The Power of Minds at Work (Hindi)


आपकी कंपनी के लोग मिलकर काम कर रहे हैं या बस अपनी सैलरी का इंतजार। अगर आपको लगता है कि सिर्फ टैलेंटेड लोगों को हायर करने से बिजनेस चमक जाएगा तो मुबारक हो आप कलेक्टिव स्टुपिडिटी के शिकार हैं। बिना आर्गेनाइजेशनल इंटेलिजेंस के आपकी टीम बस एक दिशाहीन भीड़ है।

क्या आप भी अपनी टीम की असली मेंटल पावर को वेस्ट कर रहे हैं। आज हम कार्ल अल्ब्रेक्ट की किताब से सीखेंगे कि कैसे दिमागों को जोड़कर एक सुपर आर्गेनाइजेशन बनाई जाती है जो मार्केट में तहलका मचा दे। चलिए इन 3 पावरफुल लेसन्स को गहराई से समझते हैं।


लेसन १ : आर्गेनाइजेशनल इंटेलिजेंस - जब दिमाग मिलते हैं तो चमत्कार होता है

मान लीजिए आपकी कंपनी एक बहुत बड़ी और महँगी कार है जिसमें दुनिया के सबसे बढ़िया टायर्स और इंजन लगा है। लेकिन एक छोटी सी दिक्कत है। कार का स्टीयरिंग बायीं तरफ भाग रहा है और पहिए दायीं तरफ जाने की जिद कर रहे हैं। क्या ऐसी कार कभी अपनी मंजिल तक पहुँचेगी। बिल्कुल नहीं। कार्ल अल्ब्रेक्ट कहते हैं कि आर्गेनाइजेशनल इंटेलिजेंस का मतलब यही है कि कंपनी के सारे दिमाग एक ही दिशा में सोचें और काम करें। अक्सर ऑफिस में ऐसा होता है कि मार्केटिंग वाले कुछ और बोल रहे हैं और सेल्स वाले अपनी ही अलग धुन में मगन हैं। इसे देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी शादी में फूफाजी अलग नाराज बैठे हैं और जीजाजी अपनी अलग ही चौधर दिखा रहे हैं।

असल जिंदगी का एक उदाहरण देखिए। एक सॉफ्टवेयर कंपनी थी जिसने शहर के सबसे महंगे और टॉपर कोडर्स को नौकरी पर रखा। सबको लगा कि अब तो यह कंपनी गूगल को पीछे छोड़ देगी। लेकिन हुआ इसका उल्टा। हर कोडर खुद को दूसरे से ज्यादा स्मार्ट समझता था। जब भी कोई नया प्रोजेक्ट आता तो मीटिंग रूम एक जंग का मैदान बन जाता था। वहां काम कम और ईगो की लड़ाई ज्यादा होती थी। लोग एक दूसरे की मदद करने के बजाय एक दूसरे के कोड में गलतियां निकालने में ज्यादा समय बिताते थे। नतीजा क्या निकला। प्रोजेक्ट्स लेट होने लगे और क्लाइंट्स भाग गए। यह वह स्थिति है जिसे लेखक कलेक्टिव स्टुपिडिटी कहते हैं। जब बहुत सारे स्मार्ट लोग एक साथ बैठते हैं और उनका तालमेल जीरो होता है तो पूरी आर्गेनाइजेशन एक बेवकूफ की तरह बर्ताव करने लगती है।

आर्गेनाइजेशनल इंटेलिजेंस लाने के लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि हर इंसान को अपना रोल पता हो। जब तक टीम के बीच कम्युनिकेशन क्लियर नहीं होगा तब तक सब अपनी ढपली अपना राग अलापेंगे। आपने वो बॉस तो देखे ही होंगे जो मीटिंग में आकर ऐसी अंग्रेजी झाड़ते हैं कि आधे लोगों को लगता है कि शायद सैलरी कटने वाली है और बाकी आधे सोचते हैं कि आज खाने में क्या है। लेखक कहते हैं कि साफ़ और सीधा संवाद ही असली इंटेलिजेंस है। जब एक छोटे से स्टार्टअप में चाय पिलाने वाले से लेकर सीईओ तक सबको यह पता होता है कि अगले महीने का लक्ष्य क्या है तब जाकर असली जादू होता है।

