अगर आपको लगता है कि आप बहुत बड़े तोरखां हैं और आपके फैसले हमेशा सही होते हैं तो बधाई हो आप अपनी बर्बादी के वीआईपी टिकट खुद काट रहे हैं। दुनिया स्मार्ट हो गई और आप अभी भी अपने उसी सड़े हुए इंटुइशन के भरोसे बैठे हैं जो आपको गड्ढे में धकेल रहा है।
थिंक ट्वाइस बुक समरी हिंदी में समझना आपके लिए केवल एक चॉइस नहीं बल्कि सर्वाइवल का मामला है। आज हम माइकल मौबूसिन के उन सीक्रेट्स को खोलेंगे जो आपके डिसीजन मेकिंग पावर को रॉकेट की तरह उड़ा देंगे और आपको फेलियर से बचाएंगे।
लेसन १ : आउटसाइड व्यू का इस्तेमाल करना
मान लीजिए आप एक नया स्टार्टअप शुरू करने वाले हैं या कोई नया बिजनेस प्लान कर रहे हैं। आपके अंदर जोश कूट कूट कर भरा है। आप शीशे के सामने खड़े होकर खुद को अगला अंबानी या मस्क समझ रहे हैं। आपको लगता है कि आपका आईडिया इतना यूनिक है कि मार्केट में आग लगा देगा। लेकिन असलियत तो यह है कि आप अपनी ही ख्याली दुनिया में गोते लगा रहे हैं जिसे माइकल मौबूसिन इनसाइड व्यू कहते हैं। हम इंसान खुद को इतना खुदा समझते हैं कि हमें लगता है हमारे साथ तो कभी कुछ बुरा हो ही नहीं सकता। हम सोचते हैं कि भले ही बाकी लोग फेल हो गए हों लेकिन हमारे पास तो जादुई शक्तियां हैं।
यही वह पल होता है जब आप अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं बल्कि कुल्हाड़ी पर अपना पैर मार रहे होते हैं। इनसाइड व्यू का मतलब है कि आप सिर्फ अपने प्लान और अपनी मेहनत को देख रहे हैं। आप भूल जाते हैं कि दुनिया में और भी लोग हैं जो आपसे ज्यादा स्मार्ट और ज्यादा पैसे वाले थे फिर भी धूल चाट रहे हैं। यहाँ पर काम आता है आउटसाइड व्यू। यह व्यू कहता है कि भाई अपनी भावनाओं को साइड में रखो और जरा गूगल बाबा से पूछो कि जो काम तुम करने जा रहे हो उसमें फेलियर रेट क्या है।
मान लीजिए आपके एक दोस्त ने नया रेस्टोरेंट खोलने का फैसला किया। वह आपको बता रहा है कि उसके शेफ के हाथ में जादू है और लोकेशन एकदम झकास है। वह पूरी तरह इनसाइड व्यू में डूबा है। लेकिन अगर आप थोड़े भी अकलमंद हैं तो आप आउटसाइड व्यू देखेंगे। डेटा कहता है कि साठ परसेंट रेस्टोरेंट पहले एक साल में ही बंद हो जाते हैं। अब आपका दोस्त भले ही खुद को संजीव कपूर समझ ले लेकिन वह इस बड़े डेटा का हिस्सा है। अगर वह इस बात को मान ले तो वह अपनी स्ट्रेटजी बदल सकता है। लेकिन नहीं हमें तो बस अपनी धुन में रहना है।
आउटसाइड व्यू लेना सुनने में बहुत बोरिंग लगता है क्योंकि यह हमारे ईगो को ठेस पहुंचाता है। हम चाहते हैं कि लोग हमें कहें कि तुम बहुत स्पेशल हो। लेकिन हकीकत में डेटा और इतिहास ही सबसे बड़े गुरु होते हैं। जब आप आउटसाइड व्यू अपनाते हैं तो आप बेस रेट को देखते हैं। बेस रेट यानी वह औसत रिजल्ट जो उस फील्ड के ज्यादातर लोगों को मिला है। अगर आप स्टॉक मार्केट में पैसा लगा रहे हैं और आपको लगता है कि आप हर महीने अपने पैसे डबल कर लेंगे तो जरा रुकिए। क्या पिछले सौ साल में किसी ने ऐसा किया है। नहीं ना। तो आप कौन से मंगल ग्रह से आए हैं।
