क्या आप भी खुद को बहुत बड़ा तीस मार खान और स्मार्ट लीडर समझते हैं। मुबारक हो। आप अपनी कंपनी डुबोने की रेस में सबसे आगे हैं। जब बड़े बड़े धुरंधर अपनी ईगो और पुराने लेसन के चक्कर में गलत डिसीजन लेकर कंगाल हो सकते हैं तो आपकी क्या बिसात है।
आज हम डिकोड करेंगे कि आखिर क्यों बुद्धिमान लोग भी बेवकूफी भरे फैसले लेते हैं। सिडनी फिंकलस्टीन की यह बुक आपको आईना दिखाएगी ताकि आप अपने करियर और बिजनेस को बर्बादी से बचा सकें।
लेसन १ : पुराने अनुभव का चश्मा और गलत रास्ते की शुरुआत
क्या आपको लगता है कि आपका दस साल का एक्सपीरियंस आपकी सबसे बड़ी ताकत है। जरा फिर से सोचिए। सिडनी फिंकलस्टीन कहते हैं कि कई बार आपका यही तजुर्बा आपकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। इसे किताब में मिसलीडिंग एक्सपीरियन्स कहा गया है। असल में हमारा दिमाग एक पैटर्न पहचानने वाली मशीन है। जब भी हमारे सामने कोई नई समस्या आती है तो हमारा दिमाग तुरंत पास्ट की फाइलों को खंगालता है। वह देखता है कि भाई पिछली बार जब ऐसा हुआ था तब हमने क्या किया था। और बस यहीं से खेल बिगड़ना शुरू होता है।
मान लीजिए आप एक ऐसे मैनेजर हैं जिसने पिछले पांच साल से एक ही तरह की मार्केटिंग स्ट्रेटेजी से सेल्स बढ़ाई है। अब मार्केट बदल गया है। लोग अब अखबार के विज्ञापनों से ज्यादा इंस्टाग्राम रील्स पर भरोसा कर रहे हैं। लेकिन आपकी ईगो और आपका पुराना सक्सेसफुल रिकॉर्ड आपसे कह रहा है कि बेटा जो पहले काम किया था वही अब भी करेगा। आप पुराने ढर्रे पर पैसा पानी की तरह बहा देते हैं और अंत में हाथ लगती है सिर्फ निराशा। यह वैसा ही है जैसे आप नोकिया के दौर के राजा थे और आज के दौर में भी कीपैड फोन बेचने की जिद कर रहे हैं।
पुराना अनुभव अक्सर हमें अंधा बना देता है। हम सोचते हैं कि अगर हम एक बार जीत गए तो हम हर बार जीतेंगे। लेकिन हकीकत यह है कि हर सिचुएशन के अपने अलग नियम होते हैं। किताब में बताया गया है कि जब लीडर्स किसी नई चुनौती को पुरानी सफलता के चश्मे से देखते हैं तो वे उन रेड फ्लैग्स को देख ही नहीं पाते जो चीख चीख कर कह रहे होते हैं कि भाई रास्ता बदलो।
भारतीय कॉर्पोरेट जगत में तो यह बीमारी और भी गंभीर है। यहाँ बॉस का मतलब है वह इंसान जिसे सब पता है। अगर बॉस ने कह दिया कि मैंने अपने जमाने में ऐसा किया था तो जूनियर की हिम्मत नहीं होती कि वह उसे टोक सके। भले ही वह जमाना अब डायनासोर के साथ खत्म हो चुका हो। हम अक्सर भूल जाते हैं कि जो दवा बुखार उतारने के काम आई थी वही दवा पेट दर्द में जहर बन सकती है।
इस लेसन का सीधा सा मतलब यह है कि अपने अनुभव की पूजा करना बंद कीजिए। अनुभव एक गाइड की तरह होना चाहिए ना कि किसी जंजीर की तरह जो आपको आगे बढ़ने से रोके। जब भी कोई बड़ा फैसला लें तो खुद से पूछें कि क्या मैं यह फैसला फैक्ट्स के आधार पर ले रहा हूं या सिर्फ इसलिए क्योंकि पिछली बार ऐसा करने पर मुझे इनाम मिला था। अगर आप अपनी पुरानी जीत के नशे में चूर रहेंगे तो यकीन मानिए अगली हार बहुत ही दर्दनाक होने वाली है।
डिसीजन मेकिंग में सबसे बड़ा रिस्क यही है कि हम यह मान लेते हैं कि दुनिया वैसी ही है जैसी कल थी। लेकिन दुनिया बदल चुकी है और आपके पुराने लेसन अब एक्सपायर हो चुके हैं। स्मार्ट लीडर वह नहीं है जिसके पास बहुत अनुभव है बल्कि वह है जो यह जानता है कि उसे अपना पुराना अनुभव कब कचरे के डिब्बे में फेंक देना है।
