क्या आप भी उन महान मैनेजर्स में से हैं जो सोचते हैं कि एचआर का काम सिर्फ रंगोली बनाना और सैलरी काटना है? बधाई हो, आप अपनी कंपनी को डुबोने की रेस में सबसे आगे हैं। बिना स्ट्रेटजी के एचआर चलाना वैसा ही है जैसे बिना पेट्रोल के फरारी को धक्का मारना।
आज हम ब्रायन बेकर की मशहूर किताब द एचआर स्कोरकार्ड की समरी देखेंगे। यह आर्टिकल आपको सिखाएगा कि कैसे एचआर को कंपनी का असली पावर हाउस बनाना है ताकि आपका बिजनेस और करियर दोनों रॉकेट की तरह उड़ सकें। चलिए शुरू करते हैं।
Lesson : एचआर को एक कॉस्ट सेंटर नहीं, बल्कि वैल्यू क्रिएटर बनाना
ज्यादातर कंपनियों में एचआर डिपार्टमेंट की इज्जत उतनी ही होती है जितनी किसी शादी में दूर के फूफा की। लोग समझते हैं कि इनका काम बस दिवाली पर लड्डू बांटना, ऑफिस में रंगोली बनवाना और महीने के अंत में सैलरी स्लिप भेज देना है। अगर आप भी यही सोचते हैं, तो यकीन मानिए आप एक बहुत बड़ी गलतफहमी के शिकार हैं। ब्रायन बेकर अपनी किताब द एचआर स्कोरकार्ड में सबसे पहले इसी सोच पर हथौड़ा मारते हैं। वह कहते हैं कि एचआर कोई खर्चा यानी कॉस्ट सेंटर नहीं है, बल्कि यह एक वैल्यू क्रिएटर है। अब आप पूछेंगे कि भाई यह वैल्यू कैसे क्रिएट करता है?
मान लीजिए आपने एक बहुत ही महंगी क्रिकेट टीम खरीदी है। अब आप दुनिया के सबसे महंगे कोच को ले आए, सबसे बढ़िया बैट दिला दिए, लेकिन अगर खिलाड़ियों का तालमेल ही खराब है या उन्हें पता ही नहीं कि किस सिचुएशन में कैसे खेलना है, तो क्या आप मैच जीत पाएंगे? बिल्कुल नहीं। एचआर का काम भी वही है। यह सिर्फ लोगों को नौकरी पर रखना नहीं है, बल्कि उन्हें इस तरह से तैयार करना है कि वे कंपनी के गोल को अपना पर्सनल गोल समझने लगें।
अक्सर बॉस लोग एचआर को बस एक एडमिनिस्ट्रेटिव बोझ समझते हैं। उनको लगता है कि एचआर पर होने वाला हर रुपया बर्बाद जा रहा है। लेकिन असलियत यह है कि जब एचआर सही बंदे को सही जगह पर फिट करता है, तो कंपनी की प्रोडक्टिविटी अपने आप बढ़ जाती है। सरकज्म की बात तो यह है कि जब कंपनी घाटे में जाती है, तो सबसे पहले एचआर का बजट काटा जाता है, जबकि उस वक्त कंपनी को सबसे ज्यादा जरूरत एक स्ट्रॉन्ग टीम और अच्छे कल्चर की होती है। यह वैसा ही है जैसे आप बीमार हों और डॉक्टर के पास जाने के बजाय आप अपनी दवाइयों का बजट जीरो कर दें।
लेखक समझाते हैं कि एचआर को अपनी इमेज बदलनी होगी। उन्हें डेटा के साथ टेबल पर बैठना होगा। उन्हें यह साबित करना होगा कि अगर उन्होंने एक अच्छी ट्रेनिंग वर्कशॉप रखी है, तो उससे कंपनी के सेल्स टारगेट में कितना उछाल आया है। जब तक एचआर केवल भावनाओं और कागजों पर चलेगा, उसे खर्चा ही माना जाएगा। लेकिन जिस दिन एचआर यह दिखाने लगेगा कि उनके द्वारा चुने गए एम्प्लोयी ने कंपनी को करोड़ों का फायदा पहुंचाया है, उस दिन से एचआर कंपनी का असली हीरो बन जाएगा।
याद रखिए, एक अच्छी मशीन आप पैसे से खरीद सकते हैं, लेकिन उस मशीन को चलाने वाला जुनून सिर्फ एक बेहतरीन एचआर ही पैदा कर सकता है। अगर आपका एचआर डिपार्टमेंट सिर्फ फॉर्म भरवाने में बिजी है, तो समझ लीजिए कि आप अपनी पोटेंशियल वैल्यू को कचरे के डिब्बे में डाल रहे हैं। एचआर को स्ट्रेटजिक पार्टनर बनाइए, तभी बिजनेस में वह ग्रोथ आएगी जिसका आप सपना देखते हैं।
