क्या आप भी उन पुराने बिजनेस गुरुओं की बात मानकर बैठे हैं जो कहते हैं कि बस अच्छा प्रोडक्ट बनाओ और लोग खुद आएंगे। अगर हाँ तो बधाई हो आप अपनी बर्बादी की स्क्रिप्ट खुद लिख रहे हैं। आपके कॉम्पिटिटर कस्टमर को अपना पार्टनर बना रहे हैं और आप अभी भी अकेले दीवार से बातें कर रहे हैं।
आज के इस दौर में अगर आपने कस्टमर के साथ मिलकर वैल्यू क्रिएट नहीं की तो आपका बिजनेस इतिहास बन जाएगा। आइये सी के प्रहलाद की इस किताब से समझते हैं वो ३ लेसन्स जो आपके बिजनेस करने का नजरिया हमेशा के लिए बदल देंगे।
लेसन १ : को-क्रिएशन ही असली किंग है
आज के जमाने में अगर आप अभी भी वही घिसा पिटा फार्मूला इस्तेमाल कर रहे हैं कि मैं ही भगवान हूँ और जो मैं बनाऊंगा वही पब्लिक खरीदेगी तो बॉस आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। सी के प्रहलाद और वेंकट रामास्वामी अपनी इस किताब में बहुत साफ लफ्जों में कहते हैं कि अब मार्केट बदल चुका है। पहले कंपनी सामान बनाती थी और कस्टमर चुपचाप उसे खरीद लेता था। लेकिन अब वह जमाना जा चुका है। अब तो जमाना को-क्रिएशन का है। को-क्रिएशन का सीधा मतलब है कि आप अपने कस्टमर को सिर्फ एक खरीदार मत समझिए बल्कि उसे अपना बिजनेस पार्टनर बना लीजिए।
सोचिए जरा अगर आप एक रेस्टोरेंट खोलते हैं और बिना किसी से पूछे वहां सिर्फ करेले की सब्जी सर्व करने लगते हैं क्योंकि आपको लगता है कि सेहत के लिए अच्छी है। क्या होगा। लोग आएंगे। आपकी फोटो खींचेंगे और सोशल मीडिया पर लिखेंगे कि यह दुनिया का सबसे बोरिंग रेस्टोरेंट है। आपका बिजनेस ठप। लेकिन अगर आप कस्टमर से पूछें कि उन्हें क्या पसंद है। आप उन्हें मौका दें कि वो अपनी पसंद की डिश खुद कस्टमाइज कर सकें। तो यकीन मानिए वो न सिर्फ बार बार आएंगे बल्कि अपने दस दोस्तों को भी साथ लाएंगे। यही को-क्रिएशन की ताकत है।
आज का कस्टमर वो फूफा जी नहीं है जो शादी में चुपचाप एक कोने में बैठकर खाना खाकर चले जाते थे। आज का कस्टमर वो मॉडर्न रिश्तेदार है जो किचन में घुसकर आपको बताएगा कि नमक थोड़ा कम है और तड़का थोड़ा और तेज होना चाहिए था। और मजे की बात यह है कि आपको बुरा मानने की जरूरत नहीं है। बल्कि आपको उनका स्वागत करना चाहिए। क्योंकि जब कस्टमर आपके साथ मिलकर कुछ बनाता है तो उसे उस चीज से एक अलग ही लगाव हो जाता है। उसे लगता है कि यह तो मेरा आईडिया है। और इंसान अपने आईडिया को कभी फेल होते नहीं देखना चाहता।
आज के टाइम में बड़ी बड़ी गेमिंग कंपनियाँ अपने यूजर्स को मौका देती हैं कि वो खुद के मैप्स बनाएं और खुद के कैरेक्टर्स डिजाइन करें। कंपनी बस एक प्लेटफॉर्म देती है और असली वैल्यू तो कस्टमर खुद क्रिएट कर रहे हैं। इससे कंपनी का काम आसान हो जाता है और कस्टमर को मिलता है एक शानदार एक्सपीरियंस। अगर आप एक छोटा सा स्टार्टअप भी चला रहे हैं तो भी आप यह कर सकते हैं। अपने कस्टमर से फीडबैक लीजिए। उनसे पूछिए कि वो आपके प्रोडक्ट में क्या बदलाव देखना चाहते हैं। उन्हें महसूस कराइए कि उनकी राय की कीमत है।
अगर आप अभी भी अकेले कमरे में बैठकर पूरी दुनिया को जीतने का प्लान बना रहे हैं तो रुक जाइए। बाहर निकलिए और अपने कस्टमर से बात कीजिए। उनके साथ मिलकर कुछ नया बनाइये। याद रखिए कि अब वैल्यू किसी फैक्ट्री के अंदर नहीं बल्कि कंपनी और कस्टमर के बीच होने वाली बातचीत में पैदा होती है। अगर आप इस बातचीत को इग्नोर करेंगे तो कॉम्पिटिशन आपको कुचल कर आगे निकल जाएगा। और तब आप बैठकर सिर्फ यह सोचेंगे कि मेरी इतनी बढ़िया क्वालिटी के बाद भी लोग दूसरे के पास क्यों जा रहे हैं। वो इसलिए जा रहे हैं क्योंकि वहां उन्हें सुना जा रहा है और यहाँ आप सिर्फ अपनी सुना रहे हैं।
