आप अपने नए आइडियाज पर कितना भी काम कर ले, लोग उन्हें कचरे के डिब्बे में डाल देंगे। अगर आप अभी भी वही पुराना घिसा पिटा तरीका अपना रहे है और यह सोच रहे है कि दुनिया उसे हाथो हाथ लेगी, तो आप सच में खुद को धोखा दे रहे है।
अक्सर हम नई शुरुआत के नाम पर बस जोर लगाते है, पर असलियत में हम अपनी ही लगाई हुई आग में जल रहे होते है। बिना रुकावटों को समझे आगे बढ़ना ठीक वैसा ही है जैसे बिना पेट्रोल के गाड़ी स्टार्ट करने की बेवकूफी करना। चलिए, जानते है कि आप कहाँ गलती कर रहे है और इसे कैसे ठीक किया जा सकता है।
लेसन १ : फ्रिक्शन की पहचान और उसे कम करना
आपने कभी गौर किया है कि हम सब एक अजीब किस्म के आलसी है। हमें अपनी जिंदगी में बदलाव चाहिए होता है लेकिन जैसे ही कोई नया आइडिया सामने आता है, हमारा दिमाग सबसे पहले उसे रिजेक्ट करने का बहाना ढूंढता है। इसे ही फ्रिक्शन कहते है। यह कोई बाहरी ताकत नहीं है, बल्कि यह हमारे अंदर का वह डर है जो हमें कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने नहीं देता। अब मान लीजिए आप अपने किसी दोस्त को जिम जाने का एक नया प्लान बताते है। आप उसे दुनिया भर के फायदे गिनाते है, उसे बेस्ट सप्लीमेंट्स के बारे में बताते है और एक्सरसाइज का पूरा चार्ट बना कर देते है। लेकिन क्या आपका वह दोस्त अगले दिन जिम जाता है। शायद नहीं। वह अगले ही दिन कह देगा कि अभी तो बहुत काम है या कल से पक्का शुरू करेंगे। यहाँ आपने क्या किया, आपने उस पर नए आइडियाज का बोझ लाद दिया। आपने उसे यह तो बताया कि जिम जाना अच्छा है, पर आपने उन रुकावटों को नहीं हटाया जो उसे जिम जाने से रोक रही थी। वह आलस, वह सुबह जल्दी उठने का झंझट और वह जिम की फीस भरने का डर। यही फ्रिक्शन है।
इस किताब में लोरेन और डेविड ने बड़े कमाल की बात कही है। जब लोग किसी नए आइडिया को मना करते है, तो हम अक्सर यह सोचते है कि शायद हमारा आइडिया ही घटिया था। हम उसे और बेहतर बनाने की कोशिश में लग जाते है। हम उसमें और नए फीचर्स जोड़ते है, उसे और आकर्षक बनाने की कोशिश करते है। पर सच तो यह है कि आइडिया में कमी नहीं है, कमी उस रास्ते में है जो उसे अपनाने से रोकता है। एक छोटा सा उदाहरण लेते है। मान लीजिए आपको घर का बना खाना खाने की आदत डालनी है। आप सोचते है कि कल से बाहर का पिज्जा या बर्गर बिल्कुल बंद। आप पूरी तैयारी करते है, फ्रिज में सब्जियां भर लेते है और खूब सारा प्लान बना लेते है। पर दूसरे दिन दफ्तर से लौटते वक्त थकान इतनी होती है कि खाना बनाने का मन ही नहीं करता। आप फिर से फोन उठाकर पिज्जा ऑर्डर कर देते है। यहाँ फ्रिक्शन यह नहीं था कि आपको खाना बनाना नहीं आता था। फ्रिक्शन यह था कि खाना बनाने का काम बहुत थका देने वाला था। अगर आप पहले से कटी हुई सब्जियां लाकर रखते या खाना पहले से तैयार करके रखते, तो शायद आप बाहर का खाना नहीं मंगाते।
हम अक्सर अपनी तरक्की के लिए ज्यादा जोर लगाते है। हम और मेहनत करते है, और ज्यादा काम करते है, पर रिजल्ट वही ढाक के तीन पात। हमने कभी यह सोचा ही नहीं कि जो रुकावटें हमारे रास्ते में खड़ी है, उन्हें हटाने के लिए हमें कोई मेहनत नहीं करनी बस एक समझदारी भरा कदम उठाना है। फ्रिक्शन कम करने का मतलब है कि रास्ते को इतना साफ कर दो कि आपको कुछ करना ही न पड़े। अगर आपको सुबह जल्दी उठना है, तो अलार्म को बेड से दूर रख दो। यह एक छोटा सा बदलाव आपके अंदर के रेजिस्टेंस को खत्म कर देता है। हमें लगता है कि हमें बड़े बड़े बदलाव करने होंगे, तभी कुछ हासिल होगा। पर सच यह है कि जिंदगी में बड़े बदलाव अक्सर उन छोटी छोटी रुकावटों को हटाने से आते है जिन्हें हम नजरअंदाज कर देते है। जब आप अपनी जिंदगी की इन छोटी रुकावटों को हटाना शुरू करेंगे, तो आप देखेंगे कि जो काम आपको पहाड़ चढ़ने जैसा मुश्किल लगता था, वह अब ढलान पर फिसलने जैसा आसान हो गया है। आप अपनी एनर्जी को आइडिया को और बेहतर बनाने में बर्बाद न करे, बल्कि उस एनर्जी को उन छोटी छोटी बाधाओं को हटाने में लगाए जो आपके सामने दीवार बनकर खड़ी है।
