आप अभी भी वही पुरानी घिसी पिटी प्लानिंग के भरोसे बैठे हैं। जबकि आपके कॉम्पिटिटर आपको कच्चा चबाने की तैयारी में हैं। बिना सही स्ट्रेटेजी के आप सिर्फ एक खोखली मेहनत कर रहे हैं जिसका अंत सिर्फ फेलियर है। क्या आपको सच में लगता है कि किस्मत आपको बचा लेगी। बहुत भोले हैं आप।
विलियम कोहेन की बुक द आर्ट ऑफ द स्ट्रेटेजिस्ट हमें सिखाती है कि असली जीत किस्मत से नहीं बल्कि सोची समझी चालों से मिलती है। चलिए आज के इस ब्लॉग में हम उन ३ बड़े लेसन्स को डिकोड करते हैं।
लेसन १ : मैदान में उतरे बिना जंग नहीं जीती जाती - लीडरशिप फ्रॉम द फ्रंट
आजकल के सो कॉल्ड मैनेजर्स को लगता है कि बस एअर कंडीशनर वाले केबिन में बैठकर ईमेल भेज देने से कंपनी नंबर वन बन जाएगी। भाई साहब यह कोई वीडियो गेम नहीं है जहाँ आप रिमोट पकड़कर सब कंट्रोल कर लेंगे। विलियम कोहेन साहब अपनी किताब में साफ कहते हैं कि अगर आपको अपनी टीम से रिजल्ट चाहिए तो आपको खुद कीचड़ में उतरना पड़ेगा। जब तक आप खुद पसीना नहीं बहाएंगे तब तक आपकी टीम को लगेगा कि उनका बॉस सिर्फ ज्ञान बांटने की मशीन है। असली स्ट्रेटेजी फाइलों में नहीं बल्कि उस जगह बनती है जहाँ काम हो रहा होता है।
मान लीजिए आपकी एक छोटी सी स्टार्टअप है जो चाय पत्ती बेचती है। अब आप ऑफिस में बैठकर डेटा देख रहे हैं कि सेल कम क्यों है। आप अपनी सेल्स टीम को फोन पर डांट रहे हैं कि तुम लोग काम नहीं कर रहे। लेकिन असली मजे की बात तो यह है कि आपको पता ही नहीं कि बाहर मार्केट में धूप कितनी तेज है या दुकानदार आपसे बात क्यों नहीं करना चाहता। जब आप खुद एक दिन झोला उठाकर दुकान-दुकान जाएंगे तब आपको समझ आएगा कि भाई साहब गर्मी में गला सूखता है तब सेल्स की पिच याद नहीं रहती। जब आपकी टीम आपको अपने साथ पसीने में लथपथ देखेगी तब उनके अंदर जो जोश आएगा वो आपकी किसी भी मोटिवेशनल स्पीच से बड़ा होगा। इसे ही कहते हैं लीडिंग फ्रॉम द फ्रंट।
ज्यादातर लोग क्या करते हैं। वो बस हुक्म चलाना जानते हैं। उनको लगता है कि गद्दी पर बैठ गए तो बस अब सब उनके गुलाम हैं। लेकिन भाई साहब ये राजा महाराजाओं का जमाना नहीं है। आज के दौर में अगर आप अपनी टीम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर नहीं खड़े होंगे तो वो आपकी इज्जत सिर्फ आपके मुंह पर करेंगे। पीठ पीछे वो आपके फेलियर का इंतजार करेंगे। एक सच्चा स्ट्रेटेजिस्ट अपनी टीम का ढाल बनता है। जब मुश्किल आती है तो वो सबसे आगे खड़ा होता है और जब क्रेडिट लेने की बारी आती है तो वो अपनी टीम को आगे कर देता है। अगर आप सिर्फ एसी की हवा खाकर दुनिया जीतना चाहते हैं तो बधाई हो आप एक बहुत ही शानदार फेलियर की तरफ बढ़ रहे हैं। अपनी कुर्सी छोड़िए और मैदान में जाइये वरना आपकी स्ट्रेटेजी सिर्फ पेपर पर ही अच्छी लगेगी।
