You Can't Lead with Your Feet on the Desk (Hindi)


क्या आपको भी लगता है कि ऑफिस की एसी वाली केबिन में पैर पसारकर हुकुम चलाना असली लीडरशिप है। मुबारक हो आप अपनी टीम और प्रॉफिट दोनों को गटर में डालने की तैयारी कर चुके हैं। बिना मैदान में उतरे लीडर बनने का आपका यह सपना वैसे ही टूटेगा जैसे डाइट के पहले दिन छोले भटूरे दिख जाते हैं।

आज हम एड फुलर की किताब से वे सीक्रेट्स समझेंगे जो आपके बिजनेस और काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल देंगे। चलिए जानते हैं वे ३ लेसन जो आपको एक बॉस से असली लीडर बना देंगे।


लेसन १ : डेस्क छोड़कर मैदान में उतरना

अगर आपको लगता है कि एक बढ़िया आलीशान ऑफिस, कांच की दीवारें और घूमने वाली कुर्सी ही आपकी असली ताकत है, तो एड फुलर आपको आईना दिखाने आए हैं। आजकल के कई सो कॉल्ड मैनेजर्स का हाल यह है कि उन्हें अपनी ऑफिस की कैंटीन का रास्ता तक ठीक से नहीं पता होता, लेकिन वे पूरी कंपनी को ग्लोबल लेवल पर ले जाने की बातें करते हैं। एड फुलर कहते हैं कि अगर आप अपनी डेस्क पर पैर रखकर बैठे हैं, तो आप सिर्फ हुकुम चला रहे हैं, लीडरशिप नहीं कर रहे। असली लीडरशिप वह है जो लोगों के पसीने की खुशबू और काम के शोर के बीच जाकर समझी जाती है।

कल्पना कीजिए कि आपके घर में शादी है और आप दूर एक सोफे पर बैठकर सिर्फ व्हाट्सएप ग्रुप पर इंस्ट्रक्शंस दे रहे हैं कि पनीर टिक्का कम पड़ गया है। क्या होगा। हलवाई आपको मन ही मन गालियां देगा और मेहमान भूखे रहेंगे। लेकिन अगर आप खुद वहां खड़े होते हैं, तो हलवाई को पता होता है कि मालिक की नजर है और काम बेहतर होता है। बिजनेस में भी यही लॉजिक काम करता है। एड फुलर जब मारियट इंटरनेशनल के लिए काम कर रहे थे, तो उन्होंने यह महसूस किया कि फाइलों में लिखे हुए नंबर्स कभी भी उस सच्चाई को नहीं बता सकते जो एक ग्राउंड फ्लोर पर खड़ा कर्मचारी बता सकता है।

जब आप अपनी डेस्क छोड़कर नीचे उतरते हैं, तो आप उन बैरियर्स को तोड़ देते हैं जो आपके और आपकी टीम के बीच खड़े होते हैं। कर्मचारी को लगता है कि मेरा बॉस सिर्फ एक नाम नहीं है जो महीने के अंत में सैलरी स्लिप पर दिखता है, बल्कि वह एक इंसान है जो मेरी मुश्किलों को समझता है। सार्काज्म की बात तो यह है कि कई लोग ऑफिस में सीसीटीभी कैमरे सिर्फ इसलिए लगवाते हैं ताकि वे अपनी कुर्सी से हिले बिना सबको देख सकें। यह लीडरशिप नहीं, बल्कि जेलर वाली मानसिकता है। कैमरा आपको यह तो दिखा देगा कि बंदा काम कर रहा है या नहीं, लेकिन वह यह कभी नहीं बताएगा कि वह बंदा खुश है या उसे काम करने में कोई दिक्कत आ रही है।

एड फुलर का मानना है कि फेस टू फेस बातचीत का कोई विकल्प नहीं है। ईमेल और जूम कॉल्स के जमाने में हम भूल गए हैं कि एक हाथ मिलाना या कंधे पर हाथ रखकर यह पूछना कि सब कैसा चल रहा है, किसी भी बोनस से ज्यादा मोटिवेट कर सकता है। जब आप फील्ड पर होते हैं, तो आपको वे छोटी छोटी बातें पता चलती हैं जो कभी भी किसी मीटिंग रूम में डिस्कस नहीं की जातीं। शायद कोई मशीन खराब हो, शायद किसी प्रोसेस में फालतू की देरी हो रही हो, या शायद आपकी टीम को बस थोड़े से सपोर्ट की जरूरत हो।

आजकल के स्टार्टअप फाउंडर्स को लगता है कि वे दुनिया बदल देंगे, लेकिन उन्हें अपनी टीम के छोटे से छोटे सदस्य का नाम तक नहीं पता होता। यह वैसा ही है जैसे आप किसी क्रिकेट टीम के कप्तान हैं लेकिन आपको यह नहीं पता कि आपका बॉलर किस पैर में चोट खाया हुआ है। अगर आप खुद को लीडर कहते हैं, तो आपको वहां होना पड़ेगा जहां एक्शन हो रहा है। डेस्क पर बैठकर आप सिर्फ थ्योरी पढ़ सकते हैं, प्रैक्टिकल तो मैदान में ही होता है। इसलिए, अगर आप चाहते हैं कि लोग आपकी बात सुनें और आपका सम्मान करें, तो पहले वह कुर्सी छोड़िये और लोगों के बीच जाइये। वहां जाने से जो जानकारी और इज्जत आपको मिलेगी, वह दुनिया की कोई भी एमबीए डिग्री आपको नहीं सिखा सकती।


