क्या आप अब भी वही घिसी पिटी अमेरिकन बिजनेस बुक्स पढ़कर अमीर बनने के सपने देख रहे हैं जहां कस्टमर के पास अंधा पैसा है। बहुत बढ़िया। इसी तरह अपनी आंखें बंद रखिए और देखते रहिए कैसे आपके पड़ोस वाला छोटा दुकानदार आपसे आगे निकल जाता है क्योंकि उसे पता है कि असली मार्केट तो उन 86 परसेंट लोगों में है जिनके पास आईफोन नहीं पर जरूरतें बहुत हैं। आप बस लग्जरी के पीछे भागते रहिये और असली पैसा कोई और कमा ले जाएगा।
आज हम विजय महाजन की बुक द 86 परसेंट सॉल्यूशन से वह सीक्रेट्स जानेंगे जो आपको सिखाएंगे कि कैसे डेवलपिंग मार्केट्स की कमी में भी आप करोड़ों का अंपायर खड़ा कर सकते हैं। चलिए इन 3 पावरफुल लेसन को गहराई से समझते हैं।
लेसन १ : छोटे में है बड़ा फायदा
अगर आप उन लोगों में से हैं जो मानते हैं कि बड़ा प्रॉफिट कमाने के लिए हमेशा बड़े बंगले और बड़ी गाड़ियों वाले अमीर कस्टमर्स को ही टारगेट करना चाहिए तो मुबारक हो आप अपनी बर्बादी का टिकट खुद ही कटा रहे हैं। विजय महाजन अपनी इस किताब में बहुत ही प्यार से समझाते हैं कि दुनिया की 86 परसेंट आबादी उन देशों में रहती है जहाँ लोग एक बार में हजारों रुपये खर्च करने से पहले दस बार सोचते हैं। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उनके पास पैसा नहीं है। असलियत तो यह है कि यहाँ पैसा टुकड़ों में बिखरा हुआ है और जो इसे बटोरना सीख गया वही असली किंग है।
मान लीजिए आप एक बहुत बड़े शैम्पू ब्रांड के मालिक हैं और आप सिर्फ 500 रुपये की बड़ी बोतलें बेचते हैं। आप अपनी आलीशान ऑफिस में बैठकर सोच रहे हैं कि सेल्स क्यों नहीं बढ़ रही। वहीं दूसरी तरफ एक समझदार कंपनी आती है और वही शैम्पू 1 रुपये के छोटे सैशे में बेचना शुरू कर देती है। अब आप कहेंगे कि 1 रुपये में क्या ही भला होगा। लेकिन यहीं पर आपका मैथ फेल हो जाता है। भारत के किसी छोटे गांव का मजदूर शायद 500 रुपये की बोतल कभी न खरीदे पर वह हर रोज या हर दूसरे दिन 1 रुपये वाला सैशे खुशी खुशी खरीद लेगा। जब करोड़ों लोग रोज वह 1 रुपये का सैशे खरीदते हैं तो वह आपके 500 रुपये वाली बोतल की सेल को मीलों पीछे छोड़ देता है। इसे ही कहते हैं छोटे पैकेट्स की बड़ी ताकत।
ज्यादातर सो कॉल्ड मॉडर्न बिजनेसमैन यही गलती करते हैं कि वे प्रीमियम बनने के चक्कर में उस मास मार्केट को भूल जाते हैं जो सच में वॉल्यूम देता है। अगर आप भी चश्मा लगाकर सिर्फ अमीर लोगों को ढूंढ रहे हैं तो याद रखिए कि वॉल्यूम ही इस देश का असली भगवान है। यहाँ हर बंदा डिस्काउंट और वैल्यू फॉर मनी ढूंढ रहा है। अगर आप उन्हें छोटे और सस्ते ऑप्शन्स नहीं दे पा रहे तो आप बिजनेस नहीं बल्कि सिर्फ एक महंगा शौक पाल रहे हैं।
हैरानी की बात तो यह है कि जब आप छोटे साइज में चीजें बेचते हैं तो आप कस्टमर के लिए रिस्क कम कर देते हैं। एक मिडिल क्लास आदमी के लिए 500 रुपये डूबने का गम बहुत बड़ा होता है पर 1 रुपये या 5 रुपये खर्च करना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। वह इसे बिना सोचे समझे ट्राई कर लेता है। यहीं से शुरू होती है ब्रांड लॉयल्टी। आप पहले उनके दिल में जगह बनाते हैं और फिर धीरे धीरे उनकी जेब में। यह सार्केज्म नहीं बल्कि एक कड़वी सच्चाई है कि यहाँ अमीर बनने के लिए आपको उन लोगों की मदद करनी होगी जिन्हें दुनिया गरीब समझकर छोड़ देती है।
