The 60 Minute Startup (Hindi)



क्या आप अभी भी उस परफेक्ट मोमेंट का इंतजार कर रहे हैं जब आपके पास करोड़ों रुपये और पूरा खाली समय होगा? मुबारक हो। आप अपनी पूरी लाइफ सिर्फ सपने देखने में ही निकाल देंगे और आपके पड़ोस वाला चिंटू अपना स्टार्टअप खड़ा करके आपसे आगे निकल जाएगा।

इस बुक के जरिए आप समझेंगे कि कैसे अपनी आलसी आदतों को टाटा बाय बाय बोलकर आप डेली सिर्फ 60 मिनट में अपना खुद का अम्पायर खड़ा करना शुरू कर सकते हैं। चलिए जानते हैं वो 3 कीमती लेसन जो आपकी जिंदगी बदल देंगे।


लेसन १ : परफेक्शन का भूत उतारो और काम चालू करो

हम में से ज्यादातर लोग एक ही बीमारी से परेशान हैं और उसका नाम है परफेक्शन का इंतजार। आप सोचते हैं कि जब तक आपके पास वर्ल्ड क्लास लोगो नहीं होगा या जब तक आप एक चमकती हुई वेबसाइट नहीं बना लेते तब तक आप बिजनेस शुरू नहीं कर सकते। सच तो यह है कि यह सिर्फ काम को टालने का एक बहाना है। रमेश दोंथा अपनी बुक में साफ कहते हैं कि आपको पहले दिन अंबानी बनने की जरूरत नहीं है। आपको बस एक ऐसा आइडिया चाहिए जो किसी की प्रॉब्लम सॉल्व करे।

सोचिए अगर आप एक टिफिन सर्विस शुरू करना चाहते हैं। अब आप बैठ कर यह सोच रहे हैं कि जब तक मेरे पास फाइव स्टार होटल जैसे बर्तन और डिजाइनर नेपकिन नहीं होंगे तब तक मैं खाना नहीं बनाऊंगा। इस चक्कर में आप महीनों निकाल देते हैं। वहीं दूसरी तरफ आपका एक दोस्त बस चार लोगों को फोन करता है और घर के बने सादे खाने का आर्डर ले लेता है। जब तक आप अपने लोगो का कलर डिसाइड कर रहे होते हैं तब तक वो अपने पहले दस कस्टमर बना चुका होता है। यही फर्क है एक सोचने वाले और एक करने वाले में।

ज्यादातर लोग अपने आइडिया को इतना सीक्रेट रखते हैं जैसे वो कोका कोला का फार्मूला हो। उनको लगता है कि अगर किसी को बता दिया तो कोई उनका आइडिया चोरी कर लेगा। भाई साहब असलियत यह है कि आइडिया की कीमत एक पैसे की भी नहीं है अगर आप उस पर काम नहीं करते। असली वैल्यू तो उस काम को करने में है। परफेक्शन एक ऐसी जेल है जिसमें आप खुद को बंद कर लेते हैं। आप जितनी देर परफेक्ट होने में लगाएंगे उतनी देर में मार्केट का ट्रेंड बदल जाएगा।

क्या आपको लगता है कि फेसबुक या गूगल पहले दिन वैसे ही थे जैसे आज दिखते हैं। बिल्कुल नहीं। उन्होंने एक टूटी फूटी चीज से शुरुआत की और धीरे धीरे उसे बेहतर बनाया। अगर आप एक राइटर बनना चाहते हैं तो बस लिखना शुरू करिए। यह मत सोचिए कि पहली लाइन ही ऐसी होगी कि लोग तालियां बजाने लगेंगे। शुरू में आपका काम बेकार होगा और यह नॉर्मल है। खराब काम करना ही अच्छे काम तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता है।

अपनी नौकरी के साथ साथ अगर आप दिन का सिर्फ एक घंटा भी इस काम को देते हैं तो आप उन लोगों से कोसों आगे निकल जाएंगे जो सिर्फ ऑफिस के कैंटीन में बैठकर बड़ी बड़ी बातें करते हैं। वो एक घंटा आपका प्राइम टाइम होना चाहिए। उस समय कोई मोबाइल नोटिफिकेशन नहीं और कोई फालतू की गपशप नहीं। बस आप और आपका काम। परफेक्शन की चिंता छोडिए क्योंकि मार्केट को आपकी क्वालिटी से ज्यादा इस बात की परवाह है कि आप उनकी लाइफ में क्या वैल्यू एड कर रहे हैं।

