बधाई हो। आप अभी भी उस पुरानी घिसी पिटी नौकरी में घिस रहे हैं जबकि दुनिया की सबसे बड़ी वेल्थ मशीन आपके बगल से निकल गई। अगर आपको लगता है कि हॉस्पिटल और दवाइयां ही पैसा बनाने का रास्ता हैं तो आपकी अक्ल को सलाम। आप एक ट्रिलियन डॉलर का मौका गँवा रहे हैं।
आज हम पॉल पिलजर की द वेलनेस रेवोल्यूशन से वो सीक्रेट्स निकालेंगे जो आपको बीमार होने से पहले अमीर बना देंगे। चलिए देखते हैं वो ३ बड़े लेसन्स जो आपकी किस्मत और सेहत दोनों बदल सकते हैं।
लेसन १ : सिकनेस वर्सेस वेलनेस - पैसे कहाँ हैं?
अगर आप आज भी ये सोच रहे हैं कि डॉक्टर बनकर या हॉस्पिटल खोलकर ही हेल्थ सेक्टर में पैसा कमाया जा सकता है तो आप शायद उन्नीसवीं सदी में जी रहे हैं। पॉल पिलजर अपनी बुक में एक कड़वा लेकिन मजेदार सच बताते हैं। वो कहते हैं कि हम जिसे हेल्थ केयर इंडस्ट्री कहते हैं वो असल में सिकनेस इंडस्ट्री है। जी हाँ। आपने एकदम सही पढ़ा। डॉक्टर और दवा कंपनियां आपसे तब पैसा कमाती हैं जब आप बेड पर पड़े होते हैं और अपनी जिंदगी की भीख मांग रहे होते हैं। उनका पूरा बिजनेस मॉडल आपकी बीमारी पर टिका है। आप ठीक हुए तो उनका धंधा बंद। अब आप ही बताइये। क्या ऐसी जगह पैसा लगाना समझदारी है जहाँ लोग मजबूरी में आते हैं और रोते हुए पैसे देते हैं?
यहीं पर एंट्री होती है वेलनेस इंडस्ट्री की। यह वो इंडस्ट्री है जो आपको बीमार होने ही नहीं देना चाहती। अब कुछ लोग कहेंगे कि भाई अगर कोई बीमार ही नहीं होगा तो पैसे कौन देगा? अरे मेरे भोले दोस्त। आज के जमाने में लोग बीमार होने का इन्तजार नहीं करते। लोग आज फिट दिखने के लिए और जवान रहने के लिए अपनी जेबें ढीली करने को तैयार हैं। वेलनेस का मतलब है वो हर चीज जो आपको बेहतर महसूस कराए। जैसे कि आर्गेनिक खाना। विटामिन सप्लीमेंट्स। जिम की मेंबरशिप। और वो महंगे फेस वॉश जो दावा करते हैं कि आपको देखते ही लड़कियां बेहोश हो जाएंगी। वेलनेस इंडस्ट्री आपसे तब पैसा लेती है जब आप खुश होते हैं और अपनी मर्जी से बेहतर दिखना चाहते हैं।
मान लीजिये आपके मोहल्ले में एक शर्मा जी हैं। शर्मा जी को जब हार्ट अटैक आता है तब वो लाखों रूपये हॉस्पिटल में देकर आते हैं। यह है सिकनेस इंडस्ट्री। लेकिन वही शर्मा जी का बेटा जो अभी २५ साल का है। वो हर महीने ३ हजार रूपये जिम में देता है। ५ हजार के प्रोटीन शेक पीता है और आर्गेनिक सब्जियां खाता है। वो यह सब इसलिए नहीं कर रहा कि वो बीमार है। वो यह सब इसलिए कर रहा है ताकि वो कभी शर्मा जी की तरह हॉस्पिटल के चक्कर न काटे। अब आप दिमाग लगाइये। पूरी दुनिया में शर्मा जी जैसे बीमार लोग ज्यादा हैं या उनके बेटे जैसे वो लोग जो फिट रहना चाहते हैं? जाहिर है फिट रहने वालों की तादाद करोड़ों में है।
पॉल पिलजर कहते हैं कि आने वाले समय में ट्रिलियन डॉलर यानी खरबों रूपये इसी वेलनेस सेक्टर में बहने वाले हैं। लोग अब अपनी सेहत को लेकर डरे हुए नहीं बल्कि जागरूक हैं। वो अपनी मर्जी से पैसा खर्च कर रहे हैं। सिकनेस इंडस्ट्री में आप रिएक्टिव होते हैं यानी आग लगने के बाद कुआं खोदते हैं। लेकिन वेलनेस इंडस्ट्री प्रोएक्टिव है। यहाँ आप आग लगने ही नहीं देते। और मजे की बात ये है कि यहाँ प्रॉफिट मार्जिन भी ज्यादा है और कस्टमर की वफादारी भी। तो अगली बार जब आप बिजनेस का सोचें तो बीमारों का नहीं बल्कि उन लोगों का सोचिये जो हमेशा जवान और तंदुरुस्त रहना चाहते हैं। क्योंकि असली खजाना वहीं छुपा है।
