगे। एक सफल स्टार्टअप के लिए आपको ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो आपके कमजोर पॉइंट्स को अपनी ताकत बना लें।
मान लीजिये आप एक बैंड शुरू करना चाहते हैं। अब अगर आप ही ढोलक बजाएं, आप ही गाना गाएं और आप ही स्टेज पर नाचें तो लोग आपको आर्टिस्ट नहीं बल्कि मदारी समझेंगे। बिजनेस में भी यही लॉजिक है। अगर आप एक टेक पर्सन हैं तो आपको एक ऐसा पार्टनर चाहिए जिसे बेचना आता हो। अगर आप सिर्फ कोडिंग के पीछे छिपे रहेंगे और कोई बाहर जाकर क्लाइंट्स से बात नहीं करेगा तो आपका कोड सिर्फ आपके लैपटॉप की शोभा बढ़ाएगा। भारत में हम अक्सर अपने बेस्ट फ्रेंड या पड़ोसी को को-फाउंडर बना लेते हैं क्योंकि वह हमारे साथ समोसे खाने चलता है। यह सबसे बड़ी गलती है। आपको दोस्त नहीं बल्कि एक ऐसा इंसान चाहिए जिसका स्किल सेट आपसे अलग हो।
स्टार्टअप वीकेंड के दौरान आपको सिर्फ 54 घंटे मिलते हैं। इन चंद घंटों में आप सब कुछ खुद नहीं सीख सकते। यहाँ को-फाउंडर की अहमियत समझ आती है। जब आप सो रहे हों तब कोई दूसरा मार्केटिंग ईमेल लिख रहा हो। जब आप क्लाइंट से मीटिंग कर रहे हों तब कोई दूसरा प्रोडक्ट की कमियां दूर कर रहा हो। एक अच्छी टीम वो नहीं होती जो हमेशा आपकी हां में हां मिलाए। असली टीम वो है जो आपके गलत फैसले पर आपको आईना दिखाए और कहे कि भाई यह आईडिया एकदम बकवास है। अगर आपकी टीम में सब आपकी जी-हुजुरी कर रहे हैं तो समझ जाइये कि आपकी नाव डूबने वाली है।
सर्कस में आपने देखा होगा कि एक कलाकार हवा में झूलता है और दूसरा उसे पकड़ता है। अगर पकड़ने वाला गायब हो जाए तो कलाकार का क्या हाल होगा आप जानते ही हैं। स्टार्टअप भी एक ऐसा ही रिस्की खेल है। यहाँ आपके पास एक ऐसा 'हसलर' होना चाहिए जो किसी भी दरवाजे को खटखटाने से न डरे और एक ऐसा 'हैकर' होना चाहिए जो किसी भी टेक्निकल समस्या का हल निकाल ले। अगर आप सब कुछ खुद करने की जिद पकड़ेंगे तो आप अपनी कंपनी के सबसे बड़े रोड़े बन जाएंगे। अपनी ईगो को साइड में रखिये और मान लीजिये कि आपको सब कुछ नहीं आता।
टीम बनाने का मतलब सिर्फ लोगों को हायर करना नहीं है बल्कि एक ऐसा माहौल बनाना है जहाँ हर कोई उस विजन को अपना समझे। जब आप अकेले होते हैं तो आप थक कर हार मान सकते हैं लेकिन जब आपके साथ दो और पागल लोग होते हैं जो उसी सपने के लिए अपनी नींद खराब कर रहे होते हैं तो हार मानने का ख्याल भी नहीं आता। तो अगली बार जब आप अपना करोड़ों का आईडिया किसी को बताएं तो यह मत सोचिये कि वो उसे चुरा लेगा बल्कि यह देखिये कि क्या वो आपकी टीम का वो मिसिंग टुकड़ा बन सकता है जिसकी आपको तलाश है।
लेसन ३ : फेल फ़ास्ट एंड पिवट - हारना सीखो ताकि जीत सको
हमारे देश में 'फेल' होना किसी पाप से कम नहीं माना जाता। अगर पड़ोस के शर्मा जी के लड़के का स्टार्टअप डूब जाए तो पूरी कॉलोनी उसे ऐसे देखती है जैसे उसने कोई बड़ा जुर्म कर दिया हो। लेकिन स्टार्टअप वीकेंड कहता है कि अगर आपको फेल होना है तो जल्दी हो जाइये। जितना ज्यादा समय आप एक गलत आईडिया को ढोने में लगाएंगे उतना ही आपका पैसा और मोटिवेशन बर्बाद होगा। असली समझदारी इसमें नहीं है कि आप गिरें ही न बल्कि इसमें है कि गिरकर कितनी जल्दी धूल झाड़कर वापस खड़े हो जाते हैं और अपनी दिशा बदल लेते हैं।
