The Eprocess Edge (Hindi)


अगर आप अभी भी पुराने जमाने के बिजनेस घिसे पिटे तरीकों से कस्टमर चिपकाने की सोच रहे हैं तो मुबारक हो आप बहुत जल्द मार्केट से गायब होने वाले हैं। इंटरनेट के दौर में बिना ईप्रोसेस समझे बिजनेस चलाना मतलब बिना हेलमेट के पहाड़ से कूदना है।

चलिए जानते हैं कि कैसे आप इस डिजिटल रेस में पीछे न छूटें और इस किताब के तीन जबरदस्त लेसन्स के जरिए अपने बिजनेस को एक नई ऊंचाइयों पर ले जाएं।


Lesson : प्रोसेस ही असली प्रोडक्ट है

आज के जमाने में अगर आप यह सोच रहे हैं कि सिर्फ एक बढ़िया सामान बना देने से आपका काम खत्म हो गया तो भाई साहब आप अभी भी नब्बे के दशक में जी रहे हैं। पीटर कीन और मार्क मैकडोनाल्ड अपनी किताब द ईप्रोसेस एज में बहुत साफ कहते हैं कि इंटरनेट के इस दौर में आपका प्रोडक्ट क्या है इससे कहीं ज्यादा जरूरी यह है कि आप उसे कस्टमर तक कैसे पहुंचाते हैं। आसान भाषा में कहें तो आपका प्रोसेस ही आपका असली हीरो है।

मान लीजिए आपने एक बहुत शानदार और महंगा स्मार्टफोन ऑर्डर किया। फोन तो जबरदस्त है लेकिन जिस वेबसाइट से आपने मंगाया उसका प्रोसेस इतना घटिया है कि पेमेंट करने के बाद दस दिन तक कोई अता पता नहीं है। फिर जब डिब्बा आता है तो वह फटा हुआ निकलता है और कस्टमर केयर वाले आपकी बात ऐसे सुनते हैं जैसे आप उनसे उधार मांग रहे हों। क्या आप दोबारा वहां से फोन लेंगे। बिल्कुल नहीं। भले ही फोन दुनिया का बेस्ट हो लेकिन उस घटिया प्रोसेस ने आपके दिमाग में उस ब्रांड की धज्जियां उड़ा दी हैं।

वहीं दूसरी तरफ एक ऐसी कंपनी है जिसका प्रोडक्ट शायद थोड़ा सा साधारण हो लेकिन उनका ईप्रोसेस मक्खन जैसा स्मूद है। दो क्लिक में ऑर्डर और अगले ही दिन डिलीवरी। बीच बीच में आपको अपडेट्स मिलते रहते हैं और अगर कोई दिक्कत आए तो वे तुरंत उसे सुलझा देते हैं। यहाँ असली प्रोडक्ट वह सामान नहीं बल्कि वह पूरा एक्सपीरियंस है जो उस प्रोसेस ने आपको दिया।

इंटरनेट ने कस्टमर को बहुत ज्यादा ऑप्शंस दे दिए हैं। अब वह सिर्फ चीज खरीदने नहीं बल्कि सुकून खरीदने आता है। अगर आपकी वेबसाइट का चेकआउट प्रोसेस किसी सरकारी दफ्तर की फाइलों जैसा उलझा हुआ है जहाँ यूजर को दस बार अपनी डिटेल्स भरनी पड़ें तो यकीन मानिए वह पंद्रह सेकंड के अंदर आपकी साइट छोड़कर कॉम्पिटिटर के पास चला जाएगा। इंटरनेट एरा में स्पीड और सुविधा ही सबसे बड़ी करेंसी है।

बिजनेस में वेल्थ बनाने का सबसे बड़ा सीक्रेट यही है कि आप अपने इंटरनल और एक्सटर्नल प्रोसेस को इतना ऑटोमेटेड और आसान बना दें कि कस्टमर को लगे कि वह कोई जादुई दुनिया में आ गया है। ईप्रोसेस का मतलब सिर्फ सॉफ्टवेयर डालना नहीं है बल्कि हर उस रुकावट को हटाना है जो कस्टमर और आपके प्रोडक्ट के बीच खड़ी है। याद रखिए आपका प्रोसेस ही आपकी पहचान है। अगर प्रोसेस ढीला है तो कस्टमर भी आपसे दूर रहने का ही फैसला करेगा।


