Built to Change (Hindi)


क्या आप भी अपनी कंपनी को पत्थरों की लकीर मानकर बैठे हैं। मुबारक हो क्योंकि आपकी पुरानी सोच ही आपके डूबते करियर का सबसे बड़ा कारण बनने वाली है। जबकि दुनिया बदल रही है आप अभी भी डायनासोर वाले रूल्स चिपकाए बैठे हैं। सच तो यह है कि आपका बिजनेस मॉडल अब रद्दी बन चुका है।

आज हम बिल्ट टू चेंज के उन सीक्रेट्स को अनलॉक करेंगे जो आपके बिजनेस और काम करने के तरीके को पूरी तरह ट्रांसफॉर्म कर देंगे। चलिए देखते हैं वे 3 बड़े लेसन जो आपको मार्केट का असली लीडर बनाएंगे।


लेसन १ : स्टेबिलिटी की मोहमाया छोड़ो और बदलाव को गले लगाओ

ज्यादातर भारतीय कंपनियों में एक बड़ी बीमारी है और वह है पुराने ढर्रे पर चलते रहना। हमारे यहाँ दादा परदादा के जमाने से एक ही बात सिखाई जाती है कि बेटा एक बार सेटल हो जाओ फिर लाइफ झिंगालाला है। लेकिन एडवर्ड लॉलर और क्रिस्टोफर वर्ली कहते हैं कि यह सेटल होने वाली सोच ही असल में बिजनेस के लिए जहर है। हम अक्सर ऐसी कंपनियां बनाते हैं जो स्टेबिलिटी यानी मजबूती के लिए डिजाइन होती हैं। हमें लगता है कि अगर हमने एक बार एक अच्छा सिस्टम बना लिया तो वह सालों साल तक नोट छापकर देगा। लेकिन भाई साहब यह दुनिया है यहाँ मौसम से ज्यादा तेजी से मार्केट का मिजाज बदलता है।

सोचिये उस अंकल के बारे में जिन्होंने नब्बे के दशक में एक टाइपिंग इंस्टीट्यूट खोला था। उन्होंने सोचा होगा कि बस अब तो जिंदगी भर लोग कीबोर्ड पर उंगलियां घिसने आएंगे। लेकिन फिर कंप्यूटर आए और इंटरनेट आया और देखते ही देखते उनका वह स्टेबल बिजनेस एक म्यूजियम बन गया। उन्होंने अपनी कंपनी को स्टेबिलिटी के लिए बनाया था बदलाव के लिए नहीं। बिल्ट टू चेंज किताब हमें सिखाती है कि अगर आपको मार्केट में टिके रहना है तो आपको अपनी जड़ें जमीन में गाड़कर नहीं बैठना है बल्कि आपको एक ऐसे खिलाड़ी की तरह होना चाहिए जो हर गेंद पर अपनी पोजीशन बदलने के लिए तैयार रहता है।

कंपनियां अक्सर अपनी सफलता की ही कैदी बन जाती हैं। जब कोई चीज काम करने लगती है तो हम उसे पत्थर की लकीर मान लेते हैं। हम सोचने लगते हैं कि जो कल चला था वही आज चलेगा और वही कल भी चलेगा। यह तो वही बात हुई कि आप अपनी पुरानी मारुति 800 को लेकर फॉर्मूला वन रेस में उतर जाएं और उम्मीद करें कि आप जीत जाएंगे क्योंकि वह कार दस साल पहले बहुत अच्छी चलती थी।

असल में इफेक्टिवनेस का मतलब यह नहीं है कि आप कितनी अच्छी तरह से रुके हुए हैं बल्कि यह है कि आप कितनी तेजी से मुड़ सकते हैं। ऑथर्स कहते हैं कि हमें ऑर्गेनाइजेशन को एक मशीन की तरह नहीं बल्कि एक जीवित प्राणी की तरह देखना चाहिए। जैसे एक इंसान बदलती परिस्थितियों के हिसाब से अपने कपड़े और अपना बर्ताव बदल लेता है वैसे ही कंपनी के स्ट्रक्चर को भी लचीला होना चाहिए। अगर आपकी कंपनी में एक छोटा सा फैसला लेने के लिए भी दस फाइलों पर साइन करवाने पड़ते हैं और पंद्रह मीटिंग्स करनी पड़ती हैं तो यकीन मानिए आप स्टेबिलिटी के नाम पर अपनी ही कब्र खोद रहे हैं।

आज के दौर में जो चीज आपको आज ऊपर ले जा रही है वही चीज कल आपको नीचे गिरा सकती है। इसलिए अपनी कंपनी के डीएनए में ही चेंज को डाल दीजिये। जब बदलाव आपकी आदत बन जाता है तो आपको डर नहीं लगता। याद रखिये ठहरा हुआ पानी भी कुछ समय बाद सड़ने लगता है। इसलिए अगर आप चाहते हैं कि आपका बिजनेस या आपका करियर सड़े नहीं तो उसे बहते रहने दीजिये। बदलाव मुश्किल होता है पर यह उतना भी मुश्किल नहीं है जितना कि मार्केट से बाहर होकर घर पर बैठना।


