क्या आप अभी भी एवरेज लोगों को हायर करके अपनी कंपनी को टॉप पर ले जाने का सपना देख रहे हैं? कितनी मासूमियत है! जब आपके कॉम्पिटिटर्स बेस्ट टैलेंट को छीन रहे हैं, तब आप घटिया टीम के साथ डूबने की तैयारी कर रहे हैं। इस टैलेंट की जंग में हारना तो तय ही समझिए।
आज के इस कॉम्पिटिटिव दौर में अगर आप सही लोगों को पहचानना और उन्हें संभालना नहीं सीखे, तो आपका बिजनेस इतिहास बन जाएगा। चलिए, इस किताब के तीन जबरदस्त लेसन से समझते हैं कि आखिर आप कहाँ गलती कर रहे हैं।
Lesson : टैलेंट माइंडसेट ही असली गेम है
आजकल के कई मैनेजर्स को लगता है कि ऑफिस में चार दीवारें खड़ी कर दी, कुछ सस्ते लैपटॉप बांट दिए और चाय की मशीन लगा दी, तो बस बिजनेस रॉकेट बन जाएगा। क्या सच में? अगर आप भी इसी गलतफहमी में जी रहे हैं, तो भाई साहब, आपको हकीकत के डोज की सख्त जरूरत है। द वॉर फॉर टैलेंट का सबसे पहला और बड़ा लेसन यही है कि आपकी कंपनी की असली ताकत आपकी बैलेंस शीट नहीं, बल्कि वो लोग हैं जो वहां काम करते हैं। इसे कहते हैं टैलेंट माइंडसेट।
सोचिए, आप एक क्रिकेट टीम बना रहे हैं। आप चाहते हैं कि आपकी टीम वर्ल्ड कप जीते, लेकिन आप खिलाड़ियों को चुनते वक्त कंजूसी कर रहे हैं। आप गली के चिंटू और पिंटू को टीम में रखकर उम्मीद कर रहे हैं कि वो मिचेल स्टार्क की गेंदों पर छक्के जड़ देंगे। मजाक चल रहा है क्या? टैलेंट माइंडसेट का मतलब है यह मानना कि बेहतर लोग ही बेहतर नतीजे लाते हैं। यह कोई एचआर डिपार्टमेंट का साइड प्रोजेक्ट नहीं है, यह लीडरशिप की सबसे पहली जिम्मेदारी है। अगर कंपनी का सीईओ खुद टैलेंट ढूंढने में पसीना नहीं बहा रहा, तो समझ लीजिए कि कंपनी का भविष्य अंधकार में है।
हमारे देश के कई लाला टाइप बिजनेस में क्या होता है? वहां टैलेंट से ज्यादा चापलूसी को तवज्जो दी जाती है। बॉस को लगता है कि जो बंदा रात के 10 बजे तक ऑफिस में बैठकर उसकी फालतू जोक्स पर हंस रहा है, वही असली हीरा है। लेकिन असल में वो हीरा नहीं, बल्कि एक आलसी इंसान है जो घर नहीं जाना चाहता। असली टैलेंटेड बंदा तो अपना काम खत्म करके 6 बजे निकल जाएगा क्योंकि उसे पता है कि उसकी वैल्यू क्या है। टैलेंट माइंडसेट रखने वाला लीडर इस फर्क को समझता है। वो जानता है कि एक 'ए प्लेयर' यानी टॉप परफॉर्मर, दस 'सी प्लेयर्स' से कहीं ज्यादा कीमती होता है।
मान लीजिए एक सॉफ्टवेयर कंपनी है। वहां एक कोडर है जो चुपचाप अपना काम करता है और मुश्किल से मुश्किल बग को चुटकियों में सुलझा देता है। लेकिन वो मीटिंग्स में ज्यादा बकवास नहीं करता। दूसरी तरफ एक ऐसा बंदा है जो पीपीटी बहुत सुंदर बनाता है, अंग्रेजी में भारी शब्द बोलता है, लेकिन कोड के नाम पर उसे सिर्फ कॉपी पेस्ट आता है। अगर आपका माइंडसेट टैलेंट वाला नहीं है, तो आप उस पीपीटी वाले बंदे को प्रमोट कर देंगे। नतीजा? आपकी ऐप क्रैश हो जाएगी और वो टैलेंटेड कोडर इस्तीफा देकर आपके कॉम्पिटिटर के पास चला जाएगा। बधाई हो, आपने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली!
