अगर आपको लगता है कि आप बहुत स्मार्ट हैं क्योंकि आपके पास हर बात का जवाब है तो मुबारक हो आप अपनी लाइफ बर्बाद कर रहे हैं। बिना सही सवाल पूछे आप बस एक अंधी दौड़ का हिस्सा हैं जहाँ अंत में सिर्फ पछतावा मिलता है।
क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो बिना सोचे समझे बस हाँ में हाँ मिलाते हैं और फिर बाद में कोने में बैठकर अपनी किस्मत को कोसते हैं। फ्रैंक सेस्नो की किताब आस्क मोर हमें सिखाती है कि कैसे सही सवाल आपकी बंद किस्मत के ताले खोल सकते हैं। चलिए जानते हैं वह 3 बड़े लेसन जो आपकी लाइफ बदल देंगे।
लेसन १ : डायग्नोस्टिक क्वेश्चन्स का जादू
अगर आप अपनी लाइफ की प्रॉब्लम्स को ठीक वैसे ही हैंडल कर रहे हैं जैसे एक झोलाछाप डॉक्टर सिरदर्द होने पर बस डिस्प्रिन पकड़ा देता है तो यकीन मानिए आप बहुत बड़े गड्ढे में गिरने वाले हैं। फ्रैंक सेस्नो कहते हैं कि लाइफ में असली खिलाड़ी वह नहीं है जिसके पास सारे जवाब हैं बल्कि वह है जो एक जासूस की तरह सही सवाल पूछना जानता है। इसे कहते हैं डायग्नोस्टिक क्वेश्चन्स। यह सवाल किसी एक्सरे मशीन की तरह होते हैं जो ऊपर की चमक धमक को छोड़कर सीधे बीमारी की जड़ को पकड़ लेते हैं।
सोचिए आपका कोई दोस्त अचानक आपके पास आकर कहता है कि यार मुझे अपनी जॉब छोड़नी है। अब एक आम इंसान की तरह आप शायद उसे ज्ञान देने लगेंगे कि भाई मार्केट बहुत खराब है या फिर पूछेंगे कि बॉस ने क्या बोल दिया। लेकिन एक स्मार्ट बंदा डायग्नोस्टिक सवाल पूछेगा। वह पूछेगा कि असल में कौन सी चीज तुझे सबसे ज्यादा परेशान कर रही है। क्या यह काम का बोझ है या फिर तुझे लगता है कि यहाँ तेरा फ्यूचर नहीं है। जब आप गहराई में जाकर सवाल पूछते हैं तब पता चलता है कि असली दिक्कत जॉब नहीं थी बल्कि वह ऑफिस का बेकार सा कॉफी मेकर था जिसने उसका मूड खराब कर रखा था। मजाक अपनी जगह है पर अक्सर हम समस्या को समझे बिना ही उसका इलाज ढूंढने निकल पड़ते हैं।
हम इंडियन्स की एक बड़ी अजीब आदत है। अगर घर का रिमोट नहीं चल रहा तो हम सेल बदलने से पहले रिमोट को जोर से थप्पड़ मारते हैं। हम अपनी जिंदगी और करियर के साथ भी यही कर रहे हैं। हम बिना वजह अपनी मेहनत को गलत जगह इन्वेस्ट कर देते हैं क्योंकि हमने कभी खुद से या दूसरों से सही सवाल नहीं पूछे। डायग्नोस्टिक सवाल पूछने का मतलब है कि आप बस क्यों और कैसे के पीछे हाथ धोकर पड़ जाएं। जब तक आपको वह जवाब न मिल जाए जो आपको पूरी तरह संतुष्ट कर दे तब तक पूछते रहिए।
एक ऑफिस का उदाहरण लीजिए। आपका बॉस कहता है कि इस महीने सेल्स कम हुई है। अब आप घबराकर ओवरटाइम करने लगते हैं। पर क्या आपने पूछा कि पिछली बार के मुकाबले इस बार कस्टमर का फीडबैक क्या था। क्या हमने डेटा चेक किया कि किस एरिया में सेल गिरी है। जब आप ऐसे सवाल पूछते हैं तो आप अंधेरे में तीर नहीं चलाते। आप सीधे उस नस पर हाथ रखते हैं जहाँ से खून बह रहा है। डायग्नोस्टिक क्वेश्चन्स आपको एक आम इंसान से ऊपर उठाकर एक प्रॉब्लम सॉल्वर बना देते हैं। दुनिया को आपकी राय की जरूरत नहीं है दुनिया को आपकी उस काबिलियत की जरूरत है जिससे आप उनकी उलझी हुई गुत्थी सुलझा सकें। तो अगली बार जब कोई समस्या सामने आए तो जवाब मत ढूंढिए बल्कि एक तीखा और सटीक सवाल दागिए।
लेसन २ : स्ट्रैटेजिक और एम्पैथेटिक क्वेश्चनिंग
