The Only Negotiating Guide You'll Ever Need (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सब्जी मंडी से लेकर ऑफिस की सैलरी तक हर जगह बस अपनी बेइज्जती करवा कर आते हैं। अगर आपको लगता है कि चुपचाप हार मान लेना ही शराफत है तो मुबारक हो आप अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी डील्स और खुशियाँ खुद अपने हाथों से दूसरों को दान कर रहे हैं।

आज हम पीटर स्टार्क की इस मास्टरक्लास से वह सीक्रेट्स जानेंगे जो आपको एक दबे कुचले इंसान से एक स्मार्ट नेगोशिएटर बना देंगे। तैयार हो जाइए क्योंकि अब आप हर सिचुएशन में अपनी बात मनवाना सीखने वाले हैं।


लेसन १ : तैयारी ही असली ताकत है (पावर ऑफ प्रिपरेशन)

दोस्तो, अगर आप बिना किसी तैयारी के किसी के साथ नेगोशिएट करने जा रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप अपनी हार के पेपर पर खुद साइन करके जा रहे हैं। पीटर स्टार्क और जेन फ्लेहर्टी अपनी किताब में साफ कहते हैं कि नेगोशिएशन टेबल पर बैठने से बहुत पहले ही आधी जंग जीत ली जाती है। लेकिन हमारे यहाँ लोग कैसे होते हैं। हमें लगता है कि बस मौके पर जाकर अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से सामने वाले को पिघला देंगे। यह कोई फिल्म नहीं है जहाँ आप इमोशनल म्यूजिक बजाएंगे और सामने वाला रोते हुए आपकी सारी शर्तें मान लेगा। असल दुनिया में जिसके पास डेटा है वही राजा है।

सोचिए आप एक नई कार खरीदने शोरूम गए हैं। सेल्समैन आपको देखकर ऐसे मुस्कुराता है जैसे आप उसके बिछड़े हुए भाई हों। वह आपको एक ऐसा मॉडल दिखाता है जिसे शायद कंपनी ने भी भूल जाने का फैसला कर लिया था। अब अगर आपने पहले से रिसर्च नहीं की है तो आप उसकी बातों में ऐसे फंसेंगे जैसे चूहा जाल में फंसता है। वह आपको बताएगा कि यह कार हवा से बातें करती है और आप खुशी खुशी अपनी मेहनत की कमाई उसे थमा देंगे। लेकिन अगर आप तैयारी करके गए होते तो आपको पता होता कि उस कार का माइलेज क्या है और दूसरे शोरूम में उस पर कितना डिस्काउंट मिल रहा है। तैयारी का मतलब है कि आपको सामने वाले की ताकत और कमजोरी दोनों का पता होना चाहिए।

इंडियन कॉन्टेक्स्ट में बात करें तो शादी की शॉपिंग को ही देख लीजिए। मम्मी जब दुकान पर जाती हैं तो वह पहले से ही दस दुकानों का रेट पता करके आती हैं। दुकानदार बोलता है कि बहनजी यह सूट पांच हजार का है तो मम्मी बड़े प्यार से कहती हैं कि बाजू वाली दुकान पर तो यह तीन हजार का मिल रहा है। यह क्या है। यह रिसर्च है। यही वह कॉन्फिडेंस है जो आपको तब मिलता है जब आपके पास इंफॉर्मेशन होती है। अगर आप ऑफिस में सैलरी हाइक की बात करने जा रहे हैं और आपको यह नहीं पता कि आपकी पोजीशन के लिए मार्केट में क्या रेट चल रहा है तो बॉस आपको अपनी पुरानी घिसी पिटी बातों से बहला देगा। वह कहेगा कि कंपनी अभी मुश्किल दौर से गुजर रही है और आप बेचारे बनकर वापस अपनी डेस्क पर आ जाएंगे।

तैयारी करने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप अपने लिए कुछ सवाल पहले से लिख लें। मुझे क्या चाहिए। सामने वाले को क्या चाहिए। अगर यह डील नहीं हुई तो मेरा प्लान बी क्या है। जब आपके पास एक सॉलिड प्लान बी होता है तो आपकी बॉडी लैंग्वेज बदल जाती है। आप झुककर बात नहीं करते बल्कि बराबरी से बात करते हैं। नेगोशिएशन कोई लड़ाई नहीं है बल्कि एक दिमागी खेल है जिसमें वह जीतता है जिसने अपनी होमवर्क फाइल पूरी की होती है। बिना होमवर्क के क्लास में जाने वाले बच्चे की तरह टेबल पर मत बैठिए वरना दुनिया आपको लूटने के लिए तैयार बैठी है। याद रखिए कि इंफॉर्मेशन ही वह ढाल है जो आपको सामने वाले के वार से बचाती है और वह तलवार है जिससे आप अपनी पसंद की डील हासिल करते हैं।


