आप अपनी कंपनी के सबसे बड़े एक्सपर्ट हैं और यही आपकी सबसे बड़ी प्रॉब्लम है। मुबारक हो, आपका सालों का तजुर्बा आपकी क्रिएटिविटी का गला घोंट रहा है और आपको पता भी नहीं। जब दुनिया बदल रही है, आप पुराने घिसे-पिटे आइडियाज को ही इनोवेशन समझ कर खुश हो रहे हैं। यह आर्टिकल पढ़ लो, वरना कल कोई नौसिखिया आकर आपका धंधा समेट ले जाएगा और आप बस अपनी डिग्री देखते रह जाएंगे।
आज हम सिंथिया राबे की किताब द इनोवेशन किलर की मदद से समझेंगे कि कैसे आपकी स्मार्टनेस ही आपकी सोच को लिमिट कर रही है। चलिए जानते हैं वो ३ बड़े लेसन जो आपकी विजन को पूरी तरह बदल देंगे।
लेसन १ : द कर्स ऑफ एक्सपर्टीज़ - जब आपका तजुर्बा ही आपकी बेड़ियाँ बन जाता है
मान लीजिए आप एक ऐसे इंसान हैं जिसे अपनी फील्ड का चप्पा चप्पा पता है। आपने सालों तक घिसकर वो पोजीशन हासिल की है जहाँ लोग आपसे सलाह लेने आते हैं। अब सच सुनिए जो थोड़ा कड़वा लग सकता है। सिंथिया राबे कहती हैं कि यही एक्सपर्टीज़ आपकी सबसे बड़ी दुश्मन है। जब आप किसी काम को दस साल से एक ही तरीके से कर रहे होते हैं, तो आपका दिमाग एक लोहे के पिंजरे में कैद हो जाता है। आप नए आइडियाज को नहीं देखते, आप सिर्फ वही देखते हैं जो आपने पहले देखा है। आप उस पुराने अंकल की तरह बन जाते हैं जो हर नई बात पर कहते हैं कि बेटा हमने धूप में बाल सफेद नहीं किए हैं। लेकिन असलियत यह है कि उन सफेद बालों के नीचे जो दिमाग है, वो अब नई संभावनाओं के लिए बंद हो चुका है।
सोचिए एक बड़ी साबुन बनाने वाली कंपनी है। उनके पास दुनिया भर के पीएचडी होल्डर्स और रिसर्चर्स की टीम है। एक दिन प्रोडक्शन लाइन पर दिक्कत आई कि कुछ साबुन के डिब्बे खाली पैक होकर आगे जा रहे थे। अब इन महान एक्सपर्ट्स ने मीटिंग बुलाई। हफ्तों तक माथापच्ची हुई। उन्होंने लाखों रुपए खर्च करके एक हाई टेक एक्स-रे मशीन लगानी चाही जो हर डिब्बे को स्कैन करे और खाली डिब्बा मिलने पर अलार्म बजा दे। कितना सोफिस्टिकेटेड और महंगा प्लान है ना। लेकिन तभी वहां एक सफाई कर्मचारी आया जिसने सिर्फ ५०० रुपए का एक टेबल फैन यानी पंखा लाइन के बगल में चला दिया। जो डिब्बा खाली था, वो हवा से उड़कर नीचे गिर गया और भरे हुए डिब्बे आगे निकल गए।
इन महाज्ञानी एक्सपर्ट्स के पास उस पंखे जैसा सिंपल आईडिया क्यों नहीं आया। क्योंकि उनकी एक्सपर्टीज़ ने उन्हें सिखाया था कि बड़ी प्रॉब्लम का सलूशन हमेशा बड़ा और कॉम्प्लेक्स ही होना चाहिए। वो अपनी ही जानकारी के बोझ तले दबे हुए थे। इसे ही कहते हैं द कर्स ऑफ एक्सपर्टीज़। जब आप किसी चीज के बारे में बहुत ज्यादा जान लेते हैं, तो आप उन बेसिक चीजों को भूल जाते हैं जो एक आम इंसान को साफ दिख रही होती हैं। आपका दिमाग कहता है कि यह तो हो ही नहीं सकता क्योंकि पिछले २० साल में कभी ऐसा नहीं हुआ। और बस यहीं पर आपकी कंपनी का इनोवेशन दम तोड़ देता है।