Lesson : एचआर मेट्रिक्स का बिजनेस आउटकम के साथ तालमेल
अगर मैं आपसे पूछूं कि आपकी कंपनी का एचआर कैसा काम कर रहा है, तो आपका जवाब क्या होगा? शायद आप कहेंगे कि वे बहुत अच्छे लोग हैं, टाइम पर ऑफिस आते हैं और सबकी बातें सुनते हैं। लेकिन ब्रायन बेकर कहते हैं कि भाई, यह कोई किटी पार्टी नहीं चल रही है। बिजनेस में "अच्छे होने" के नंबर नहीं मिलते, नंबर मिलते हैं "रिजल्ट" के। लेसन 02 हमें सिखाता है कि एचआर की हर एक्टिविटी का सीधा नाता कंपनी के मुनाफे से होना चाहिए।
मान लीजिए आप जिम जाते हैं। अब आप वहां जाकर रोज दो घंटे सेल्फी लेते हैं, नए जिम कपड़े पहनते हैं और सबको "हेलो" बोलते हैं। क्या इससे आपकी बॉडी बनेगी? बिल्कुल नहीं। बॉडी तब बनेगी जब आप वजन उठाएंगे और अपनी डाइट ट्रैक करेंगे। ठीक इसी तरह, एचआर में सिर्फ यह देखना कि "कितने लोगों ने इंटरव्यू दिया" या "कितने लोग पिकनिक पर गए", बिल्कुल वैसा ही है जैसे जिम में सेल्फी लेना। असली मेट्रिक्स तो यह है कि जो ट्रेनिंग आपने स्टाफ को दी, क्या उससे कस्टमर की शिकायतें कम हुईं? क्या उस ट्रेनिंग के बाद सेल की क्लोजिंग रेट बढ़ी?
अक्सर एचआर डिपार्टमेंट अपनी रिपोर्ट में बड़ी-बड़ी बातें लिखते हैं जैसे "एम्प्लोयी सेटिस्फैक्शन 90% है"। सुनने में तो यह बहुत कूल लगता है, लेकिन सरकज्म देखिए, अगर आपके एम्प्लोयी ऑफिस में फ्री का वाईफाई और कॉफी पीकर बहुत खुश हैं लेकिन कंपनी का रेवेन्यू गिर रहा है, तो उस सेटिस्फैक्शन का क्या अचार डालेंगे? लेखक कहते हैं कि एचआर को ऐसे मेट्रिक्स पकड़ने होंगे जो सीधे सीईओ की बैलेंस शीट पर असर डालें।
सच्चाई तो यह है कि डेटा झूठ नहीं बोलता, बस उसे सही तरह से पढ़ना आना चाहिए। अगर आपका टैलेंट एक्विजिशन प्रोसेस इतना धीमा है कि बेस्ट कैंडिडेट किसी दूसरी कंपनी में चला जाता है, तो यह आपकी स्ट्रेटजी की हार है। आपको यह मापना होगा कि एक नया एम्प्लोयी कंपनी में आने के कितने दिन बाद अपनी सैलरी के बराबर काम करके देने लगता है। जब आप नंबर्स की भाषा में बात करना शुरू करते हैं, तभी मैनेजमेंट आपकी बात सीरियसली लेता है।
बिना डेटा के एचआर वैसा ही है जैसे अंधेरे कमरे में काली बिल्ली ढूंढना जो वहां है ही नहीं। आपको यह समझना होगा कि हर हायरिंग, हर रिवार्ड और हर पॉलिसी एक इन्वेस्टमेंट है। और इन्वेस्टमेंट का मतलब है रिटर्न। अगर आप सिर्फ रैंडम फैसले ले रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि सब ठीक हो जाएगा, तो आप बिजनेस नहीं बल्कि जुआ खेल रहे हैं। इसलिए, एचआर को इमोशन्स से बाहर निकलकर इकोनॉमिक्स पर ध्यान देना होगा। जब एचआर मेट्रिक्स और बिजनेस आउटकम का मेल होता है, तभी कंपनी एक अजेय ताकत बनती है।
Lesson : एचआर आर्किटेक्चर का निर्माण
अब तक आपने समझ लिया कि एचआर कोई खर्चा नहीं है और डेटा ही भगवान है। लेकिन सवाल यह है कि यह सब होगा कैसे? इसका जवाब है एक सॉलिड "एचआर आर्किटेक्चर"। जैसे एक मजबूत बिल्डिंग बनाने के लिए सिर्फ ईंट और सीमेंट काफी नहीं होते, बल्कि एक तगड़ा नक्शा चाहिए होता है, वैसे ही एक कामयाब कंपनी के लिए एचआर का एक ऐसा सिस्टम चाहिए जो सीधा बिजनेस स्ट्रेटजी से जुड़ा हो।