इसे एक क्रिकेट मैच की तरह समझिए। अगर बैट्समैन सिर्फ अपने शतक के लिए खेले और बॉलर सिर्फ अपनी विकेट्स गिने तो टीम हार जाएगी। जीत तब मिलती है जब सबको पता हो कि उनका असली मकसद मैच जीतना है चाहे उसके लिए किसी को अपनी विकेट ही क्यों न कुर्बान करनी पड़े। ऑफिस में भी जब लोग अपनी डेस्क और अपनी कुर्सी से बाहर निकलकर पूरी कंपनी के बारे में सोचने लगते हैं तब जाकर वह आर्गेनाइजेशन सच में इंटेलिजेंट बनती है। बिना इस समझ के आप चाहे कितनी भी महँगी ट्रेनिंग करवा लें या ऑफिस में फ्री पिज्जा बांट दें काम नहीं बनने वाला। अगर लोग एक दूसरे को नीचा दिखाने में बिजी हैं तो समझ लीजिए कि आपकी कंपनी का आईक्यू लेवल किसी नर्सरी के बच्चे से भी कम हो चुका है। इसलिए दिमागों को जोड़ना सीखिए उन्हें आपस में लड़ाना नहीं।


लेसन २ : कलेक्टिव स्टुपिडिटी - समझदारों की वह महफ़िल जहाँ काम बिगड़ता है

क्या आपने कभी किसी ऐसी मीटिंग में हिस्सा लिया है जहाँ दो घंटे तक बहस हुई और अंत में नतीजा यह निकला कि अगली मीटिंग कब करनी है। अगर हाँ तो आप कलेक्टिव स्टुपिडिटी यानी सामूहिक बेवकूफी का लाइव नजारा देख चुके हैं। कार्ल अल्ब्रेक्ट कहते हैं कि यह एक ऐसी बीमारी है जो बड़ी बड़ी कंपनियों को अंदर से खोखला कर देती है। इसमें होता यह है कि कंपनी में काम करने वाले इंडिविजुअल्स तो बहुत जीनियस होते हैं लेकिन जैसे ही वे एक कमरे में साथ बैठते हैं उनका कुल दिमाग घुटनों में चला जाता है। यह कुछ वैसा ही है जैसे आप दुनिया के सबसे बेहतरीन ग्यारह शेफ को बुलाएं और उनसे एक खिचड़ी बनाने को कहें। हर कोई अपना गुप्त मसाला डालेगा और अंत में जो चीज बनेगी उसे कुत्ता भी नहीं सूंघेगा।

एक बड़ी कार बनाने वाली कंपनी थी। उनके पास एक से बढ़कर एक इंजीनियर थे। उन्होंने एक ऐसी कार डिजाइन की जो बहुत सुरक्षित थी और जिसका माइलेज भी जबरदस्त था। लेकिन जब मार्केटिंग टीम की बारी आई तो उन्होंने तय किया कि इस कार का नाम कुछ ऐसा होना चाहिए जो बहुत ही हटकर हो। उन्होंने काफी रिसर्च की और एक ऐसा नाम चुना जिसका स्पेनिश भाषा में मतलब होता था 'वह जो चलती नहीं'। अब आप ही सोचिए कि कौन समझदार इंसान ऐसी कार खरीदेगा जिसका नाम ही चिल्ला चिल्ला कर कह रहा हो कि भाई मैं तो आगे नहीं बढ़ूंगी। वहां मौजूद किसी भी इंसान ने यह नहीं सोचा कि नाम रखने से पहले एक बार डिक्शनरी चेक कर लें। सब एक दूसरे की हां में हां मिलाते रहे क्योंकि कोई भी बॉस के सामने विलेन नहीं बनना चाहता था।

