The Southwest Airlines Way (Hindi)


क्या आप भी अपनी टीम को रोबोट समझकर उनसे काम निकलवाने की कोशिश कर रहे हैं और फिर भी रिजल्ट्स जीरो हैं? मुबारक हो, आप अपनी कंपनी को डुबाने की रेस में सबसे आगे चल रहे हैं। बिना रिश्तों के सक्सेस ढूंढना वैसे ही है जैसे बिना पेट्रोल के अपनी महंगी गाड़ी को धक्का मारना।

आज हम जोडी गिटेल की किताब द साउथवेस्ट एयरलाइंस वे से सीखेंगे कि कैसे रिश्तों की पावर का इस्तेमाल करके आप एक हाई परफॉरमेंस वर्क कल्चर खड़ा कर सकते हैं। चलिए देखते हैं वो 3 बड़े लेसन जो आपका बिजनेस और करियर बदल देंगे।


लेसन १ : शेयरड गोल्स और म्यूचुअल रेस्पेक्ट की ताकत

अगर आपको लगता है कि ऑफिस में सिर्फ ऑर्डर देकर और लोगों को डराकर आप दुनिया जीत लेंगे तो शायद आप किसी पुरानी सदी की फिल्म में जी रहे हैं। साउथवेस्ट एयरलाइंस ने दुनिया को दिखाया कि असली सक्सेस तब मिलती है जब पूरी टीम के गोल्स एक हों और उनके बीच आपस में जबरदस्त इज्जत हो। इमेजिन कीजिये एक ऐसी सिचुएशन जहां पायलट खुद प्लेन के अंदर कचरा उठा रहा है क्योंकि उसे पता है कि प्लेन को टाइम पर उड़ना है। हमारे यहां तो अगर चपरासी छुट्टी पर चला जाए तो बॉस के हाथ से पानी का गिलास भी नहीं उठता क्योंकि उनकी ईगो इतनी बड़ी है कि वो उसे संभालते संभालते ही थक जाते हैं। साउथवेस्ट ने सिखाया कि जब तक एक टीम के अंदर म्यूचुअल रेस्पेक्ट यानी आपसी सम्मान नहीं होगा तब तक आप सिर्फ एक भीड़ हैं और कुछ नहीं।

जरा सोचिए उस कंपनी के बारे में जहां हर कोई अपनी अपनी ढपली बजा रहा है। सेल्स वाले कहते हैं कि हमने तो टारगेट पूरा कर दिया अब प्रोडक्शन वाले जानें। मार्केटिंग वाले कहते हैं कि हमने तो लीड्स दे दी अब सेल्स वाले बेकार हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक क्रिकेट मैच में बैट्समैन कहे कि मैंने तो शतक मार दिया अब अगर बॉलर रन लुटा रहे हैं तो मुझे क्या फर्क पड़ता है। अरे भाई मैच तो हार जाओगे ना। साउथवेस्ट एयरलाइंस में यह ईगो वाला कचरा नहीं चलता। वहां हर कोई जानता है कि अगर प्लेन लेट हुआ तो सबकी नाक कटेगी। चाहे वो सामान उठाने वाला वर्कर हो या केबिन क्रू का मेंबर। सबके दिमाग में एक ही गोल होता है कि पैसेंजर को सही समय पर और मुस्कुराहट के साथ पहुंचाना है।

आजकल के कॉर्पोरेट कल्चर में लोग एक दूसरे की टांग खींचने में पीएचडी कर चुके हैं। अगर कोई कलीग अच्छा काम कर रहा है तो उसे एप्रिशिएट करने के बजाय लोग इस फिराक में रहते हैं कि कैसे उसकी छोटी सी गलती पकड़ी जाए और बॉस के सामने उसका रायता फैलाया जाए। लेकिन साउथवेस्ट का तरीका बिल्कुल अलग है। वो कहते हैं कि एक दूसरे की रेस्पेक्ट करना कोई एहसान नहीं बल्कि हाई परफॉरमेंस की पहली शर्त है। जब आप अपने साथी वर्कर की मेहनत की कद्र करते हैं तो वो आपके लिए अपनी जान झोंकने को तैयार हो जाता है। और जब पूरी टीम एक दूसरे के लिए खड़ी होती है तो बड़े से बड़ा कॉम्पिटिटर भी धूल चाटने लगता है।

