The Spark and the Grind (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सिर्फ रात को सपने में बड़े आइडियाज देख कर खुद को अगला स्टीव जॉब्स समझने लगते हैं। अगर हाँ तो मुबारक हो आप अपनी लाइफ को बर्बाद करने की सही राह पर हैं। बिना डिसिप्लिन के आपका वो महान आईडिया रद्दी के टुकड़े के बराबर है और आपकी सुस्ती उस रद्दी की टोकरी।

अब बहुत हुआ खाली पीली हवा में महल बनाना। अगर आप सच में अपनी क्रिएटिविटी को बैंक बैलेंस में बदलना चाहते हैं तो एरिक वाहल की यह बातें आपके दिमाग के बंद ताले खोल देंगी। चलिए जानते हैं उन ३ पावरफुल लेसन्स के बारे में जो आपको एक एवरेज इंसान से सुपर अचीवर बना देंगे।


लेसन १ : स्पार्क वर्सेस ग्राइंड का बैलेंस

जरा सोचिए आपके पास एक बहुत ही शानदार स्पोर्ट्स कार है। एकदम चमकती हुई और पावरफुल। लेकिन उसमें पेट्रोल ही नहीं है। क्या वो कार आपको अपनी मंजिल तक ले जाएगी। बिल्कुल नहीं। वो बस आपके गैरेज में खड़ी होकर धूल खाएगी और आपके पड़ोसी उसे देखकर आपका मजाक उड़ाएंगे। ठीक यही हाल उन लोगों का होता है जिनके पास सिर्फ स्पार्क होता है पर ग्राइंड करने की हिम्मत नहीं होती। स्पार्क का मतलब है वो छोटा सा बिजली का झटका या वो आईडिया जो आपके दिमाग में अचानक आता है। जैसे कि रात को २ बजे अचानक सोचना कि मैं दुनिया का सबसे बड़ा ऐप बनाऊंगा। यह स्पार्क सुनने में तो बहुत कूल लगता है और आपको थोड़े समय के लिए किसी फिल्म का हीरो महसूस कराता है। लेकिन असली खेल तब शुरू होता है जब सुबह सूरज निकलता है और आपको उस आईडिया पर काम करना पड़ता है।

ज्यादातर लोग स्पार्क के नशे में जीते हैं। उन्हें लगता है कि बस एक अच्छा आईडिया मिल जाए और लाइफ सेट हो जाएगी। भाई साहब अगर आईडिया से ही सब अमीर बन जाते तो आज सड़क पर खड़ा हर दूसरा इंसान करोड़पति होता। स्पार्क सिर्फ एक शुरुआत है। यह उस माचिस की तीली की तरह है जो आग तो लगा सकती है लेकिन उसे जलाए रखने के लिए आपको लकड़ियाँ यानी कि ग्राइंड की जरूरत पड़ती है। ग्राइंड का मतलब है वो बोरियत भरा काम जो आपको रोज करना पड़ता है। वो कोल्हू के बैल की तरह मेहनत करना जिसके बारे में कोई इंस्टाग्राम रील नहीं बनाता क्योंकि वह देखने में ग्लैमरस नहीं होता।

आजकल के युवाओं को लगता है कि क्रिएटिविटी का मतलब है पहाड़ों पर जाकर शांति से बैठना और किसी चमत्कार का इंतजार करना। सच तो यह है कि दुनिया के बड़े से बड़े आर्टिस्ट और बिजनेसमैन अपनी डेस्क पर बैठकर पसीना बहा रहे होते हैं जबकि बाकी दुनिया आईडिया के आने का इंतजार कर रही होती है। अगर आप सोचते हैं कि आप सिर्फ तब काम करेंगे जब आपका मूड अच्छा होगा तो यकीन मानिए आप कभी कुछ बड़ा नहीं कर पाएंगे। मूड तो उस बेवफा पार्टनर की तरह है जो वक्त पड़ने पर हमेशा साथ छोड़ देता है।

असली सक्सेस तब मिलती है जब आप अपने स्पार्क को ग्राइंड के साथ जोड़ देते हैं। एरिक वाहल कहते हैं कि डिसिप्लिन ही वो चीज है जो एक आवारा आईडिया को एक बिजनेस साम्राज्य में बदल देती है। अगर आप रोज सुबह उठकर अपने काम को वह समय नहीं दे रहे हैं जो उसे चाहिए तो आप सिर्फ एक ख्याली पुलाव पका रहे हैं। और याद रखिए ख्याली पुलाव से पेट नहीं भरता सिर्फ मन को तसल्ली मिलती है।

लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि भाई हम तो बहुत क्रिएटिव हैं पर पैसा क्यों नहीं आ रहा। जवाब सीधा है क्योंकि आप सिर्फ बातें करने में क्रिएटिव हैं काम करने में नहीं। जब आप ग्राइंड करना शुरू करते हैं तो शुरू में बहुत दर्द होता है। हाथ पैर फूलने लगते हैं और दिमाग कहता है कि चलो छोड़ो कोई वेब सीरीज देखते हैं। लेकिन जो इंसान उस बोरियत और उस थकावट को पार कर लेता है वही असली विजेता बनता है। ग्राइंड ही वो मशीन है जो आपके कच्चे आईडिया को फिनिश्ड प्रोडक्ट में बदलती है। इसलिए आज से ही अपने उस स्पार्क को अलमारी में बंद करना छोड़िए और उसे ग्राइंड की भट्टी में डाल दीजिए। तभी आपके नाम का सिक्का बाजार में चलेगा वरना आप सिर्फ एक और आईडिया वाले इंसान बनकर रह जाएंगे जिसकी कोई कीमत नहीं है।


लेसन २ : फेलियर को अपना दोस्त बनाना

अब बात करते हैं उस चीज की जिससे हम सबको डर लगता है जैसे बचपन में अंधेरे वाले कमरे से लगता था और वह है फेलियर। हमारे समाज में फेल होना किसी पाप से कम नहीं माना जाता। अगर आप फेल हो गए तो पड़ोसी ऐसे देखते हैं जैसे आपने उनकी जायदाद हड़प ली हो। लेकिन एरिक वाहल कहते हैं कि अगर आप फेल नहीं हो रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप कुछ नया कर ही नहीं रहे हैं। आप बस उसी पुरानी लीक पर चल रहे हैं जहाँ भीड़ चल रही है। क्रिएटिविटी की दुनिया में फेलियर कोई एंड पॉइंट नहीं है बल्कि यह तो एक बहुत ही जरूरी प्रोसेस है।

सोचिए अगर थॉमस एडिसन पहली बार में ही बल्ब बना लेते तो क्या हमें पता चलता कि १००० तरीके कौन से हैं जिनसे बल्ब नहीं बनता। बिल्कुल नहीं। आजकल के सो कॉल्ड क्रिएटिव लोग एक बार रिजेक्ट होते ही देवदास बन जाते हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया खत्म हो गई। अरे भाई अगर आपका आईडिया पहली बार में ही परफेक्ट होता तो शायद वह इतना भी बड़ा नहीं था कि दुनिया को हिला सके। जो लोग रिस्क लेने से डरते हैं वह असल में जीने से डरते हैं। बिना रिस्क के तो आप सिर्फ एक रोबोट हैं जिसे बस उतनी ही जानकारी है जितनी उसमें फीड की गई है।

फेलियर असल में आपको वह फीडबैक देता है जो आपका सबसे अच्छा दोस्त भी शायद मुहब्बत के चक्कर में न दे पाए। यह आपको बताता है कि कहाँ सुधार की जरूरत है। लेकिन हमारे यहाँ तो लोग फेलियर को ईगो पर ले लेते हैं। जैसे ही कोई काम बिगड़ा वो अपना बोरिया बिस्तर समेट कर वापस अपनी ९ से ५ वाली सुरक्षित नौकरी में छिप जाते हैं। सुरक्षित रहना अच्छी बात है लेकिन सुरक्षित रहकर कभी इतिहास नहीं रचा जाता। इतिहास तो वो लोग रचते हैं जो बार बार गिरते हैं और फिर उठकर धूल झाड़ते हुए कहते हैं कि चलो एक बार फिर ट्राई करते हैं।

आप में से बहुत लोग फेल होने के बाद ऐसे शकल बनाते हैं जैसे दुनिया के सारे गम आपके ही पास हैं। सच तो यह है कि आपकी नाकामयाबी में किसी को दिलचस्पी नहीं है जब तक कि आप उससे कुछ सीखकर वापस न आएं। फेलियर को गले लगाना सीखिए। इसे एक मेडल की तरह पहनिए क्योंकि यह सबूत है कि आपने कोशिश की। एरिक वाहल के अनुसार क्रिएटिविटी की भट्टी में जलने के लिए आपको अपने डर को जलाना होगा। जब आप डरना छोड़ देते हैं तब आपके अंदर का असली आर्टिस्ट बाहर आता है।

जरा सोचिए अगर हर पेंटर यह सोचकर ब्रश न उठाता कि पेंटिंग खराब हो जाएगी तो क्या हमें कभी महान कलाकृतियाँ मिलतीं। नहीं मिलतीं। हम बस कोरे कागज लेकर बैठे रहते। इसलिए गलतियां करने से मत डरिए। जितनी ज्यादा गलतियां आप करेंगे आप उतने ही स्मार्ट बनेंगे। बस एक बात का ध्यान रखें कि एक ही गलती को बार बार करना बेवकूफी है और नई गलतियां करना क्रिएटिविटी। तो क्या आप आज कोई नई गलती करने के लिए तैयार हैं या फिर वही पुरानी बोरियत भरी परफेक्ट लाइफ जीना चाहते हैं। फैसला आपका है क्योंकि सक्सेस का रास्ता फेलियर की गलियों से होकर ही गुजरता है।


