क्या आप भी अपनी टीम के हर एम्प्लॉई को बराबर प्यार बाँटकर खुद को महान लीडर समझ रहे हैं। बधाई हो आप अपनी कंपनी और करियर दोनों की कब्र खोद रहे हैं। सबको एक तराजू में तौलने की आपकी यह मासूम सी गलती आपको करोड़ों का नुकसान और एवरेज परफॉरमेंस का गिफ्ट दे रही है।
आज हम ब्रायन बेकर और मार्क हुसेलिड की किताब से वह सीक्रेट्स जानेंगे जो आपके टैलेंट मैनेजमेंट के पुराने तरीकों को पूरी तरह बदल देंगे। चलिए समझते हैं उन 3 लेसन को जो आपकी वर्कफोर्स को एक हाई इम्पैक्ट मशीन बना देंगे।
लेसन १ : हर एम्प्लॉई खास नहीं होता और यह कड़वा सच है
अगर आप सोचते हैं कि ऑफिस में सबको एक जैसा ट्रीटमेंट देकर आप दुनिया के सबसे कूल बॉस बन जाएंगे तो यकीन मानिए आप बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार हैं। अक्सर मैनेजर्स को लगता है कि फेयरनेस का मतलब सबको बराबर बाँटना है। लेकिन असलियत यह है कि बिज़नेस कोई स्कूल की रेस नहीं है जहाँ सबको सांत्वना पुरस्कार दिया जाए। ब्रायन बेकर और मार्क हुसेलिड साफ़ कहते हैं कि आपकी वर्कफोर्स में कुछ ऐसे रोल्स होते हैं जो सीधे आपके मुनाफे को कंट्रोल करते हैं। इन्हें हम ए पोजीशंस कहते हैं। अब जरा अपनी टीम को देखिए। क्या आपका वह ग्राफिक डिज़ाइनर जो बस सोशल मीडिया पोस्ट बनाता है और वह सेल्स हेड जो कंपनी का सत्तर परसेंट रेवेन्यू लाता है दोनों की वैल्यू सेम है। अगर आपका जवाब हाँ है तो आपकी कंपनी का डूबना तय है।
मान लीजिए आप एक बहुत बड़ा रेस्टोरेंट चला रहे हैं। अब आपके पास एक शेफ है जिसके हाथ के स्वाद के दीवाने पूरे शहर में हैं। दूसरी तरफ एक क्लीनर है जो फर्श को चमका कर रखता है। अब अगर आप अपनी पूरी सैलरी बजट का आधा हिस्सा क्लीनर को दे दें क्योंकि वह बड़ी मेहनत से पोछा लगाता है तो क्या होगा। लोग आपके यहाँ चमकता हुआ फर्श देखने नहीं बल्कि वह बेहतरीन खाना खाने आते हैं। अगर शेफ छोड़कर गया तो दुकान बंद हो जाएगी। लेकिन अगर क्लीनर गया तो उसकी जगह कोई भी दूसरा इंसान फर्श साफ कर सकता है। यही वर्कफोर्स डिफरेंशिएशन का असली मतलब है। जो रोल आपके बिज़नेस की स्ट्रेटेजी को सक्सेसफुल बनाते हैं आपको सारा ध्यान और पैसा वहीं झोंकना होगा।
अक्सर देखा गया है कि कंपनियाँ अपना कीमती समय सी और बी प्लेयर्स को सुधारने में बर्बाद कर देती हैं। वह उन एम्प्लॉई को ट्रेनिंग देती हैं जिनका काम बस औसत है। यह वैसा ही है जैसे आप एक गधे को पेंटिंग करना सिखा रहे हों। मेहनत बहुत लगेगी पर नतीजा जीरो ही रहेगा। इसके बजाय अगर आप वही टाइम और पैसा अपने ए प्लेयर्स पर लगाएं तो वह आपको दस गुना ज्यादा रिजल्ट देंगे। आपको समझना होगा कि हर रोल क्रिटिकल नहीं होता। कुछ काम बस सपोर्ट के लिए होते हैं। तो अगली बार जब आप सबको बराबर बोनस देने का सोचें तो याद रखिएगा कि आप अपने बेस्ट परफॉर्मर का अपमान कर रहे हैं और एवरेज लोगों को आलसी होने का लाइसेंस दे रहे हैं।
लेसन २ : एवरेज पर पैसा फूंकना बंद कीजिये और असली खिलाड़ियों पर दांव लगाइये
ज्यादातर कंपनियों की सबसे बड़ी बीमारी यह है कि वे 'इक्विटी' के नाम पर अपने रिसोर्सेज का रायता फैला देती हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने ट्रेनिंग बजट सबको बराबर नहीं बाँटा तो ऑफिस में गॉसिप शुरू हो जाएगी। अरे भाई यह ऑफिस है कोई सत्संग नहीं जहाँ सबको बराबर प्रसाद मिले। किताब हमें यह सिखाती है कि आपको अपनी 'बी पोजीशंस' और 'ए पोजीशंस' के बीच एक लक्ष्मण रेखा खींचनी होगी। जो एम्प्लॉई आपके बिज़नेस में स्ट्रैटेजिक इम्पैक्ट पैदा कर रहे हैं उन पर दिल खोलकर खर्च कीजिये। बाकी लोगों के लिए बस इतना काफी है कि वे अपना काम ठीक से करते रहें।