लेसन २ : टीम का जोश ही आपकी असली पावर है - हाई मोरल की ताकत
क्या आपको सच में लगता है कि सिर्फ भारी भरकम सैलरी देकर आप लोगों से वफादारी खरीद लेंगे। अगर ऐसा होता तो दुनिया की सबसे अमीर कंपनियाँ कभी डूबती ही नहीं। विलियम कोहेन साहब कहते हैं कि एक स्ट्रेटेजिस्ट का सबसे बड़ा हथियार उसकी टीम का हौसला होता है। अगर आपकी टीम का मोरल गिरा हुआ है तो समझ लीजिये कि आपकी जंग शुरू होने से पहले ही खत्म हो चुकी है। लोग आपके लिए काम नहीं करते बल्कि वो उस विजन के लिए काम करते हैं जो आप उन्हें दिखाते हैं। अगर उनके मन में डर है या उन्हें लगता है कि उनकी कोई वैल्यू नहीं है तो वो सिर्फ घड़ी देखेंगे कि कब शाम के छह बजें और वो इस जेल से बाहर निकलें।
मान लीजिये आपकी एक सॉफ्टवेयर कंपनी है और डेडलाइन सिर पर खड़ी है। आपकी टीम रात भर जागकर कोडिंग कर रही है। अब यहाँ दो तरह के बॉस हो सकते हैं। पहला वो जो रात को १० बजे फोन करके चिल्लाता है कि सुबह तक काम नहीं हुआ तो देख लेना। दूसरा वो जो चुपचाप ऑफिस पहुँचता है सबके लिए पिज्जा आर्डर करता है और खुद भी उनके साथ बैठकर छोटे-मोटे बग्स फिक्स करने में मदद करता है। अब आप खुद सोचिये कि टीम किसके लिए अपनी जान लगाएगी। पहले वाले के लिए वो सिर्फ काम खत्म करेंगे ताकि डांट न पड़े लेकिन दूसरे वाले के लिए वो बेहतरीन काम करेंगे क्योंकि उन्हें लग रहा है कि उनका लीडर उनके साथ खड़ा है। डर से आप काम करवा सकते हैं पर एक्सीलेंस नहीं ला सकते।
कई बार कंपनी में ऐसा माहौल होता है कि लोग एक दूसरे की टांग खींचने में लगे रहते हैं। इसे कहते हैं ऑफिस पॉलिटिक्स का कचरा। एक घटिया लीडर इस पॉलिटिक्स को बढ़ावा देता है क्योंकि उसे लगता है कि लोग आपस में लड़ेंगे तो उसे खतरा नहीं होगा। लेकिन एक असली स्ट्रेटेजिस्ट जानता है कि अगर घर के अंदर ही आग लगी होगी तो बाहर की दुनिया से क्या खाक लड़ेंगे। आपको अपनी टीम के बीच ऐसा भरोसा पैदा करना होगा कि उन्हें लगे कि वो एक परिवार का हिस्सा हैं। जब टीम को लगता है कि उनकी जीत में ही लीडर की जीत है तो वो पहाड़ भी हिला देते हैं। और अगर आप अब भी वही पुराने खड़ूस मैनेजर बने रहना चाहते हैं जो सिर्फ गलतियाँ ढूंढता है तो यकीन मानिए आपकी टीम आपकी कंपनी को डूबते हुए देखने के लिए सबसे पहले ताली बजाएगी।
लेसन ३ : फालतू की नौटंकी बंद करो और सीधे वार करो - सिंप्लिसिटी और फोकस