लेसन ३ : अपनी रूटीन को मंदिर बनाना

बहुत से लोगों को लगता है कि क्रिएटिविटी कोई जादुई शक्ति है जो आसमान से अचानक बिजली की तरह गिरेगी। वह इंतजार करते हैं कि कब उनका मूड बनेगा और कब वह कोई महान काम करेंगे। भाई साहब अगर आप भी इसी 'मूड' के भरोसे बैठे हैं तो आप अपनी लाइफ की फिल्म के विलेन खुद ही हैं। एरिक वाहल कहते हैं कि क्रिएटिविटी कोई इत्तेफाक नहीं है बल्कि यह एक अनुशासन यानी डिसिप्लिन है। आपको अपनी रूटीन को एक मंदिर की तरह मानना होगा जहाँ आपको रोज हाजिरी लगानी है चाहे आपका मन हो या न हो।

सोचिए एक जिम जाने वाले इंसान के बारे में। क्या उसकी बॉडी सिर्फ उस दिन बनती है जिस दिन उसका मन करता है। नहीं। उसकी बॉडी तब बनती है जब वह उस दिन भी जिम जाता है जिस दिन उसका बिस्तर छोड़ने का रत्ती भर भी मन नहीं होता। क्रिएटिविटी का भी यही हाल है। जब आप रोज एक ही समय पर अपने काम की मेज पर बैठते हैं तो आप अपने दिमाग को एक सिग्नल देते हैं कि भाई अब काम का वक्त हो गया है। धीरे-धीरे आपका दिमाग उस रूटीन का आदी हो जाता है। फिर आपको प्रेरणा का इंतजार नहीं करना पड़ता प्रेरणा खुद लाइन में लगकर आपके पास आती है।

लेकिन आजकल की जनरेशन को तो 'फ्लो' चाहिए। उन्हें लगता है कि जब तक बैकग्राउंड में कोई अच्छा म्यूजिक न बजे या मौसम सुहाना न हो तब तक आइडियाज नहीं आएंगे। यह सब बहानेबाजी है। असल में आप काम करने से जी चुरा रहे हैं। रूटीन बनाना बोरिंग लग सकता है पर यही बोरियत आपको जीनियस बनाती है। दुनिया के सबसे बड़े लेखक और आर्टिस्ट अपनी एक फिक्स रूटीन फॉलो करते थे। वह सुबह उठते थे और बस काम में लग जाते थे। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि बाहर बारिश हो रही है या धूप खिली है।

अगर आप अपनी लाइफ में कुछ बड़ा करना चाहते हैं तो अपनी आदतों को लोहे की तरह मजबूत बनाइए। जब आपकी रूटीन सेट हो जाती है तो आपके फैसले लेने की ताकत बचती है जिसे आप अपने काम में लगा सकते हैं। वरना आधा दिन तो आप इसी सोच में निकाल देते हैं कि आज क्या करूँ और कैसे करूँ। एरिक वाहल के अनुसार डिसिप्लिन ही वह रास्ता है जो आपके सपनों को हकीकत की जमीन पर उतारता है। बिना रूटीन के आप बस एक बिना पतवार की नाव की तरह हैं जो लहरों के साथ कहीं भी बह जाएगी।

तो अब वक्त आ गया है कि आप अपनी सुस्ती को तलाक दें और डिसिप्लिन के साथ सात फेरे लें। अपनी एक ऐसी रूटीन बनाइए जिसे दुनिया की कोई भी ताकत हिला न सके। जब आप रोज ग्राइंड करेंगे और अपनी रूटीन का सम्मान करेंगे तब जाकर वह 'स्पार्क' एक असली आग में बदलेगा। याद रखिए सक्सेस कोई लॉटरी नहीं है जो किसी की भी लग जाए। यह एक इनाम है जो सिर्फ उन लोगों को मिलता है जो रोज मैदान में उतरकर पसीना बहाते हैं।


दोस्तों, एरिक वाहल की यह बातें सिर्फ सुनने के लिए नहीं बल्कि अपनी लाइफ में उतारने के लिए हैं। अगर आप अब भी वही पुराने बहाने बनाएंगे तो यकीन मानिए अगले साल भी आप वहीं खड़े होंगे जहाँ आज हैं। अपनी क्रिएटिविटी को डिसिप्लिन का साथ दीजिए और देखिए कैसे आपकी दुनिया बदलती है। आज ही अपनी एक रूटीन तय करें और कमेंट में हमें बताएं कि वह कौन सा एक लेसन है जिसे आप आज से ही फॉलो करने वाले हैं। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो सिर्फ आइडियाज की बातें करते हैं पर काम कुछ नहीं करते। अब उठिए और अपने उस स्पार्क को हकीकत में बदलिए।

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