क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो मंडे से फ्राइडे तक एक लाश की तरह काम करते हैं और सिर्फ सैटरडे संडे का इंतज़ार करते हैं। मुबारक हो आप अपनी जिंदगी के सत्तर परसेंट हिस्से को सिर्फ इसलिए बर्बाद कर रहे हैं क्योंकि आपको लगता है कि काम करना एक सजा है। यह सोच आपको थका देगी और अंत में आपके पास सिर्फ अफसोस बचेगा।
इस आर्टिकल में हम रिकार्दो सेमलर की बुक द सेवन डे वीकेंड से सीखेंगे कि कैसे आप अपने काम और मजे को एक साथ जोड़ सकते हैं। चलिए जानते हैं वो ३ कमाल के लेसन जो आपके जीने का तरीका बदल देंगे।
लेसन १ : अपनी लाइफ को वीकेंड के भरोसे मत छोड़ो
हममें से ज्यादातर लोग एक बहुत ही अजीब बीमारी के शिकार हैं जिसे मैं "वीकेंड सिंड्रोम" कहता हूँ। हम मंडे की सुबह ऐसे उठते हैं जैसे हमें फांसी की सजा सुना दी गई हो। पूरे पांच दिन हम ऑफिस में एक रोबोट की तरह कीबोर्ड पीटते रहते हैं और मन ही मन फ्राइडे की शाम का सपना देखते हैं। हमारा मर्म यह है कि असली लाइफ तो बस सैटरडे और संडे को होती है बाकी पांच दिन तो बस गुलामी है। रिकार्दो सेमलर कहते हैं कि यह दुनिया का सबसे बड़ा स्कैम है जो आपने खुद के साथ किया है। क्यों भाई आपकी लाइफ के वो पांच दिन क्या पड़ोसियों के हैं। क्या आपने अपनी खुशियों का ठेका सिर्फ हफ्ते के दो दिनों को दे रखा है।
सोचिए आप एक सुंदर पहाड़ी रास्ते पर गाड़ी चला रहे हैं लेकिन आप खिड़की से बाहर नहीं देख रहे क्योंकि आप सिर्फ डेस्टिनेशन पर पहुँचने की जल्दी में हैं। काम और मजे को अलग करना छोड़ दीजिए। सेमलर का मानना है कि अगर आप मंडे की दोपहर को मूवी देखना चाहते हैं तो जाइए और देखिए। अगर आपको संडे की रात को कोई बढ़िया बिजनेस आईडिया आता है तो उस पर काम कीजिए। अपनी लाइफ को कैलेंडर के उन लाल खानों के हिसाब से मत चलाइए। लाइफ कोई जेल की सजा नहीं है जिसे आप काट रहे हैं।
आजकल के कॉर्पोरेट कल्चर ने हमें सिखाया है कि डेस्क पर बैठना ही काम करना है। लेकिन सच तो यह है कि सबसे बेहतरीन आइडियाज अक्सर शावर लेते समय या वॉक करते समय आते हैं ना कि उस घुटन भरे क्यूबिकल में। अगर आप अपनी पूरी जवानी सिर्फ सैटरडे का वेट करने में निकाल देंगे तो यकीन मानिए रिटायरमेंट तक आप सिर्फ एक थके हुए इंसान बन कर रह जाएंगे। मजे को कल पर टालना बंद कीजिए।
अगर आपको आज कॉफी पीते हुए धूप सेंकने का मन है तो उसे काम के बीच में ही करिए। काम को अपनी लाइफ का हिस्सा बनाइए उसे अपनी लाइफ का दुश्मन मत समझिए। जब आप काम और लाइफ के बीच की इस दीवार को गिरा देते हैं तब आप असली मायने में जीना शुरू करते हैं। वरना तो आप बस एक ऐसे चूहे हैं जो अपनी ही रेस में भाग रहा है और जिसे लगता है कि पिंजरे से बाहर की दुनिया सिर्फ दो दिन के लिए खुलती है।