क्या आपने कभी उन लोगों को देखा है जो एक छोटा सा काम करने के लिए भी १० मीटिंग्स बुलाते हैं और ५० पन्नों की पीपीटी फाइल तैयार करते हैं। विलियम कोहेन साहब अपनी बुक में एक कड़वा सच बताते हैं कि जो स्ट्रेटेजी जितनी पेचीदा होती है उसके फेल होने के चांस उतने ही ज्यादा होते हैं। दुनिया के महान स्ट्रेटेजिस्ट कभी भी बातों को घुमाते नहीं थे। उनका प्लान इतना सिंपल होता था कि टीम का आखिरी बंदा भी उसे समझ सके। अगर आपकी स्ट्रेटेजी समझने के लिए किसी को डिक्शनरी खोलनी पड़ रही है या तीन दिन की ट्रेनिंग लेनी पड़ रही है तो समझ जाइये कि आप रास्ता भटक चुके हैं। असल समझदारी कम से कम मेहनत में ज्यादा से ज्यादा इम्पैक्ट पैदा करने में है।
मान लीजिए आपको शहर में एक नया जिम खोलना है। अब एक तरीका तो यह है कि आप भारी भरकम मार्केटिंग रिसर्च करें और यह देखें कि लोग जिम क्यों नहीं आते। आप ५०० पन्नों की रिपोर्ट बना लें कि लोगों को आलस आता है या उन्हें जिम के कपड़े पसंद नहीं हैं। दूसरा तरीका यह है कि आप सीधे उन लोगों के पास जाएं जो जिम जाना चाहते हैं और उन्हें सिर्फ एक ऐसी चीज दें जो आपका कॉम्पिटिटर नहीं दे रहा। जैसे कि फ्री पर्सनल ट्रेनिंग का पहला हफ्ता। अब यहाँ आपने क्या किया। आपने फालतू का रायता नहीं फैलाया बल्कि सीधे कस्टमर की नस पर हाथ रखा। सिंपल प्लान और सीधा एक्शन। लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि जब तक काम को मुश्किल न दिखाया जाए तब तक उनकी इज्जत नहीं होगी। भाई साहब कॉम्प्लिकेटेड होना स्मार्ट होने की निशानी नहीं बल्कि कन्फ्यूज होने की निशानी है।
स्ट्रेटेजी का मतलब यह नहीं है कि आप सब कुछ करने की कोशिश करें। इसका मतलब यह है कि आप क्या नहीं करेंगे। अगर आप एक साथ १० खरगोशों के पीछे भागेंगे तो हाथ में एक भी नहीं आएगा। एक असली लीडर अपने लक्ष्य को अर्जुन की तरह देखता है जिसे सिर्फ मछली की आंख दिखाई देती है। आपको यह पता होना चाहिए कि आपकी कंपनी की असली ताकत क्या है और उसी एक चीज पर अपनी पूरी जान लगा देनी चाहिए। बाकी सब कुछ सिर्फ शोर है। अगर आप शोर में खो गए तो जंग हारना तय है। इसलिए अपनी प्लानिंग को इतना साफ रखिए कि कोई बच्चा भी उसे समझ सके। याद रखिए कि असली पावर सादगी में है। अगर आप अब भी अपनी भारी भरकम फाइलों और मीटिंग्स के पीछे छिपे रहना चाहते हैं तो याद रखिएगा कि दुनिया उन्हीं को याद रखती है जिन्होंने रिजल्ट दिया न कि उन्हें जिन्होंने सिर्फ अच्छी प्रेजेंटेशन दी।
दोस्तों, जंग चाहे ऑफिस की हो या जिंदगी की। बिना सही दिमाग लगाए आप सिर्फ एक भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाएंगे। विलियम कोहेन की ये बातें सिर्फ एक बुक का हिस्सा नहीं बल्कि आपकी सक्सेस का रोडमैप हैं। आज ही फैसला कीजिये कि क्या आप एक थके हुए मैनेजर बने रहना चाहते हैं या एक विजनरी स्ट्रेटेजिस्ट। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जिसे लगता है कि सिर्फ मेहनत से ही सब कुछ हासिल होता है। कमेंट्स में बताएं कि इन ३ लेसन्स में से कौन सी बात आपके दिल को छू गई।
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