अगर आपको लगता है कि सिर्फ एक बड़ा सुपरहिट आईडिया ही आपको करोड़पति बनाएगा तो मुबारक हो आप अपनी गरीबी की खुद ही प्लानिंग कर रहे हैं। जबकि दुनिया के स्मार्ट लोग कचरा समझकर छोड़े गए छोटे प्रोडक्ट्स से तिजोरियां भर रहे हैं और आप अभी भी उस एक जैकपॉट के इंतज़ार में बूढ़े हो रहे हैं।
आज हम क्रिस एंडरसन की फेमस बुक दी लॉन्ग टेल की मदद से समझेंगे कि कैसे कम बिकने वाले प्रोडक्ट्स भी आपको असली प्रॉफिट दिला सकते हैं। चलिए इन ३ पावरफुल लेसन को गहराई से समझते हैं जो आपके बिजनेस देखने का नजरिया हमेशा के लिए बदल देंगे।
लेसन १ : हिट्स का मोह छोड़ो और वैरायटी का दामन पकड़ो
हमारे समाज में एक बड़ी बीमारी है और वो है हिट्स के पीछे भागना। बचपन से हमें सिखाया गया है कि अगर क्लास में फर्स्ट नहीं आए तो तुम बेकार हो। अगर फिल्म ने १०० करोड़ नहीं कमाए तो वो फ्लॉप है। और अगर आपका बिजनेस कोई ऐसा प्रोडक्ट नहीं बेच रहा जिसे पूरी दुनिया पागलों की तरह खरीदे तो शायद आप बिजनेस करने के लायक ही नहीं हैं। लेकिन क्रिस एंडरसन कहते हैं कि यह सोच अब एक्सपायर हो चुकी है। पुराने जमाने में दुकान की अलमारी छोटी होती थी तो दुकानदार सिर्फ वही सामान रखता था जो धड़ाधड़ बिके। इसे हम हिट कल्चर कहते हैं। लेकिन आज के डिजिटल दौर में अलमारियां अनंत हैं।
सोचिए उस लोकल किराना स्टोर वाले अंकल के बारे में जो सिर्फ वही बिस्कुट रखते हैं जो टीवी पर एड में आते हैं। अगर आप उनसे जाकर कोई ऐसा खास ऑर्गेनिक बिस्कुट मांग लें जो सिर्फ गुड़ और बाजरे से बना हो तो वो आपको ऐसी नजरों से देखेंगे जैसे आपने उनकी किडनी मांग ली हो। उनके लिए वो प्रोडक्ट बेकार है क्योंकि उसे महीने में शायद दो ही लोग मांगेंगे। लेकिन यही तो असली खेल है। ऑनलाइन मार्केट में ऐसे लाखों प्रोडक्ट्स हैं जिन्हें शायद महीने में सिर्फ दो लोग खरीदते हैं। लेकिन जब आप ऐसे लाखों अलग अलग प्रोडक्ट्स को एक साथ जोड़ देते हैं तो उनका कुल सेल किसी एक सुपरहिट बिस्कुट से भी ज्यादा निकल जाता है।
इसे एक और मजेदार मिसाल से समझते हैं। बॉलीवुड की वो घिसी पिटी फिल्में याद कीजिए जिसमें हीरो वही पुरानी एक्टिंग करता है और वही चार गाने होते हैं। प्रोड्यूसर्स को लगता है कि बस यही बिकता है। लेकिन फिर आता है नेटफ्लिक्स जैसा प्लेटफॉर्म जहाँ आपको कोरियन ड्रामा से लेकर स्पेनिश थ्रिलर तक सब मिलता है। हो सकता है कि आपके पड़ोस वाले शर्मा जी को स्पेनिश फिल्में समझ न आएं पर पूरी दुनिया में ऐसे करोड़ों लोग हैं जिन्हें वो पसंद हैं। यहाँ कोई भी चीज बेकार नहीं है। बस उसे सही खरीदार की तलाश है।
अगर आप आज भी इस इंतजार में बैठे हैं कि कोई एक ऐसा आईडिया आएगा जो रातों रात आपको अंबानी बना देगा तो आप असल में उस लॉटरी के पीछे भाग रहे हैं जिसका टिकट ही कभी छपा नहीं। असली समझदारी इसमें है कि आप छोटे छोटे मार्केट्स को पकड़ें। उन लोगों की जरूरतों को पूरा करें जिन्हें बड़ी कंपनियां इग्नोर कर देती हैं। जब आप भीड़ से हटकर उन चीजों पर ध्यान देते हैं जिन्हें बाकी लोग कचरा समझते हैं तब आप असल में लॉन्ग टेल का हिस्सा बनते हैं। यह वैरायटी ही आज के दौर का असली किंग है। अगर आप सिर्फ एक हिट के भरोसे जिएंगे तो जैसे ही मार्केट का टेस्ट बदलेगा आप सड़क पर आ जाएंगे। लेकिन अगर आपके पास वैरायटी है तो आप हर मौसम के राजा हैं।