अगर आप आज शुरुआत नहीं करते हैं तो यकीन मानिए एक साल बाद आप फिर से यही सोच रहे होंगे कि काश मैंने उस दिन शुरू कर दिया होता। इसलिए उस भूत को भगाइए जो आपसे कहता है कि अभी आप तैयार नहीं हैं। आप कभी पूरी तरह तैयार नहीं होंगे। आपको बस कूदना है और रास्ते में अपने पंख फैलाने हैं।


लेसन २ : साठ मिनट का जादू और प्रायोरिटी का खेल

अक्सर लोग रोना रोते हैं कि उनके पास टाइम नहीं है। ऑफिस का काम, घर की जिम्मेदारी और फिर बचा हुआ वक्त नेटफ्लिक्स पर सीरीज देखने में निकल जाता है। लेकिन रमेश दोंथा कहते हैं कि अगर आप खुद को डेली सिर्फ साठ मिनट नहीं दे सकते, तो शायद आप अपनी लाइफ बदलने के लिए सीरियस ही नहीं हैं। यह साठ मिनट कोई साधारण समय नहीं है, यह आपका वह इन्वेस्टमेंट है जो आपको भविष्य में आजादी देगा। लेकिन दिक्कत यह है कि हम इस एक घंटे को भी फालतू के कामों में बर्बाद कर देते हैं।

लोग सोचते हैं कि बिजनेस करने के लिए पूरा दिन खाली होना चाहिए। जैसे कि जब तक आप ऑफिस से इस्तीफा नहीं देंगे, तब तक आप कुछ बड़ा नहीं कर पाएंगे। यह सोच वैसी ही है जैसे कोई सोचे कि जब तक वो स्विमिंग पूल नहीं खरीदेगा, तब तक वो तैरना नहीं सीखेगा। अरे भाई, शुरुआत तो बाल्टी के पानी से भी हो सकती है। आपको बस अपनी प्रायोरिटी सेट करनी है। अगर आप सुबह एक घंटा जल्दी उठ जाएं या रात को सोने से पहले इंस्टाग्राम स्क्रॉल करना बंद कर दें, तो आपको वो कीमती साठ मिनट मिल जाएंगे।

इस एक घंटे में आपको रिसर्च नहीं करनी है, आपको असल में काम करना है। लोग अक्सर 'रिसर्च' के नाम पर यूट्यूब पर वीडियो देखते रहते हैं और उन्हें लगता है कि वो बिजनेस कर रहे हैं। यह वैसा ही है जैसे जिम जाने के बजाय वर्कआउट के वीडियो देखकर अपनी बॉडी बनने का इंतजार करना। आपको उस एक घंटे में वो काम करना है जिससे पैसा आए या कस्टमर बढ़े। चाहे वो कोल्ड ईमेल भेजना हो, अपने प्रोडक्ट का डेमो बनाना हो या किसी क्लाइंट से बात करना हो।

मान लीजिए आपको एक ग्राफिक डिजाइनिंग का स्टार्टअप शुरू करना है। अब आप उस एक घंटे में यह नहीं सोचेंगे कि फोटोशॉप का कौन सा वर्जन बेस्ट है। आप सीधा अपना लैपटॉप खोलेंगे और कम से कम दो अच्छे डिजाइन बनाएंगे जिन्हें आप लोगों को दिखा सकें। वो साठ मिनट आपकी एकाग्रता की परीक्षा है। उस समय दुनिया इधर की उधर हो जाए, आपको अपने फोन को एरोप्लेन मोड पर डाल देना चाहिए। क्योंकि आपके दोस्त का मीम या किसी की शादी की फोटो आपके बिल नहीं भरेगी।

जरा सोचिए, अगर आप रोज एक घंटा अपने स्टार्टअप को देते हैं, तो एक हफ्ते में सात घंटे और महीने में तीस घंटे होते हैं। तीस घंटे का मतलब है कि आपने बिना नौकरी छोड़े अपनी कंपनी के लिए लगभग चार पूरे वर्किंग डेज निकाल लिए। यह सुनने में छोटा लगता है, लेकिन यही छोटे कदम आगे चलकर एक बड़ा पहाड़ खड़ा कर देते हैं। लोग अक्सर शुरुआत में बहुत जोश में होते हैं और पहले दिन पांच घंटे काम करते हैं, फिर अगले चार दिन गायब हो जाते हैं। यह तरीका बिल्कुल गलत है।

सफलता की कुंजी इंटेंसिटी में नहीं, बल्कि कंसिस्टेंसी में है। आपको कछुए की चाल चलनी है लेकिन बिना रुके। अगर आप डेली वो साठ मिनट ईमानदारी से देंगे, तो तीस दिन के अंदर आपके पास दिखाने के लिए कुछ ठोस होगा। आप खुद हैरान रह जाएंगे कि जिस काम को आप सालों से टाल रहे थे, वो सिर्फ कुछ घंटों की मेहनत से खड़ा हो गया। तो बहाने बनाना बंद करिए और अपनी घड़ी में वो साठ मिनट आज ही फिक्स कर लीजिए।