सोचिये एक क्रिकेट टीम है। अब अगर बोर्ड यह तय करे कि जितना पैसा और ट्रेनिंग स्टार बैट्समैन को दी जा रही है उतनी ही उस इंसान को भी मिलेगी जो ग्राउंड पर ड्रिंक्स लेकर आता है। सुनने में कितना बेवकूफी भरा लगता है ना। ड्रिंक्स लाने वाला भी टीम का हिस्सा है और उसकी मेहनत कम नहीं है लेकिन मैच वह नहीं जिताता। मैच वह खिलाड़ी जिताता है जो बाउंड्री मारता है। अगर आप स्टार बैट्समैन को स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं देंगे तो वह किसी दूसरी टीम में चला जाएगा और आपकी टीम बस पानी पीकर खुश होती रहेगी।
ठीक यही बात आपके ऑफिस पर भी लागू होती है। अगर आप अपने टॉप टैलेंट को वही घिसा-पिटा इंक्रीमेंट दे रहे हैं जो आप एक ऐसे इंसान को दे रहे हैं जो बस अपनी डेस्क पर बैठकर चाय पीता है तो आप अपने स्टार को खुद धक्का मारकर बाहर निकाल रहे हैं। कंपनियां अक्सर एचआर पॉलिसी के नाम पर सबको एक ही लाठी से हांकती हैं। लेकिन सच तो यह है कि 'ए प्लेयर्स' को सिर्फ पैसा नहीं बल्कि चैलेंजेस और स्पेशल अटेंशन चाहिए होती है। अगर आप अपने टॉप टैलेंट पर इन्वेस्ट नहीं करेंगे तो आप एक ऐसी टीम खड़ी कर लेंगे जो बहुत अनुशासित तो होगी पर कभी कोई मैच नहीं जीत पाएगी। याद रखिये एवरेज लोगों की फौज खड़ी करना सक्सेस नहीं बल्कि फेलियर का पहला कदम है।
लेसन ३ : सिर्फ टैलेंट से काम नहीं चलेगा एक धाकड़ सिस्टम भी चाहिए
अगर आपको लगता है कि मार्केट से सबसे महंगे और टैलेंटेड बंदे को उठा लाने से आपकी सारी मुश्किलें हल हो जाएंगी तो आप बहुत बड़े धोखे में हैं। यह वैसा ही है जैसे आप एक फरारी कार खरीद लें और उसे कीचड़ भरे खेतों में चलाने की कोशिश करें। कार में कोई खराबी नहीं है पर आपका रास्ता और सिस्टम उसे तेज चलने ही नहीं देगा। किताब के लेखक साफ कहते हैं कि टैलेंट का असली जादू तभी दिखता है जब उसे कंपनी की स्ट्रैटेजी और एक मजबूत सिस्टम का सपोर्ट मिले। बिना सही सिस्टम के आपका बेस्ट एम्प्लॉई भी कुछ ही महीनों में एक बोर और एवरेज वर्कर बनकर रह जाएगा।
मान लीजिए आपके पास दुनिया का सबसे बेहतरीन हलवाई है जो लाजवाब मिठाई बनाता है। अब आपने उसे एक ऐसी किचन में बिठा दिया जहाँ न तो गैस चूल्हा ठीक है और न ही ताज़ा दूध मिलता है। ऊपर से आपने उस पर दस ऐसे मैनेजर बिठा दिए जिन्हें नमक और चीनी का फर्क भी नहीं पता। अब आप मुझे बताइए कि क्या वह हलवाई आपको अपनी स्पेशल मिठाई खिला पाएगा। बिल्कुल नहीं। वह बेचारा तो बस सिस्टम की कमियों से लड़ते-लड़ते ही थक जाएगा। अंत में वह भी वही घटिया मिठाई बनाएगा जो बाकी सब बना रहे हैं। यही हाल आपके ऑफिस का है। जब तक आपके स्ट्रैटेजिक रोल्स को सही टूल्स और आज़ादी नहीं मिलेगी तब तक उनका टैलेंट सिर्फ कागजों पर ही अच्छा लगेगा।
एक फिल्म मेकर को ही देख लीजिए। एक सुपरस्टार तभी हिट फिल्म देता है जब उसके पास बेहतरीन स्क्रिप्ट और सही कैमरा क्रू होता है। अगर स्क्रिप्ट ही कचरा हो तो सुपरस्टार भी फ्लॉप हो जाता है। आपकी कंपनी में भी यही 'स्क्रिप्ट' आपका वर्कफोर्स सिस्टम है। आपको यह पक्का करना होगा कि आपके ए प्लेयर्स को काम करने के लिए लाल फीताशाही और फालतू की मीटिंग्स के दलदल से आज़ादी मिले। जब टैलेंट और सिस्टम का सही मिलन होता है तभी असली इम्पैक्ट पैदा होता है। तो गधों की भीड़ जमा करने के बजाय एक ऐसा इकोसिस्टम बनाइये जहाँ आपके घोड़े सरपट दौड़ सकें।
तो दोस्तों, अब वक्त आ गया है कि आप अपनी टीम और अपने काम करने के तरीके को दोबारा देखें। क्या आप भी सबको खुश करने के चक्कर में अपने असली हीरों को खो रहे हैं। याद रखिये बिजनेस कोई चैरिटी नहीं है। आज ही अपने ए पोजीशंस की पहचान करें और उन पर अपना दांव लगाएं। इस आर्टिकल को अपने उन मैनेजर दोस्तों के साथ शेयर करें जो आज भी 'सबको बराबर समझो' वाले पुराने ज़माने में जी रहे हैं। कमेंट्स में बताएं कि आपकी नज़र में एक असली ए प्लेयर की सबसे बड़ी खूबी क्या होती है।
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