टैलेंट की इस जंग में सर्वाइव करने के लिए आपको एक शिकारी की तरह सोचना होगा। आपको हर वक्त इस तलाश में रहना होगा कि मार्केट में सबसे तेज दिमाग कौन है। यह कोई एक दिन का काम नहीं है, यह एक जुनून है। आपको अपनी कंपनी के कल्चर में यह बात घोल देनी होगी कि यहाँ सिर्फ काम और काबिलियत की पूजा होगी। अगर आप अपने एम्प्लॉईज को सिर्फ एक नंबर की तरह देखते हैं, तो वो भी आपकी कंपनी को सिर्फ एक बस स्टॉप की तरह देखेंगे जहाँ वो अगली बस यानी अगली बेहतर जॉब का इंतजार करेंगे।
इसलिए, अगर आप चाहते हैं कि आपका बिजनेस लंबे समय तक टिके, तो सबसे पहले अपनी सोच बदलिए। मशीनों पर निवेश करने से पहले इंसानों पर निवेश करना सीखिए। क्योंकि अंत में, एक जीनियस इंसान आपकी पूरी कंपनी की तकदीर बदल सकता है, जबकि दस एवरेज लोग मिलकर सिर्फ आपकी बिजली का बिल बढ़ा सकते हैं।
Lesson : एम्प्लॉई वैल्यू प्रपोजिशन - सिर्फ सैलरी ही सब कुछ नहीं है
अगर आपको लगता है कि आप किसी को थोड़े ज्यादा पैसे फेंक कर अपनी कंपनी में रोक लेंगे, तो आप शायद 1990 के दौर में जी रहे हैं। आज का टैलेंटेड प्रोफेशनल आपसे सिर्फ बैंक बैलेंस नहीं मांगता, वो आपसे एक 'वैल्यू' मांगता है। इसे ही कहते हैं एम्प्लॉई वैल्यू प्रपोजिशन यानी ईवीपी। यह आपकी कंपनी का वो प्रॉमिस है जो आप अपने एम्प्लॉई से करते हैं। अगर आपका प्रॉमिस खोखला है, तो आपका टैलेंटेड बंदा उतनी ही जल्दी गायब होगा जितनी जल्दी दिवाली का बोनस खत्म होता है।
सोचिए, आप एक शादी के रिश्ते के लिए जा रहे हैं। लड़का कहता है कि मेरे पास बहुत पैसा है, लेकिन मैं दिन भर चिल्लाऊंगा, तुम्हें कभी बाहर नहीं ले जाऊंगा और घर का माहौल हमेशा तनावपूर्ण रहेगा। क्या कोई वहां रुकना चाहेगा? बिल्कुल नहीं! वैसे ही टैलेंटेड लोग सिर्फ सैलरी स्लिप नहीं देखते। वो देखते हैं कि क्या उन्हें वहां कुछ नया सीखने को मिलेगा? क्या ऑफिस का कल्चर जहरीला तो नहीं है? और सबसे जरूरी, क्या उनके काम की कोई इज्जत है? अगर आप उन्हें सिर्फ एक रोबोट समझकर काम करवाएंगे, तो वो आपके पास सिर्फ तब तक रहेंगे जब तक उन्हें कोई दूसरा ऑफर नहीं मिल जाता।
मान लीजिए दो स्टार्टअप हैं। एक है 'खटारा प्राइवेट लिमिटेड' जो अपने ऑफिस में मुफ्त कॉफी और बहुत बड़ी सैलरी देता है, लेकिन वहां का बॉस बात-बात पर बेइज्जती करता है और संडे को भी मीटिंग रखता है। दूसरा है 'फ्यूचर ब्राइट इंक' जहाँ सैलरी शायद थोड़ी कम हो, लेकिन वहां एम्प्लॉई को अपनी बात कहने की आजादी है, काम के फ्लेक्सिबल घंटे हैं और उनके पर्सनल ग्रोथ पर ध्यान दिया जाता है। आपको क्या लगता है, समझदार और टैलेंटेड बंदा कहाँ जाएगा? जाहिर है, वो शांति और इज्जत चुनेगा। क्योंकि टैलेंटेड लोगों को पता होता है कि पैसा तो वो कहीं भी कमा लेंगे, लेकिन मानसिक शांति और अच्छी वर्क लाइफ हर जगह नहीं मिलती।