सोचिए एक घर है जहाँ मम्मी चाहती हैं कि बच्चा डॉक्टर बने, पापा चाहते हैं कि वो बिजनेस संभाले और दादाजी चाहते हैं कि वो खेती करे। अब उस बेचारे बच्चे का हाल क्या होगा? वो कंफ्यूज होकर रील बनाना शुरू कर देगा। ठीक यही हाल उन कंपनियों का होता है जहाँ सेल्स टीम कुछ और कह रही है और एचआर कुछ और ही लोगों को भर्ती कर रहा है। एचआर आर्किटेक्चर का काम है सबको एक ही सुर में लाना।
ब्रायन बेकर कहते हैं कि अगर आपकी कंपनी का गोल "बेस्ट कस्टमर सर्विस" देना है, तो आपका एचआर आर्किटेक्चर भी वैसा ही होना चाहिए। यानी आपको ऐसे लोग ढूंढने होंगे जो बात करने में माहिर हों, न कि ऐसे जो सिर्फ कोडिंग में एक्सपर्ट हों। आपको उन्हें रिवॉर्ड भी उसी आधार पर देना होगा। अक्सर लोग गलती यह करते हैं कि वे चाहते तो हैं कि टीम मिलकर काम करे (टीम वर्क), लेकिन बोनस सिर्फ उस एक बंदे को देते हैं जिसने सबसे ज्यादा शोर मचाया। यह तो वही बात हुई कि आप अपनी कार को तेज भगाना चाहते हैं लेकिन ब्रेक पर पैर रखकर एक्सीलरेटर दबा रहे हैं।
एक सही एचआर आर्किटेक्चर कंपनी के कल्चर को एक सांचे में ढालता है। यह सिर्फ नियम बनाने के बारे में नहीं है, बल्कि यह तय करने के बारे में है कि जब बॉस कमरे में न हो, तब एम्प्लोयी कैसा व्यवहार करते हैं। अगर आपके सिस्टम में ट्रांसपेरेंसी और ग्रोथ का स्कोप नहीं है, तो आपके बेस्ट एम्प्लोयी आपको "टा-टा बाय-बाय" कहने में देर नहीं लगाएंगे। सरकज्म तो देखिए, कई कंपनियां लाखों रुपये ब्रांडिंग पर खर्च करती हैं ताकि वे "बेस्ट प्लेस टू वर्क" दिख सकें, लेकिन अंदर का सिस्टम इतना सड़ा हुआ होता है कि नया जॉइन करने वाला बंदा तीसरे दिन ही इस्तीफा लिखने लगता है।
यह समझ लीजिए कि एक महान आर्किटेक्चर रातों-रात नहीं बनता। इसके लिए एचआर मैनेजर्स को ऑफिस की गप्पों से बाहर निकलकर बोर्डरूम की स्ट्रेटजी का हिस्सा बनना पड़ेगा। जब आपका हायरिंग प्रोसेस, आपकी ट्रेनिंग, आपका परफॉरमेंस रिव्यु और आपका कल्चर एक ही लाइन में होंगे, तभी आप उस "एचआर स्कोरकार्ड" को हासिल कर पाएंगे जो आपकी कंपनी को मार्केट का लीडर बनाएगा।
तो दोस्तों, एचआर का मतलब सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि इंसानियत और बिजनेस का सही मेल है। अगर आप एक लीडर हैं या एचआर प्रोफेशनल हैं, तो आज खुद से एक सवाल पूछिए: क्या आप अपनी टीम को सिर्फ मैनेज कर रहे हैं या उन्हें जीत की तरफ लीड कर रहे हैं? वक्त आ गया है कि हम पुरानी घिसी-पिटी सोच को छोड़ें और "द एचआर स्कोरकार्ड" की फिलॉसफी को अपनाएं। अपनी टीम में इन्वेस्ट कीजिए, क्योंकि मशीनें काम आसान कर सकती हैं, लेकिन विजन को हकीकत में सिर्फ इंसान ही बदल सकते हैं।
अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप अपनी कंपनी में बदलाव लाना चाहते हैं, तो इसे अपने एचआर टीम और बॉस के साथ शेयर करें। चलिए, मिलकर एक ऐसा वर्क कल्चर बनाते हैं जहाँ काम करना बोझ नहीं, बल्कि एक गर्व की बात हो। नीचे कमेंट में बताएं कि आपके ऑफिस का सबसे बड़ा एचआर चैलेंज क्या है?
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