यही स्ट्रेटेजी आज मोबाइल डाटा से लेकर बिस्किट तक हर जगह काम कर रही है। जो लोग सोचते थे कि इंटरनेट सिर्फ अमीरों के लिए है उन्हें जियो ने एक छोटे से रिचार्ज प्लान से समझा दिया कि असली ताकत तो आम आदमी के हाथ में है। तो अगर आप भी अपना बिजनेस बढ़ाना चाहते हैं तो अपने इगो को थोड़ा साइड में रखिये और यह सोचना बंद कीजिये कि छोटा काम छोटा होता है। असल में छोटे मार्केट्स ही आपको वह ग्रोथ दे सकते हैं जिसका सपना आप अपनी बड़ी वाली चेयर पर बैठकर देख रहे हैं।
लेसन २ : इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी को अवसर बनाएं
अगर आप उन लोगों में से हैं जो हमेशा सिस्टम को कोसते रहते हैं कि भाई यहाँ तो सड़कों की हालत खराब है और बिजली का कोई ठिकाना नहीं है तो आप एक परफेक्ट शिकायत करने वाले इंसान तो बन सकते हैं पर एक सफल बिजनेसमैन कभी नहीं बन सकते। विजय महाजन कहते हैं कि जहाँ दुनिया की बाकी 14 परसेंट आबादी चकाचौंध और शानदार इन्फ्रास्ट्रक्चर में जीती है वहीं असली 86 परसेंट मार्केट ऐसी जगहों पर है जहाँ गूगल मैप्स भी कई बार हाथ खड़े कर देता है। लेकिन स्मार्ट लोग इस कमी को अपनी कमजोरी नहीं बल्कि अपना सबसे बड़ा हथियार बनाते हैं।
मान लीजिए आप एक ऑनलाइन ग्रोसरी कंपनी खोलते हैं और आप जिद पर अड़े हैं कि आप सिर्फ बड़े बड़े ट्रक्स से ही डिलीवरी करेंगे क्योंकि भाई आप तो प्रोफेशनल हैं। अब आप एक ऐसी गली में फंस जाते हैं जहाँ एक साइकिल भी मुश्किल से निकलती है। वहां आपका करोड़ों का ट्रक खड़ा खड़ा सिर्फ धूल फांकेगा और कस्टमर पड़ोस वाले रामू काका से सामान ले लेगा। रामू काका को पता है कि यहाँ ट्रक नहीं बल्कि एक साइकिल या फिर सिर पर टोकरा रखकर जाना ही असली डिस्ट्रीब्यूशन है। यह देखकर आपको लगेगा कि यह तो बहुत अनप्रोफेशनल है पर असल में वही रामू काका आपसे ज्यादा प्रॉफिट कमा रहे हैं क्योंकि उन्होंने सिस्टम की कमी को समझकर खुद को ढाल लिया है।
आजकल के नए स्टार्टअप्स सोचते हैं कि बिना हाईटेक वेयरहाउस के बिजनेस नहीं हो सकता। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके घर तक जो दूध वाला सुबह 5 बजे पहुंचता है या जो अखबार वाला हर मौसम में आता है उनका इन्फ्रास्ट्रक्चर क्या है। उनके पास कोई जीपीएस या बड़े सर्वर्स नहीं हैं फिर भी उनकी सप्लाई चेन कभी फेल नहीं होती। वे जानते हैं कि अगर पुल टूटा है तो नाव से कैसे जाना है और अगर बिजली नहीं है तो हिसाब किताब कॉपी पेन पर कैसे करना है। वे मुश्किल हालातों में रास्ता निकालना जानते हैं।
जरा सोचिये अगर आप एक ऐसी मशीन बनाते हैं जो सिर्फ हाई वोल्टेज बिजली पर चलती है तो आप इंडिया के आधे से ज्यादा गाँवों में कभी कदम ही नहीं रख पाएंगे। लेकिन अगर आप उसी मशीन को ऐसा बनाते हैं जो हाथ से चले या सोलर पावर का इस्तेमाल करे तो आपने अचानक से करोड़ों नए कस्टमर्स बना लिए। यहाँ की कमियां ही आपको नया सोचने पर मजबूर करती हैं। अगर सब कुछ परफेक्ट होता तो शायद आपको कोई पूछता भी नहीं क्योंकि तब तो बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां यहाँ पहले ही कब्जा कर चुकी होतीं।
इसलिए अगर आप भी इसी इंतजार में बैठे हैं कि जब सरकार सड़कें बनाएगी या जब हर गांव में 5जी आएगा तब आप अपना बिजनेस शुरू करेंगे तो मुबारक हो आप अपनी रिटायरमेंट तक इंतजार ही करते रहेंगे। सफल होने का असली मजा तब है जब आप वहां रास्ता बनाएं जहाँ कोई रास्ता ही न हो। यह सुनने में थोड़ा फिल्मी लग सकता है पर हकीकत यही है कि 86 परसेंट मार्केट में वही टिकता है जो सिस्टम के रोने रोने के बजाय अपनी पीठ पर सामान लादकर कस्टमर तक पहुंचना जानता है।
लेसन ३ : लोकल इमोशन्स और ट्रेडिशन की ताकत
