अगर आपको लगता है कि आप बहुत स्मार्ट हैं और बिना लोगों का भरोसा जीते लाइफ में रॉकेट की स्पीड से उड़ेंगे तो भाई साहब आप एक बहुत बड़े धोखे में जी रहे हैं। आपकी इसी ईगो की वजह से आप हर मोड़ पर भारी 'ट्रस्ट टैक्स' भर रहे हैं और आपको पता तक नहीं है।
इस आर्टिकल में हम स्टीफन आर कवि की फेमस बुक 'द स्पीड ऑफ ट्रस्ट' से वो ३ कीमती लेसन सीखेंगे जो आपकी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ में भरोसे की रफ़्तार को १० गुना बढ़ा देंगे। चलिए इन लेसन्स को गहराई से समझते हैं।
लेसन १ : सेल्फ ट्रस्ट - पहले खुद के सगे बनो
हम में से ज्यादातर लोग दुनिया को इम्प्रेस करने के चक्कर में इतने अंधे हो जाते हैं कि हम भूल ही जाते हैं कि सबसे बड़ा जज हमारे अंदर बैठा है। स्टीफन आर कवि कहते हैं कि ट्रस्ट की शुरुआत बाहर से नहीं बल्कि आपके अंदर से होती है। इसे वो 'क्रेडिबिलिटी' कहते हैं। अब क्रेडिबिलिटी का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि आपने बड़ी डिग्री ली है या आप सूट-बूट पहनकर ऑफिस जाते हैं। इसका असली मतलब है कि क्या आप खुद पर भरोसा करते हैं।
सोचिए, आप रोज रात को सोने से पहले खुद से वादा करते हैं कि कल सुबह ५ बजे उठकर जिम जाऊँगा। सुबह अलार्म बजता है और आप उसे ऐसे मारते हैं जैसे उसने आपका कोई पुराना कर्ज मांगा हो। फिर आप सो जाते हैं। आपने किसी और का नहीं बल्कि अपना खुद का भरोसा तोड़ा है। अब जब आप खुद से किया छोटा सा वादा नहीं निभा पा रहे हैं तो आपका सबकॉन्शियस माइंड आपको एक 'धोखेबाज' की केटेगरी में डाल देता है। फिर जब आप लाइफ में कोई बड़ा गोल सेट करते हैं तो अंदर से आवाज आती है कि रहने दे भाई, तुझसे सुबह का अलार्म तो संभलता नहीं, तू दुनिया क्या खाक बदलेगा।
यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी ऐसे दोस्त से उधार मांग रहे हैं जिसे आपने पिछले साल के पैसे अभी तक वापस नहीं किए। वो दोस्त आपको पैसे तो क्या, अपनी पुरानी साइकिल भी नहीं देगा। ठीक वैसे ही आपकी बॉडी और आपका माइंड आपकी बात मानना बंद कर देते हैं क्योंकि आपकी 'सेल्फ क्रेडिबिलिटी' जीरो हो चुकी है।
सेल्फ ट्रस्ट बनाने के चार पिलर्स हैं: इंटिग्रिटी, इंटेंट, कैपेबिलिटीज और रिजल्ट्स। इंटिग्रिटी का मतलब है ईमानदारी। अगर आप अंदर से खोखले हैं और बाहर से महात्मा बनने का नाटक कर रहे हैं तो आप एक चलते-फिरते स्कैम हैं। लोग शायद शुरू में आपकी बातों में आ जाएं लेकिन आपकी बॉडी लैंग्वेज और आपकी वाइब्स आपका राज खोल देंगी। फिर आता है इंटेंट यानी आपकी नीयत। अगर आपकी नीयत में खोट है तो आप दुनिया के सबसे बड़े स्किल्ड इंसान भी बन जाएं, लोग आपसे दूर ही भागेंगे। जैसे वो पड़ोस वाला अंकल जो हमेशा दूसरों की मदद करने का दिखावा करता है लेकिन उसका असली मकसद सिर्फ गॉसिप इकट्ठा करना होता है।
