Yes! (Hindi)


क्या आप आज भी लोगों के सामने हाथ पैर जोड़कर अपनी बात मनवाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं? शर्म की बात है कि आपके पास वो दिमाग ही नहीं है जिससे लोग आपकी धुन पर नाचें। जबकि दुनिया साइकोलॉजी का इस्तेमाल करके आपको उल्लू बना रही है और आप बस देखते रह जा रहे हैं।

लेकिन फिक्र मत करिए। आज मैं आपको नोआ गोल्डस्टीन की बुक से वो ५० तरीके बताऊंगा जिनसे आप किसी को भी कन्विंस कर सकते हैं। चलिए देखते हैं वो ३ बड़े लेसन जो आपकी लाइफ बदल देंगे।


लेसन १ : सोशल प्रूफ का असली पावर

सोचिए आप और आपका दोस्त एक अनजान शहर में भूखे घूम रहे हैं। आपके सामने दो रेस्टोरेंट हैं। एक एकदम खाली पड़ा है और दूसरे के बाहर लंबी लाइन लगी है। आप कहाँ जाएंगे? जाहिर सी बात है आप उसी लाइन में जाकर खड़े हो जाएंगे जहाँ भीड़ है। क्यों? क्योंकि हमारा दिमाग कहता है कि अगर सब वहां जा रहे हैं तो दाल में कुछ काला नहीं बल्कि दाल बहुत स्वाद होगी। इसे ही कहते हैं सोशल प्रूफ। हम इंसान भेड़ चाल चलने में उस्ताद हैं। हमें लगता है कि अगर बहुत सारे लोग कुछ कर रहे हैं तो वो सही ही होगा।

लेखक बताते हैं कि अगर आपको किसी से अपनी बात मनवानी है तो उसे ये मत बताइये कि आपका आईडिया कितना महान है। उसे ये बताइये कि उसके जैसे और कितने लोग पहले से ही ये काम कर रहे हैं। मान लीजिए आप अपने पड़ोसी को कचरा सही जगह फेंकने के लिए मनाना चाहते हैं। अगर आप उसे ज्ञान देंगे तो वो आपको ही कचरा समझकर इग्नोर कर देगा। लेकिन अगर आप उसे प्यार से ये कहेंगे कि भाई साहब इस गली के १० में से ८ लोग अब डस्टबिन का इस्तेमाल करने लगे हैं तो उसके दिल में एक अजीब सी घबराहट होगी। उसे लगेगा कि कहीं वो इस सोसाइटी का सबसे पिछड़ा हुआ इंसान तो नहीं बन गया?

यही वो डर है जो लोगों को बदलने पर मजबूर करता है। इसे साइकोलॉजी की भाषा में हर्ड मेंटालिटी कहते हैं। लोग अपनी अक्ल लड़ाने से ज्यादा दूसरों की नकल करना पसंद करते हैं। होटल इंडस्ट्री का एक मजेदार उदाहरण देखिये। जब होटल्स ने कमरों में लिखवाया कि कृपया पर्यावरण बचाने के लिए तौलिया दोबारा इस्तेमाल करें तो बहुत कम लोगों ने बात मानी। लेकिन जैसे ही उन्होंने मैसेज बदला और लिखा कि इस कमरे में रुकने वाले ७५ परसेंट मेहमान तौलिया दोबारा इस्तेमाल करते हैं तो अचानक जादुई बदलाव आया। लोग सोचने लगे कि जब पिछला वाला बंदा इतना शरीफ था तो मैं क्यों पीछे रहूँ?

ये ट्रिक हर जगह काम करती है। चाहे आप कोई सामान बेच रहे हों या अपनी गर्लफ्रेंड को किसी मूवी के लिए मना रहे हों। बस उसे ये दिखा दीजिये कि बाकी सब भी वही कर रहे हैं। अगर आप किसी ऑफिस मीटिंग में अपना कोई आईडिया बेचना चाहते हैं तो ये मत कहिये कि ये बेस्ट है। बल्कि ये कहिये कि शर्मा जी और वर्मा जी की टीम ने भी इसी तरह का प्लान अपनाया था। बस फिर देखिये कैसे लोग आपकी बातों में हां में हां मिलाने लगते हैं। हम अकेले चलने से डरते हैं और इसी डर का फायदा उठाकर आप दुनिया को अपनी उँगलियों पर नचा सकते हैं। लेकिन याद रखियेगा कि ये तब ही काम करता है जब आप उन्हें अपने जैसा कोई उदाहरण देते हैं। अगर आप किसी छोटे बच्चे को बोलेंगे कि देखो वो ८० साल के दादाजी कितनी शांति से बैठे हैं तो बच्चा आपकी बात कभी नहीं सुनेगा। उसे उसके हमउम्र दोस्त का उदाहरण दीजिये और फिर जादू देखिये।