लेसन २ : एम्प्लॉइज को पूरी आजादी और जिम्मेदारी देना
अब बात करते हैं उस सबसे बड़े डर की जो हर बॉस और कंपनी के मालिक को रात भर सोने नहीं देता। वह डर है अपने एम्प्लॉइज पर भरोसा करना। ज्यादातर ऑफिसेस में माहौल ऐसा होता है जैसे कोई किंडरगार्टन स्कूल चल रहा हो। हर बात के लिए परमिशन लेना। लंच ब्रेक पांच मिनट ज्यादा हो गया तो बॉस की नजरें ऐसे घूमती हैं जैसे आपने उसकी जायदाद अपने नाम करवा ली हो। रिकार्दो सेमलर कहते हैं कि यह कंट्रोल करने की आदत असल में आपकी कंपनी को खोखला कर रही है। उन्होंने अपनी कंपनी सेमको में एक बहुत ही सिंपल सा फंडा अपनाया। लोगों को एडल्ट्स की तरह ट्रीट करो और उन्हें पूरी आजादी दे दो।
सोचिए अगर आपसे कहा जाए कि आपकी सैलरी आप खुद तय करेंगे। आपका वर्किंग टाइम आप खुद चुनेंगे और आपको कोई रिपोर्टिंग मैनेजर नहीं होगा। आप सोचेंगे कि भाई यह तो फिर कंपनी नहीं चैरिटी बन जाएगी और लोग सारा दिन सोफे पर बैठकर नेटफ्लिक्स देखेंगे। लेकिन सेमलर का जादू यहीं काम करता है। जब आप किसी को आजादी देते हैं तो आप उसे जिम्मेदारी का एक भारी बोझ भी देते हैं। इंसान का ईगो उसे काम करने पर मजबूर करता है क्योंकि अब वह किसी और के लिए नहीं बल्कि अपनी इज्जत के लिए काम कर रहा होता है। सेमको में लोग खुद तय करते थे कि उन्हें कितना कमाना है और कब छुट्टी लेनी है। रिजल्ट यह हुआ कि कंपनी की ग्रोथ रॉकेट की तरह ऊपर गई।
हमारे देश में तो अटेंडेंस रजिस्टर और बायोमेट्रिक मशीन को भगवान माना जाता है। बॉस को लगता है कि अगर बंदा नौ से पांच कुर्सी पर बैठा है तो वह काम कर रहा है। भले ही वह स्क्रीन पर क्रिकेट का स्कोर देख रहा हो या फेसबुक स्क्रॉल कर रहा हो। सेमलर इस दिखावे की मेहनत को कचरा मानते हैं। वह कहते हैं कि लोगों को काम के घंटों पर नहीं बल्कि काम के रिजल्ट्स पर जज करो।
अगर कोई एम्प्लॉई अपना पूरा काम दो घंटे में करके घर जाना चाहता है तो उसे जाने दो। उसे जबरदस्ती ऑफिस में बैठाकर उसकी आत्मा को दुखी करने से आपको क्या मिलेगा। असली लीडर वह नहीं है जो सबको अपनी उंगलियों पर नचाए बल्कि वह है जो लोगों को इतना काबिल बना दे कि उसे कुछ करने की जरूरत ही न पड़े। जब आप कंट्रोल छोड़ते हैं तभी आप असल में लीड करते हैं। वरना तो आप बस एक बहुत महंगे चौकीदार हैं जो दूसरों की मेहनत पर नजर रख रहा है।
लेसन ३ : बेकार की मीटिंग्स और फालतू के नियमों को खत्म करना