हमारे यहाँ कई बिजनेस ओनर्स को लगता है कि ऑफिस में एक टेबल टेनिस की टेबल लगा दी या महीने में एक बार पिज्जा खिला दिया, तो बस हो गया महान कल्चर। भाई साहब, यह सब दिखावा है। असली ईवीपी तब बनता है जब आप अपने एम्प्लॉई को यह यकीन दिलाते हैं कि आपकी कंपनी में काम करना उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि है। क्या आप उन्हें बड़ी चुनौतियां दे रहे हैं? क्या आप उन्हें फैसले लेने की ताकत दे रहे हैं? अगर आप हर छोटे काम में टांग अड़ाएंगे यानी माइक्रो मैनेजमेंट करेंगे, तो आपका टॉप टैलेंट दम तोड़ देगा।
सच्चाई तो यह है कि आज का युवा एम्प्लॉई 'इम्पैक्ट' डालना चाहता है। वो चाहता है कि जब वो सुबह सोकर उठे, तो उसे ऑफिस जाने में चिड़चिड़ाहट न हो। अगर आपकी कंपनी का माहौल ऐसा है जहाँ सिर्फ पॉलिटिक्स चलती है और काम कम, तो समझ लीजिए कि आपने खुद ही अपने विनाश का सामान तैयार कर लिया है। टैलेंटेड लोग उन जगहों की तरफ खिंचे चले जाते हैं जहाँ उन्हें अपनी काबिलियत दिखाने का मैदान मिलता है, न कि जहाँ उन्हें सिर्फ हुक्म बजाना पड़ता है।
इसलिए, अगर आप इस टैलेंट की जंग को जीतना चाहते हैं, तो अपने ऑफर को थोड़ा अट्रैक्टिव बनाइये। सिर्फ रुपयों के मामले में नहीं, बल्कि अनुभव के मामले में। उन्हें एक ऐसा विजन दीजिये जिसमें उन्हें अपना भविष्य चमकता हुआ दिखे। याद रखिये, एक वफादार और टैलेंटेड एम्प्लॉई आपकी कंपनी को वहां ले जा सकता है जहाँ करोड़ों रुपये का विज्ञापन भी नहीं ले जा सकता। अपनी कंपनी को एक जेल नहीं, बल्कि एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाइये जहाँ टैलेंट अपनी उड़ान भर सके।
Lesson : ए और बी प्लेयर्स के बीच का फर्क - भेड़ और शेरों को अलग करना सीखें
क्या आपने कभी किसी सरकारी दफ्तर में उस बाबू को देखा है जो फाइल पर मक्खी मार रहा होता है और आप कितनी भी जल्दी में हों, वो अपनी चाल नहीं बदलता? बस, वही है एक 'सी प्लेयर'। लेकिन कॉर्पोरेट की दुनिया में अगर आप ऐसे लोगों को पाल रहे हैं, तो आप बिजनेस नहीं कर रहे, आप एक चैरिटी ट्रस्ट चला रहे हैं। द वॉर फॉर टैलेंट का तीसरा और सबसे कड़वा लेसन यह है कि आपको अपने ए, बी और सी प्लेयर्स के बीच एक गहरी लकीर खींचनी होगी। अगर आप सबको एक ही तराजू में तोलेंगे, तो आपके 'ए प्लेयर्स' (टॉप परफॉर्मर्स) बहुत जल्द आपको टाटा-बाय बाय बोल देंगे।
मान लीजिए आप एक रेस्टोरेंट चला रहे हैं। आपके पास एक शेफ है जो इतना लाजवाब खाना बनाता है कि लोग दूर-दूर से आते हैं (आपका ए प्लेयर)। दूसरा एक वेटर है जो अपना काम ठीक-ठाक कर लेता है, कभी गलती नहीं करता लेकिन कभी कुछ एक्स्ट्रा भी नहीं करता (आपका बी प्लेयर)। और तीसरा एक सफाई कर्मचारी है जो रोज लेट आता है, कोनों में कचरा छोड़ देता है और हर वक्त मोबाइल में लगा रहता है (आपका सी प्लेयर)। अब अगर दिवाली पर आप तीनों को एक जैसा बोनस देंगे और बराबर तारीफ करेंगे, तो उस शेफ को कैसा लगेगा? उसे लगेगा कि उसकी मेहनत की कोई कीमत नहीं है। वो अगले दिन अपनी कड़ाही उठाएगा और बगल वाले रेस्टोरेंट में चला जाएगा।