लेसन २ : छोटी सी शुरुआत और कंसिस्टेंसी का खेल

क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ लोग आपसे इतनी आसानी से बड़ी बड़ी मदद कैसे मांग लेते हैं? और आप ना चाहते हुए भी हां कह देते हैं। इसके पीछे एक बहुत ही तेज दिमाग वाली ट्रिक है जिसे फुट इन द डोर तकनीक कहते हैं। लेखक बताते हैं कि अगर आप किसी से कोई बड़ा काम करवाना चाहते हैं तो सीधे पहाड़ तोड़ने को मत कहिये। पहले उनसे एक छोटा सा और मामूली सा काम करवाइए। जब इंसान एक बार छोटा सा हां कह देता है तो उसका दिमाग खुद को उस बात से जोड़ लेता है।

मान लीजिए आपका कोई दोस्त है जो कंजूसी में गोल्ड मेडलिस्ट है। अगर आप उससे सीधे कहेंगे कि भाई मुझे ५००० रूपये उधार दे दे तो वो ऐसे गायब होगा जैसे गधे के सिर से सींग। लेकिन अगर आप उससे पहले सिर्फ ५० रूपये मांगेंगे एक चाय पीने के लिए और वो हां कर देता है तो आपने उसके दिमाग का दरवाजा खोल दिया है। अगली बार जब आप उससे थोड़े ज्यादा पैसे मांगेंगे तो उसके लिए मना करना मुश्किल होगा। क्योंकि उसका ईगो उसे कहेगा कि यार मैं तो एक मददगार इंसान हूँ मैंने पिछली बार भी इसकी हेल्प की थी।

इंसान अपनी इमेज को लेकर बहुत ज्यादा सीरियस रहता है। हम जो एक बार कह देते हैं हम उसी रास्ते पर चलना चाहते हैं ताकि हम दोगले न लगें। मार्केटिंग वाले इसका जमकर फायदा उठाते हैं। वो आपको पहले एक फ्री सैंपल देंगे या कहेंगे कि बस ये छोटा सा फॉर्म भर दीजिये। आपको लगता है कि फॉर्म भरने में क्या जाता है? लेकिन असल में आपने उनके जाल में पहला कदम रख दिया है। एक बार जब आप अपना नाम और नंबर दे देते हैं तो आप उनके लिए एक ऐसे कस्टमर बन जाते हैं जिसने उन पर भरोसा दिखाया है।

एक रिसर्च में देखा गया कि जब लोगों से उनके घर के बाहर एक बहुत बड़ा और भद्दा बोर्ड लगाने को कहा गया जिस पर लिखा था धीरे चलें तो सबने मना कर दिया। लेकिन जिन लोगों से पहले एक छोटा सा स्टिकर लगाने की रिक्वेस्ट की गई थी उन्होंने बाद में वो बड़ा बोर्ड लगाने के लिए भी हां कर दिया। ये है कंसिस्टेंसी की ताकत। अगर आप अपने बॉस से सैलरी बढ़वाना चाहते हैं तो सीधे ऑफिस में घुसकर डिमांड मत कीजिये। पहले उनसे किसी छोटे प्रोजेक्ट पर उनकी सलाह मांगिए या कोई छोटी सी जिम्मेदारी पूरी करके दिखाईये।

जब वो आपकी छोटी बातों को सराहने लगेंगे तो आपकी बड़ी बात मानना उनके लिए मजबूरी बन जाएगा। याद रखिये कि इंसान का दिमाग एक ऐसी मशीन है जो खुद को सही साबित करना चाहती है। अगर आपने किसी को एक बार ये मनवा लिया कि वो आपके काम का सपोर्टर है तो वो अपनी पूरी जिंदगी लगा देगा उस इमेज को बचाने में। बस आपको शुरुआत एक छोटे से कदम से करनी है। सीधे छलांग मारेंगे तो पैर टूटेंगे लेकिन सीढ़ियों से चढ़ेंगे तो मंजिल भी मिलेगी और थकावट भी नहीं होगी।