अगले लेसन में हम देखेंगे कि आखिर यह सब मुमकिन कैसे हुआ और कैसे आप बिना गोदाम के भी सामान बेच सकते हैं।
लेसन २ : बिना गोदाम की दुकान और जीरो इन्वेंटरी का जादू
पुराने जमाने के बिजनेसमैन की सबसे बड़ी टेंशन क्या थी। यही कि भाई सामान रखेंगे कहाँ। अगर आप एक फिजिकल स्टोर खोलते हैं तो आपको हर इंच का किराया देना पड़ता है। अब ऐसे में कोई भी दुकानदार वह सामान रखने की हिम्मत नहीं करेगा जो साल में एक बार बिकता हो। अगर उसने ऐसा किया तो समझो वो अपनी बर्बादी का कॉन्ट्रैक्ट साइन कर रहा है। लेकिन आज के इंटरनेट युग ने इस पूरी सिरदर्दी को ही खत्म कर दिया है। इसे ही क्रिस एंडरसन इन्वेंटरी की घटती कीमत कहते हैं। आज के दौर में सामान को दुकान की शेल्फ पर सजाना जरूरी नहीं है उसे बस एक सर्वर पर लिस्ट करना काफी है।
जरा सोचिए उन महान रिश्तेदारों के बारे में जो शादी के वक्त आपको ऐसी सलाह देते हैं जैसे उन्होंने ही पूरी दुनिया की इकॉनमी चलाई हो। वो कहेंगे बेटा बिजनेस वही करो जिसमें माल आंखों के सामने दिखे। लेकिन उन्हें कौन समझाए कि आज के जमाने में असली पैसा वहां है जहाँ माल दिखता ही नहीं है। जैसे कि ई-बुक्स या ऑनलाइन कोर्सेज। अमेज़न जैसा बड़ा खिलाड़ी आज इसलिए सफल है क्योंकि उसके पास अपना कोई बहुत बड़ा शोरूम नहीं है जहाँ आपको जाकर लाइन लगानी पड़े। उनके पास एक डिजिटल गोदाम है जहाँ वो करोड़ों ऐसी चीजें भी रख सकते हैं जिनकी डिमांड बहुत कम है। अगर कोई ऐसी किताब है जिसे साल भर में सिर्फ आप ही खरीदना चाहते हैं तो अमेज़न उसे भी संभाल कर रख सकता है क्योंकि उसे रखने का खर्चा लगभग जीरो है।
मान लीजिए आप एक ऐसी दुकान खोलते हैं जो सिर्फ पुराने गानों के रिकॉर्ड्स बेचती है। अगर आप मुंबई के किसी महंगे मॉल में यह दुकान खोलेंगे तो महीने भर का किराया ही आपको दिवालिया बना देगा। ऊपर से उन रिकॉर्ड्स को धूल से बचाना और संभालना एक अलग ही महाभारत है। लेकिन अगर आप यही काम एक वेबसाइट के जरिए करते हैं तो आप पूरी दुनिया के शौकीनों को अपना कस्टमर बना सकते हैं। जो चीज आपके पड़ोस वाले चचा के लिए कबाड़ है वही इंटरनेट पर किसी कद्रदान के लिए सोना हो सकती है।
असली मजाक तो उन लोगों पर है जो आज भी ईंट पत्थर की दीवारें खड़ी करके बिजनेस करने का ख्वाब देख रहे हैं। जब आप डिजिटल होते हैं तो आपकी पहुंच सिर्फ अपने मोहल्ले तक नहीं बल्कि पूरी कायनात तक हो जाती है। अब आपको डरने की जरूरत नहीं है कि अगर मेरा सामान नहीं बिका तो क्या होगा। क्योंकि डिजिटल दुनिया में सामान रखने का किराया सांस लेने से भी सस्ता है। यहाँ आप जितने ज्यादा ऑप्शंस देंगे उतने ही ज्यादा आप लॉन्ग टेल के फायदे उठा पाएंगे। यह लेसन हमें सिखाता है कि फिजिकल लिमिट्स अब आपके बिजनेस की रुकावट नहीं होनी चाहिए। अगर आप अब भी जगह की कमी का रोना रो रहे हैं तो यकीन मानिए आप २१वीं सदी में रहने के लायक ही नहीं हैं।
अगले लेसन में हम बात करेंगे उस मॉडल की जिसने गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियों को दुनिया का बेताज बादशाह बना दिया है।
लेसन ३ : एग्रीगेटर बनो और दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाओ
अगर आप अब भी खुद का एक छोटा सा प्रोडक्ट बनाकर उसे घर-घर जाकर बेचने की सोच रहे हैं, तो आप शायद १९वीं सदी के किसी ब्लैक एंड व्हाइट जमाने में जी रहे हैं। आज की तारीख में असली पैसा सामान बनाने में नहीं, बल्कि सामान बेचने वालों को एक साथ लाने में है। इसे ही क्रिस एंडरसन दी एग्रीगेटर मॉडल कहते हैं। दुनिया के सबसे बड़े रईस आज वो नहीं हैं जिनके पास खुद की फैक्ट्रियां हैं, बल्कि वो हैं जिनके पास एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहाँ दूसरे लोग आकर अपना सामान बेचते हैं। गूगल, अमेज़न और यूट्यूब जैसे नाम इसी वजह से बड़े बने क्योंकि उन्होंने दुनिया भर के छोटे-छोटे 'लॉन्ग टेल' क्रिएटर्स और सेलर्स को एक छत के नीचे खड़ा कर दिया।
जरा अपने उस दोस्त के बारे में सोचिए जो हमेशा खुद को बहुत बड़ा आर्टिस्ट समझता है और अपनी पेंटिंग्स बेचने के लिए दर-दर की ठोकरें खाता है। वो बेचारा एक-एक कस्टमर के लिए तरसता है। अब दूसरी तरफ उस इंसान को देखिए जिसने एक ऐसी वेबसाइट बना दी जहाँ हजारों ऐसे आर्टिस्ट अपनी पेंटिंग्स लिस्ट कर सकते हैं। आर्टिस्ट को शायद साल में एक खरीदार मिले, लेकिन वेबसाइट मालिक को तो हर सेल पर अपना कमीशन मिल रहा है। इसे कहते हैं बिना मेहनत के मलाई खाना। जब आप एक एग्रीगेटर बनते हैं, तो आप खुद कुछ नहीं बेच रहे होते, आप बस लोगों की जरूरतों और सामान के बीच का पुल बन जाते हैं।
वो मोहल्ले वाली आंटी याद हैं जो सबकी शादियां फिक्स करवाती हैं। उनके पास खुद का कोई लड़का या लड़की नहीं है, लेकिन उनके पास डेटा सबका है। वो बस सही डिमांड को सही सप्लाई से जोड़ती हैं और अपना शगुन पक्का कर लेती हैं। इंटरनेट की दुनिया में भी यही खेल चल रहा है। आज लोग उन प्लेटफॉर्म्स की तरफ भागते हैं जहाँ उन्हें चॉइस मिले। अगर आप किसी को सिर्फ दो ऑप्शंस देंगे, तो वो आपकी दुकान छोड़कर चला जाएगा। लेकिन अगर आप उसे एक ऐसा समंदर दे देंगे जहाँ लाखों ऑप्शंस हों, तो वो वहीं फंस कर रह जाएगा।
यही वजह है कि लॉन्ग टेल में 'फिल्टर' और 'सर्च' की बहुत वैल्यू है। जब सामान इतना ज्यादा हो जाता है, तो लोग कंफ्यूज हो जाते हैं। तब आपको जरूरत पड़ती है एक ऐसे स्मार्ट सिस्टम की जो कस्टमर को वही दिखाए जो उसे चाहिए। नेटफ्लिक्स को पता है कि आपको रात को १२ बजे क्या देखना पसंद है, और अमेज़न को पता है कि आपकी सैलरी आते ही आप कौन सा फालतू सामान खरीदने वाले हैं। ये कंपनियां आपको आपके ही टेस्ट के जाल में फंसा लेती हैं। अगर आप भी अपने बिजनेस को नेक्स्ट लेवल पर ले जाना चाहते हैं, तो यह सोचना बंद कीजिए कि मैं क्या बनाऊं। इसके बजाय यह सोचिए कि मैं कैसे बहुत सारे लोगों को एक साथ लाऊं।
याद रखिए, आज के दौर में भीड़ का हिस्सा बनने से अच्छा है कि आप उस भीड़ को रास्ता दिखाने वाले गाइड बन जाएं। अगर आप लॉन्ग टेल के इन तीनों लेसन को समझ गए हैं, तो आपको अमीर बनने से कोई नहीं रोक सकता, सिवाय आपकी अपनी सुस्ती के। तो उठिए और इस डिजिटल क्रांति का हिस्सा बनिए।
तो दोस्तों, क्या आप अब भी उस एक जैकपॉट के भरोसे बैठे रहेंगे या आज से ही अपना लॉन्ग टेल बिजनेस खड़ा करना शुरू करेंगे। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो आज भी पुराने ढर्रे पर बिजनेस कर रहे हैं। नीचे कमेंट्स में बताएं कि आपको इन ३ लेसन में से सबसे बेस्ट कौन सा लगा। याद रखिए, दुनिया बदल रही है, अब आपकी बारी है।
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