लेसन २ : कल्चरल सेंसिटिविटी और भरोसा

अगर आपको लगता है कि पूरी दुनिया आपके इशारों पर नाचेगी क्योंकि आपके पास पैसा या बड़ा ब्रांड है, तो शायद आप किसी गलतफहमी के शिकार हैं। एड फुलर कहते हैं कि बिजनेस सिर्फ नंबर्स का खेल नहीं है, बल्कि यह भावनाओं और विश्वास का खेल है। खासकर जब आप अलग अलग देशों और कल्चर के लोगों के साथ काम करते हैं। कई लोग इंडिया से बाहर जाकर या अपनी सिटी छोड़कर दूसरी जगह बिजनेस करने जाते हैं और वहां भी वही एटीट्यूड रखते हैं जैसे वे अपने घर के शेर हों। यह वैसा ही है जैसे आप किसी के घर मेहमान बनकर जाएं और उनके सोफे पर बैठकर उन्हीं के खाने की बुराई करने लगें।

आजकल के दौर में भरोसा जीतना उतना ही मुश्किल है जितना संडे की सुबह जल्दी सोकर उठना। एड फुलर ने जब मारियट को दुनिया भर में फैलाया, तो उन्होंने सीखा कि हर देश का अपना एक अलग मिजाज होता है। आप जापान में जाकर वैसे ही डील क्लोज नहीं कर सकते जैसे आप अमेरिका या दिल्ली में करते हैं। वहां के लोग पहले आपको समझेंगे, आपके साथ खाना खाएंगे और फिर तय करेंगे कि आप पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं। हमारे यहाँ क्या होता है। हम मीटिंग में जाते ही सीधे चेकबुक निकाल लेते हैं या प्रेजेंटेशन चालू कर देते हैं। सार्काज्म तो देखिए, हम खुद को ग्लोबल लीडर कहते हैं लेकिन हमें यह तक नहीं पता होता कि सामने वाले देश में हाथ मिलाना सही है या सिर झुकाना।

भरोसा रातों रात नहीं बनता। यह उन छोटे छोटे वादों से बनता है जिन्हें आप निभाते हैं। अगर आपने किसी को कहा कि आप कल फोन करेंगे, तो कल मतलब कल ही होना चाहिए। बिजनेस रिलेशनशिप्स में ईमानदारी सबसे बड़ा असेट है। एड फुलर बताते हैं कि कई बार आपको अपनी ईगो साइड में रखकर सामने वाले के कल्चर को समझना पड़ता है। अगर आप चीन में बिजनेस कर रहे हैं, तो वहां की परंपराओं का मजाक उड़ाकर आप कभी सफल नहीं हो सकते। लोग आपके ब्रांड से पहले आपसे जुड़ते हैं। अगर आप एक अच्छे इंसान नहीं बन सकते, तो एक अच्छे लीडर बनने का ख्याल दिमाग से निकाल दीजिये।

रिलेशनशिप बिल्डिंग का मतलब सिर्फ काम की बातें करना नहीं है। इसका मतलब है सामने वाले की लाइफ और उसकी वैल्यूज में इंटरेस्ट लेना। जब आप किसी क्लाइंट के साथ उनके परिवार के बारे में बात करते हैं या उनके त्यौहार की बधाई देते हैं, तो आप एक प्रोफेशनल बैरियर को तोड़कर एक पर्सनल कनेक्शन बना लेते हैं। यही वह कनेक्शन है जो मुश्किल समय में आपके बिजनेस को बचाए रखता है। वरना मार्केट में आपसे सस्ते और आपसे बड़े खिलाड़ी तो हमेशा मौजूद रहेंगे ही। लोग उनके पास क्यों नहीं जाते। क्योंकि उनके पास वह भरोसा नहीं है जो आपने कमाया है।

डिजिटल दुनिया में हम इमोजी भेजकर सोचते हैं कि हमने रिश्ता बना लिया। लेकिन असली भरोसा तब बनता है जब आप सामने वाले की आंखों में आंखें डालकर बात करते हैं और उन्हें यह महसूस कराते हैं कि आप उनके फायदे के लिए भी उतने ही चिंतित हैं जितने अपने फायदे के लिए। बिजनेस में जीत उसी की होती है जो बैरियर्स को गिराकर पुल बनाना जानता है। अगर आप सिर्फ अपनी दीवारें ऊंची करते रहेंगे, तो एक दिन आप उस महल में अकेले रह जाएंगे जहाँ न कोई पार्टनर होगा और न ही कोई वफादार कस्टमर।