हम दूसरों को सलाह देते वक्त तो आउटसाइड व्यू इस्तेमाल करते हैं लेकिन खुद के मामले में अंधे हो जाते हैं। जब पड़ोसी का लड़का स्टार्टअप शुरू करता है तो हम कहते हैं कि बेटा बहुत रिस्क है आजकल सब डूब रहे हैं। लेकिन जब हम खुद शुरू करते हैं तो लगता है कि कायनात हमारे लिए लाल कालीन बिछा कर खड़ी है। यही वह थिंकिंग एरर है जिससे माइकल मौबूसिन हमें बचाना चाहते हैं।
अगर आप वाकई कामयाब होना चाहते हैं तो अपनी आंखों से वह गुलाबी चश्मा उतार फेंकिए। किसी भी बड़े फैसले से पहले खुद से पूछिए कि मेरे जैसे हालात में बाकी लोगों का क्या अंजाम हुआ। अगर सांख्यिकी कहती है कि जीत की उम्मीद कम है तो ओवरकॉन्फिडेंस में कूदना बहादुरी नहीं बल्कि बेवकूफी है। आउटसाइड व्यू आपको डराने के लिए नहीं बल्कि आपको जमीन पर टिकाए रखने के लिए है ताकि आप अपनी प्लानिंग को और मजबूत कर सकें और उन गलतियों से बच सकें जो हजारों लोग पहले ही कर चुके हैं।
लेसन २ : टनल विजन से बचना
जब आप किसी समस्या में फंसते हैं तो आपका दिमाग एक टॉर्च की तरह काम करने लगता है। टॉर्च की रोशनी जहाँ पड़ती है बस वही दिखता है और बाकी की पूरी दुनिया अंधेरे में गायब हो जाती है। इसे माइकल मौबूसिन टनल विजन कहते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी पार्टी में अपनी एक्स को देख लें। फिर पूरी पार्टी में चाहे कितना ही अच्छा पनीर टिक्का क्यों न मिल रहा हो या कितना ही बढ़िया गाना बज रहा हो आपका पूरा ध्यान बस उसी एक चेहरे पर टिका रहता है। आप बाकी सब भूल जाते हैं। लाइफ और बिजनेस में भी हम यही करते हैं। हम एक ही नजरिए से सब कुछ देखने लगते हैं और बाकी के ऑप्शन हमें दिखाई ही नहीं देते।
इंसानी दिमाग की एक बहुत बड़ी कमजोरी है कि वह बहुत जल्दी किसी एक आइडिया से चिपक जाता है। हमें लगता है कि जो हमें दिख रहा है बस वही सच है। मान लीजिए आप एक फोन खरीदना चाहते हैं। आपने मन बना लिया है कि आपको वही महंगा वाला फोन लेना है जिसका कैमरा बहुत अच्छा है। अब आपका दिमाग सिर्फ उन आर्टिकल्स को पढ़ेगा जो उस फोन की तारीफ कर रहे हैं। अगर कोई आपको आकर कहे कि भाई इसका बैटरी बैकअप बेकार है तो आप उसे ऐसे देखेंगे जैसे उसने आपकी किडनी मांग ली हो। इसे कन्फर्मेशन बायस भी कहते हैं। आप केवल वही जानकारी ढूंढते हैं जो आपके पहले से बने हुए ख्याल को सही साबित करे।
टनल विजन का सबसे बड़ा शिकार वो लोग होते हैं जो खुद को बहुत बड़ा एक्सपर्ट समझते हैं। एक्सपर्ट होने का एक नुकसान यह है कि आप अपनी फील्ड के इतने आदी हो जाते हैं कि आपको बाहर की कोई बात समझ ही नहीं आती। एक हथौड़े वाले इंसान को हर समस्या एक कील ही नजर आती है। अगर कोई डॉक्टर है तो वह हर चीज का इलाज दवाई में ढूंढेगा और अगर कोई इंजीनियर है तो वह हर समस्या को मशीन की तरह देखेगा। लेकिन दुनिया इतनी सीधी नहीं है। असल जिंदगी के फैसले कई अलग अलग चीजों से मिलकर बने होते हैं।