आप अपनी मीटिंग्स में बैठकर वही पुरानी फाइल्स पलटते रहते हैं और सोचते हैं कि आप कुछ नया कर रहे हैं। असल में आप बस पुरानी धूल झाड़ रहे होते हैं। अगर आप अपनी टीम में सबसे ज्यादा जानने वाले इंसान हैं, तो यकीन मानिए आप उस टीम की तरक्की की सबसे बड़ी रुकावट भी बन सकते हैं। नई सोच के लिए आपको यह भूलना पड़ता है कि आपको क्या पता है। क्या आप तैयार हैं अपने उस ईगो को साइड में रखने के लिए जो चिल्ला चिल्ला कर कहता है कि मुझे सब पता है।
लेसन २ : द जीरो ग्रेविटी थिंकर - अपनी टीम में एलियन को जगह देना सीखें
जब आपकी टीम के सभी धुरंधर अपनी एक्सपर्टीज़ की जेल में बंद होते हैं, तब आपको जरूरत होती है एक ऐसे इंसान की जिसके पास कोई पिछला बोझ न हो। सिंथिया राबे इसे जीरो ग्रेविटी थिंकर कहती हैं। यह वो लोग होते हैं जिन्हें आपकी इंडस्ट्री की कखग भी नहीं पता होती। और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। आपके ऑफिस के जो सीनियर मैनेजर साहब हैं, वो तो जमीन की ग्रेविटी से इतने चिपके हुए हैं कि उन्हें लगता है कि जो नियम उन्होंने बनाए हैं वही कुदरत का कानून हैं। लेकिन एक जीरो ग्रेविटी थिंकर के लिए कोई नियम नहीं होता क्योंकि उसे पता ही नहीं कि नियम क्या हैं। वह आपसे ऐसे बचकाने सवाल पूछेगा कि आपको हंसी आ जाएगी, लेकिन वही सवाल आपको हिला कर रख देंगे।
मान लीजिए आपका जूतों का बिजनेस है। आपने दुनिया के बेस्ट डिजाइनर्स रखे हैं जो दिन-रात लेदर और सोल की बातें करते हैं। अब आप एक ऐसी मीटिंग में एक रसोइए यानी शेफ को बुला लेते हैं। आपके एक्सपर्ट्स उसे ऐसे देखेंगे जैसे वो किसी दूसरे ग्रह से आया हो। लेकिन जब वो शेफ आपसे पूछेगा कि आप जूतों के डिब्बे में नमक क्यों नहीं डालते ताकि नमी खत्म हो जाए, तो आपके एक्सपर्ट्स का मुंह खुला का खुला रह जाएगा। क्योंकि उन एक्सपर्ट्स ने हमेशा सिर्फ केमिकल और सिलिका जेल के बारे में सोचा है, उस सिंपल चीज के बारे में नहीं जो किचन में रोज इस्तेमाल होती है।
हकीकत तो यह है कि आपकी टीम के लोग एक दूसरे की शक्ल देख-देखकर एक जैसा सोचने लगे हैं। इसे ग्रुपथिंक कहते हैं, जहाँ हर कोई बॉस की बात पर हां में हां मिलाता है क्योंकि किसी को अपनी नौकरी प्यारी है तो किसी को अपनी इमेज। जीरो ग्रेविटी थिंकर को इस बात की परवाह नहीं होती कि लोग क्या सोचेंगे। वह उस बच्चे की तरह है जो भीड़ में चिल्लाकर कह देता है कि राजा जी ने तो कपड़े ही नहीं पहने हैं। वह आपकी प्रोसेस के उन छेदों को पकड़ लेता है जिन्हें आपने बरसों से अपनी नजरअंदाज करने वाली आदत से ढका हुआ है।
अगर आप वाकई कुछ ऐसा बनाना चाहते हैं जो मार्केट में तहलका मचा दे, तो आपको ऐसे लोगों को काम पर रखना होगा जो आपकी फील्ड से कोसों दूर हों। अगर आप सॉफ्टवेयर बना रहे हैं, तो किसी आर्टिस्ट से बात कीजिए। अगर आप रेस्टोरेंट चला रहे हैं, तो किसी इंजीनियर की सलाह लीजिए। यह लोग आपको वह रास्ता दिखाएंगे जो आपके एक्सपीरियंस की धुंध में कहीं खो गया था। जीरो ग्रेविटी थिंकर का होना लग्जरी नहीं, बल्कि जरूरत है वरना आप अपनी ही बनाई हुई दुनिया में गोल-गोल घूमते रह जाएंगे और कहेंगे कि हमने तो बहुत मेहनत की थी।
