The Inmates Are Running the Asylum (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो एक नया गैजेट या ऐप चलाकर खुद को दुनिया का सबसे बड़ा गधा समझने लगते हैं? बधाई हो, आप पागल नहीं हैं, बल्कि ये हाई टेक दुनिया के इनमेट्स यानी पागल खुद अस्पताल चला रहे हैं। अपनी कीमती अक्ल और समय इन कचरा प्रोडक्ट्स पर बर्बाद करना बंद कीजिये।

एलन कूपर की इस महान किताब द इनमेट्स आर रनिंग द असाइलम के जरिए हम समझेंगे कि क्यों मॉडर्न टेक्नोलॉजी हमारे दिमाग का दही कर रही है और कैसे हम इन ३ बड़े लेसन्स से अपनी मानसिक शांति वापस पा सकते हैं।


Lesson : कॉग्निटिव फ्रिक्शन - जब गैजेट्स आपके दिमाग का दही कर देते हैं

क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि आपने एक नया माइक्रोवेव खरीदा और उसे चलाने के लिए आपको नासा के साइंटिस्ट जैसा दिमाग लगाना पड़ा? या फिर किसी नए ऐप में बस एक फोटो सेव करने के चक्कर में आपने अपने जीवन के कीमती १५ मिनट गँवा दिए? एलन कूपर इसे कहते हैं कॉग्निटिव फ्रिक्शन। सरल भाषा में कहें तो यह वह मानसिक रगड़ या घर्षण है जो तब पैदा होता है जब किसी मशीन का इंटरफेस आपकी नेचुरल सोच के साथ कुश्ती लड़ने लगता है।

सोचिये आप एक लिफ्ट में घुसे और वहां बटन की जगह एक कंप्यूटर कीबोर्ड लगा हो जिस पर आपको अपनी मंजिल का फ्लोर नंबर टाइप करके एंटर दबाना पड़े। कैसा लगेगा? गुस्सा आएगा न? यही हाल आज के ज्यादातर हाई टेक प्रोडक्ट्स का है। बनाने वाले को लगता है कि उसने बहुत कूल फीचर दे दिया है पर असल में उसने यूजर के दिमाग पर एक एक्स्ट्रा बोझ डाल दिया है। कूपर साहब बड़े प्यार से समझाते हैं कि कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर इंसानों की मदद के लिए बने थे न कि उन्हें सर्कस का बंदर बनाने के लिए।

इंसानी दिमाग एक समय में एक ही पेचीदा काम पर फोकस कर सकता है। लेकिन जब एक वाशिंग मशीन में भी ४० अलग-अलग मोड और एलसीडी स्क्रीन आ जाती है तो बेचारा आम आदमी बस यही सोचता रहता है कि भाई मुझे बस कपड़े धोने थे मुझे कोई स्पेस शटल नहीं उड़ाना है। यह फ्रिक्शन तब बढ़ता है जब डिजाइनर्स को लगता है कि ज्यादा फीचर्स मतलब बेहतर प्रोडक्ट। यह वैसी ही बात हुई कि आप एक साइकिल खरीदें और दुकानदार कहे कि इसमें हमने हवाई जहाज का इंजन और नाव का चप्पू भी फिट कर दिया है। अब आप उसे चलाएंगे कैसे?

सच्चाई तो यह है कि जब भी हमें कोई नया गैजेट चलाने के लिए मैन्युअल पढ़ना पड़ता है तो समझ लीजिये कि उस प्रोडक्ट का डिजाइन फेल हो चुका है। असली इंटेलिजेंस इसमें नहीं है कि आप कितनी कॉम्प्लेक्स चीज बना सकते हैं बल्कि इसमें है कि आप कितनी जटिल चीज को कितना सरल बना सकते हैं। अगर यूजर को अपना काम करने के लिए मशीन की भाषा सीखनी पड़ रही है तो मालिक मशीन है और गुलाम आप।

हमें यह समझना होगा कि हमारा दिमाग कोई हार्ड ड्राइव नहीं है जिसे फालतू के स्टेप्स याद रखने में खर्च किया जाए। एक अच्छा प्रोडक्ट वह है जो आपके इरादे को समझे और बिना किसी ड्रामे के उसे पूरा कर दे। अगर किसी ऐप को यूज करते वक्त आपको अपनी अक्ल पर शक होने लगे तो यकीन मानिए गलती आपकी नहीं बल्कि उस इनमेट यानी उस पागल डिजाइनर की है जिसने उसे बनाया है।


Lesson : प्रोग्रामर का माइंडसेट बनाम यूजर का माइंडसेट - पागलखाना आखिर कौन चला रहा है?