लेसन २ : विन विन अप्रोच - दोनों का फायदा ही असली जीत है

अक्सर लोगों को लगता है कि नेगोशिएशन का मतलब है सामने वाले की जेब काटकर अपनी जेब भरना। हमें लगता है कि अगर हमने दूसरे को पूरी तरह से निचोड़ लिया तभी हम एक सच्चे खिलाड़ी हैं। लेकिन पीटर स्टार्क कहते हैं कि यह सोच आपको एक बार तो जिता सकती है पर लंबे समय के लिए आप एक विलेन बन जाएंगे। असली नेगोशिएटर वह नहीं है जो सामने वाले को हारने पर मजबूर करे बल्कि वह है जो एक ऐसा रास्ता निकाले जहाँ दोनों को लगे कि उनकी लॉटरी लग गई है। इसे कहते हैं विन विन सिचुएशन।

अब जरा इमेजिन करिए कि आप अपने मकान मालिक से किराया कम करवाने गए हैं। अगर आप वहां जाकर चिल्लाने लगें कि कमरा बहुत गंदा है या आप लूट रहे हैं तो मकान मालिक आपको अगले ही महीने घर खाली करने का नोटिस थमा देगा। यहाँ आपने अपनी जीत तो चाही पर दूसरे को नीचा दिखा दिया। लेकिन अगर आप विन विन अप्रोच अपनाते तो आप कहते कि अंकल देखिए मैं पिछले दो साल से समय पर किराया दे रहा हूँ और घर का ख्याल भी रखता हूँ। अगर आप थोड़ा किराया कम कर दें तो मैं अगले दो साल तक कहीं नहीं जाऊंगा और आपको नए किरायेदार ढूंढने का सिरदर्द नहीं पालना पड़ेगा। यहाँ आपने अपना फायदा भी देखा और मकान मालिक को एक सिक्योरिटी भी दे दी। अब उसे लगेगा कि थोड़ा नुकसान सहना ज्यादा अच्छा है बजाय इसके कि वह एक अच्छे किरायेदार को खो दे।

हमारे यहाँ लोग अक्सर यह गलती करते हैं कि वह अपनी ईगो को नेगोशिएशन टेबल पर ले आते हैं। उन्हें लगता है कि झुकना मतलब हारना है। लेकिन सच तो यह है कि थोड़ा सा झुककर अगर आप एक बड़ी डील क्लोज कर रहे हैं तो आप हार नहीं रहे बल्कि आप समझदारी दिखा रहे हैं। सोचिए आप एक फ्रीलांस प्रोजेक्ट के लिए क्लाइंट से बात कर रहे हैं। क्लाइंट का बजट कम है और आपका रेट ज्यादा। अब आप या तो मना कर सकते हैं या फिर आप कह सकते हैं कि ठीक है मैं आपके बजट में काम कर दूँगा लेकिन मुझे काम करने के लिए थोड़ा ज्यादा समय चाहिए होगा या फिर मैं प्रोजेक्ट के सिर्फ मेन हिस्सों पर काम करूँगा। इससे क्या हुआ। क्लाइंट को उसका बजट मिल गया और आपको आपका कीमती समय। दोनों खुश और काम भी शुरू।

नेगोशिएशन असल में एक रिश्ते की तरह होता है। अगर एक पार्टनर हमेशा दबकर रहेगा तो वह रिश्ता ज्यादा दिन नहीं चलेगा। वैसे ही अगर आप हर बार सामने वाले को नुकसान पहुंचाकर अपनी बात मनवाएंगे तो अगली बार वह आपके साथ काम करना तो दूर आपकी शक्ल भी नहीं देखना चाहेगा। पीटर स्टार्क समझाते हैं कि आपको सामने वाले की जरूरतों को भी समझना चाहिए। शायद उसे पैसे की नहीं बल्कि इज्जत की या किसी और चीज की जरूरत हो। जब आप दूसरे की प्रॉब्लम को अपनी प्रॉब्लम समझकर हल करते हैं तो वह इंसान खुद चलकर आपको वह सब दे देता है जो आप चाहते हैं। यह कोई जादू नहीं है बल्कि एक गहरी साइकोलॉजी है। जो इंसान सबको साथ लेकर चलता है वही असल में सबसे ऊंचे मुकाम पर पहुँचता है। अगली बार जब किसी से डील करें तो यह मत सोचिए कि मैं इसे कैसे हराऊं बल्कि यह सोचिए कि हम दोनों मिलकर इस केक को कैसे बड़ा करें ताकि सबको बड़ा हिस्सा मिले।