लेसन २ : इमोशनल अटैचमेंट और रेड फ्लैग्स को इग्नोर करने की कला
क्या आपने कभी किसी ऐसे प्रोजेक्ट पर पैसा और वक्त लगाया है जो डूब रहा था, लेकिन आपने सिर्फ इसलिए हाथ नहीं खींचा क्योंकि वह आपका 'आईडिया' था। सिडनी फिंकलस्टीन कहते हैं कि लीडर्स अक्सर अपने फैसलों से प्यार करने लगते हैं। और जैसा कि हम जानते हैं, प्यार अंधा होता है। जब आप किसी प्रोजेक्ट, किसी टीम मेंबर या किसी बिजनेस मॉडल से इमोशनली जुड़ जाते हैं, तो आपका दिमाग उन 'रेड फ्लैग्स' को देखना बंद कर देता है जो खतरे की घंटी बजा रहे होते हैं।
मान लीजिए आपने एक रेस्टोरेंट खोला है। आपने बहुत मेहनत से इसका मेनू डिजाइन किया और अपनी पसंद की डिशेज रखीं। अब तीन महीने बीत चुके हैं, गल्ले में फूटी कौड़ी नहीं आ रही और वेटर मक्खियां मार रहे हैं। डेटा चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि भाई लोगों को तुम्हारा बनाया पास्ता पसंद नहीं आ रहा। लेकिन आपकी ईगो कह रही है कि नहीं, मेरा टेस्ट तो वर्ल्ड क्लास है, शायद ग्राहकों को ही खाना खाना नहीं आता। आप और लोन लेते हैं, और मार्केटिंग करते हैं, लेकिन अपना मेनू नहीं बदलते।
यही वह इमोशनल अटैचमेंट है जो एक अच्छे भले लीडर को बर्बादी की तरफ ले जाता है। हम अक्सर उन चीजों को पकड़े रहते हैं जिन्हें बहुत पहले छोड़ देना चाहिए था। किताब में इसे 'इनएप्रोप्रिएट अटैचमेंट्स' कहा गया है। जब हम किसी चीज में अपना बहुत सारा टाइम और एनर्जी लगा देते हैं, तो हमारा दिमाग उसे अपनी पहचान मान लेता है। उस प्रोजेक्ट का फेल होना हमें अपनी पर्सनल फेलियर लगने लगता है। और इसी हार के डर से बचने के लिए हम अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं।
कॉर्पोरेट ऑफिसों में तो यह नजारा आम है। कोई मैनेजर किसी ऐसे एम्प्लॉई को प्रमोट कर देता है जो उसका खास होता है, भले ही वह काम में जीरो हो। जब वह एम्प्लॉई पूरी टीम का काम बिगाड़ देता है, तब भी मैनेजर उसे डिफेंड करता रहता है। क्यों। क्योंकि उसे अपनी चॉइस को सही साबित करना है। उसे डर लगता है कि अगर उसने अपनी गलती मान ली, तो लोग उसकी काबिलियत पर शक करेंगे।
हकीकत तो यह है कि दुनिया को आपके इमोशंस से कोई लेना-देना नहीं है। मार्केट को फर्क नहीं पड़ता कि आपने उस प्रोजेक्ट के लिए कितनी रातें जागी हैं। अगर वह काम नहीं कर रहा, तो वह नहीं कर रहा। स्मार्ट लीडर वह होता है जो अपने काम से प्यार तो करता है, लेकिन उसके साथ शादी नहीं कर लेता। वह अपनी ईगो को दरवाजे के बाहर छोड़कर टेबल पर बैठता है।
अगर आप भी किसी डूबते जहाज की सवारी कर रहे हैं और सिर्फ इसलिए नहीं उतर रहे क्योंकि आपने उसमें बहुत बड़ा निवेश किया है, तो रुकिए। याद रखिए, अपनी गलती मान लेना कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी समझदारी है। जो इंसान सही समय पर 'यू-टर्न' लेना जानता है, वही लंबी रेस का घोड़ा बनता है। अपनी भावनाओं को किनारे रखिए और ठंडे दिमाग से सोचिए कि क्या आप सच में सही दिशा में जा रहे हैं, या सिर्फ अपनी जिद पूरी कर रहे हैं।
लेसन ३ : पहले से तय फैसले और लॉजिक का झूठा सहारा
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आपने मन ही मन कोई नया फोन या गाड़ी खरीदने का फैसला कर लिया हो और फिर आप इंटरनेट पर केवल वही रिव्यूज देखते हैं जो उसे अच्छा बताते हैं। सिडनी फिंकलस्टीन कहते हैं कि लीडर्स भी यही गलती करते हैं। इसे किताब में प्री डिटरमिंड डिसीजन मेकिंग कहा गया है। असल में हम पहले फैसला ले लेते हैं और उसके बाद अपनी टीम को बुलाते हैं ताकि वे हमारे उस गलत फैसले पर लॉजिक की मोहर लगा सकें।