Lesson : रिलेशनशिप ओवर ट्रांजेक्शन

अगर आप अपने कस्टमर को सिर्फ एक चलता फिरता एटीएम समझते हैं जिससे बस एक बार पैसे निकलवाने हैं, तो भाई साहब आपका बिजनेस मॉडल किसी पुराने जमाने की खटारा गाड़ी जैसा है जो कभी भी बीच रस्ते में दम तोड़ सकती है। पीटर कीन और मार्क मैकडोनाल्ड अपनी किताब द ईप्रोसेस एज में बार बार यह जोर देते हैं कि इंटरनेट के इस शोर शराबे वाले दौर में असली पैसा ट्रांजेक्शन में नहीं बल्कि रिलेशनशिप में है। मतलब यह कि सामान एक बार बेचना बहादुरी नहीं है, बल्कि उस बंदे को बार बार अपनी दुकान पर वापस लाना असली खिलाड़ी की पहचान है।

जरा सोचिए आप किसी पड़ोस की किराने वाली दुकान पर जाते हैं। वहां का अंकल आपको नाम से पहचानता है और बिना पूछे ही आपकी पसंद की चाय पत्ती निकाल कर रख देता है। अब भले ही बड़े मॉल में पांच रुपये की छूट मिल रही हो, लेकिन आप उस अंकल के पास ही जाएंगे क्योंकि वहां एक रिश्ता है, एक भरोसा है। इंटरनेट एरा में ईप्रोसेस का काम यही भरोसा डिजिटल लेवल पर पैदा करना है। आज के समय में डेटा ही वह जरिया है जिससे आप अपने कस्टमर के मन की बात जान सकते हैं।

मान लीजिए आपने एक ऑनलाइन स्टोर से जिम का सामान मंगवाया। अब अगर वह स्टोर आपको अगले महीने प्रोटीन पाउडर पर डिस्काउंट का मेल भेजता है या वर्कआउट करने के सही तरीके बताता है, तो आपको लगेगा कि यह कंपनी सिर्फ मेरा पैसा नहीं चाहती बल्कि मेरी सेहत का भी ख्याल रखती है। लेकिन अगर वही स्टोर आपको साड़ी या बच्चों के खिलौनों के विज्ञापन भेजने लगे, तो आप कहेंगे कि क्या भाई साहब होश में तो हो। यहाँ ईप्रोसेस फेल हो गया क्योंकि उसने आपको एक इंसान नहीं बल्कि सिर्फ एक नंबर समझा।

इंटरनेट ने कस्टमर को बहुत ताकतवर बना दिया है। उसके पास एक लाख और ऑप्शंस हैं। अगर आपका प्रोसेस उसे खास महसूस नहीं कराता, तो वह एक सेकंड में अनसब्सक्राइब का बटन दबा देगा। असलियत यह है कि एक नए कस्टमर को ढूंढना पुराने कस्टमर को रोके रखने से पांच गुना ज्यादा महंगा पड़ता है। तो क्यों न अपने डिजिटल प्रोसेस को ऐसा बनाया जाए कि कस्टमर को लगे कि आप उसके पर्सनल असिस्टेंट हैं।

बिजनेस वेल्थ तभी बनती है जब आपके पास ऐसे वफादार फैंस हों जो आपके प्रोडक्ट की तारीफ खुद जाकर चार लोगों से करें। और यह वफादारी सिर्फ इंटरनेट पर डिस्काउंट देने से नहीं आती, बल्कि हर उस टच पॉइंट पर आती है जहाँ आप कस्टमर की मदद करते हैं, उसकी परेशानी समझते हैं और उसे यह एहसास दिलाते हैं कि वह आपके लिए कीमती है। अगर आपका ईप्रोसेस सिर्फ पेमेंट गेटवे तक सीमित है, तो आप एक बहुत बड़ी अपॉर्चुनिटी मिस कर रहे हैं। याद रखिए, ट्रांजेक्शन से घर चलता है, लेकिन रिलेशनशिप से एम्पायर खड़ा होता है।