अगर आपको लगता है कि आप न्यूयॉर्क या लंदन की कोई कूल मार्केटिंग स्ट्रेटजी इंडिया के किसी कस्बे में कॉपी-पेस्ट कर देंगे और लोग लाइन लगाकर आपका सामान खरीदेंगे, तो आपकी मासूमियत पर वाकई तरस आता है। विजय महाजन अपनी किताब में साफ शब्दों में कहते हैं कि 86 परसेंट मार्केट उन लोगों का है जिनके लिए उनकी संस्कृति और रीति-रिवाज उनके बजट से भी ऊपर हैं। आप चाहे कितने भी बड़े ग्लोबल ब्रांड क्यों न हों, अगर आप यहाँ के लोगों के साथ उनके त्योहारों और परंपराओं के जरिए नहीं जुड़ पाए, तो आप उनके लिए बस एक अजनबी ही रहेंगे।
मान लीजिए एक बहुत बड़ी विदेशी कंपनी इंडिया में अपना 'एप्पल पाई' बेचने आती है। वे करोड़ों का विज्ञापन करते हैं कि यह दुनिया का बेस्ट डेजर्ट है। लेकिन जब वह प्रोडक्ट मार्केट में आता है, तो लोग उसे चखकर कहते हैं कि भाई इससे अच्छी तो हमारी गुझिया या जलेबी है। यहाँ हार एप्पल पाई की नहीं, बल्कि उस सोच की हुई है जिसने यह नहीं समझा कि भारतीय जुबान को क्या पसंद है। वहीं दूसरी तरफ, मैकडॉनल्ड्स जैसे बड़े ब्रांड्स को देखिए। उन्होंने जब देखा कि यहाँ लोग आलू टिक्की के दीवाने हैं, तो उन्होंने 'मैकआलू टिक्की' लॉन्च कर दिया। उन्होंने ग्लोबल ब्रांड को पूरी तरह से देसी तड़का लगा दिया क्योंकि उन्हें पता था कि यहाँ के लोगों के दिल का रास्ता पेट और परंपरा से होकर जाता है।
ज्यादातर पढ़े-लिखे लोग अपनी मार्केटिंग मीटिंग्स में बैठकर ग्राफ और डेटा देखते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि 86 परसेंट मार्केट में खरीदारी केवल लॉजिक से नहीं, बल्कि इमोशन और भरोसे से होती है। यहाँ लोग सामान तब खरीदते हैं जब उन्हें लगता है कि यह ब्रांड उनके जैसा है। अगर आप किसी को दिवाली की बधाई सिर्फ एक ठंडे मैसेज से दे रहे हैं और आपका कॉम्पिटिटर उसी समय एक ऐसा एड चला रहा है जो घर वापस आने की खुशी दिखाता है, तो जीत हमेशा इमोशन की ही होगी।
यहाँ की शादियाँ देख लीजिए। लोग भले ही पूरे साल कंजूसी करेंगे, लेकिन शादी में अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च करेंगे। जो बिजनेसमैन इस परंपरा को समझ गया, वह समझ जाएगा कि उसे अपना प्रोडक्ट कब और कैसे बेचना है। यहाँ ट्रेडिशन सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी मार्केट अपॉर्चुनिटी है। अगर आप मॉडर्न बनने की होड़ में इन जड़ों को काट देंगे, तो आप कभी इस विशाल मार्केट का हिस्सा नहीं बन पाएंगे।
आखिर में बात बस इतनी सी है कि ग्लोबल बनिए, पर अपनी सोच को लोकल रखिए। अगर आप लोगों की भाषा, उनके त्योहार और उनके रहन-सहन का सम्मान नहीं करेंगे, तो वे भी आपके ब्रांड का सम्मान नहीं करेंगे। यह 86 परसेंट मार्केट कोई आंकड़ा नहीं है, यह करोड़ों इंसानों की भावनाएं हैं। जो इन भावनाओं को समझ गया, समझो उसने सफलता का पासवर्ड क्रैक कर लिया। अब आप खुद सोचिए, क्या आप अब भी अपनी पुरानी किताबी थ्योरीज के भरोसे बैठे रहना चाहते हैं या फिर सच में इस मार्केट की नब्ज पकड़ना चाहते हैं।
दोस्तो, दुनिया बदल रही है और पैसा कमाने के नियम भी। अगर आप भी उस 14 परसेंट के पीछे भागना छोड़कर इस 86 परसेंट की ताकत को पहचान लें, तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। क्या आप भी किसी ऐसे बिजनेस को जानते हैं जिसने छोटे लेवल से शुरू करके कमाल कर दिया। नीचे कमेंट्स में जरूर बताएं और इस आर्टिकल को उस दोस्त के साथ शेयर करें जो अपना नया स्टार्टअप शुरू करने का सोच रहा है। चलिए, साथ मिलकर ग्रो करते हैं।
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