इसे ऐसे समझिये कि आप दिल्ली से मुंबई जाने के लिए निकले हैं लेकिन आधे रास्ते में पता चला कि रास्ता बंद है। अब क्या आप वहीं सड़क पर बैठकर रोएंगे या फिर कोई दूसरा रास्ता ढूंढेंगे। बिजनेस की भाषा में इसे 'पिवट' करना कहते हैं। मान लीजिये आपने एक ऐसी वेबसाइट बनाई जहाँ लोग अपनी पुरानी कारें बेच सकें लेकिन एक महीने बाद आपको पता चलता है कि लोग कारें नहीं बल्कि पुरानी साइकिलें ज्यादा ढूंढ रहे हैं। अब अगर आप अपनी जिद पर अड़े रहे कि मैं तो सिर्फ कार ही बेचूंगा तो आप बहुत जल्दी दीवालिया हो जाएंगे। स्मार्ट एंटरप्रेन्योर वो है जो मार्केट की नब्ज पहचानकर तुरंत अपना रास्ता बदल ले।
सच बोलूं तो कुछ लोग अपने आईडिया से ऐसे चिपक जाते हैं जैसे वो उनके खानदान की पुश्तैनी जायदाद हो। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने अपना आईडिया बदल दिया तो उनकी बेइज्जती हो जाएगी। भाई साहब मार्केट को आपकी इज्जत से कोई लेना देना नहीं है। मार्केट को सिर्फ अपनी प्रॉब्लम का सोल्यूशन चाहिए। अगर आपका आईडिया लोगों की लाइफ में कोई वैल्यू ऐड नहीं कर रहा तो उसे कूड़ेदान में डालने में एक सेकंड की भी देरी मत कीजिये। जल्दी फेल होने का फायदा यह है कि आपके पास दूसरा बड़ा दांव खेलने के लिए रिसोर्सेज और हिम्मत बची रहती है।
स्टार्टअप कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप एक बार सेट कर दें और वो हमेशा चलता रहे। यह एक लगातार सीखने वाली प्रोसेस है। स्टार्टअप वीकेंड के उन 54 घंटों में भी लोग दस बार अपना आईडिया बदलते हैं क्योंकि जब वो बाहर जाकर कस्टमर से बात करते हैं तो उन्हें असलियत का पता चलता है। अगर आप अपने कमरे में बंद होकर यह सोचेंगे कि दुनिया को क्या चाहिए तो आप कभी सफल नहीं होंगे। बाहर निकलिये ठोकर खाइए और देखिये कि दुनिया असल में किस चीज के लिए पैसे देने को तैयार है।
याद रखिये कि हर बड़ा स्टार्टअप जो आज आप देख रहे हैं वह शुरू में कुछ और ही था। इंस्टाग्राम सिर्फ एक चेक-इन ऐप था और यूट्यूब एक डेटिंग वीडियो साइट। अगर उन्होंने पिवट नहीं किया होता तो आज वो कहीं गुम हो चुके होते। अपनी जिद को अपनी कामयाबी के बीच में मत आने दीजिये। जिस दिन आप फेलियर को अपना दुश्मन नहीं बल्कि अपना टीचर मानने लगेंगे उसी दिन से आपकी कामयाबी का सफर शुरू हो जाएगा।
स्टार्टअप वीकेंड सिर्फ एक किताब नहीं है बल्कि एक वार क्राई है उन लोगों के लिए जो कुछ बड़ा करना चाहते हैं। 54 घंटे काफी हैं एक साम्राज्य की नींव रखने के लिए बशर्ते आपके पास सही टीम हो और आप हारने से न डरते हों। अब फैसला आपके हाथ में है। क्या आप अभी भी वही घिसे पिटे बहाने बनाएंगे या फिर आज से ही अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए पहला कदम उठाएंगे।
अगर आपको आज के इन लेसन ने थोड़ा भी इंस्पायर किया है तो कमेंट में 'एक्शन' लिखिये और अपने उस दोस्त को टैग कीजिये जिसके साथ आप अपना अगला स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं। याद रखिये कल कभी नहीं आता जो है बस आज ही है।
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