मान लीजिए आपकी सोसाइटी में कोई फंक्शन है। अब एक तरफ वो लोग हैं जो सिर्फ हुक्म चला रहे हैं और खुद सोफे पर बैठकर चाय पी रहे हैं। दूसरी तरफ वो लोग हैं जो खुद टेंट लगा रहे हैं और खाना भी परोस रहे हैं। आप किस टीम का हिस्सा बनना चाहेंगे? जाहिर है दूसरी वाली का। क्योंकि वहां इज्जत है और एक साथ मिलकर काम करने का जुनून है। साउथवेस्ट एयरलाइंस ने इसी छोटे से फॉर्मूले को एक मल्टी बिलियन डॉलर कंपनी में बदल दिया। उन्होंने दिखाया कि जब गोल्स शेयरड होते हैं तो काम बोझ नहीं बल्कि एक मिशन बन जाता है। और जब मिशन बड़ा हो तो छोटे मोटे झगड़े अपने आप खत्म हो जाते हैं।

आज के इस दौर में जहां हर कोई सिर्फ अपने प्रमोशन और अपनी सैलरी की चिंता में डूबा है वहां दूसरों के काम को समझना और उसे वैल्यू देना ही आपको एक लीडर बनाता है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी टीम या आपका बिजनेस आसमान की ऊंचाइयों को छुए तो सबसे पहले यह देखना बंद करें कि कौन क्या कर रहा है। बल्कि यह देखें कि आप एक दूसरे की मदद कैसे कर सकते हैं। जब तक आप सामने वाले की मेहनत को अपनी मेहनत नहीं मानेंगे तब तक आप उस लेवल की सक्सेस को कभी टच नहीं कर पाएंगे जिसके बारे में यह किताब बात करती है। तो क्या आप तैयार हैं अपनी ईगो को साइड में रखकर अपनी टीम को वो इज्जत देने के लिए जिसके वो हकदार हैं?


लेसन २ : मुश्किल समय में अपनी टीम का हाथ थामना

बिजनेस की दुनिया में जब तक मुनाफा हो रहा है तब तक तो हर कोई आपकी पीठ थपथपाने आ जाएगा। लेकिन जैसे ही मार्केट में मंदी आती है या कोई बड़ा संकट खड़ा होता है तो सबसे पहले एम्प्लॉई की छंटनी यानी लेऑफ शुरू कर दिए जाते हैं। साउथवेस्ट एयरलाइंस ने यहां भी पूरी दुनिया को आईना दिखाया है। जब 9/11 के हमले के बाद पूरी एविएशन इंडस्ट्री घुटनों पर थी और बड़ी बड़ी एयरलाइंस अपने हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकाल रही थीं तब साउथवेस्ट इकलौती ऐसी कंपनी थी जिसने अपने एक भी कर्मचारी को घर नहीं भेजा। इसे कहते हैं असली कमिटमेंट। हमारे यहां तो अगर बॉस का मूड खराब हो जाए या महीने का बजट थोड़ा ऊपर नीचे हो जाए तो वो सीधे पिंक स्लिप पकड़ाने की सोचने लगते हैं। जैसे कर्मचारी कोई इंसान नहीं बल्कि रिप्लेसेबल सेल हो जिसे जब चाहो बदल दो।

साउथवेस्ट ने यह साबित किया कि एम्प्लॉई आपके लिए सिर्फ एक कॉस्ट नहीं बल्कि आपकी सबसे बड़ी एसेट यानी संपत्ति हैं। अगर आप बुरे वक्त में उनके साथ नहीं खड़े होंगे तो आप उनसे यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वो अच्छे वक्त में आपके लिए एक्स्ट्रा मेहनत करेंगे। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप अपने किसी दोस्त से उम्मीद करें कि वो आपकी शादी में नाचने आए लेकिन जब वो बीमार था तब आपने उसका फोन तक नहीं उठाया। यह रिश्ते ऐसे नहीं चलते। साउथवेस्ट की लीडरशिप ने यह साफ कर दिया था कि चाहे हमें अपनी ग्रोथ थोड़ी धीमी करनी पड़े या प्रॉफिट कम हो जाए लेकिन हम उन लोगों का साथ नहीं छोड़ेंगे जिन्होंने इस कंपनी को अपने पसीने से सींचा है।