लेसन २ : चेंज के डर को समझना
जब हम किसी नए बदलाव की बात करते है, तो अक्सर हमें लगता है कि लोग उसे खुशी खुशी अपना लेंगे। पर सच तो ये है कि लोग बदलाव से नफरत करते है। उन्हें बस वही पसंद है जो वो सालों से करते आ रहे है, भले ही वह तरीका उन्हें कोई फायदा न दे रहा हो। मान लीजिए आप अपने ऑफिस में एक नया सॉफ्टवेयर लागू करना चाहते है जो काम को दस गुना तेज कर सकता है। आप अपने मैनेजर को बताते है कि ये कितना फायदेमंद है और इससे कितना समय बचेगा। पर आपका मैनेजर उसे एक्सेप्ट करने में आनाकानी करता है। आप सोचते है कि वह कितना जिद्दी है और उसका दिमाग कितना पुराना है। आप उसे बार बार समझाते है, प्रेजेंटेशन दिखाते है, पर वह टस से मस नहीं होता। यहाँ पर आप सिर्फ अपने नजरिए से सोच रहे है। आप उस मैनेजर का नजरिया नहीं देख रहे जो इस बदलाव को एक खतरा मान रहा है। उसे डर है कि अगर यह नया सिस्टम आया तो उसे सब कुछ फिर से सीखना पड़ेगा। उसे डर है कि कहीं उसकी पुरानी काबिलियत बेकार न हो जाए। यह डर ही वह सबसे बड़ी दीवार है जो हर नए बदलाव को रोकती है।
हम इसे चेंज का डर कहते है, जो हर इंसान के अंदर गहराई तक बैठा होता है। लोग नई चीजों से नहीं डरते, वे उस अनिश्चितता से डरते है जो नए बदलाव के साथ आती है। जैसे ही आप किसी को कहते है कि कुछ नया ट्राई करो, उनके दिमाग में घंटी बजने लगती है कि क्या सब कुछ खराब हो जाएगा। अगर आप चाहते है कि कोई आपकी बात माने या आपके आइडिया को अपनाए, तो आपको उनके उस डर को शांत करना होगा। आप उन्हें यह मत बताइए कि नया आइडिया कितना शानदार है, बल्कि उन्हें यह भरोसा दिलाइए कि उनके साथ कुछ भी बुरा नहीं होगा। उन्हें समझाइए कि पुराना तरीका भी सुरक्षित रहेगा और नया तरीका सिर्फ एक छोटा सा सुधार है। अक्सर लोग इसलिए नहीं बदलते क्योंकि उन्हें लगता है कि नया रास्ता उन्हें किसी अनजान और डरावनी जगह ले जाएगा। अगर आप उन्हें यकीन दिला सके कि रास्ता वही है बस थोड़ी सी रोशनी और आ गई है, तो वे आपके साथ चलने के लिए तैयार हो जाएंगे।
याद रखिए, आप किसी को जबरदस्ती चेंज के लिए मजबूर नहीं कर सकते। जैसे एक बच्चा अपनी पसंदीदा पुरानी फटी हुई गुड़िया को नहीं छोड़ना चाहता क्योंकि उसे उस गुड़िया से जुड़ाव महसूस होता है, वैसे ही हर इंसान अपनी पुरानी आदतों से जुड़ा होता है। आप उससे वह पुरानी गुड़िया छीनकर एक नई और चमकती हुई कार नहीं दे सकते। वह रोएगा ही, क्योंकि उसे उसकी पुरानी चीज में सुकून मिलता है। आपको उस बदलाव को इतना प्यारा और सरल बनाना होगा कि वह खुद ही उस पुरानी आदत को छोड़कर नई आदत को गले लगा ले। जब आप लोगों के इस डर को एक कमजोरी नहीं बल्कि एक स्वभाव की तरह देखेंगे, तो आपको उन पर गुस्सा नहीं आएगा। आप शांत होकर उन्हें समझा पाएंगे और बदलाव का रास्ता आसान हो जाएगा। लोग आपकी बातों से नहीं बल्कि आपके भरोसे से बदलते है। क्या आप भी अपनी जिंदगी में किसी बदलाव को लेकर ऐसे ही डरे हुए है या आप उसे एक मौका देने के लिए तैयार है?
