The Accidental Billionaires (Hindi)


क्या आपको लगता है कि आप अपने दोस्तों के साथ मिलकर दुनिया बदल देंगे। बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं आप। मार्क जुकरबर्ग ने भी यही सोचा था और फिर जो हुआ उसने दोस्ती की धज्जियां उड़ा दीं। आप बस हाथ मलते रह जाएंगे और कोई आपका आईडिया लेकर बिलेनियर बन जाएगा।

फेसबुक की शुरुआत की यह कहानी सिर्फ कोडिंग के बारे में नहीं है। यह धोखे और पावर की ऐसी दास्तान है जिसे सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे। चलिए देखते हैं इस सफर के वो 3 लेसन जो आपको हिलाकर रख देंगे।


लेसन १ : आईडिया की कोई कीमत नहीं है असली खेल सिर्फ एक्सक्यूशन का है

अक्सर हम इंडियन्स को लगता है कि हमारे पास एक ऐसा आईडिया है जो कल सुबह हमें अंबानी के बगल में खड़ा कर देगा। हम उसे किसी को बताते नहीं हैं क्योंकि हमें लगता है कि कोई उसे चुरा लेगा। लेकिन मार्क जुकरबर्ग की यह कहानी आपको एक कड़वा सच सिखाती है। आईडिया तो विंकलवॉस भाइयों के पास भी था। वो हार्वर्ड के हैंडसम और अमीर लड़के थे जिनके पास एक सोशल नेटवर्क बनाने का प्लान था। उन्होंने मार्क को अपना पार्टनर बनाया ताकि वो उनके लिए कोडिंग कर सके। लेकिन मार्क ने क्या किया। उन्होंने उनके आईडिया को सिर्फ सुना ही नहीं बल्कि उसे इतनी तेजी से असलियत में बदल दिया कि जब तक वो भाई अपनी टाई सीधी कर पाते तब तक फेसबुक लाइव हो चुका था।

असल लाइफ में भी यही होता है। आप अपने दोस्तों के साथ चाय की टपरी पर बैठकर 'अगला जोमेटो' बनाने का प्लान बनाते रहते हैं और उधर कोई लड़का कमरे में बंद होकर कोडिंग खत्म कर देता है। आईडिया तो सड़कों पर बिखरे पड़े हैं। असली वैल्यू उस इंसान की है जो उसे जमीन पर उतारता है। अगर आप सिर्फ सोचते रहेंगे और काम शुरू नहीं करेंगे तो दुनिया आपको याद नहीं रखेगी। लोग सिर्फ उसे जानते हैं जिसका प्रोडक्ट मार्केट में चल रहा होता है। मार्क ने यह साबित कर दिया कि अगर आप तेजी से काम नहीं करेंगे तो आपका आईडिया रद्दी के भाव बिकेगा।

मार्क जुकरबर्ग कोई बहुत बड़े विजनरी नहीं थे बल्कि वो एक बहुत बड़े कामचोर नहीं थे। उन्होंने रुकने का इंतजार नहीं किया। उन्होंने यह नहीं सोचा कि जब सब कुछ परफेक्ट होगा तब लॉन्च करेंगे। उन्होंने बस शुरू कर दिया। विंकलवॉस भाई कोर्ट के चक्कर काटते रह गए और मार्क दुनिया के सबसे कम उम्र के बिलेनियर बन गए। यह लेसन हमें सिखाता है कि अगर आपके दिमाग में कुछ है तो उसे आज ही शुरू करें। परफेक्शन के पीछे भागना छोड़िए और बस मैदान में उतर जाइए। क्योंकि इस दुनिया में पहले आने वाले को ही मलाई मिलती है और बाकी सब सिर्फ केस लड़ते रह जाते हैं।


लेसन २ : बिजनेस में दोस्ती और इमोशन्स आपको डुबो सकते हैं

एडुआर्डो सेवरिन को लगा था कि वो और मार्क बेस्ट फ्रेंड्स फॉरएवर हैं। उन्होंने फेसबुक की शुरुआत में अपना पैसा लगाया और मार्क का साथ दिया। लेकिन बिजनेस की दुनिया बहुत जालिम होती है और मार्क को जल्दी ही यह समझ आ गया था। जब फेसबुक को बड़ा करने की बारी आई और सिलिकॉन वैली के बड़े इन्वेस्टर्स से मिलना हुआ तब मार्क ने अपनी दोस्ती को पीछे छोड़ दिया। उन्होंने एक झटके में अपने सबसे पुराने दोस्त का शेयर कम कर दिया और उसे कंपनी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। यह सुनकर शायद आपको बुरा लगे लेकिन कॉर्पोरेट की दुनिया में भावनाएं सिर्फ फिल्मों में अच्छी लगती हैं।