क्या आपने कभी गौर किया है कि ऑफिस की आधी जिंदगी तो सिर्फ यह डिस्कस करने में निकल जाती है कि हमें काम क्या करना है। इसे हम प्यार से 'मीटिंग' कहते हैं। एक ऐसी जगह जहाँ दस लोग मिलकर यह तय करते हैं कि ग्यारहवें बंदे को क्या करना चाहिए और अंत में निकलता कुछ भी नहीं है। रिकार्दो सेमलर कहते हैं कि अगर आपको अपनी कंपनी और अपनी लाइफ को बचाना है तो इन फालतू के नियमों और मीटिंग्स के कचरे को बाहर फेंकना होगा। सेमको कंपनी में उन्होंने नियम बनाया कि कोई भी मीटिंग अनिवार्य नहीं होगी। अगर आपको लगता है कि आपका वहां होना समय की बर्बादी है तो आप बिना कुछ बोले उठकर जा सकते हैं। जरा सोचिए अगर हमारे यहाँ ऐसा हो जाए तो आधे से ज्यादा कॉन्फ्रेंस रूम तो खाली पड़े रहेंगे।
हम इंडियन्स को नियम बनाने का बहुत शौक है। ऑफिस में चप्पल पहनकर नहीं आना। ईमेल का जवाब दो मिनट में देना। फॉर्म नंबर १० बी भरना। ये सब नियम हमें डिसिप्लिन नहीं बनाते बल्कि हमें एक पिंजरे में बंद पंछी बना देते हैं जिसकी उड़ान भरने की इच्छा ही मर चुकी है। सेमलर कहते हैं कि नियम सिर्फ उन लोगों के लिए होते हैं जो दिमाग का इस्तेमाल नहीं करना चाहते। जब आप हर चीज के लिए एक मैन्युअल बना देते हैं तो आप अपने एम्प्लॉइज की क्रिएटिविटी का गला घोंट देते हैं। क्या आपने कभी किसी पेंटर को देखा है जो टाइम टेबल देखकर पेंटिंग बनाता हो या कोई म्यूजिशियन जो घड़ी देखकर सुर लगाता हो। काम एक आर्ट होना चाहिए ना कि एक बोझ।
सेमलर ने अपनी कंपनी में फाइलों का अंबार और लंबे-चौड़े बिजनेस प्लान्स खत्म कर दिए। उन्होंने सब कुछ इतना सिंपल रखा कि एक बच्चा भी समझ सके। जब चीजें सिंपल होती हैं तब काम करने में मजा आता है। असली प्रोडक्टिविटी तब नहीं आती जब आप बहुत बिजी दिखते हैं बल्कि तब आती है जब आप शांत दिमाग से सबसे जरूरी काम पर फोकस करते हैं।
अपनी लाइफ से उन सभी चीजों को डिलीट कर दीजिए जो सिर्फ दिखावे के लिए हैं। चाहे वो फालतू की नेटवर्किंग कॉल्स हों या वो ईमेल जिनका कोई अंत नहीं है। याद रखिए आपकी लाइफ का हर मिनट कीमती है और इसे उन चीजों में बर्बाद मत कीजिए जो आपको कोई वैल्यू नहीं दे रही हैं। जब आप सादगी को अपनाते हैं तब आप अपनी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ के बीच का वो परफेक्ट बैलेंस ढूंढ पाते हैं जिसे सब लोग ढूंढ रहे हैं लेकिन पा नहीं रहे।
तो दोस्तों, रिकार्दो सेमलर की यह फिलॉसफी हमें सिखाती है कि लाइफ सिर्फ रिटायरमेंट के बाद जीने के लिए नहीं है। आप आज भी अपनी मर्जी के मालिक बन सकते हैं बशर्ते आप अपनी पुरानी सोच को बदलने के लिए तैयार हों। काम को मजे के साथ जोड़िए और अपनी आजादी को वापस पाइए।
आपको इन ३ लेसन्स में से कौन सा लेसन सबसे ज्यादा पसंद आया। क्या आप भी अपने ऑफिस में मंडे को मूवी देखने की हिम्मत रखते हैं। हमें कमेंट्स में जरूर बताएं और इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हमेशा ऑफिस के काम का रोना रोता रहता है।
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