कल्पना कीजिये कि आप एक रेस्टोरेंट में जाते हैं और वेटर से कहते हैं कि मुझे एक कड़क चाय चाहिए। वेटर किचन में जाता है और वहां से चाय की पत्ती, चीनी, दूध और पानी के अलग-अलग डब्बे लाकर आपके सामने रख देता है। फिर वो आपसे पूछता है कि सर, अब आप बताइये कि पहले पानी उबालूँ या दूध डालूँ? बटन ए दबाऊँ या स्विच बी? आप कहेंगे भाई, मुझे चाय पीनी है, मुझे चाय बनाने की इंजीनियरिंग नहीं सीखनी। बस यही सबसे बड़ा पंगा है जिसे एलन कूपर इनमेट्स यानी उन पागलों की समस्या कहते हैं जो इस टेक की दुनिया का अस्पताल चला रहे हैं।

यहाँ पागल से मतलब उन ब्रिलियंट लेकिन जिद्दी प्रोग्रामर्स से है जिन्हें लगता है कि दुनिया के हर इंसान को कोड और लॉजिक समझ आना चाहिए। प्रोग्रामर का दिमाग चलता है कैसे काम करेगा (How it works) पर, जबकि एक आम यूजर का दिमाग चलता है क्या काम होगा (What it does) पर। प्रोग्रामर्स को हर चीज कंट्रोल में चाहिए होती है, उन्हें हर मुमकिन फीचर वहां दिखाना होता है। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने यूजर को ५० ऑप्शन नहीं दिए तो वो यूजर का अपमान कर रहे हैं। लेकिन सच तो ये है कि आम इंसान को उन ५० ऑप्शंस की जगह बस एक बड़ा और साफ स्टार्ट बटन चाहिए होता है।

एक प्रोग्रामर के लिए सॉफ्टवेयर एक पहेली की तरह है जिसे सुलझाने में उसे मजा आता है। लेकिन एक यूजर के लिए सॉफ्टवेयर एक हथौड़ा है जिससे उसे अपनी दीवार पर कील ठोकनी है। अब अगर आप हथौड़े में भी सेटिंग्स और कॉन्फ़िगरेशन मेनू डाल देंगे, तो वो बेचारा अपनी उंगली ही फोड़ेगा ना? कूपर साहब कहते हैं कि जब प्रोग्रामर्स ही डिजाइन तय करने लगते हैं, तो नतीजा एक ऐसा प्रोडक्ट होता है जो अंदर से तो बहुत पावरफुल है, पर बाहर से देखने में किसी एलियन की भाषा जैसा लगता है।

दिक्कत तब आती है जब ये टेक एक्सपर्ट्स मान लेते हैं कि अगर यूजर को समझ नहीं आ रहा, तो यूजर ही बुद्धू है। अरे भाई, अगर मुझे अपनी फोटो एडिट करने के लिए पीएचडी (PhD) करनी पड़ रही है, तो गलती मेरी नहीं, उस सॉफ्टवेयर के बाप की है। प्रोग्रामर्स अक्सर एज केसेस (Edge Cases) के पीछे भागते हैं—यानी वो चीजें जो शायद साल में एक बार हों। उनके चक्कर में वो रोज इस्तेमाल होने वाले फीचर्स को भी पेचीदा बना देते हैं।

यही वजह है कि हमारे फोन और लैपटॉप्स में आधे से ज्यादा फीचर्स ऐसे होते हैं जिन्हें हम कभी छूते भी नहीं, लेकिन वो हमारी स्क्रीन पर कचरे की तरह पड़े रहते हैं। कूपर का कहना है कि डिजाइन का कंट्रोल इन टेक गुरुओं के हाथ से छीनकर उन लोगों को देना होगा जो इंसानी बर्ताव को समझते हैं। जब तक बनाने वाला यह नहीं समझेगा कि सामने वाला इंसान है मशीन नहीं, तब तक हम ऐसे ही बेमतलब के ऑप्शंस के बीच सर पटकते रहेंगे। याद रखिये, असली जीनियस वो है जो बैकएंड की सारी गंदगी खुद झेल ले और यूजर को सिर्फ एक चमकता हुआ और आसान अनुभव दे।


Lesson : पर्सोना का जादू - हर किसी को खुश करने का लालच छोड़िये

क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया का सबसे बेकार जूता कौन सा होगा? वो जूता जो हर किसी को फिट आ जाए! बच्चा पहने तो भी सही, पहलवान पहने तो भी सही और दादी जी पहनें तो भी सही। जाहिर है, ऐसा जूता किसी को भी ठीक से फिट नहीं आएगा और सबके पैरों में छाले डाल देगा। एलन कूपर कहते हैं कि सॉफ्टवेयर और गैजेट्स के साथ भी हम यही गलती करते हैं। हम एक ऐसा प्रोडक्ट बनाना चाहते हैं जो नासा के इंजीनियर से लेकर चाय की दुकान वाले चाचा तक सबको पसंद आए। नतीजा? वो किसी को भी समझ नहीं आता।