लेसन ३ : किलिंग द सैक्रेड काउ - पुरानी परंपराओं की बलि चढ़ाना जरूरी है
हर कंपनी और हर इंसान के पास कुछ ऐसी चीजें होती हैं जिन्हें वे कभी हाथ नहीं लगाते। इन्हें सिंथिया राबे सैक्रेड काउ यानी पवित्र गाय कहती हैं। ये वो पुराने नियम, पुराने प्रोडक्ट्स या पुराने काम करने के तरीके हैं जो शायद दस साल पहले बहुत काम के थे, लेकिन आज सिर्फ एक बोझ हैं। फिर भी कोई इन्हें बदलने की हिम्मत नहीं करता क्योंकि सबको लगता है कि अरे, हमारी कंपनी तो हमेशा से ऐसे ही चलती आई है। अगर हमने इसे बदला तो अनर्थ हो जाएगा। आप अपनी उन्हीं पुरानी आदतों की पूजा करते रहते हैं और फिर रोते हैं कि बिजनेस में ग्रोथ क्यों नहीं हो रही। सच तो यह है कि जब तक आप इन पुरानी और बेकार परंपराओं की बलि नहीं चढ़ाएंगे, तब तक नए आईडिया के लिए जगह नहीं बनेगी।
इसे एक मजेदार मिसाल से समझिए। एक शादी में दुल्हन की मां ने मछली बनाते समय उसके सिर और पूंछ को काट दिया। जब बेटी ने पूछा कि ऐसा क्यों किया, तो मां ने कहा कि मेरी मां भी ऐसे ही बनाती थी। जब नानी से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि मेरी मां भी यही करती थी। आखिरकार जब पर-नानी से पूछा गया, तो उन्होंने हंसकर कहा कि बेटा, उस जमाने में मेरे पास कड़ाही बहुत छोटी थी इसलिए मुझे मछली काटनी पड़ती थी। अब सोचिए, कड़ाही बड़ी हो गई, जमाना बदल गया, लेकिन पूरा खानदान आज भी मछली काट रहा है क्योंकि किसी ने सवाल पूछने की हिम्मत ही नहीं की।
आपके ऑफिस में भी ऐसी कई छोटी कड़ाही वाली परंपराएं चल रही होंगी। वो लंबी-लंबी बोरिंग मीटिंग्स जिनका कोई नतीजा नहीं निकलता, वो कागजी कार्रवाई जो सिर्फ वक्त बर्बाद करती है, या वो प्रोडक्ट जो अब कोई नहीं खरीदता लेकिन ईगो के चक्कर में आप उसे बेचे जा रहे हैं। आप इन सैक्रेड काउस को चारा खिलाना बंद कीजिए। जिस दिन आप अपनी सबसे पुरानी और पसंदीदा परंपरा को चुनौती देंगे, उस दिन आपकी टीम को समझ आएगा कि असली इनोवेशन क्या होता है।
इनोवेशन का मतलब सिर्फ कुछ नया बनाना नहीं है, बल्कि उस पुराने को छोड़ना भी है जो अब सड़ चुका है। अगर आप कल की सफलता चाहते हैं, तो आपको आज की उन आदतों को मारना होगा जो आपको पीछे खींच रही हैं। याद रखिए, जो पेड़ अपनी पुरानी पत्तियां नहीं गिराता, उस पर कभी नई कोपलें नहीं आतीं। तो अगली बार जब कोई कहे कि यह काम तो हमारे यहाँ ऐसे ही होता है, तो समझ जाइए कि यही वो सैक्रेड काउ है जिसे अब विदा करने का वक्त आ गया है।
तो दोस्तों, क्या आप अपनी एक्सपर्टीज़ के पिंजरे को तोड़कर बाहर आने के लिए तैयार हैं। अपनी टीम में एक जीरो ग्रेविटी थिंकर को ढूंढिए और उन बेकार की परंपराओं को आज ही खत्म कीजिए। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जिसे लगता है कि उसे सब पता है। कमेंट में बताएं कि आपके ऑफिस की वो कौन सी सैक्रेड काउ है जिसे आप आज ही खत्म करना चाहते हैं। चलिए मिलकर इनोवेशन का असली मतलब समझते हैं।
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