लेसन ३ : एफर्टलेस प्रोग्रेस की ताकत
अब तक आपने जाना कि कैसे छोटी रुकावटों को हटाना और लोगों के डर को समझना बदलाव की नीव रखता है। लेकिन सवाल यह है कि इस प्रोग्रेस को आप हमेशा के लिए कायम कैसे रखे। क्या यह कोई जादू है जो अचानक हो जाएगा। बिल्कुल नहीं। यह एफर्टलेस प्रोग्रेस का खेल है। इसका मतलब यह नहीं है कि आप कुछ न करे और सब कुछ अपने आप हो जाए। इसका मतलब यह है कि आप मेहनत को उस दिशा में लगाए जहाँ वह सबसे ज्यादा असर दिखा सके। अक्सर हम अपनी पूरी जान एक ही जगह लगा देते है और जब रिजल्ट नहीं मिलता, तो हम हार मान लेते है। एफर्टलेस प्रोग्रेस का मतलब है कि आप पानी की तरह बन जाए जो चट्टान को काटने के लिए हथौड़े का नहीं, बल्कि निरंतर बहने वाली धार का इस्तेमाल करता है। पानी चट्टान से नहीं लड़ता, वह रास्ता ढूंढता है। ठीक वैसे ही आपको अपनी लाइफ में ऐसे रास्ते खोजने है जहाँ रुकावट कम हो।
कल्पना कीजिए आप एक ऐसे बगीचे में है जहाँ खरपतवार बहुत ज्यादा है। आप दिन भर मेहनत करते है और उन्हें उखाड़ते है, पर अगले दिन वे फिर उग आती है। आप थक कर हार जाते है। यहाँ आप गलत तरीके से मेहनत कर रहे है। आपको यह सोचना चाहिए कि खरपतवार क्यों उग रही है। शायद वहां धूप ज्यादा आ रही है या मिट्टी में कुछ बदलाव की जरूरत है। अगर आप उस मुख्य वजह पर काम करेंगे, तो खरपतवार अपने आप कम हो जाएगी। यह है असली मेहनत, जो आपको दिखती नहीं पर असर बहुत बड़ा डालती है। हम अक्सर अपनी लाइफ में अपनी उन आदतों को बदलने के लिए बहुत शोर मचाते है जो हमें पसंद नहीं है। पर हम कभी यह नहीं देखते कि उन आदतों को शुरू करने के पीछे का कारण क्या था। अगर आप उस कारण को ही मिटा दे, तो वह आदत अपने आप खत्म हो जाएगी। मेहनत का मतलब पसीना बहाना नहीं, बल्कि स्मार्ट तरीके से रास्ता साफ करना है।
जब आप इस तरीके से जीना शुरू करेंगे, तो आप महसूस करेंगे कि आपकी प्रोग्रेस की रफ्तार बढ़ गई है। आप कम थकेंगे और ज्यादा हासिल करेंगे। यह किसी फिल्म के हीरो की तरह नहीं है जो एक बार में पूरी दुनिया बदल देता है, बल्कि यह एक समझदार इंसान की तरह है जो जानता है कि एक छोटी सी चाबी से बड़ा ताला भी खुल सकता है। आपको बस अपनी जिंदगी का वो ताला ढूंढना है और उस रुकावट को हटाना है जो आपको आगे बढ़ने से रोक रही है। क्या आप भी अपनी लाइफ को आसान बनाने के लिए तैयार है, या अभी भी मेहनत के नाम पर सिर पटकते रहेंगे। अब समय आ गया है कि आप अपनी काबिलियत को पहचाने और बदलाव को अपना साथी बनाए। उठिए और आज ही अपनी लाइफ में वो छोटे बदलाव कीजिए जो आपको कल एक बड़े मुकाम पर ले जाएंगे। आपका सफर यहाँ खत्म नहीं होता, बल्कि आज से शुरू होता है। खुद पर यकीन रखे, क्योंकि बदलाव की शुरुआत आपसे ही होती है।
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