जरा सोचिए उस एम्प्लॉई के बारे में जिसे पता है कि चाहे बाहर तूफान क्यों न आ जाए उसकी कंपनी उसे डूबने नहीं देगी। ऐसा वर्कर ऑफिस में काम करने नहीं आता बल्कि वो वहां अपनी पूरी आत्मा झोंक देता है। वो कंपनी के पैसे को वैसे ही बचाता है जैसे वो अपनी खुद की बचत हो। इसे ही तो हम हाई परफॉरमेंस कहते हैं। लेकिन आजकल का हाल तो यह है कि लोग ऑफिस सिर्फ इसलिए जाते हैं ताकि महीने के अंत में सैलरी आ जाए और बॉस की गालियों से बचा जा सके। यहां कोई रिश्ता नहीं है बस एक सौदा है। और सौदा तब तक ही चलता है जब तक फायदा हो। जिस दिन फायदा खत्म उस दिन रिश्ता खत्म। साउथवेस्ट ने इस सौदेबाजी को खत्म करके एक परिवार जैसा माहौल बनाया।

मान लीजिए आप एक ऐसी बस में सफर कर रहे हैं जिसका ड्राइवर जानता है कि अगर बस खराब हुई तो उसे तुरंत नौकरी से निकाल दिया जाएगा। वो ड्राइवर बस को बस चलाने के लिए चलाएगा। लेकिन अगर उसी ड्राइवर को पता हो कि मालिक उसे अपने भाई जैसा मानता है और हर हाल में उसके साथ है तो वो ड्राइवर बस के इंजन की आवाज तक पर ध्यान देगा कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हो रही। यही छोटा सा फर्क एक साधारण कंपनी और एक महान कंपनी के बीच की खाई को पाट देता है। साउथवेस्ट ने यह समझ लिया था कि डर के साये में काम करने वाले लोग कभी कमाल नहीं कर सकते। कमाल वो करते हैं जिन्हें यह पता हो कि पीछे खड़ा होने वाला कोई है।

इस किताब का यह लेसन हमें सिखाता है कि अगर आप लीडर बनना चाहते हैं तो आपको अपनी टीम का भरोसा जीतना होगा। और भरोसा तब नहीं जीता जाता जब सब कुछ ठीक चल रहा हो बल्कि तब जीता जाता है जब सब कुछ बिखर रहा हो। अगर आप मुश्किल समय में अपने लोगों की ढाल नहीं बन सकते तो आप लीडर कहलाने के लायक ही नहीं हैं। याद रखिये मशीनें खरीदी जा सकती हैं और टेक्नोलॉजी कॉपी की जा सकती है लेकिन जो वफादारी और रिश्ता आप अपने लोगों के साथ बनाते हैं उसे कोई कॉम्पिटिटर कभी नहीं चुरा सकता। तो क्या आप में वो जिगरा है कि आप मंदी के दौर में भी अपनी टीम को यह कह सकें कि डरो मत मैं तुम्हारे साथ हूँ?


लेसन ३ : ब्लेम गेम छोड़कर प्रॉब्लम सॉल्विंग पर फोकस करना

क्या आपके ऑफिस में भी ऐसा होता है कि जब कोई गलती होती है तो सब एक दूसरे का चेहरा देखने लगते हैं जैसे कोई जासूसी फिल्म चल रही हो? हर कोई यह साबित करने में लग जाता है कि गलती मेरी नहीं उसकी थी। साउथवेस्ट एयरलाइंस ने इस 'तू तू मैं मैं' के कल्चर को जड़ से उखाड़ फेंका। उन्होंने सिखाया कि जब जहाज जमीन पर खड़ा होता है तो कंपनी के पैसे जल रहे होते हैं। ऐसे में यह ढूंढना कि सामान लेट क्यों हुआ या सफाई में देरी क्यों हुई उससे ज्यादा जरूरी यह है कि सब मिलकर उस देरी को कैसे खत्म करें। हमारे यहां तो अगर घर में नल टपकने लगे तो पति पत्नी पर चिल्लाता है और पत्नी बच्चों पर जबकि नल ठीक करने के लिए प्लम्बर को फोन कोई नहीं करता।