यहीं पर काम आता है एलन कूपर का सबसे बड़ा हथियार—पर्सोना (Personas)। पर्सोना का मतलब है एक इमेजिनरी या काल्पनिक यूजर की प्रोफाइल बनाना। मान लीजिये आप एक बैंकिंग ऐप बना रहे हैं। अब आप 'सबके लिए' डिजाइन करने की जगह एक काल्पनिक इंसान बनाइये, जैसे रमेश बाबू। रमेश ५५ साल के हैं, उन्हें चश्मा लगता है, और उन्हें बस अपनी पेंशन चेक करनी है और बिजली का बिल भरना है। अब जब भी आप ऐप में कोई नया बटन जोड़ें, तो खुद से पूछिये—क्या रमेश बाबू को यह समझ आएगा? क्या उन्हें इस ३डी एनिमेशन वाले मेनू की जरूरत है?

जवाब अक्सर 'नहीं' होगा। हम असल में इलास्टिक यूजर (Elastic User) के जाल में फंस जाते हैं। मीटिंग में जब बॉस कहता है कि हमें एक्सपर्ट्स के लिए ये फीचर चाहिए, तो हम उसे डाल देते हैं। फिर जब मार्केटिंग वाला कहता है कि बिगिनर्स के लिए ये आसान होना चाहिए, तो हम उसे भी घुसा देते हैं। इस चक्कर में प्रोडक्ट रबर की तरह खिंच जाता है और अपनी असली पहचान खो देता है। कूपर साहब बड़े मजे से समझाते हैं कि अगर आप सबको खुश करने की कोशिश करेंगे, तो आप किसी को भी खुश नहीं कर पाएंगे।

सोचिये आप एक ऐसी कार चला रहे हैं जिसमें रेसिंग कार का स्टीयरिंग है, ट्रक का गियर है और स्कूटर की ब्रेक है। क्या आप उसे चला पाएंगे? नहीं, आप बस एक्सीडेंट का इन्तजार करेंगे। यही हाल हमारे डिजिटल प्रोडक्ट्स का है। हमें यह तय करना होगा कि हमारा 'प्राइमरी पर्सोना' कौन है। अगर आपने उस एक इंसान का काम आसान कर दिया, तो बाकी लोग अपने आप रास्ता ढूंढ लेंगे।

पर्सोना बनाना सिर्फ एक कागजी काम नहीं है, यह एक माइंडसेट है। यह हमें सिखाता है कि डिजाइन करते वक्त अपनी ईगो को साइड में रखें। प्रोग्रामर्स को लगता है कि 'मैं इसे यूज कर सकता हूँ तो सब कर सकते हैं'। भाई, आप तो सुबह नाश्ते में कोड खाते हैं, आम इंसान को तो बस अपनी फाइल सेव करनी है!

तो अगली बार जब आप कुछ भी नया बनाएं या किसी प्रोडक्ट को जज करें, तो देखिये कि क्या वो किसी खास इंसान की जिंदगी आसान कर रहा है या बस फीचर्स का कबाड़खाना है। टेक का मकसद इंसानी काबिलियत को बढ़ाना है, उसे नीचा दिखाना नहीं। अगर हम इन ३ लेसन्स को अपनी लाइफ और काम में उतार लें, तो हम उस पागलखाने से बाहर निकल सकते हैं जहाँ इनमेट्स राज कर रहे हैं।


आज की इस हाई टेक भागदौड़ में हम मशीनों के गुलाम बन गए हैं। पर याद रखिये, मशीनें हमारे लिए बनी हैं, हम उनके लिए नहीं। एलन कूपर की ये बातें हमें याद दिलाती हैं कि सादगी (Simplicity) ही असली पावर है। अपनी अक्ल पर शक करना बंद कीजिये और उन प्रोडक्ट्स की डिमांड कीजिये जो आपकी इज्जत करें।

क्या आपने भी कभी किसी ऐप या वेबसाइट को यूज करते वक्त अपना सिर पकड़ा है? क्या आपको भी लगता है कि मॉडर्न गैजेट्स जरूरत से ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड हो गए हैं? कमेंट्स में अपना वो 'पागल कर देने वाला' अनुभव जरूर शेयर करें। इस आर्टिकल को अपने उस डेवलपर या डिजाइनर दोस्त को भेजें जो फीचर्स के नाम पर कचरा परोस रहा है! चलिए साथ मिलकर इस डिजिटल दुनिया को थोड़ा और समझदार बनाते हैं।

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