मान लीजिए एक कंपनी का सीईओ एक नई कंपनी को खरीदना चाहता है। उसे पता है कि उस कंपनी की हालत खस्ता है लेकिन उसे वह डील अपनी प्रोफाइल के लिए बहुत कूल लग रही है। अब वह अपनी फाइनेंस टीम को बुलाता है और उनसे कहता है कि मुझे ऐसी रिपोर्ट बनाकर दो जो यह साबित करे कि यह डील फायदे का सौदा है। बेचारे एम्प्लॉई अपनी नौकरी बचाने के चक्कर में आंकड़ों को इधर उधर मरोड़ते हैं और एक ऐसी रिपोर्ट पेश करते हैं जो सच से कोसों दूर होती है। सीईओ साहब खुश हो जाते हैं क्योंकि उन्हें वही सुनने को मिला जो वह सुनना चाहते थे।
यह वैसा ही है जैसे आप वजन कम करने का फैसला करें लेकिन रोज रात को पिज्जा खाएं और फिर खुद को यह समझाएं कि पिज्जा में जो पनीर है उसमें तो बहुत प्रोटीन होता है। हम अक्सर अपने दिमाग को धोखा देने में उस्ताद होते हैं। जब हम किसी चीज को पाने की ठान लेते हैं तो हमारा दिमाग एक वकील की तरह काम करने लगता है जो हमारे हर गलत कदम के पक्ष में दलीलें ढूंढता है।
सच्चाई तो यह है कि इसे ही कन्फर्मेशन बायस कहते हैं। हम उन जानकारियों को तो बड़े चाव से पढ़ते हैं जो हमारे आइडिया को सपोर्ट करती हैं और उन जानकारियों को रद्दी की टोकरी में डाल देते हैं जो हमें चेतावनी दे रही होती हैं। एक अच्छा लीडर वह नहीं है जिसके पास हर सवाल का जवाब है बल्कि वह है जो खुद से और अपनी टीम से कड़वे सवाल पूछने की हिम्मत रखता है।
अगर आप किसी मीटिंग में बैठे हैं और हर कोई आपकी बात पर हाँ में हाँ मिला रहा है तो समझ जाइए कि आप खतरे में हैं। लीडरशिप का मतलब यह नहीं है कि आप अपनी मर्जी दूसरों पर थोपें बल्कि यह है कि आप अपनी मर्जी को फैक्ट्स की कसौटी पर कसें। जिस दिन आप अपनी राय के खिलाफ सबूत ढूंढना शुरू कर देंगे उस दिन आप एक महान लीडर बनने की राह पर होंगे।
अक्सर बड़े बड़े स्टार्टअप्स और कंपनियां इसी चक्कर में बंद हो जाती हैं क्योंकि उनके फाउंडर्स को लगता है कि वे भगवान हैं और उनके फैसले कभी गलत नहीं हो सकते। वे अपनी ईगो को सहलाने के लिए चाटुकारों की फौज खड़ी कर लेते हैं। लेकिन जब हकीकत का थप्पड़ पड़ता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए अगली बार जब आप कोई बड़ा फैसला लें तो एक ऐसे इंसान को भी कमरे में बुलाएं जो आपकी बात काटने का दम रखता हो।
तो दोस्तों, यह थे थिंक अगेन बुक के वो कड़वे सच जो आपको एक बेहतर डिसीजन मेकर बना सकते हैं। लीडरशिप केवल हुक्म चलाने का नाम नहीं है बल्कि खुद की सोच को बार बार चुनौती देने का नाम है। याद रखिए आपका पुराना अनुभव आपका सबसे अच्छा दोस्त भी हो सकता है और सबसे बड़ा दुश्मन भी। अपनी भावनाओं को कंट्रोल में रखिए और कभी भी अपने फैसलों के प्यार में अंधे मत होइए।
आज ही रुकिए और सोचिए कि क्या आप भी कोई ऐसा फैसला ले रहे हैं जो सिर्फ आपकी जिद है। अपनी टीम से पूछिए कि क्या वे आपसे सहमत हैं या सिर्फ डर के मारे चुप हैं। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप अपनी लीडरशिप जर्नी को बदलना चाहते हैं तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें जो अपनी ईगो में डूबे हुए हैं। नीचे कमेंट्स में बताएं कि आपका सबसे खराब डिसीजन कौन सा था और आपने उससे क्या सीखा। चलिए साथ मिलकर बेहतर फैसले लेना सीखते हैं।
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