टैलेंट की जंग में बने रहने का मतलब है कि आपको अपने 'ए प्लेयर्स' को पलकों पर बिठाकर रखना होगा। उन्हें ज्यादा जिम्मेदारी दीजिये, उन्हें कंपनी के भविष्य का हिस्सा बनाइये और हाँ, उन्हें रिवॉर्ड भी सबसे ज्यादा दीजिये। वहीं जो 'बी प्लेयर्स' हैं, वो आपकी कंपनी की रीढ़ की हड्डी होते हैं। उन्हें ट्रेनिंग दीजिये, उनका हौसला बढ़ाइये ताकि वो भी कल 'ए प्लेयर' बन सकें। लेकिन जो 'सी प्लेयर्स' हैं, जो न खुद काम करना चाहते हैं और न दूसरों को करने देते हैं, उन्हें बड़े प्यार से गेट तक छोड़ कर आना ही आपकी कंपनी के लिए सबसे बड़ा उपकार होगा। यह सुनने में थोड़ा क्रूर लग सकता है, लेकिन एक सड़ा हुआ सेब पूरी टोकरी को खराब कर देता है।
हमारे यहाँ अक्सर इमोशनल ब्लैकमेलिंग चलती है। "अरे, बेचारा पांच साल से काम कर रहा है, भले ही काम नहीं आता पर दिल का अच्छा है।" भाई साहब, आप दिल का रिश्ता नहीं निभा रहे, आप एक प्रोफेशनल संस्था चला रहे हैं। अगर कोई बंदा आपकी कंपनी की ग्रोथ में बाधा बन रहा है, तो उसे बनाए रखना आपके 'ए प्लेयर्स' के साथ नाइंसाफी है। हाई-परफॉर्मेंस कल्चर का मतलब ही यही है कि यहाँ केवल एक्सीलेंस की जगह है। जब बाकी एम्प्लॉईज देखते हैं कि मेहनत करने वालों को इज्जत मिल रही है और कामचोरों को बाहर का रास्ता, तब असल में मोटिवेशन पैदा होता है।
टैलेंट की इस जंग में सिर्फ वही जीतता है जिसके पास सबसे बेहतरीन सिपाही होते हैं। अपनी टीम को पहचानना सीखिए। हर इंसान को उसकी काबिलियत के हिसाब से जगह दीजिये। अगर आप एक शेर को भेड़ों के झुंड में रखेंगे, तो कुछ समय बाद वो शेर भी दहाड़ना भूल जाएगा। अपनी कंपनी में शेरों का कुनबा बनाइये, भेड़ों का मेला नहीं।
दोस्तो, द वॉर फॉर टैलेंट हमें सिखाती है कि टैलेंट कोई ऐसी चीज नहीं है जो किस्मत से मिल जाए, इसे ढूंढना, तराशना और संभालना पड़ता है। अगर आप आज भी पुराने तौर-तरीकों से अपनी टीम चला रहे हैं, तो आप हार की तरफ बढ़ रहे हैं। आज ही अपनी टीम का एनालिसिस कीजिये। पहचानिए अपने उन 'ए प्लेयर्स' को जो आपकी कंपनी को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं।
क्या आप अपनी कंपनी में एक टैलेंट माइंडसेट बनाने के लिए तैयार हैं? या फिर आप अब भी एवरेज लोगों के भरोसे बड़ी कामयाबी का इंतजार कर रहे हैं? नीचे कमेंट्स में हमें बताएं कि आपके हिसाब से एक आइडियल टीम में सबसे जरूरी क्वालिटी क्या होनी चाहिए। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो एक टीम लीड कर रहे हैं या अपना स्टार्टअप चला रहे हैं। याद रखिये, सही लोग ही सही बिजनेस बनाते हैं!
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