यही कलेक्टिव स्टुपिडिटी का सबसे बड़ा कारण है 'यस मैन' कल्चर। जब ऑफिस में लोग सच बोलने के बजाय वह बोलने लगते हैं जो बॉस सुनना चाहता है तो कंपनी का पतन शुरू हो जाता है। लोग सोचते हैं कि अगर मैंने बीच में कुछ बोला तो कहीं मेरी अप्रेजल की फाइल डस्टबिन में न चली जाए। इससे बेहतर है कि चुपचाप सिर हिलाते रहो और कंपनी को गड्ढे में जाते देखते रहो। लेखक के अनुसार यह स्थिति तब पैदा होती है जब कंपनी में डर का माहौल होता है। जहाँ सवाल पूछना मना हो वहां सिर्फ आदेशों का पालन होता है और आदेश देने वाला भी अक्सर जमीनी हकीकत से कोसों दूर होता है।

इस बेवकूफी से बचने का एक ही तरीका है और वह है 'साइकोलॉजिकल सेफ्टी'। इसका मतलब है कि टीम का सबसे जूनियर मेंबर भी अपनी बात बिना डरे रख सके। इमेजिन कीजिए कि एक रॉकेट लॉन्च होने वाला है और एक सफाई कर्मचारी को दिखता है कि एक नट ढीला है। अगर वह डर के मारे चुप रहता है कि साहब मुझे डांटेंगे तो करोड़ों का रॉकेट धुंआ बन जाएगा। लेकिन अगर आर्गेनाइजेशन इंटेलिजेंट है तो वह कर्मचारी तुरंत चिल्लाकर सबको बताएगा और उसे इसके लिए इनाम मिलेगा न कि डांट। ऑफिस पॉलिटिक्स और ईगो को साइड में रखकर जब लोग सिर्फ 'सच' और 'रिजल्ट' पर फोकस करते हैं तभी यह सामूहिक बेवकूफी खत्म होती है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी टीम स्मार्ट बने तो पहले उन्हें गलत होने की आजादी दीजिए। वरना आप बस रोबोट्स की एक फ़ौज पाल रहे हैं जो बिना दिमाग चलाए बस स्विच दबने का इंतजार कर रही है।


लेसन ३ : स्ट्रक्चर और कल्चर का तालमेल - सिर्फ दीवारों से कंपनी नहीं बनती

अगर आपने एक बहुत ही आलीशान फाइव स्टार होटल बनाया है लेकिन वहां का वेटर आपसे ऐसे बात करता है जैसे आपने उससे उसकी किडनी मांग ली हो तो क्या आप वहां दोबारा जाएंगे। कभी नहीं। कार्ल अल्ब्रेक्ट का तीसरा लेसन इसी बारे में है। वह कहते हैं कि किसी भी आर्गेनाइजेशन की कामयाबी उसके स्ट्रक्चर यानी ढाँचे और कल्चर यानी वहां के माहौल के बीच के तालमेल पर टिकी होती है। स्ट्रक्चर का मतलब है आपकी कंपनी के नियम कायदे और कल्चर का मतलब है वह तरीका जिससे लोग असल में एक दूसरे से पेश आते हैं। अगर नियम कहते हैं कि हम कस्टमर को भगवान मानते हैं लेकिन आपका स्टाफ कस्टमर को देखते ही मुंह बना लेता है तो समझ लीजिए कि आपकी नैया डूबने वाली है।