लेसन ३ : स्कार्सिटी और खोने का खौफ

क्या आपने कभी गौर किया है कि जब आप ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं, तो वहां अचानक एक लाल रंग का मैसेज चमकने लगता है "सिर्फ २ स्टॉक बचे हैं" या "अगले १० मिनट में ऑफर खत्म"? उस वक्त आपके दिल की धड़कनें ऐसे बढ़ जाती हैं जैसे कि अगर आपने वो शर्ट नहीं खरीदी तो दुनिया का अंत हो जाएगा। असल में वो शर्ट उतनी खास नहीं है, लेकिन वो 'खोने का डर' आपसे आपकी अक्ल छीन लेता है। लेखक बताते हैं कि हम इंसान किसी चीज को पाने की खुशी से ज्यादा, उसे खोने के दुख से डरते हैं।

इसे साइकोलॉजी की दुनिया में 'लॉस एवर्जन' कहते हैं। अगर आप किसी को कहेंगे कि ये काम करने से आपको ५०० रूपये का फायदा होगा, तो शायद वो आलस कर जाए। लेकिन अगर आप उससे कहेंगे कि अगर आपने ये काम नहीं किया तो आपके रखे हुए ५०० रूपये कट जाएंगे, तो वो बंदा रॉकेट की रफ्तार से काम करेगा। हम फायदे के लालच में उतने एक्टिव नहीं होते जितने नुकसान के डर से होते हैं। अगर आप अपनी बातों में वजन डालना चाहते हैं, तो लोगों को ये बताना बंद कीजिये कि उन्हें क्या मिलेगा। इसके बजाय उन्हें ये दिखाना शुरू कीजिये कि वो क्या मिस कर रहे हैं।

मान लीजिए आप एक सेल्समेन हैं और कोई बीमा पॉलिसी बेच रहे हैं। अगर आप कस्टमर को कहेंगे कि "सर, ये पॉलिसी लेने से आपको बुढ़ापे में बहुत सुख मिलेगा", तो वो आपकी बात अनसुनी कर देगा क्योंकि बुढ़ापा उसे अभी बहुत दूर लग रहा है। लेकिन अगर आप उससे ये कहेंगे कि "सर, अगर आज आपने ये साइन नहीं किया तो कल से ये डिस्काउंट हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा और आपको २० परसेंट ज्यादा पैसे भरने पड़ेंगे", तो उसके हाथ अपने आप पेन ढूंढने लगेंगे। ये डर ही है जो लोगों से फैसले करवाता है।

लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप हर जगह झूठ बोलना शुरू कर दें। असली जादू तब होता है जब आप 'एक्सक्लूसिविटी' का इस्तेमाल करते हैं। लोगों को वो चीजें ज्यादा कीमती लगती हैं जो आसानी से नहीं मिलतीं। इसीलिए जब कोई कहता है कि "ये जानकारी सिर्फ आपके लिए है" या "ये मौका चुनिंदा लोगों को ही दिया गया है", तो सामने वाला खुद को वीआईपी समझने लगता है। उसे लगता है कि अगर उसने मना किया तो वो एक बहुत बड़े क्लब से बाहर हो जाएगा।

अपनी डेली लाइफ में भी आप इसे इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर आप अपने दोस्त को किसी ट्रिप पर ले जाना चाहते हैं और वो नखरे दिखा रहा है, तो उसे ये मत बताइये कि वहां कितना मजा आएगा। उसे ये कहिये कि "भाई, बाकी सब तो जा ही रहे हैं, बस तेरी एक सीट खाली है और होटल वाले बुकिंग क्लोज करने वाले हैं। बाद में मत कहना कि अकेले घूम आए"। बस, इतना कहते ही उसका सारा नखरा कपूर की तरह उड़ जाएगा। हम किसी चीज को तब तक कीमती नहीं समझते जब तक हमें ये न पता चल जाए कि वो हमसे छीनी जा सकती है। इसी डर का सही इस्तेमाल आपको एक मास्टर इन्फ्लुएंसर बना सकता है।


तो दोस्तों, क्या आप अब भी वही पुराने घिसे पिटे तरीके अपनाएंगे या इन साइंटिफिक तरीकों से दुनिया को अपना दीवाना बनाएंगे? याद रखिये, पर्सुएशन कोई जादू नहीं बल्कि एक कला है जिसे आप आज से ही शुरू कर सकते हैं। नीचे कमेंट्स में बताइये कि आप इन ३ लेसन में से सबसे पहले कौन सा अपनी लाइफ में आजमाने वाले हैं? इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ जरूर शेयर करें जिसे अपनी बात मनवाना बिलकुल नहीं आता।

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