Lesson : स्पीड और एफिशिएंसी का तालमेल

अगर आपको लगता है कि सिर्फ एक चमचमाती वेबसाइट बना लेना ही डिजिटल इंडिया में क्रांति लाना है, तो भाई साहब आप गलतफहमी के शिकार हैं। पीटर कीन और मार्क मैकडोनाल्ड अपनी किताब द ईप्रोसेस एज में एक कड़वा सच बताते हैं कि अगर आपका बैकएंड प्रोसेस बैलगाड़ी की रफ़्तार से चल रहा है, तो आपकी फ्रंटएंड वेबसाइट चाहे जितनी भी रॉकेट जैसी दिखे, आपका बिजनेस डूबना तय है। आज के इंटरनेट एरा में कस्टमर को 'अभी के अभी' सब कुछ चाहिए। अगर आप उसे इंतजार करवा रहे हैं, तो समझ लीजिए आप उसे अपने कॉम्पिटिटर की गोद में बिठा रहे हैं।

कल्पना कीजिए आपने एक ऑनलाइन फूड ऐप से पिज्जा ऑर्डर किया। ऐप पर तो बड़े सुंदर ग्राफिक्स दिख रहे हैं, लेकिन अंदर का प्रोसेस इतना सड़ा हुआ है कि रेस्टोरेंट को आपका ऑर्डर ही पंद्रह मिनट बाद पता चलता है। फिर डिलीवरी बॉय रास्ता भटक जाता है क्योंकि आपके ईप्रोसेस ने उसे सही लोकेशन ही नहीं भेजी। जब तक पिज्जा आपके घर पहुंचता है, तब तक वह इतना ठंडा हो चुका होता है कि आप उसे खाएं या उससे क्रिकेट खेलें, समझ नहीं आता। यहाँ कमी पिज्जा में नहीं थी, कमी उस प्रोसेस की स्पीड और तालमेल में थी।

इंटरनेट पर बिजनेस करने का मतलब सिर्फ ऑनलाइन होना नहीं है, बल्कि अपने हर छोटे-बड़े काम को इतना तेज करना है कि गलती की गुंजाइश खत्म हो जाए। चाहे वो इन्वेंट्री मैनेजमेंट हो, कस्टमर की शिकायत का जवाब देना हो या पेमेंट रिफंड करना हो। अगर आपका रिफंड आने में सात जन्म लग रहे हैं, तो कस्टमर अगली बार आपकी साइट का नाम सुनकर ही कान पकड़ लेगा। एफिशिएंसी का मतलब यह नहीं कि आप बस काम निपटा रहे हैं, बल्कि यह है कि आप कम से कम मेहनत और समय में बेस्ट रिजल्ट दे रहे हैं।

आजकल के स्टार्टअप्स की सबसे बड़ी बीमारी यही है कि वे दिखावे पर करोड़ों खर्च करते हैं लेकिन अपने इंटरनल सिस्टम को अपडेट करना भूल जाते हैं। एक स्मार्ट बिजनेसमैन वही है जो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके अपनी टीम की प्रोडक्टिविटी बढ़ाता है और फालतू के कागजी कामों को डिजिटल कचरे के डिब्बे में डाल देता है। याद रखिए, इंटरनेट की दुनिया में जो रुक गया, वो समझो बिक गया।

तो दोस्तों, अगर आप भी चाहते हैं कि आपका बिजनेस सिर्फ चले नहीं बल्कि सरपट दौड़े, तो अपने ईप्रोसेस को आज ही धार दीजिए। कस्टमर को वैल्यू दीजिए, उसके साथ एक सच्चा रिश्ता बनाइए और अपनी स्पीड को अपनी ताकत बनाइए। वेल्थ बनाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है, बस सही प्रोसेस का सही समय पर इस्तेमाल करना है। उठिए, बदलिए और इस डिजिटल क्रांति का हिस्सा बनिए वरना इतिहास के पन्नों में सिर्फ एक नाम बनकर रह जाएंगे।

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