साउथवेस्ट में जब भी कोई प्रॉब्लम आती है तो उसे एक इंडिविजुअल की गलती नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की चुनौती माना जाता है। वहां के मैनेजर्स उंगली उठाने के बजाय हाथ बढ़ाने में यकीन रखते हैं। अगर गेट पर भीड़ ज्यादा है तो ऑपरेशंस वाला बंदा भी टिकटिंग में मदद करने पहुंच जाता है। इसे ही कहते हैं बाउंड्रीलेस ऑर्गेनाइजेशन। जहां काम की कोई दीवार नहीं होती। लेकिन आजकल के ज्यादातर दफ्तरों में तो लोग अपना जेडी यानी जॉब डिस्क्रिप्शन हाथ में लेकर घूमते हैं। अगर उनसे कह दो कि भाई जरा यह फाइल उधर रख दो तो जवाब आता है कि यह मेरे काम का हिस्सा नहीं है। यह एटीट्यूड बिजनेस को दीमक की तरह चाट जाता है।

जरा कल्पना कीजिये एक ऐसी टीम की जहां गलती होने पर आपको सजा का डर नहीं बल्कि मदद की उम्मीद हो। जब डर खत्म होता है तो इनोवेशन शुरू होता है। साउथवेस्ट के एम्प्लॉई अपनी गलतियों को छुपाते नहीं हैं बल्कि उन्हें खुलकर बताते हैं ताकि बाकी लोग उससे सीख सकें। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप अपने दोस्तों के साथ ट्रिप पर जा रहे हों और टायर पंक्चर हो जाए। क्या आप वहां बैठकर यह बहस करेंगे कि गाड़ी किसने तेज चलाई थी या आप सब मिलकर स्टेपनी बदलेंगे? साउथवेस्ट एयरलाइंस एक ऐसी ही टीम है जो हमेशा स्टेपनी बदलने के लिए तैयार रहती है। उन्होंने साबित किया कि ब्लेम गेम सिर्फ वक्त और एनर्जी की बर्बादी है।

एक और मजेदार बात यह है कि जब आप किसी पर उंगली उठाते हैं तो आप उसके साथ अपना रिश्ता खराब कर लेते हैं। और जैसा कि जोडी गिटेल ने कहा है यह पूरा बिजनेस रिश्तों पर टिका है। एक बार अगर भरोसा टूट गया तो फिर टीम वर्क सिर्फ कागजों पर रह जाता है। साउथवेस्ट के लोग एक दूसरे को अपना कॉम्पिटिटर नहीं बल्कि अपना पार्टनर मानते हैं। वहां का कल्चर ऐसा है कि अगर पायलट को दिख रहा है कि ग्राउंड क्रू थक गया है तो वो उन्हें जोक्स सुनाकर या खुद मदद करके उनका हौसला बढ़ाता है। यही वो जादू है जो साउथवेस्ट को दुनिया की सबसे प्रॉफिटेबल एयरलाइंस में से एक बनाता है।

तो इस पूरी चर्चा का सार यह है कि अगर आप वाकई में हाई परफॉरमेंस चाहते हैं तो आपको अपनी टीम के बीच से डर का माहौल हटाना होगा। लोगों को गलतियां करने की आजादी दें और उन गलतियों से साथ मिलकर लड़ने का साहस पैदा करें। जब आपकी टीम को लगेगा कि उनका बॉस या उनका साथी उन्हें नीचा दिखाने के लिए नहीं बल्कि उन्हें उठाने के लिए बैठा है तो वो चमत्कार कर दिखाएंगे। बिजनेस सिर्फ नंबर्स का खेल नहीं है बल्कि उन लोगों के दिलों का मेल है जो उन नंबर्स को सच करते हैं। तो आज से ही अपनी टीम में ब्लेम गेम बंद कीजिये और रिश्तों की नई बुनियाद रखिये।


दोस्तों, रिश्तों की यह पावर सिर्फ साउथवेस्ट एयरलाइंस तक सीमित नहीं है। इसे आप अपनी जिंदगी और अपने काम में आज ही लागू कर सकते हैं। नीचे कमेंट में बताएं कि क्या आपने कभी अपने ऑफिस या काम में ऐसी सिचुएशन झेली है जहां टीम वर्क ने नामुमकिन को मुमकिन कर दिया? इस आर्टिकल को अपने उस टीम मेंबर के साथ शेयर करें जिसे आप सच में रेस्पेक्ट करते हैं। चलिए मिलकर एक ऐसा वर्क कल्चर बनाते हैं जहां लोग काम से नहीं बल्कि एक दूसरे से प्यार करें।

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