हमारे यहाँ इंडिया में हम अक्सर अपने यार दोस्तों के साथ बिजनेस शुरू कर देते हैं। हम सोचते हैं कि भाई है तो धोखा नहीं देगा। लेकिन जब पैसों की बात आती है तो बड़े बड़े रिश्ते टूट जाते हैं। मार्क ने सिखाया कि अगर कंपनी को आगे ले जाना है तो आपको पत्थर दिल बनना पड़ेगा। अगर आपका पार्टनर कंपनी की ग्रोथ के हिसाब से खुद को नहीं बदल रहा है तो वो आपके लिए एक बोझ बन जाता है। एडुआर्डो एक अच्छे इंसान थे लेकिन वो फेसबुक को उस ऊंचाई तक नहीं ले जा सकते थे जहाँ मार्क उसे देखना चाहते थे।

यह लेसन हमें सिखाता है कि अपने प्रोफेशनल और पर्सनल रिश्तों के बीच एक मोटी दीवार खड़ी कर दीजिए। अगर आप बिजनेस में किसी को सिर्फ इसलिए रख रहे हैं क्योंकि वो आपका बचपन का लंगोटिया यार है तो आप अपनी बर्बादी की नींव रख रहे हैं। मार्क जुकरबर्ग ने दोस्ती के ऊपर विजन को रखा। उन्होंने सीन पार्कर जैसे लोगों का साथ पकड़ा जो भले ही थोड़े विवादित थे पर बिजनेस को स्केल करना जानते थे। अंत में इतिहास सिर्फ विनर को याद रखता है इस बात को नहीं कि उसने कितने दोस्तों का दिल तोड़ा। अगर आप भी कुछ बड़ा करना चाहते हैं तो इमोशन्स का थैला घर पर छोड़कर ऑफिस आइए वरना आप भी एडुआर्डो की तरह सिर्फ कोर्ट के बाहर खड़े होकर अपनी पुरानी दोस्ती के किस्से सुनाते रह जाएंगे।


लेसन ३ : दुनिया बदलने के लिए पुराने रूल्स को तोड़ना पड़ता है

फेसबुक की शुरुआत एक छोटे से कॉलेज रूम से हुई थी लेकिन उसका मकसद पूरी दुनिया के सोशल स्ट्रक्चर को हिला देना था। उस समय इंटरनेट के कुछ पुराने नियम थे और लोग अपनी प्राइवेसी को लेकर बहुत डरे हुए रहते थे। लेकिन मार्क जुकरबर्ग ने इन सब बातों की परवाह नहीं की। उन्होंने फेसबुक को एक ऐसी जगह बना दिया जहाँ लोग अपनी पूरी जिंदगी दूसरों के सामने खोलकर रखने लगे। उन्होंने दिखाया कि अगर आप कुछ नया और बड़ा करना चाहते हैं तो आपको समाज के बनाए हुए डरों से ऊपर उठना होगा। मार्क ने सिस्टम के साथ चलने के बजाय अपना खुद का सिस्टम बनाया।

अक्सर हम इंडियन्स 'लोग क्या कहेंगे' के चक्कर में अपने बड़े आईडियाज को मार देते हैं। हमें लगता है कि अगर हम कुछ अलग करेंगे तो सोसाइटी हमें एक्सेप्ट नहीं करेगी। लेकिन फेसबुक की कहानी हमें सिखाती है कि दुनिया उन्हीं के पीछे चलती है जो उन्हें रास्ता दिखाते हैं। मार्क ने कॉलेज के सर्वर क्रैश कर दिए और यूनिवर्सिटी के एडमिनिस्ट्रेशन से पंगे लिए। उन्होंने कभी परमिशन मांगकर काम नहीं किया बल्कि काम करने के बाद माफी मांगना ज्यादा बेहतर समझा। अगर वो रूल्स के हिसाब से चलते तो आज हम सब एक दूसरे की फोटो लाइक नहीं कर रहे होते बल्कि अभी भी पुराने तरीके के सोशल नेटवर्क पर अटके होते।

यह लेसन साफ है कि अगर आप मार्केट में लीडर बनना चाहते हैं तो आपको रिस्क लेना होगा और थोडा 'बागी' बनना पड़ेगा। शांति से बैठकर और सबकी बातें मानकर आप सिर्फ एक अच्छी नौकरी पा सकते हैं पर एक रेवोल्यूशन खड़ा नहीं कर सकते। मार्क ने साबित किया कि एक छोटा सा आईडिया भी दुनिया का नक्शा बदल सकता है बशर्ते आपके पास पुरानी दीवारों को गिराने का जिगरा हो। तो अब फैसला आपका है कि आप सिस्टम का हिस्सा बने रहना चाहते हैं या उस सिस्टम को बदलने वाले इंसान बनना चाहते हैं।


अगर आपको लगता है कि आप भी अपने आईडिया से दुनिया बदल सकते हैं तो आज ही उस पर काम शुरू करें। याद रखिए कि मार्क जुकरबर्ग कोई सुपरमैन नहीं थे बस वो रुकने के लिए तैयार नहीं थे। कमेंट्स में हमें बताएं कि आपको इन तीन लेसन में से सबसे अच्छा कौन सा लगा और क्या आप भी अपने बिजनेस के लिए किसी दोस्त को छोड़ने की हिम्मत रखते हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो सिर्फ बड़ी बातें करते हैं पर काम कुछ नहीं करते।

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