The E-Myth Manager (Hindi)


क्या आप भी उन मैनेजर्स में से हैं जो खुद को कंपनी का शहंशाह समझते हैं पर असल में आप बस एक महंगे मजदूर बन कर रह गए हैं? मुबारक हो, आप अपनी जिंदगी और करियर दोनों का कचरा कर रहे हैं क्योंकि आपको लगता है कि आपके बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। अगर आपको अपनी कुर्सी से चिपक कर गधे की तरह मेहनत करने का इतना ही शौक है, तो यह आर्टिकल पढ़कर अपना कीमती टाइम वेस्ट मत कीजिये।

लेकिन अगर आप थक चुके हैं उस अंतहीन काम से जो कभी खत्म नहीं होता, तो माइकल गर्बर की यह किताब आपके लिए आँखें खोलने वाला सच लेकर आई है। चलिए जानते हैं वह ३ लाइफ चेंजिंग लेसन्स जो आपको एक थके हुए मैनेजर से एक स्मार्ट लीडर बना देंगे।


Lesson : आप मैनेजर नहीं, एक कन्फ्यूज्ड मजदूर हैं

सच थोड़ा कड़वा है पर हजम करना पड़ेगा। हमारे देश में आधे से ज्यादा मैनेजर्स को लगता है कि अगर वह ऑफिस में सबसे ज्यादा पसीना बहा रहे हैं, तो वह बहुत महान काम कर रहे हैं। माइकल गर्बर कहते हैं कि यह मैनेजमेंट नहीं, यह तो सुसाइड है। "द ई मिथ मैनेजर" हमें समझाती है कि एक मैनेजर का असली काम दूसरों से काम करवाना होता है, न कि दूसरों का काम खुद छीन कर बैठ जाना। आपने वह शर्मा जी देखे हैं जो अपनी टीम के हर छोटे काम में नाक घुसाते हैं? "अरे राहुल, यह ईमेल ऐसे नहीं वैसे लिखो", "पूजा, यह फाइल का कलर थोड़ा और डार्क करो"। शर्मा जी को लगता है कि वह क्वालिटी कंट्रोल कर रहे हैं, पर असल में वह अपनी टीम की ग्रोथ का गला घोंट रहे हैं और खुद के लिए ब्लड प्रेशर का इंतजाम कर रहे हैं।

मैनेजमेंट का मतलब यह नहीं है कि आप हर चीज के मास्टर बन जाएं। अगर आप एक टीम लीडर हैं और आपको संडे को भी लैपटॉप खोलकर बैठना पड़ रहा है क्योंकि "मेरे बिना तो ऑफिस बंद हो जाएगा", तो समझ लीजिये कि आपका मैनेजमेंट फेल हो चुका है। आप एक ऐसी मशीन के पुर्जे बन गए हैं जिसे आप ही को चलाना था। गर्बर का सीधा सा फंडा है: आप काम के अंदर मत घुसिये, काम के ऊपर रहिये। जो मैनेजर खुद को सबसे ज्यादा बिजी दिखाता है, असल में वह सबसे कम मैनेज कर रहा होता है। वह बस आग बुझाने में लगा है, जबकि उसका काम था आग लगने ही न देना।

सोचिये, अगर आप एक क्रिकेट टीम के कैप्टन हैं, तो क्या आप खुद ही बैटिंग करेंगे, खुद ही बॉलिंग और खुद ही बाउंड्री पर जाकर फील्डिंग भी करेंगे? अगर आप ऐसा करेंगे तो टीम तो हारेगी ही, आपकी कमर भी टूट जाएगी। एक स्मार्ट मैनेजर वह है जो पिच पर खड़े होकर सबको उनकी जगह बताता है और फिर शांति से गेम को ऑब्जर्व करता है। लेकिन यहाँ तो आलम यह है कि मैनेजर साहब फाइलें ढो रहे हैं और टीम कैंटीन में समोसे तोड़ रही है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है?

असली मैनेजर वह है जो फ्री होता है। हाँ, आपने सही सुना। अगर आपके पास बैठकर सोचने का समय नहीं है, तो आप मैनेज नहीं कर रहे, आप बस सर्वाइव कर रहे हैं। आपको अपनी टीम को यह भरोसा दिलाना होगा कि वह बिना आपके इंटरफेरेंस के भी काम कर सकते हैं। पर हमारी ईगो बीच में आ जाती है। हमें लगता है कि अगर सब कुछ सही हो गया, तो मेरी वैल्यू क्या रहेगी? इसी डर के चक्कर में हम अपनी टीम को पंगु बना देते हैं। याद रखिये, एक बेहतरीन मैनेजर की पहचान तब होती है जब वह ऑफिस में न हो, और फिर भी सारा काम मक्खन की तरह चले। अगर आपके ऑफिस छोड़ते ही वहां अफरा तफरी मच जाती है, तो आप लीडर नहीं, एक बहुत ही खराब सिस्टम के मालिक हैं।