कैपेबिलिटीज का मतलब है आपकी स्किल्स। सिर्फ अच्छी नीयत से काम नहीं चलता। मान लीजिए आपको सर्जरी करवानी है और डॉक्टर बहुत ही भला इंसान है, मंदिर जाता है, जानवरों को खाना खिलाता है, लेकिन उसे कैंची पकड़नी नहीं आती। क्या आप उससे अपना ऑपरेशन करवाएंगे। बिल्कुल नहीं। आपको उस पर भरोसा नहीं होगा क्योंकि उसके पास रिजल्ट देने की काबिलियत नहीं है।
और आखिर में आते हैं रिजल्ट्स। दुनिया को आपकी कोशिशों से कोई लेना-देना नहीं है। अगर आप बार-बार फेल हो रहे हैं तो धीरे-धीरे आपका खुद पर से भी भरोसा उठ जाएगा। इसलिए छोटे-छोटे टास्क पूरे कीजिए और खुद को जीतते हुए देखिए। जब आप खुद की नजरों में हीरो बन जाते हैं तो दुनिया को आप पर भरोसा करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। खुद पर भरोसा करना कोई लग्जरी नहीं है बल्कि यह लाइफ की रेस में बने रहने के लिए बेसिक फ्यूल है। अगर आपकी गाड़ी में पेट्रोल ही नहीं है तो आप फेरारी के टायर लगा लो या मर्सिडीज का लोगो, गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगी।
लेसन २ : रिलेशनशिप ट्रस्ट - खाली वादों का बैलेंस नहीं चलता
जब आप खुद पर भरोसा करना सीख जाते हैं, तब बारी आती है दूसरों के साथ डील करने की। स्टीफन कवि इसे 'रिलेशनशिप ट्रस्ट' कहते हैं। लेकिन भाई साहब, इंडिया में रिश्तों का मतलब सिर्फ दिवाली पर मिठाई का डिब्बा भेजना नहीं होता। यहाँ ट्रस्ट एक बैंक अकाउंट की तरह है। अगर आप सिर्फ पैसे (भरोसा) निकालते रहेंगे और कभी जमा नहीं करेंगे, तो एक दिन बैंक (रिश्ता) दिवालिया हो जाएगा और आप सड़क पर आ जाएंगे।
सोचिए आपके ऑफिस में एक ऐसा कलीग है जो मीटिंग में तो बड़ी-बड़ी बातें करता है, जैसे वो पूरी दुनिया का बोझ अपने कंधों पर उठा लेगा। लेकिन जब काम करने की बारी आती है, तो वो ऐसे गायब होता है जैसे मिस्टर इंडिया की घड़ी मिल गई हो। क्या आप अगली बार उस पर भरोसा करेंगे। बिल्कुल नहीं। आप उसे देखते ही अपना रास्ता बदल लेंगे।
रिश्तों में भरोसा बनाने के लिए आपको १३ बिहेवियर अपनाने पड़ते हैं, लेकिन चलिए कुछ खास की बात करते हैं। सबसे पहला है 'टॉक स्ट्रेट'। घुमा-फिरा कर बातें करना बंद कीजिए। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो 'हाँ' भी ऐसे बोलते हैं कि सुनने वाले को लगता है 'शायद' बोल रहे हैं। अगर काम नहीं हो सकता, तो साफ बोल दो भाई। शुगर-कोटिंग करना उन लोगों का काम है जो सच बोलने से डरते हैं। सीधा बोलना शुरू कीजिए, क्योंकि जलेबी सिर्फ खाने में अच्छी लगती है, बातों में नहीं।