मान लीजिए एक कंपनी की सेल गिर रही है। मार्केटिंग वाला कहेगा कि एड्स और बढ़ाओ। सेल्स वाला कहेगा कि डिस्काउंट दे दो। मालिक कहेगा कि एम्प्लॉई आलसी हो गए हैं। सब अपनी अपनी टनल में बंद हैं। कोई यह नहीं देख रहा कि शायद मार्केट का ट्रेंड ही बदल गया है और लोग अब वो सामान खरीदना ही नहीं चाहते। जब आप एक ही सुरंग में देखते हैं तो आप उन बड़े खतरों को नजरअंदाज कर देते हैं जो बगल से आ रहे होते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप पटरी पर चलते हुए सामने वाले सिग्नल को देख रहे हों और साइड से आती हुई दूसरी ट्रेन आपको उड़ा ले जाए।
इस टनल विजन से बचने का एकमात्र तरीका है अपने नजरिए को जानबूझकर बड़ा करना। मौबूसिन कहते हैं कि आपको हमेशा चेकलिस्ट का इस्तेमाल करना चाहिए। जब भी कोई बड़ा फैसला लें तो अपने आप से पूछें कि इसके अलावा और क्या क्या हो सकता है। अगर मेरा यह फैसला गलत हुआ तो उसका सबसे बड़ा कारण क्या होगा। उन लोगों से बात करिए जो आपसे असहमत हैं। हाँ जी हाँ जी करने वाले चमचों से घिरे रहना टनल विजन को और गहरा कर देता है। आपको ऐसे लोग चाहिए जो आपके चेहरे पर बोल सकें कि भाई तू गलत सोच रहा है।
सर्कस के घोड़े की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर दौड़ना बंद कीजिए। अपनी सोच को एक ड्रोन की तरह ऊपर ले जाइये और पूरे मैदान को देखिये। जब आप अपनी टनल से बाहर निकलते हैं तो आपको समझ आता है कि जिस समस्या को आप पहाड़ समझ रहे थे वो असल में एक छोटी सी कंकड़ थी। बस देखने का नजरिया गलत था। सही फैसला वही होता है जो इमोशंस की सुरंग से बाहर निकलकर ठंडे दिमाग से लिया जाए। याद रखिये कि दुनिया गोल है और यहाँ रास्ते कभी खत्म नहीं होते बस हम ही अपनी एक गली पकड़ कर बैठ जाते हैं।
लेसन ३ : लक और स्किल का फर्क समझना
अगर कल सुबह आप उठें और देखें कि आपकी लॉटरी लग गई है तो क्या आप खुद को दुनिया का सबसे बड़ा फाइनेंशियल जीनियस मानने लगेंगे। शायद नहीं। लेकिन अगर आप स्टॉक मार्केट में एक तुक्का मारें और पैसा डबल हो जाए तो आप तुरंत इन्स्टाग्राम पर ज्ञान बांटना शुरू कर देंगे कि कैसे आपकी मेहनत और स्ट्रैटेजी ने कमाल कर दिया। माइकल मौबूसिन कहते हैं कि हम इंसान इतने भोले हैं कि हमें लक और स्किल के बीच का फर्क ही समझ नहीं आता। जब हम जीतते हैं तो हमें लगता है कि हम सुपरमैन हैं और जब हारते हैं तो कहते हैं कि किस्मत खराब थी।
लक और स्किल को समझने का एक बहुत सिंपल टेस्ट है। खुद से पूछिए कि क्या मैं जानबूझकर हार सकता हूँ। चेस के खेल में आप जानबूझकर हार सकते हैं क्योंकि वहां स्किल की जरूरत होती है। लेकिन लॉटरी के खेल में आप जानबूझकर हारने की कोशिश नहीं कर सकते क्योंकि वहां सब कुछ लक पर निर्भर है। लाइफ के ज्यादातर काम इन दोनों के बीच में कहीं फंसे होते हैं। बिजनेस हो या इन्वेस्टिंग यहाँ स्किल तो चाहिए ही लेकिन लक का तड़का भी बहुत जरूरी है। समस्या तब शुरू होती है जब हम लक से मिली जीत को अपनी काबिलियत मान लेते हैं और फिर अगली बार और बड़ा दांव खेलकर बर्बाद हो जाते हैं।