Lesson : लोगों पर नहीं, सिस्टम पर भरोसा कीजिये

अब आप कहेंगे कि भाई, अगर मैं काम नहीं करूँगा और टीम पर सब छोड़ दूंगा, तो वो तो रायता फैला देंगे। यहीं पर माइकल गर्बर अपना दूसरा मास्टरस्ट्रोक मारते हैं। वह कहते हैं कि समस्या आपके लोगों में नहीं है, समस्या आपके सिस्टम में है। भारत में हम 'जुगाड़' के बड़े शौकीन हैं। आज काम हो गया क्योंकि राजू बहुत होशियार था, कल काम अटक गया क्योंकि राजू छुट्टी पर था। इसे मैनेजमेंट नहीं, इसे किस्मत का खेल कहते हैं। एक असली ई मिथ मैनेजर वह है जो इंसान को नहीं, एक प्रोसेस को हायर करता है।

इसे एक देसी उदाहरण से समझिये। आप कभी मैकडॉनल्ड्स गए हैं? वहां का बर्गर बनाने वाला कोई शेफ नहीं होता, बल्कि एक १८ साल का लड़का होता है जिसे बस एक सिस्टम फॉलो करना सिखाया गया है। उसे पता है कि बन को कितने सेकंड गर्म करना है और केचप की कितनी बूंदे डालनी हैं। आप दिल्ली में खाएं या मुंबई में, टेस्ट वही मिलेगा। क्यों? क्योंकि वहां सिस्टम भगवान है, इंसान नहीं। लेकिन हमारे ऑफिसों में क्या होता है? "अरे वो गुप्ता जी जानते हैं कि बिल कैसे पास होगा, उन्हीं से पूछना पड़ेगा"। मतलब अगर गुप्ता जी को कल बस ने उड़ा दिया, तो आपकी कंपनी का दीवाला निकल जाएगा। क्या आप सच में ऐसा बिजनेस या टीम चलाना चाहते हैं जो एक इंसान की मर्जी पर टिकी हो?

सिस्टम बनाने का मतलब है कि आप हर काम का एक 'तरीका' फिक्स कर दें। इतनी बारीकी से कि अगर आप सड़क से किसी समझदार इंसान को उठाकर अपनी कुर्सी पर बिठा दें, तो वह भी उस मैन्युअल को पढ़कर काम चला सके। लेकिन हमें क्या लगता है? हमें लगता है कि अपनी सीक्रेट ट्रिक्स किसी को नहीं बतानी चाहिए, वरना हमारी कुर्सी खतरे में पड़ जाएगी। यह छोटी सोच ही हमें एक छोटा मैनेजर बनाए रखती है। एक बड़ा मैनेजर वह है जो खुद को 'रिप्लेसेबल' बनाता है। वह ऐसे रूल्स और स्टेप्स लिख देता है कि काम ऑटो पायलट पर चलने लगे।

जरा सोचिये, आप हर रोज एक ही तरह की दिक्कतों को सुलझाने में अपनी एनर्जी क्यों फूंक रहे हैं? अगर वही ईमेल, वही क्लाइंट की शिकायत और वही टीम के ड्रामे रोज हो रहे हैं, तो आपने अब तक उसका परमानेंट सॉल्यूशन यानी एक 'सिस्टम' क्यों नहीं बनाया? असल में हम सिस्टम बनाने से डरते हैं क्योंकि उसमें दिमाग खर्च होता है। हमें आग बुझाने में मजा आता है क्योंकि उसमें हम हीरो बनते हैं। "देखो, मैंने आज फिर से डूबती नैया पार लगा दी"। भाई साहब, आप हीरो नहीं हैं, आप एक खराब आर्किटेक्ट हैं जिसने ऐसा घर बनाया है जिसमें रोज आग लगती है।

जब आप एक सिस्टम खड़ा कर देते हैं, तब आप आज़ाद होते हैं। तब आप यह नहीं देखते कि काम कैसे हो रहा है, आप यह देखते हैं कि सिस्टम कैसे काम कर रहा है। माइकल गर्बर कहते हैं कि एक मैनेजर का काम है सिस्टम को मैनेज करना, न कि लोगों को। अगर सिस्टम सही है, तो साधारण लोग भी असाधारण रिजल्ट्स देंगे। और अगर सिस्टम ही सड़ा हुआ है, तो आप दुनिया के बेस्ट टैलेंट को भी ले आइये, वो भी वहां आकर सिर्फ मक्खियां ही मारेंगे। इसलिए खुद को सुपरमैन समझना बंद कीजिये और एक शानदार प्रोसेस बनाने पर फोकस कीजिये।