लेसन २ : परफॉरमेंस और रिवॉर्ड्स का नया गेम प्लान

अब मान लीजिये आपने अपनी कंपनी का स्ट्रक्चर तो एकदम फ्लेक्सिबल बना दिया। आपने कह दिया कि हम कल से कुछ नया करेंगे। लेकिन आपके एम्प्लॉई अभी भी उसी पुरानी मानसिकता में जी रहे हैं कि बस सुबह नौ बजे ऑफिस आओ और शाम को पांच बजे पतली गली से निकल लो। यह तो वही बात हुई कि आपने एक चमचमाती फरारी कार तो खरीद ली पर उसे चलाने के लिए ऐसे ड्राइवर को रखा है जिसे सिर्फ बैलगाड़ी हांकना आता है। ऑथर्स कहते हैं कि सस्टेनेबल सक्सेस के लिए आपको अपने रिवॉर्ड सिस्टम और परफॉरमेंस मैनेजमेंट को पूरी तरह बदलना होगा।

हमारे यहाँ आमतौर पर क्या होता है। साल के आखिर में एक अप्रेजल होता है जिसमें बॉस आपकी साल भर की गलतियां निकालता है और आप बस अपना प्रमोशन मांगते रहते हैं। यह सिस्टम पूरी तरह से सड़ चुका है। बिल्ट टू चेंज के मुताबिक आपको लोगों को सिर्फ उनके काम के लिए नहीं बल्कि उनकी सीखने की काबिलियत के लिए रिवॉर्ड देना चाहिए। अगर कोई एम्प्लॉई कुछ नया सीख रहा है या कंपनी को बदलने में मदद कर रहा है तो उसे असली ईनाम मिलना चाहिए।

सोचिये अगर विराट कोहली मैदान पर इसलिए खेलें कि उन्हें सिर्फ महीने की पगार मिलनी है तो क्या वह कभी इतने रिकॉर्ड तोड़ पाते। वह हर मैच में अपनी कमियों को सुधारते हैं क्योंकि वहां परफॉरमेंस का सीधा रिवॉर्ड मिलता है। आपकी कंपनी में भी ऐसा ही होना चाहिए। अगर आपका कोई स्टाफ मेंबर पुराने घिसे पिटे तरीके से काम कर रहा है और आप उसे फिर भी सैलरी बढ़ाकर दे रहे हैं तो आप असल में उसे आलसी बनने के पैसे दे रहे हैं। यह तो वही मजाक हुआ कि बच्चा एग्जाम में फेल हो गया और आपने उसे नई साइकिल दिला दी क्योंकि वह पिछले साल पास हुआ था।

सच्चाई तो यह है कि लोग वही करते हैं जिसके लिए उन्हें फायदा दिखता है। अगर आप चाहते हैं कि आपके लोग बदलाव को अपनाएं तो उन्हें यह दिखाना होगा कि इस बदलाव में उनका क्या फायदा है। अगर कंपनी नई टेक्नोलॉजी ला रही है और एम्प्लॉई उसे सीखने से मना कर रहा है तो उसे यह एहसास होना चाहिए कि वह दौड़ में पीछे छूट रहा है। यहाँ डराना मकसद नहीं है बल्कि एक ऐसी संस्कृति बनाना है जहाँ हर कोई खुद को अपडेट रखने के लिए बेताब हो।

अक्सर कंपनियां लोगों को डरा कर काम करवाना चाहती हैं। लेकिन डर से सिर्फ काम होता है इनोवेशन नहीं। अगर आपको अपनी टीम से वह आग चाहिए जो कंपनी को आसमान तक ले जाए तो आपको उनके टैलेंट की कद्र करनी होगी। ऑथर्स का कहना है कि ह्यूमन कैपिटल यानी आपके लोग ही आपकी असली संपत्ति हैं। लेकिन यह संपत्ति तभी काम की है जब वह समय के साथ बढ़ती रहे। अगर आपकी टीम की स्किल वैसी ही है जैसी पांच साल पहले थी तो समझ लीजिये आपकी कंपनी का एक्सपायरी डेट पास आ रहा है।

सीधी सी बात है कि अगर आप दुनिया जीतना चाहते हैं तो आपको अपनी फौज को सबसे आधुनिक हथियारों और ट्रेनिंग से लैस करना होगा। अगर आप पुराने तीर कमान लेकर मॉडर्न वॉर में उतरेंगे तो दुश्मन आपको हँसते हँसते हरा देगा। इसलिए अपने रिवॉर्ड सिस्टम को ऐसा बनाइये कि लोग बदलाव से भागें नहीं बल्कि उसका इंतजार करें।