अगर आपको लगता है कि सवाल पूछना सिर्फ जानकारी इकट्ठा करने का जरिया है तो आप उतने ही गलत हैं जितना कोई यह सोचे कि शादी में लोग सिर्फ खाना खाने जाते हैं। फ्रैंक सेस्नो बताते हैं कि सवाल दो तरह के पावरफुल हथियारों की तरह काम करते हैं। एक है स्ट्रैटेजिक जो आपको आपके गोल तक पहुँचाता है और दूसरा है एम्पैथेटिक जो आपको सामने वाले के दिल तक पहुँचाता है। अगर आप इन दोनों का बैलेंस नहीं जानते तो आप या तो एक रूखे रोबोट बन जाएंगे या फिर एक इमोशनल ड्रामा क्वीन।
स्ट्रैटेजिक सवाल वह होते हैं जो किसी शतरंज के खिलाड़ी की चाल की तरह होते हैं। मान लीजिए आप अपने पार्टनर से घर के काम में मदद चाहते हैं। अब अगर आप चिल्लाकर कहेंगे कि तुम कुछ नहीं करते तो जंग छिड़ना तय है। लेकिन अगर आप स्ट्रैटेजिक सवाल पूछेंगे कि क्या हम इस संडे का प्लान ऐसे बना सकते हैं जिससे हम दोनों को आराम करने का थोड़ा ज्यादा टाइम मिले। यहाँ आपने अपना काम भी निकलवा लिया और सामने वाले को बुरा भी नहीं लगा। इसे कहते हैं उंगली टेढ़ी करके घी निकालना पर बिना किसी शोर के। बिजनेस हो या रिलेशनशिप स्ट्रैटेजिक सवाल आपको वह रास्ता दिखाते हैं जो सीधे आपकी जीत की ओर जाता है।
अब बात करते हैं एम्पैथेटिक सवालों की जो आजकल की भागदौड़ वाली दुनिया में खत्म होते जा रहे हैं। हम अक्सर पूछते हैं और भाई क्या हाल है। पर क्या हम रुककर जवाब सुनते हैं। एम्पैथेटिक सवाल का मतलब है किसी के जूतों में पैर डालकर देखना कि उसे काँटा कहाँ चुभ रहा है। जब आपका कोई कलीग उदास बैठा हो तो यह पूछने के बजाय कि काम कब खत्म होगा यह पूछिए कि आज सुबह से तू थोड़ा बदला हुआ लग रहा है क्या सब ठीक है। यह सवाल एक जादू की झप्पी की तरह काम करता है। लोग उन लोगों को कभी नहीं भूलते जो उन्हें तब सुनते हैं जब पूरी दुनिया बस अपनी सुनाने में लगी होती है।
विडंबना देखिए कि हम गूगल से तो हजार सवाल पूछते हैं पर अपने घर वालों से पूछना भूल जाते हैं। हमें लगता है कि हम सब जानते हैं पर असल में हम एक बंद कमरे में रह रहे हैं जिसकी चाबी सिर्फ सही सवालों के पास है। एम्पैथेटिक सवाल पूछने के लिए आपको अपने ईगो को साइड में रखना पड़ता है। आपको यह मानना पड़ता है कि सामने वाले की कहानी आपसे अलग और शायद आपसे ज्यादा दर्दनाक हो सकती है। जब आप किसी से पूछते हैं कि तुझे लाइफ में सबसे ज्यादा खुशी किस बात से मिलती है तो आप सिर्फ एक जवाब नहीं पा रहे होते बल्कि आप उस इंसान के साथ एक अटूट रिश्ता बना रहे होते हैं।
इन दोनों का मेल ही आपको एक असली लीडर बनाता है। एक ऐसा लीडर जो जानता है कि कब दिमाग से काम लेना है और कब दिल से। अगर आप सिर्फ स्ट्रैटेजिक रहेंगे तो लोग आपसे डरेंगे और अगर आप सिर्फ एम्पैथेटिक रहेंगे तो लोग आपका फायदा उठाएंगे। इसलिए इन दोनों का तड़का लगाइए। सही समय पर सही नीयत से पूछा गया एक छोटा सा सवाल बड़े से बड़े कॉन्ट्रैक्ट साइन करवा सकता है और टूटे हुए रिश्तों को भी जोड़ सकता है। याद रखिए कि बोलने वाला सिर्फ सुना जाता है पर पूछने वाला हमेशा याद रखा जाता है।
लेसन ३ : ब्रिजिंग क्वेश्चन्स से रिश्ते सुधारना