लेसन ३ : मुश्किल समय में हाथ थामना

कहते हैं कि समंदर के शांत होने पर तो कोई भी अनाड़ी जहाज चला लेता है, असली कप्तान वही है जो तूफान में लहरों का सीना चीरकर निकले। एड फुलर का यह लेसन उन लोगों के लिए एक करारा तमाचा है जो अच्छे वक्त में तो आपकी फोटो पर हार्ट इमोजी भेजते हैं, लेकिन बुरा वक्त आते ही आपको अनफ्रेंड कर देते हैं। बिजनेस की दुनिया में जब सब कुछ सही चल रहा होता है, तो हर कोई आपका पार्टनर बनना चाहता है। लेकिन जब संकट आता है, जैसे कोई मंदी या कोई ग्लोबल क्राइसिस, तब पता चलता है कि आपके पास लीडर है या सिर्फ एक स्वार्थी मैनेजर।

कल्पना कीजिये कि आपकी कंपनी पर कोई मुसीबत आई है और आपका बॉस सबसे पहले अपनी सैलरी बचाकर भागने की प्लानिंग कर रहा है। कैसा लगेगा आपको। एड फुलर ने अपने करियर में कई ऐसे मोड़ देखे जब दुनिया थम गई थी, चाहे वह खाड़ी युद्ध हो या आतंकी हमले। ऐसे समय में उन्होंने अपनी डेस्क नहीं पकड़ी, बल्कि वे अपने उन पार्टनर्स और टीम के पास पहुंचे जो डरे हुए थे। सार्काज्म तो देखिए, आजकल की कंपनियां संकट आने पर सबसे पहले अपने सबसे पुराने वफादार लोगों को ही नौकरी से निकालती हैं ताकि उनके बैलेंस शीट के नंबर्स चमकते रहें। यह वैसा ही है जैसे नाव में छेद होने पर आप अपने लाइफ जैकेट को ही पानी में फेंक दें ताकि नाव का वजन कम हो जाए।

असली रिलेशनशिप तब नहीं बनती जब आप साथ में शैम्पेन पीते हैं, बल्कि तब बनती है जब आप एक दूसरे के आंसू पोंछते हैं। एड फुलर कहते हैं कि अगर आप मुश्किल समय में अपने पार्टनर के साथ खड़े रहते हैं, तो आप एक ऐसी लॉयल्टी कमा लेते हैं जिसे पैसा कभी नहीं खरीद सकता। जब आप किसी की डूबती नैया को सहारा देते हैं, तो वह इंसान आपके लिए मर मिटने को तैयार हो जाता है। यही वह जादू है जो मारियट जैसे ब्रांड्स को दशकों तक टॉप पर रखता है। लोग आपके प्रोडक्ट्स को भूल सकते हैं, लेकिन वे उस अहसास को कभी नहीं भूलते जो आपने उन्हें तब दिया था जब उनके पास कोई उम्मीद नहीं थी।

संकट के समय कम्युनिकेट करना बहुत जरूरी है। कई लीडर्स मुश्किल वक्त में गायब हो जाते हैं, जैसे किसी उधार लेने वाले दोस्त का फोन स्विच ऑफ हो जाता है। एड फुलर का मानना है कि भले ही आपके पास कोई समाधान न हो, लेकिन वहां मौजूद रहना ही आधे डर को खत्म कर देता है। आपकी टीम को यह पता होना चाहिए कि उनका कैप्टन जहाज छोड़कर नहीं भागा है। यह भरोसा ही लोगों में वह हिम्मत भरता है कि वे नामुमकिन को भी मुमकिन कर दें। बिजनेस सिर्फ मुनाफे का सौदा नहीं है, यह साथ निभाने का वादा है।

आज के इस कॉम्पिटिटिव दौर में, जहाँ हर कोई एक दूसरे की टांग खींचने में लगा है, वहां हाथ थामने वाला लीडर ही असली हीरो बनता है। अगर आप चाहते हैं कि आपका बिजनेस सिर्फ एक सीजन का वंडर न रहे, बल्कि एक लेगेसी बने, तो लोगों के बुरे वक्त में उनके काम आना सीखिए। जब आप किसी का हाथ तब थामते हैं जब पूरी दुनिया ने उनका साथ छोड़ दिया हो, तब आप सिर्फ प्रॉफिट नहीं कमाते, आप अमर हो जाते हैं। याद रखिये, आपकी असली वैल्यू आपके बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उन लोगों की गिनती से होती है जो आपके एक इशारे पर किसी भी तूफान से टकराने को तैयार खड़े हों।


तो दोस्तों, एड फुलर की यह बातें सिर्फ एक किताब का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि एक सफल और इज्जतदार जीवन जीने का मंत्र हैं। अपनी डेस्क से बाहर निकलिये, लोगों के दिलों में जगह बनाइये और भरोसे की वह दीवार खड़ी कीजिये जिसे कोई भी संकट हिला न सके। क्या आप आज अपनी टीम के किसी एक सदस्य से बिना किसी काम के हाल चाल पूछने की हिम्मत रखते हैं। नीचे कमेंट्स में लिखिये कि आप एक सच्चे लीडर बनने के लिए आज कौन सा एक कदम उठाएंगे। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जिसे लगता है कि बॉस बनना ही सब कुछ है।

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