मान लीजिए आपका एक दोस्त है जिसने बिना किसी रिसर्च के एक ऐसी कंपनी में पैसा लगा दिया जिसका नाम उसे बस सुनने में अच्छा लगा। किस्मत से उस कंपनी को कोई बड़ा कॉन्ट्रैक्ट मिल गया और शेयर के दाम आसमान छूने लगे। अब वो दोस्त आपको ऐसे सलाह देगा जैसे उसने पूरी इकोनॉमिक्स पढ़ रखी हो। यह लक है जिसे वो स्किल समझ रहा है। असली दिक्कत यह है कि लक हमेशा साथ नहीं देता। अगली बार जब वो अपनी इसी तथाकथित स्किल का इस्तेमाल करेगा तो मार्केट उसे ऐसा पटकेगा कि उसे नानी याद आ जाएगी।
मौबूसिन हमें समझाते हैं कि हमें प्रोसेस पर ध्यान देना चाहिए न कि सिर्फ रिजल्ट पर। अगर आपका प्रोसेस सही है और आप हार गए तो दुखी मत होइए क्योंकि वहां लक ने खेल बिगाड़ा है। लेकिन अगर आपका प्रोसेस गलत था और आप फिर भी जीत गए तो यह सबसे ज्यादा खतरनाक बात है। यह आपको एक झूठा कॉन्फिडेंस देता है जो आपको भविष्य में बहुत बड़े खड्डे में गिराएगा। इसे बिल्कुल वैसे ही समझिये जैसे कोई बिना हेलमेट के तेज गाड़ी चलाए और घर सही सलामत पहुँच जाए। इसका मतलब यह नहीं कि वो बहुत बड़ा ड्राइवर है। इसका मतलब सिर्फ यह है कि मौत आज छुट्टी पर थी।
स्किल और लक के इस खेल में एक और मजेदार बात है जिसे मीन रिवर्जन कहते हैं। यानी चीजें समय के साथ औसत पर वापस आ जाती हैं। अगर कोई बहुत ज्यादा लकी रहा है तो देर सवेर उसका बुरा वक्त आएगा। और अगर कोई बहुत काबिल है लेकिन किस्मत साथ नहीं दे रही तो एक न एक दिन उसकी काबिलियत रंग लाएगी। इसलिए शॉर्ट टर्म के नतीजों को देखकर ज्यादा उछलना नहीं चाहिए। अगर आज आप टॉप पर हैं तो चेक कीजिये कि वहां पहुँचने में आपकी मेहनत कितनी थी और हवा का रुख कितना था।
इस आर्टिकल का सार यही है कि जिंदगी के फैसले लेते वक्त थोड़े विनम्र बनिए। अपनी सफलता का पूरा क्रेडिट खुद को मत दीजिये और अपनी असफलता के लिए सिर्फ खुद को मत कोसिये। जब आप इन दोनों के बीच की महीन रेखा को देख पाते हैं तभी आप एक मैच्योर डिसीजन मेकर बनते हैं। अगली बार जब आप किसी की कामयाबी देखें तो तुरंत उसे अपना गुरु मत मान लीजिये। देखिये कि क्या उसके पास कोई ऐसा प्रोसेस है जिसे दोहराया जा सके या वो बस एक बार का तुक्का था। याद रखिये कि जुए में जीता हुआ पैसा और मेहनत से कमाया हुआ पैसा दिखने में एक जैसा होता है लेकिन उनकी उम्र अलग अलग होती है।
तो दोस्तों यह थे माइकल मौबूसिन की किताब थिंक ट्वाइस के वो तीन बड़े लेसन जो आपकी जिंदगी बदल सकते हैं। अब फैसला आपका है कि आप अपनी उसी पुरानी ढर्रे वाली सोच के साथ चलना चाहते हैं या अपने दिमाग को एक नई दिशा देना चाहते हैं। अगर आपको अपनी अकल पर थोड़ा भी शक है तो इस आर्टिकल को दोबारा पढ़िए और अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो खुद को बहुत बड़ा तीस मार खां समझते हैं। कमेंट में बताइये कि इनमें से कौन सा लेसन आपको सबसे ज्यादा रिलेटेबल लगा। चलिए अब अपनी थिंकिंग को अपग्रेड कीजिये और लाइफ के गेम में मास्टर बनिए।
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