दूसरा जरूरी बिहेवियर है 'डेमोस्ट्रेट रिस्पेक्ट'। अक्सर हम उन लोगों की इज्जत करना भूल जाते हैं जो हमारे लिए 'जरूरी' नहीं हैं। जैसे वो ऑफिस का चपरासी या घर का पेंटर। अगर आप सिर्फ अपने बॉस के सामने पूंछ हिलाते हैं और छोटों को इंसान नहीं समझते, तो यकीन मानिए, आपका असली चेहरा सबको दिख रहा है। लोग आपको देख रहे हैं और आपकी क्रेडिबिलिटी का मीटर गिर रहा है।
एक और मजेदार बिहेवियर है 'राईट रॉन्ग्स'। अगर आपने गलती की है, तो उसे मान लीजिये। कुछ लोग अपनी गलती को ऐसे छुपाते हैं जैसे मोहल्ले के लड़के क्रिकेट खेलते हुए पड़ोसी की खिड़की का कांच तोड़कर बैट छुपा लेते हैं। बहाने बनाना छोड़िए। माफ़ी मांगना आपको छोटा नहीं बनाता, बल्कि यह दिखाता है कि आप अपने ईगो से ज्यादा अपने रिश्तों की कद्र करते हैं।
सबसे बड़ा गेम चेंजर है 'शो लोयल्टी'। जब कोई इंसान कमरे में मौजूद न हो, तब उसके बारे में बात करना आपकी औकात बताता है। अगर आप अपने दोस्त की बुराई किसी और के सामने कर रहे हैं, तो सुनने वाला समझ जाता है कि कल को आप उसकी भी पीठ में छुरा घोंपेंगे। वफादारी का मतलब है पीठ पीछे भी वही बोलना जो सामने बोल सको।
रिलेशनशिप में ट्रस्ट कोई एक दिन का चमत्कार नहीं है। यह उन छोटी-छोटी चीजों का नतीजा है जो आप रोज करते हैं। अगर आप अपने पार्टनर से प्रॉमिस करते हैं कि आप शाम को घर जल्दी आएंगे, और फिर आप दोस्तों के साथ पार्टी करने निकल जाते हैं, तो समझ लीजिये कि आपने अपने ट्रस्ट अकाउंट से भारी विड्रॉल कर लिया है। अब अगली बार जब आप सच में लेट होंगे और आप जेनुइन रीजन देंगे, तब भी सामने वाला आप पर शक ही करेगा। और फिर आप चिल्लाएंगे कि 'मुझ पर कोई भरोसा ही नहीं करता'। भाई साहब, भरोसा कमाना पड़ता है, यह खैरात में नहीं मिलता।
लेसन ३ : ट्रस्ट टैक्स और डिविडेंड - आपकी जेब पर भरोसे की मार
अब जरा पैसों की बात करते हैं, क्योंकि बिना लक्ष्मी की बात किए इंडियन ऑडियंस को नींद नहीं आती। स्टीफन कवि ने एक बहुत ही गजब का फॉर्मूला दिया है: ट्रस्ट हमेशा स्पीड और कॉस्ट (कीमत) से जुड़ा होता है। जब किसी कंपनी या रिश्ते में भरोसा कम होता है, तो वहां काम करने की रफ़्तार कछुए जैसी हो जाती है और खर्चा रॉकेट की तरह बढ़ जाता है। इसे वो कहते हैं 'ट्रस्ट टैक्स'।
सोचिए आप एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी चेक के लिए लाइन में खड़े हैं। वहां आपकी बेल्ट, जूते, और यहाँ तक कि आपकी जेब में पड़ा एक सिक्का भी चेक किया जाता है। क्यों। क्योंकि वहां अथॉरिटी को आप पर भरोसा नहीं है। इस भरोसे की कमी की वजह से आपको दो घंटे पहले पहुंचना पड़ता है और एयरपोर्ट को करोड़ों के स्कैनर लगाने पड़ते हैं। यह जो आपका वक्त बर्बाद हुआ और पैसा खर्च हुआ, यही 'ट्रस्ट टैक्स' है।