लेसन २ : प्रोडक्ट नहीं, एक्सपीरियंस बेचिए
अगर आप आज भी यह सोचकर खुश हो रहे हैं कि आपका प्रोडक्ट दुनिया में सबसे बेस्ट है, तो दोस्त, जाग जाइये। मार्केट में आपसे बेहतर और आपसे सस्ता सामान बनाने वाले हजारों लोग बैठे हैं। इस किताब का दूसरा सबसे बड़ा लेसन यही है कि अब लोग चीजें नहीं खरीदते, वो उस चीज से जुड़ा हुआ 'अनुभव' यानी एक्सपीरियंस खरीदते हैं। सी के प्रहलाद कहते हैं कि वैल्यू अब किसी डिब्बे में बंद होकर नहीं आती, बल्कि वह उस पल में पैदा होती है जब कस्टमर आपके प्रोडक्ट का इस्तेमाल करता है।
मान लीजिए आप एक कॉफी की दुकान पर जाते हैं। अगर आप सिर्फ कॉफी पीने जा रहे हैं, तो आप घर पर भी बना सकते हैं जिसकी कीमत शायद पांच या दस रूपये होगी। लेकिन आप स्टारबक्स जैसे कैफे में जाकर पांच सौ रूपये खर्च करते हैं। क्यों। क्या वहां की कॉफी में सोने के सिक्के डले होते हैं। बिल्कुल नहीं। आप वहां उस माहौल, उस खुशबू, वहां की आरामदायक कुर्सी और उस कप पर लिखे अपने नाम के लिए पैसे देते हैं। वो आपको कॉफी नहीं, एक 'प्रीमियम फीलिंग' बेच रहे हैं। यही वो एक्सपीरियंस है जिसके लिए लोग पागलों की तरह पैसे देने को तैयार रहते हैं।
सच्चाई तो यह है कि आज का कस्टमर बहुत ज्यादा डिमांडिंग हो गया है। वो चाहता है कि उसे हर कदम पर स्पेशल महसूस कराया जाए। अगर आपकी सर्विस में वो 'वाह' वाला फैक्टर नहीं है, तो आप सिर्फ एक कमोडिटी बनकर रह जाएंगे। और कमोडिटी का हाल क्या होता है। लोग हमेशा सस्ता ढूंढते हैं। अगर आप चाहते हैं कि लोग कीमत की चिंता किए बिना आपके पास आएं, तो आपको अपनी सर्विस को एक इवेंट की तरह पेश करना होगा।
यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी को डेट पर ले जाएं। अगर आप वहां जाकर सिर्फ अपनी तारीफों के पुल बांधेंगे और सामने वाले को इग्नोर करेंगे, तो यकीन मानिए वो आपकी आखिरी डेट होगी। लेकिन अगर आप उन्हें यह महसूस कराएंगे कि वो दुनिया के सबसे खास इंसान हैं, तो बात बन जाएगी। बिजनेस भी बिल्कुल ऐसा ही है। आपका प्रोडक्ट सिर्फ एक जरिया है उस रिश्ते को बनाने का। असली खेल तो उस फीलिंग का है जो आप अपने कस्टमर के दिल में छोड़ जाते हैं।
आजकल की डिजिटल दुनिया में तो यह और भी जरूरी हो गया है। आप कोई ऐप इस्तेमाल करते हैं और अगर वो दो सेकंड ज्यादा लोड होने में लेती है, तो आप उसे फौरन डिलीट कर देते हैं। क्यों। क्योंकि आपका एक्सपीरियंस खराब हो गया। कंपनी ने करोड़ों खर्च करके ऐप बनाई, लेकिन आपके उन दो सेकंड के खराब अनुभव ने उस पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया। इसलिए, हर छोटी से छोटी चीज पर ध्यान दीजिए। कस्टमर आपकी वेबसाइट पर कैसे आता है, उसे सामान कैसे मिलता है और उसके बाद आप उससे कैसे बात करते हैं, यह सब मिलकर एक बड़ा एक्सपीरियंस बनाते हैं।
याद रखिए, प्रोडक्ट तो कोई भी कॉपी कर सकता है, लेकिन जो अनुभव आप अपने कस्टमर को देते हैं, उसे कॉपी करना नामुमकिन है। यही आपकी असली ताकत है। अगर आप सिर्फ बेचने के चक्कर में रहेंगे, तो शायद एक बार बेच लें। लेकिन अगर आप एक यादगार लम्हा देंगे, तो आप एक वफादार कस्टमर बना लेंगे जो आपके ब्रांड का झंडा लेकर घूमेगा। अगले लेसन में हम देखेंगे कि इस भरोसे को और मजबूत कैसे किया जाता है।
लेसन ३ : डेटा और ट्रांसपेरेंसी से भरोसा जीतें