लेसन ३ : कस्टमर ही राजा है और बाकी सब मोह माया है

क्या आप उन लोगों में से हैं जो पहले प्रोडक्ट बना लेते हैं और फिर गली-गली घूमकर पूछते हैं कि क्या कोई इसे खरीदेगा? अगर हां, तो आप अपनी नाकामी का सामान खुद तैयार कर रहे हैं। रमेश दोंथा का सबसे बड़ा मंत्र यही है कि प्रोडक्ट से पहले मार्केट और कस्टमर को ढूंढो। लोग अक्सर अपने आइडिया के प्यार में इतने पागल हो जाते हैं कि वो यह भूल जाते हैं कि क्या असल में किसी को इसकी जरूरत है भी?

मान लीजिए आपने एक ऐसा छाता बनाया है जो बारिश में नहीं बल्कि धूप में आपको गाना सुनाता है। आपने अपनी पूरी जमापूंजी और सारा समय इसे बनाने में लगा दिया। लेकिन जब आप इसे बेचने निकले तो पता चला कि लोगों को गाना सुनने के लिए ईयरफोन्स पसंद हैं, छाता नहीं। अब आप उस छाते के साथ अकेले खड़े होकर गाना सुनिए क्योंकि किसी और को इसमें कोई इंटरेस्ट नहीं है। यही गलती ज्यादातर स्टार्टअप करने वाले करते हैं।

आपको पहले उस इंसान को ढूंढना है जिसकी लाइफ में कोई समस्या है और फिर अपने स्टार्टअप के जरिए उसे हल करना है। अगर आप पहले 30 दिनों में अपना पहला पेइंग कस्टमर नहीं ढूंढ पाते, तो समझ लीजिए कि आपके आइडिया में दम नहीं है या फिर आप गलत दिशा में मेहनत कर रहे हैं। पैसा ही वो एकमात्र सबूत है जो बताता है कि आपका बिजनेस आइडिया काम कर रहा है। जब कोई अजनबी आपको अपनी मेहनत की कमाई देता है, तब असल में आपका स्टार्टअप पैदा होता है।

अपने साठ मिनट के डेली रूटीन में से कम से कम आधा समय लोगों से बात करने और फीडबैक लेने में बिताएं। लोगों से पूछिए कि उन्हें क्या परेशानी आ रही है। क्या वो आपकी सर्विस के लिए पैसे देने को तैयार हैं? अगर जवाब 'ना' है, तो दुखी होने के बजाय शुक्र मनाइए कि आपका समय और पैसा फालतू की चीज बनाने से बच गया। आपको जिद्दी नहीं बल्कि लचीला होना पड़ेगा। मार्केट जो मांग रहा है वही बेचिए, वो नहीं जो आपको बेचना पसंद है।

अक्सर हम सोचते हैं कि मार्केटिंग के लिए लाखों का बजट चाहिए। लेकिन आज के जमाने में अगर आपके पास एक स्मार्टफोन और इंटरनेट है, तो पूरी दुनिया आपकी मार्केट है। अपने पहले कस्टमर को ढूंढने के लिए आपको किसी बड़े विज्ञापन की जरूरत नहीं है। बस अपनी शर्म को अलमारी में बंद करिए और लोगों तक पहुंचिए। जब पहला कस्टमर आपकी सर्विस की तारीफ करेगा और आपको पैसे देगा, तो वो खुशी किसी भी लॉटरी जीतने से बड़ी होगी।

अंत में बस इतना याद रखिए कि बिजनेस कोई रॉकेट साइंस नहीं है। यह सिर्फ लोगों की मदद करने और उसके बदले में वैल्यू पाने का एक जरिया है। अगर आप अपनी नौकरी के उस बोरिंग रूटीन से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाना चाहते हैं, तो यह 60 मिनट का स्टार्टअप मॉडल आपके लिए सबसे बेस्ट है। डर सबको लगता है, लेकिन जो उस डर के बावजूद अपना लैपटॉप खोलकर काम पर बैठ जाता है, वही कल का लीडर बनता है।

तो अब सोचना बंद करिए और अपनी घड़ी की सुइयों को देखिए। आपका वो एक घंटा अभी इसी वक्त शुरू हो सकता है। क्या आप तैयार हैं अपने सपनों का पहला कस्टमर ढूंढने के लिए? उठिए और साबित कर दीजिए कि आप सिर्फ बातें बनाने वाले नहीं बल्कि काम करके दिखाने वाले इंसान हैं।

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