एक बहुत बड़ी सरकारी बैंक थी जिसने करोड़ों रुपये खर्च करके अपना पूरा सिस्टम डिजिटल कर दिया। उन्होंने बड़ी बड़ी मशीनें लगायीं और दीवारों पर पोस्टर चिपका दिए कि अब हम दुनिया के सबसे फ़ास्ट बैंक हैं। लेकिन वहां काम करने वाले बाबूजी का कल्चर अभी भी वही पुराना था। जब एक ग्राहक अपना काम करवाने गया तो बाबूजी ने चश्मा नाक पर टिकाया और बोले कि सर्वर डाउन है कल आना। अब आप चाहे सुपर कंप्यूटर लगा लें या रॉकेट की स्पीड वाला इंटरनेट अगर काम करने वाले इंसान की नियत ही लंच ब्रेक के बाद आने की है तो वह टेक्नोलॉजी सिर्फ शो पीस बनकर रह जाएगी। यह स्ट्रक्चर और कल्चर का वह गैप है जो किसी भी अच्छे खासे बिजनेस का कचरा कर सकता है।

अल्ब्रेक्ट कहते हैं कि एक इंटेलिजेंट आर्गेनाइजेशन वह है जहाँ नियम लोगों की मदद के लिए बनाए जाते हैं न कि उन्हें परेशान करने के लिए। आपने वो ऑफिस तो देखे ही होंगे जहाँ छोटी सी पेन लेने के लिए भी आपको तीन मैनेजरों के साइन करवाने पड़ते हैं। इसे रेड टेपिज्म कहते हैं और यह कलेक्टिव इंटेलिजेंस का सबसे बड़ा दुश्मन है। जब स्ट्रक्चर इतना भारी हो जाए कि इंसान उसके नीचे दबने लगे तो क्रिएटिविटी मर जाती है। लोग बस फाइलों को इधर से उधर खिसकाने में बिजी रहते हैं और असली काम कहीं पीछे छूट जाता है। यह कुछ वैसा ही है जैसे आप घर में मेहमान बुलाएं और उन्हें सोफे पर बैठने से पहले दस फॉर्म भरवाएं। मेहमान भाग जाएगा और आपकी इज्जत का फालूदा हो जाएगा।

एक सफल कंपनी का कल्चर ऐसा होना चाहिए जहाँ हर कोई खुद को मालिक समझे। जब एक कर्मचारी को लगता है कि उसकी राय की वैल्यू है तो वह अपना सौ प्रतिशत देता है। आपको अपने स्ट्रक्चर को लचीला बनाना होगा ताकि वह बदलते वक्त के साथ ढल सके। अगर मार्केट बदल रहा है और आपकी कंपनी अभी भी दादा आदम के जमाने के नियमों पर चल रही है तो आप बहुत जल्द इतिहास की किताबों में मिलेंगे। याद रखिए कि लोग आपकी कंपनी के लोगो या बिल्डिंग से नहीं जुड़ते वे वहां के अनुभव और व्यवहार से जुड़ते हैं। जब आपका स्ट्रक्चर और कल्चर एक ही सुर में गाने लगते हैं तभी वह आर्गेनाइजेशन एक सुरम्य संगीत की तरह चलती है जो सबको मंत्रमुग्ध कर देती है।

अपनी टीम के साथ बैठिए और पूछिए कि क्या हमारे नियम हमें आगे बढ़ा रहे हैं या हमारे पैरों की बेड़ियाँ बन रहे हैं। जिस दिन आपने इन बेड़ियों को तोड़कर एक खुला और पारदर्शी माहौल बना दिया उस दिन आपकी कंपनी को टॉप पर पहुँचने से कोई नहीं रोक पाएगा।


तो दोस्तों, क्या आपकी टीम भी कलेक्टिव स्टुपिडिटी का शिकार है या आप एक इंटेलिजेंट आर्गेनाइजेशन बनाने की राह पर हैं। याद रखिए कि अकेले इंसान का दिमाग तेज हो सकता है लेकिन जंग हमेशा पूरी टीम के दिमाग से जीती जाती है। आज ही अपने ऑफिस या अपनी टीम में जाकर एक ऐसा बदलाव करें जिससे सबको अपनी बात कहने की आजादी मिले। नीचे कमेंट्स में बताएं कि आपको इन तीनों लेसन में से कौन सा सबसे ज्यादा पसंद आया और इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो अपनी टीम को लीड कर रहा है।

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