लेसन २ : प्रोएक्टिव कंज्यूमर का उदय
पुराने जमाने में लोग घी के डिब्बे और चीनी के बोरे शान से घर लाते थे। तब किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन लोग चीनी छोड़कर स्टेविया खरीदेंगे और सादे पानी की जगह अल्कलाइन वाटर के लिए एक्स्ट्रा पैसे देंगे। पॉल पिलजर हमें समझाते हैं कि मार्केट अब बदल चुका है। अब जन्म हुआ है प्रोएक्टिव कंज्यूमर का। यह वो इंसान है जो इंटरनेट पर अपनी बीमारी सर्च करके डॉक्टर को भी कन्फ्यूज कर देता है। यह वो पीढ़ी है जो अपने फोन में स्टेप्स गिनती है और रात को नींद कितनी आई इसका डेटा चेक करती है।
आप सोच रहे होंगे कि इसमें बिजनेस का क्या लेना देना है? तो सुनिए। पहले बिजनेस का मतलब होता था लोगों की जरूरतें पूरी करना। जैसे भूख लगी तो रोटी। लेकिन अब बिजनेस का मतलब है लोगों की इच्छाएं और डर को मैनेज करना। आज का कंज्यूमर 'इलाज' से ज्यादा 'बचाव' पर खर्च कर रहा है। उसे पता है कि आज की भागदौड़ वाली लाइफ में अगर वो ढीला पड़ा तो हॉस्पिटल का बिल उसकी पुश्तैनी जायदाद साफ कर देगा। इसलिए वो आज ही अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा विटामिन। योगा क्लासेस और स्ट्रेस कम करने वाले गैजेट्स पर उड़ा रहा है। यह कंज्यूमर अब यह नहीं पूछता कि क्या यह जरूरी है? वो पूछता है कि क्या इससे मैं और बेहतर दिखूँगा?
मान लीजिये आपके ऑफिस में एक राहुल नाम का लड़का है। राहुल की सैलरी ५० हजार है। वो हर सुबह उठकर ग्रीन टी पीता है क्योंकि उसे किसी इन्फ्लुएंसर ने बताया कि इससे मेटाबॉलिज्म बढ़ता है। उसे मेटाबॉलिज्म का मतलब शायद पता भी न हो। लेकिन वो उस डिब्बे के लिए १००० रूपये ख़ुशी ख़ुशी देता है। फिर वो ऑफिस जाने के लिए अपनी स्मार्ट वॉच पहनता है जो उसे हर एक घंटे में टोकती है कि भाई उठ जा। तू जिंदा है। वो संडे को ५ किलोमीटर की मैराथन में भाग लेता है और उसके लिए २००० रूपये की टी शर्ट और ५००० के जूते खरीदता है। यह राहुल बीमार नहीं है। राहुल डरा हुआ भी नहीं है। राहुल बस प्रोएक्टिव है।
पॉल पिलजर कहते हैं कि जो भी बिजनेस इस प्रोएक्टिव माइंडसेट को समझ गया वो मालामाल हो जाएगा। लोग अब सिर्फ पेट भरने के लिए खाना नहीं खा रहे। वो न्यूट्रिशन के लिए खा रहे हैं। वो सिर्फ कपड़े नहीं पहन रहे। वो ऐसे कपड़े ढूंढ रहे हैं जो जिम में पसीना सोख सकें और फोटो में अच्छे लगें। यह पूरी की पूरी एक नई इकॉनमी है। यहाँ डिमांड कभी खत्म नहीं होने वाली क्योंकि हर कोई हमेशा के लिए जवान और सुंदर दिखना चाहता है। अगर आप इस बहती गंगा में हाथ नहीं धो रहे तो यकीन मानिए आप बिजनेस की दुनिया के डायनासोर बनने वाले हैं। जो समय के साथ नहीं बदला वो गायब हो गया। इसलिए कंज्यूमर की इस नई भूख को पहचानिए।
लेसन ३ : डिस्ट्रीब्यूशन का नया मौका