अगर आपके घर या ऑफिस में बात-बात पर वर्ल्ड वॉर छिड़ जाती है और आपको लगता है कि शांति का इकलौता रास्ता देश छोड़कर भागना है तो रुक जाइए। फ्रैंक सेस्नो हमें एक ऐसा टूल देते हैं जिसे ब्रिजिंग क्वेश्चन्स कहते हैं। यह सवाल उन टूटे हुए पुलों की तरह होते हैं जो दो नफरत करने वाले किनारों को फिर से जोड़ देते हैं। असल में ज्यादातर झगड़े इसलिए नहीं होते कि लोग एक-दूसरे को नापसंद करते हैं बल्कि इसलिए होते हैं क्योंकि हम एक-दूसरे के नजरिए को समझ ही नहीं पाते। हम बस अपनी बात मनवाने के लिए चिल्लाते रहते हैं जैसे कोई पुराना रेडियो खराब सिग्नल पर शोर मचा रहा हो।
ब्रिजिंग सवाल पूछने का मतलब है कि आप बहस को जीत-हार के मुकाबले से हटाकर समाधान की तरफ ले जाते हैं। मान लीजिए आपकी अपनी मम्मी से इस बात पर बहस हो रही है कि आपको शादी कब करनी है। अब आप चिल्ला सकते हैं कि यह मेरी लाइफ है पर इससे सिर्फ कलेश बढ़ेगा। इसकी जगह एक ब्रिजिंग सवाल पूछिए कि मम्मी आपको क्यों लगता है कि अभी शादी करना ही सबसे सही फैसला है। जब आप ऐसा पूछते हैं तो आप उन्हें अपनी फिक्र जाहिर करने का मौका देते हैं। इससे माहौल की गर्मी कम हो जाती है और बातचीत का एक ऐसा रास्ता खुलता है जहाँ दोनों पक्ष अपनी बात शांति से रख सकें।
हमारे देश में तो वैसे भी रायचंदों की कमी नहीं है। हर कोई आपको सलाह देने के लिए तैयार खड़ा है चाहे उसे उस विषय का क ख ग भी न पता हो। ऐसे में ब्रिजिंग क्वेश्चन्स आपको उन फालतू की बहसों से बचाते हैं जो आपका मानसिक सुकून छीन लेती हैं। यह सवाल हमें सिखाते हैं कि कैसे हम दूसरों के साथ कॉमन ग्राउंड ढूंढें। अगर आप किसी प्रोजेक्ट पर अपने पार्टनर से सहमत नहीं हैं तो पूछिए कि वह कौन सी एक बात है जिस पर हम दोनों सहमत हो सकते हैं। जब आप 'मैं' और 'तुम' को छोड़कर 'हम' पर फोकस करते हैं तो बड़ी से बड़ी दीवारें गिर जाती हैं।
ब्रिजिंग क्वेश्चन्स का इस्तेमाल करना कोई कमजोरी नहीं बल्कि एक सुपरपावर है। यह उन लोगों के लिए है जो मैच्योर हैं और जानते हैं कि चीखने-चिल्लाने से सिर्फ गला खराब होता है रिश्ते नहीं सुधरते। जब आप पुल बनाने वाले सवाल पूछते हैं तो आप सामने वाले को यह अहसास कराते हैं कि आप उसे सुन रहे हैं और उसका सम्मान कर रहे हैं। यही वह पॉइंट है जहाँ से बदलाव शुरू होता है। फ्रैंक सेस्नो कहते हैं कि दुनिया में जितनी भी बड़ी क्रांतियां हुई हैं या बड़े समझौते हुए हैं उनके पीछे हमेशा कुछ ऐसे सवाल थे जिन्होंने लोगों को साथ आने पर मजबूर कर दिया।
आपकी लाइफ की क्वालिटी इस बात पर डिपेंड करती है कि आप खुद से और दूसरों से कैसे सवाल पूछते हैं। अगर आप घटिया सवाल पूछेंगे तो लाइफ भी घटिया ही रहेगी। लेकिन अगर आप हिम्मत करके सही और गहरे सवाल पूछना शुरू करेंगे तो हर बंद दरवाजा अपने आप खुल जाएगा। तो अब अपनी जुबान का इस्तेमाल सिर्फ जवाब देने के लिए नहीं बल्कि दुनिया को और गहराई से समझने के लिए कीजिए। उठिए और पूछिए क्योंकि पूछने वाले की कभी हार नहीं होती।
तो दोस्तों, क्या आप आज से अपनी लाइफ में सही सवाल पूछने की शुरुआत करेंगे। नीचे कमेंट्स में मुझे वह एक सवाल लिखकर बताइए जो आप आज किसी से पूछना चाहते हैं पर अब तक डर रहे थे। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो हमेशा बिना सोचे समझे बहस करते हैं। चलिए साथ मिलकर बेहतर सवाल पूछना सीखते हैं।
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