अब जरा अपनी लाइफ के बारे में सोचिए। आपके ऑफिस में अगर बॉस को अपनी टीम पर भरोसा नहीं है, तो वो हर ईमेल के सी-सी में बैठना चाहेगा। वो हर छोटी फाइल पर साइन करेगा। मीटिंग्स पर मीटिंग्स होंगी सिर्फ यह चेक करने के लिए कि कहीं कोई काम चोरी तो नहीं कर रहा। नतीजा। जो काम एक घंटे में होना चाहिए था, उसे होने में तीन दिन लग जाते हैं। इसे कहते हैं सिस्टम का स्लो होना। आपकी कंपनी का आधा बजट तो सिर्फ एक-दूसरे की जासूसी करने में निकल जाता है।
लेकिन अगर इसका उल्टा हो, यानी 'हाई ट्रस्ट' हो, तो आपको मिलता है 'ट्रस्ट डिविडेंड'। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे आप अपने बचपन के पक्के दोस्त से कोई डील करते हैं। वहां कागजी कार्रवाई कम होती है और काम फोन की एक कॉल पर हो जाता है। वहां स्पीड इतनी तेज होती है कि कॉम्पिटिशन वाले देखते रह जाते हैं।
ट्रस्ट टैक्स सिर्फ ऑफिस में नहीं लगता, यह आपके घर की रसोई तक पहुंच चुका है। अगर आपको अपनी पत्नी या पति के मोबाइल का पासवर्ड चेक करना पड़ रहा है, तो समझ लीजिए आप अपनी मेंटल पीस का भारी टैक्स भर रहे हैं। शक की वजह से जो स्ट्रेस होता है, उसकी वजह से आप काम पर ध्यान नहीं दे पाते और आपकी प्रोडक्टिविटी जीरो हो जाती है। अंत में आप डॉक्टर के पास जाते हैं और उसे बी-पी की दवाई के पैसे देते हैं। मुबारक हो, आपने ट्रस्ट टैक्स की एक और क़िस्त जमा कर दी है।
स्टीफन कवि कहते हैं कि मार्केट में भी लोग उन्हीं ब्रांड्स को ज्यादा पैसा देते हैं जिन पर वो भरोसा करते हैं। आप एप्पल या टाटा का सामान इसलिए खरीदते हैं क्योंकि आपको पता है कि वहां धोखा नहीं मिलेगा। वहां ट्रस्ट इतना ज्यादा है कि आप बिना सोचे समझे प्रीमियम कीमत देने को तैयार हो जाते हैं।
इसलिए, अगर आप चाहते हैं कि आपका करियर और बिजनेस रफ़्तार पकड़े, तो लोगों का भरोसा जीतना शुरू कीजिए। यह कोई इमोशनल बात नहीं है, यह एक हार्ड कोर बिजनेस स्ट्रेटेजी है। जब लोग आप पर आंख बंद करके भरोसा करेंगे, तो आपकी डील्स जल्दी क्लोज होंगी, आपके रिश्ते मजबूत होंगे और आपकी जेब में पैसा ज्यादा टिकेगा। भरोसा एक ऐसी जादुई खाद है जिसे अगर आप अपने काम में डाल दें, तो रातों-रात आपकी ग्रोथ की रफ़्तार सबको हैरान कर देगी।
भरोसा बनाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है, लेकिन इसे निभाना सबके बस की बात नहीं। आज खुद से पूछिए कि क्या आप अपनी ही नजरों में भरोसेमंद हैं। अगर नहीं, तो आज ही एक छोटा सा वादा खुद से कीजिए और उसे हर हाल में पूरा कीजिए। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप अपनी लाइफ में 'ट्रस्ट टैक्स' बचाना चाहते हैं, तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिए जो हमेशा बहाने बनाते हैं। कमेंट में बताइए कि आपके हिसाब से भरोसे का सबसे बड़ा पिलर कौन सा है।
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