अब आप कहेंगे कि भाई पॉल पिलजर की बातें तो समझ आ गई। लेकिन क्या मुझे अब कोई लैब खोलनी पड़ेगी या कोई नई दवाई ईजाद करनी होगी? बिल्कुल नहीं। पिलजर यहाँ एक बहुत ही तगड़ा पॉइंट बताते हैं। वो कहते हैं कि इस ट्रिलियन डॉलर इंडस्ट्री में असली पैसा सिर्फ चीजें बनाने (मैन्युफैक्चरिंग) में नहीं है। असली पैसा है डिस्ट्रीब्यूशन में। यानी सही जानकारी और सही प्रोडक्ट को सही इंसान तक पहुँचाने में। आज के जमाने में गूगल पर जानकारी तो बहुत है। लेकिन इतनी ज्यादा है कि लोग पागल हो रहे हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि कौन सा सप्लीमेंट असली है और कौन सा बस चूना है।
यहीं पर आपके लिए मौका बनता है। आपको साइंटिस्ट बनने की जरूरत नहीं है। आपको बस एक भरोसेमंद जरिया बनना है। चाहे वो एक हेल्थ ब्लॉग हो। एक यूट्यूब चैनल हो। या फिर डायरेक्ट सेलिंग का कोई मॉडल। जब आप लोगों को एजुकेट करते हैं कि उनकी बॉडी के लिए क्या सही है। तो आप सिर्फ सामान नहीं बेच रहे होते। आप उनका भरोसा जीत रहे होते हैं। और आज की डिजिटल दुनिया में भरोसा ही सबसे बड़ी करेंसी है। अगर आपने १००० लोगों को भी सही गाइडेंस दे दी। तो वो उम्र भर आपसे जुड़े रहेंगे क्योंकि सेहत का मामला बहुत पर्सनल होता है।
मान लीजिये आपके पड़ोस में एक चाची हैं। जिनका काम ही सबको फ्री की सलाह देना है। "बेटा। ये मत खाओ। वो लगाओ।" अब सोचिये अगर वही चाची अपनी इस बक-बक को एक प्रोफेशनल बिजनेस में बदल दें। वो रिसर्च करें कि मार्केट में सबसे अच्छा एलोवेरा जेल कौन सा है और फिर अपने पूरे मोहल्ले को बताएं। तो क्या होगा? मोहल्ले वाले दुकान पर जाने के बजाय चाची के पास आएंगे। क्योंकि दुकान वाला तो अपना फायदा देखेगा। लेकिन चाची उनकी सेहत की चिंता कर रही हैं (या कम से कम ऐसा लग रहा है)। बस यही डिस्ट्रीब्यूशन का जादू है। आपको बस वो "भरोसेमंद चाची" बनना है जिसका नेटवर्क और नॉलेज दोनों सॉलिड हो।
पॉल पिलजर साफ कहते हैं कि आने वाले सालों में सबसे अमीर वो लोग नहीं होंगे जो दवाइयां बनाएंगे। बल्कि वो होंगे जो लोगों को हॉस्पिटल जाने से रोकने का रास्ता दिखाएंगे। आप एक कंसल्टेंट बन सकते हैं। एक कोच बन सकते हैं। या एक ऐसे प्लेटफॉर्म के मालिक जो लोगों को बेस्ट वेलनेस प्रोडक्ट्स से जोड़ता है। याद रखिये। पैसा वहां नहीं है जहाँ भीड़ भाग रही है। पैसा वहां है जहाँ भविष्य जा रहा है। और भविष्य वेलनेस है। तो क्या आप अभी भी पुरानी घिसी पिटी राह पर चलेंगे या इस नई क्रांति के डिस्ट्रीब्यूशन किंग बनेंगे? फैसला आपका है। क्योंकि मौके बार-बार दरवाजा नहीं खटखटाते।
दोस्तों, "द वेलनेस रेवोल्यूशन" सिर्फ एक किताब नहीं है। यह आने वाले कल का नक्शा है। हम एक ऐसे दौर में हैं जहाँ बीमार पड़ना सबसे महंगा शौक बन चुका है। इसलिए समझदारी इसी में है कि आप न सिर्फ अपनी सेहत को संभालें। बल्कि इस बढ़ती इंडस्ट्री का हिस्सा बनकर अपनी वेल्थ को भी बढ़ाएं। अगर आप आज नहीं जागे। तो कल आप उसी सिकनेस इंडस्ट्री के ग्राहक बने खड़े होंगे।
तो अब देर किस बात की? नीचे कमेंट में लिखिये "मै रेडी हूँ" अगर आप भी वेलनेस की इस लहर का हिस्सा बनना चाहते हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो हमेशा बीमार होने का रोना रोते हैं। शायद उनकी और आपकी किस्मत दोनों बदल जाए।
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