अब तक हमने समझा कि कस्टमर को साथ जोड़ना है और उसे एक अच्छा अनुभव देना है। लेकिन यह सब तब तक काम नहीं करेगा जब तक आपके और कस्टमर के बीच 'भरोसे' की दीवार मजबूत न हो। सी के प्रहलाद और वेंकट रामास्वामी कहते हैं कि आज के दौर में कस्टमर के पास जानकारी का समंदर है। आप उसे बेवकूफ नहीं बना सकते। पहले के समय में कंपनियाँ अपनी कमियाँ छुपा लेती थीं, लेकिन आज अगर आपके प्रोडक्ट में एक छोटा सा छेद भी है, तो उसका फोटो इंटरनेट पर जंगल की आग की तरह फैल जाएगा। इसलिए, डेटा का सही इस्तेमाल और पारदर्शिता यानी ट्रांसपेरेंसी ही अब एकमात्र रास्ता है।
आजकल हर कंपनी चिल्लाती है कि हम कस्टमर का डेटा सुरक्षित रखते हैं और हम बहुत ईमानदार हैं। लेकिन ईमानदारी सिर्फ बोलने से नहीं आती, उसे दिखाना पड़ता है। इसे एक मजेदार उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आप किसी ऑनलाइन स्टोर से कोई सामान मंगाते हैं। अगर वो कंपनी आपको हर पल की अपडेट देती रहे कि आपका सामान कहाँ है, किसने पैक किया और कब आप तक पहुँचेगा, तो आपको सुकून मिलता है। लेकिन अगर वो पैसे लेकर गायब हो जाए और सात दिन तक कोई अता पता न हो, तो आपके मन में क्या आता है। यही न कि शायद मेरे पैसे डूब गए। चाहे वो सामान आठवें दिन पहुँच भी जाए, लेकिन आपका भरोसा टूट चुका होता है।
सच तो यह है कि आज का कस्टमर बहुत 'जासूस' किस्म का हो गया है। वो खरीदने से पहले दस रिव्यूज पढ़ता है और सौ लोगों से पूछता है। अगर आप उससे कुछ छुपाएंगे, तो वो इसे अपनी बेइज्जती समझेगा। आपको अपना डेटा कस्टमर के साथ शेयर करना चाहिए ताकि उसे लगे कि वो भी इस प्रोसेस का हिस्सा है। जैसे आजकल के हेल्थ ऐप्स आपको बताते हैं कि आपने कितने कदम चले और आपके शरीर में क्या बदलाव हो रहे हैं। वो आपका ही डेटा आपको बेहतर तरीके से दिखाते हैं, जिससे आपका उन पर भरोसा बढ़ जाता है।
ट्रांसपेरेंसी का मतलब यह नहीं है कि आप अपनी तिजोरी की चाबी कस्टमर को दे दें। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि जब आप गलती करें, तो उसे मान लें। अगर डिलीवरी लेट है, तो बहाने बनाने के बजाय सच बताइए। कस्टमर को सच बोलने वाला इंसान पसंद आता है, वो सेल्समैन नहीं जो चांद तारे तोड़कर लाने के वादे करता है और बाद में फोन उठाना बंद कर देता है। आज के जमाने में 'परफेक्ट' होना जरूरी नहीं है, 'सच्चा' होना जरूरी है।
जब आप डेटा और सच्चाई को मिला देते हैं, तो एक ऐसा बॉन्ड बनता है जिसे कोई कॉम्पिटिटर नहीं तोड़ सकता। को-क्रिएशन का मतलब ही यही है कि दोनों तरफ से जानकारी का लेन देन हो। जितना ज्यादा आप कस्टमर को जानने की कोशिश करेंगे और जितना ज्यादा आप खुद को उनके सामने खोलेंगे, उतना ही आपका बिजनेस बढ़ेगा। कॉम्पिटिशन अब बाहर नहीं है, कॉम्पिटिशन आपके और आपके कस्टमर के बीच की उस दूरी में है जिसे आपको खत्म करना है।
तो दोस्तों, 'द फ्यूचर ऑफ कॉम्पिटिशन' हमें सिखाती है कि अकेले भागने का दौर खत्म हो चुका है। अब जीत उसी की होगी जो सबको साथ लेकर चलेगा। अपने कस्टमर को सिर्फ एक रसीद का नंबर मत समझिए, उसे एक इंसान और अपना पार्टनर मानिए। क्या आप आज से अपने बिजनेस या काम में कस्टमर की राय को जगह देने के लिए तैयार हैं। कमेंट्स में अपनी राय जरूर बताएं और इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अभी भी पुराने ढर्रे पर बिजनेस कर रहे हैं। याद रखिए, अगर आप नहीं बदलेंगे, तो वक्त आपको बदल देगा।
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