Lesson : मैनेजर नहीं, अपनी कंपनी के विजनरी बनिए

अब तक हमने समझा कि आपको मजदूर नहीं बनना है और सिस्टम खड़ा करना है। लेकिन यह सब आप कर किसके लिए रहे हैं? माइकल गर्बर का तीसरा लेसन थोड़ा गहरा है। वह कहते हैं कि एक मैनेजर को अपनी कंपनी के भविष्य का सपना देखना चाहिए, न कि सिर्फ आज की फाइलों में डूबे रहना चाहिए। ज़्यादातर मैनेजर्स का विजन सिर्फ महीने की ३० तारीख तक होता है कि बस सैलरी आ जाए और बॉस की गालियां न सुननी पड़ें। लेकिन अगर आप एक ई मिथ मैनेजर बनना चाहते हैं, तो आपको यह सोचना होगा कि आपकी टीम आज से पांच साल बाद कहाँ होगी।

इसे एक मजेदार मिसाल से समझते हैं। मान लीजिये आप एक बस के ड्राइवर हैं। एक आम मैनेजर वह ड्राइवर है जो बस के पहिए, इंजन और पैसेंजर्स के शोर में इतना उलझा है कि उसे पता ही नहीं कि बस जा कहाँ रही है। वह बस गड्ढों से बचने की कोशिश कर रहा है। लेकिन एक विजनरी मैनेजर वह है जो मैप लेकर बैठा है। उसे पता है कि मंजिल कितनी दूर है और वहां पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता कौन सा है। हमारे यहाँ दिक्कत यह है कि मैनेजर्स को लगता है कि "विजन" देखना तो बड़े बड़े CEOs का काम है। भाई साहब, अगर आप अपनी छोटी सी टीम के लिए भी कोई बड़ा सपना नहीं देख सकते, तो आपकी टीम एक बेजान मशीन की तरह काम करेगी जो बस तेल पीती है और धुआं छोड़ती है।

जब आपके पास एक बड़ा विजन होता है, तो आपकी टीम को एक मकसद मिलता है। वरना ऑफिस का माहौल वही पुराना रहता है—सुबह ९ बजे आओ, लंच का इंतजार करो, और शाम को ६ बजते ही ऐसे भागो जैसे जेल से छूटे हो। माइकल गर्बर कहते हैं कि एक मैनेजर का काम अपनी टीम के अंदर जोश भरना है। और जोश तब आता है जब लोगों को लगता है कि वह किसी बड़ी चीज का हिस्सा हैं। अगर आप उन्हें सिर्फ डेडलाइन्स और टारगेट्स देंगे, तो वह सिर्फ उतना ही काम करेंगे जिससे उनकी नौकरी बची रहे। पर अगर आप उन्हें एक 'परपज' देंगे, तो वह अपनी जान लगा देंगे।

लेकिन यहाँ भी हमारा देसी ईगो आड़े आ जाता है। हमें लगता है कि अगर टीम को ज्यादा सपने दिखा दिए, तो वो हमारे सिर पर चढ़ जाएंगे। सच तो यह है कि जब आप अपनी टीम को एक विजन देते हैं, तो आप असल में खुद को उस रोजमर्रा की चिकचिक से आज़ाद कर रहे होते हैं। विजनरी होने का मतलब यह नहीं है कि आप हवा में महल बनाएं। इसका मतलब है यह समझना कि आपका बिजनेस या आपकी सर्विस दुनिया में क्या बदलाव ला रही है। चाहे आप एक छोटा सा किराना स्टोर मैनेज कर रहे हों या किसी बड़ी टेक कंपनी की टीम, आपका एक बड़ा लक्ष्य होना जरूरी है।

याद रखिये, जो मैनेजर सिर्फ आज का सोचता है, वह कल तक गायब हो जाता है। आपको अपनी आर्गेनाइजेशन के स्ट्रक्चर को एक खेल की तरह देखना होगा। एक ऐसा खेल जिसे जीतने के लिए आपको अपनी टीम को तैयार करना है। जब आप हाथ में फाइल लेकर नहीं, बल्कि दिमाग में एक विजन लेकर ऑफिस घुसेंगे, तब लोग आपकी इज्जत आपकी पोस्ट की वजह से नहीं, बल्कि आपकी पर्सनैलिटी की वजह से करेंगे। तो अपनी नजरें डेस्क से उठाइये और आसमान की तरफ देखिये। क्योंकि जब तक आप बड़ा सोचेंगे नहीं, तब तक आप बड़ा मैनेज कर ही नहीं पाएंगे।


तो दोस्तों, माइकल गर्बर की यह किताब हमें सिखाती है कि मैनेजमेंट कोई सजा नहीं, बल्कि एक आर्ट है। अगर आप अब भी वही पुरानी गलतियां दोहरा रहे हैं, तो रुकिए और सोचिये। क्या आप एक आजाद लीडर बनना चाहते हैं या अपनी ही कंपनी के उम्रकैद वाले कैदी? चुनाव आपका है। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो ऑफिस के काम में पागलों की तरह फंसे हुए हैं। और नीचे कमेंट में बताइये कि आप आज से अपनी टीम के लिए क्या नया सिस्टम बनाने वाले हैं। चलिए, अब काम पर नहीं, सिस्टम पर काम शुरू कीजिये।

-----

आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now




#ManagementTips #MichaelGerber #LeadershipHindi #EMyth #BusinessGrowthHindi


_

Post a Comment

Previous Post Next Post