लेसन ३ : खामोशी का जादू - जब चुप रहना ही सबसे बड़ा हथियार बन जाए

क्या आपने कभी नोटिस किया है कि जब आप किसी से कुछ पूछते हैं और वह जवाब नहीं देता तो आपको कितनी बेचैनी होने लगती है। आप उस सन्नाटे को भरने के लिए बिना मतलब की बातें करने लगते हैं। पीटर स्टार्क कहते हैं कि नेगोशिएशन की दुनिया में खामोशी यानी साइलेंस एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो सामने वाले के छक्के छुड़ा सकता है। लेकिन हमारे यहाँ तो लोग चुप रहने को कमजोरी समझते हैं। हमें लगता है कि अगर हम लगातार नॉन स्टॉप बोलेंगे तभी हम सामने वाले पर हावी हो पाएंगे। असलियत में जो ज्यादा बोलता है वह अपनी उतनी ही ज्यादा कमजोरियां जगजाहिर करता है।

मान लीजिए आप किसी पुराने दोस्त को अपनी पुरानी बाइक बेच रहे हैं। आपने कीमत बताई पचास हजार। दोस्त ने कहा कि यार यह तो बहुत ज्यादा है मैं तो सिर्फ तीस हजार ही दे पाऊंगा। अब ज्यादातर लोग यहाँ घबरा जाते हैं और तुरंत बोलने लगते हैं कि नहीं भाई इसमें नए टायर डलवाए हैं इसका इंजन एकदम झकास है वगैरह वगैरह। लेकिन एक स्मार्ट नेगोशिएटर क्या करेगा। वह बस चुपचाप दोस्त की आँखों में देखेगा और कुछ नहीं बोलेगा। बस एक गहरी खामोशी। अब वह दोस्त जो तीस हजार बोलकर अपनी जीत मना रहा था उसे अजीब लगने लगेगा। उसे लगेगा कि शायद उसने बहुत कम बोल दिया है। वह उस सन्नाटे को झेल नहीं पाएगा और खुद ही बोलेगा कि अच्छा चल ठीक है पैंतीस हजार ले ले। बस कुछ सेकंड की चुप्पी ने आपकी जेब में पांच हजार एक्स्ट्रा डलवा दिए।

खामोशी का मतलब सिर्फ चुप रहना नहीं है बल्कि यह सामने वाले को सोचने पर मजबूर करना है। जब आप कम बोलते हैं तो आप एक रहस्यमयी इंसान बन जाते हैं। सामने वाले को समझ नहीं आता कि आपके दिमाग में क्या चल रहा है। वह अपनी घबराहट में ऐसे राज उगल देता है जो वह कभी नहीं बताना चाहता था। ऑफिस की मीटिंग्स में भी यही होता है। जब बॉस कोई मुश्किल सवाल पूछे तो तुरंत सफाई देने की जगह दो सेकंड का पॉज लीजिए। वह सन्नाटा कमरे में एक ऐसा दबाव पैदा करेगा कि बॉस खुद ही अपनी बात को नरम कर देगा। जो इंसान अपनी जुबान पर कंट्रोल रख सकता है वह पूरी दुनिया पर कंट्रोल रख सकता है।

लेकिन याद रखिए यह खामोशी ईगो वाली नहीं होनी चाहिए। यह एक सोची समझी स्ट्रैटेजी होनी चाहिए। आपको सुनना ज्यादा है और बोलना कम। जब आप सुनते हैं तो आप सामने वाले की जरूरतें उसका डर और उसकी लिमिट्स को समझ पाते हैं। पीटर स्टार्क का मानना है कि एक अच्छा नेगोशिएटर एक जासूस की तरह होता है जो सन्नाटे के जरिए सच बाहर निकालता है। तो अगली बार जब कोई आपको कम दाम ऑफर करे या आपकी बात न माने तो फौरन बहस मत शुरू कर दीजिए। बस एक लंबी सांस लीजिए सामने वाले को शांति से देखिए और उस खामोशी को अपना काम करने दीजिए। आप हैरान रह जाएंगे कि कैसे लोग खुद ही हार मानकर आपकी शर्तों पर आ जाते हैं। जीत हमेशा शोर मचाने वालों की नहीं बल्कि शांति से सही चाल चलने वालों की होती है।


दोस्तो, नेगोशिएशन कोई ऐसी चीज नहीं है जो सिर्फ बड़े बिजनेसमैन ही करते हैं। यह आपकी हर रोज की जिंदगी का हिस्सा है। चाहे वह ऑटो वाले से किराया कम करवाना हो या अपनी कंपनी से प्रमोशन मांगना। अगर आप तैयारी के साथ जाएंगे विन विन अप्रोच रखेंगे और जरूरत पड़ने पर खामोश रहेंगे तो यकीन मानिए आपको हराना नामुमकिन होगा। अब आप नीचे कमेंट्स में बताइए कि वह कौन सी एक डील है जो आप काफी समय से क्लोज करना चाहते हैं पर कर नहीं पा रहे। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जिसे ना कहना नहीं आता। अब समय है एक दबंग नेगोशिएटर बनने का।

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