लेसन ३ : लीडरशिप का मतलब कंट्रोल नहीं बल्कि रास्ता बनाना है

पुराने जमाने के बॉस कैसे होते थे। एक आलीशान केबिन में बैठकर हुकुम चलाना और यह देखना कि कौन कितनी देर तक अपनी डेस्क पर चिपका हुआ है। उन्हें लगता था कि कंट्रोल करने से ही कंपनी चलती है। लेकिन बिल्ट टू चेंज के ऑथर्स कहते हैं कि अगर आप अपनी कंपनी को हर पल बदलने के लिए तैयार रखना चाहते हैं, तो आपको यह 'कंट्रोल' वाला भूत उतारना पड़ेगा। एक असली लीडर वह नहीं है जो हर छोटी बात में अपनी टांग अड़ाए, बल्कि वह है जो एक ऐसा माहौल बनाए जहाँ बदलाव खुद-ब-खुद होने लगे।

इसे एक एग्जांपल से समझते हैं। मान लीजिये आप एक बस के ड्राइवर हैं। अगर आप रास्ता जानते हैं और सवारी सिर्फ पीछे बैठी है, तो काम चल जाएगा। लेकिन अगर अचानक सामने पहाड़ आ जाए या रास्ता बंद हो जाए और आपको पता ही न हो कि क्या करना है, तो पूरी बस गड्ढे में गिर जाएगी। लेकिन अगर आपकी बस में हर सवारी को पता है कि मैप कैसे देखते हैं और मुसीबत में कैसे रिएक्ट करना है, तो आप हर मुश्किल से निकल जाएंगे। मॉडर्न लीडरशिप का मतलब है अपनी टीम को इतना पावरफुल बनाना कि उन्हें हर छोटे फैसले के लिए आपकी शक्ल न देखनी पड़े।

आजकल के कई मैनेजर्स को लगता है कि अगर वे सब कुछ खुद चेक नहीं करेंगे तो काम बिगड़ जाएगा। यह तो वही बात हुई कि आप अपने बच्चे को स्विमिंग सिखाना चाहते हैं लेकिन उसे पानी के पास जाने ही नहीं देते क्योंकि आपको डर है कि वह भीग जाएगा। भाई साहब, अगर उसे भीगने नहीं दोगे तो वह तैरेगा कैसे। लीडरशिप का असली टेस्ट तब होता है जब आप वहां न हों और तब भी आपकी टीम सही फैसले ले रही हो।

बदलाव के दौर में इंफॉर्मेशन ही असली ताकत है। अगर जानकारी सिर्फ टॉप लेवल के लोगों के पास रहेगी, तो नीचे वाले लोग अंधेरे में तीर मारते रहेंगे। ऑथर्स का कहना है कि कंपनी के हर लेवल पर डेटा और जानकारी शेयर होनी चाहिए। जब लोगों को पता होता है कि कंपनी कहाँ जा रही है और मार्केट में क्या चल रहा है, तो वे बदलाव से डरते नहीं हैं। वे समझ जाते हैं कि अगर कंपनी को जिंदा रहना है, तो हमें अपना काम करने का तरीका बदलना ही होगा।

अक्सर लीडर्स को लगता है कि उन्हें 'सुपरमैन' बनना है जिसे सब कुछ पता हो। सच तो यह है कि आज की तेजी से बदलती दुनिया में किसी एक इंसान के पास सारे जवाब नहीं हो सकते। इसलिए एक अच्छा लीडर वह है जो सवाल पूछना जानता हो और अपनी टीम को नए आइडियाज देने के लिए मोटिवेट करे। अगर आपकी मीटिंग में सिर्फ आप बोल रहे हैं और बाकी सब सिर हिला रहे हैं, तो समझ जाइये कि आप अपनी कंपनी की क्रिएटिविटी का गला घोंट रहे हैं।

यह समझ लीजिये कि बदलाव कोई एक बार होने वाली घटना नहीं है। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। बिल्ट टू चेंज हमें याद दिलाती है कि जो कंपनियां समय के साथ खुद को नहीं ढालतीं, वे इतिहास के पन्नों में दबकर रह जाती हैं। याद रखिये, नोकिया और कोडक जैसी बड़ी कंपनियां इसलिए नहीं डूबीं कि उनके पास पैसा कम था, बल्कि इसलिए डूबीं क्योंकि उनके लीडर्स ने सही समय पर बदलने से इनकार कर दिया था।


क्या आप भी उसी पुरानी नाव में सवार हैं जो आज नहीं तो कल डूबने वाली है। क्या आप बदलाव से डरते हैं या उसे एक मौके की तरह देखते हैं। याद रखिये, दुनिया आपके रुकने का इंतजार नहीं करेगी। आज ही अपने काम करने के तरीके को गौर से देखिये। क्या आप खुद को अपडेट कर रहे हैं। क्या आप नई स्किल्स सीख रहे हैं। अगर नहीं, तो आज ही कसम खाइए कि आप स्टेबिलिटी के पीछे नहीं भागेंगे बल्कि खुद को इतना लचीला बनाएंगे कि हर बदलाव आपको और भी मजबूत बना दे। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। कमेंट में बताइये कि आप अपनी लाइफ में कौन सा एक बड़ा बदलाव लाने वाले हैं।

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