Businessthink (Hindi)


अगर आप अभी भी अपनी ईगो को अपना सबसे बड़ा एसेट मान रहे हैं तो मुबारक हो आप अपने बिजनेस को डूबते हुए देखने की पहली लाइन में खड़े हैं। बिना सही स्ट्रेटेजी के मेहनत करना वैसा ही है जैसे बंद दरवाजे को धक्का देना और सोचना कि आप जिम जा रहे हैं।

आज के कॉम्पिटिटिव वर्ल्ड में सिर्फ हार्ड वर्क से काम नहीं चलता। डेव मारकम और स्टीव स्मिथ की बुक बिजनेसथिंक हमें वे कड़वे सच बताती है जो हर प्रोफेशनल को जानने चाहिए। चलिए इस बुक के उन ३ पावरफुल लेसन को गहराई से समझते हैं जो आपकी सोच बदल देंगे।


लेसन १ : अपनी ईगो को दरवाजे पर छोड़ दें

आजकल के दौर में हर कोई खुद को अगला एलन मस्क समझता है। ऑफिस की मीटिंग हो या क्लाइंट के साथ कॉल लोग अपनी बात को सही साबित करने के लिए ऐसे लड़ते हैं जैसे कोई खानदानी जायदाद का केस हो। बिजनेसथिंक का सबसे पहला और सबसे बड़ा लेसन यही है कि अपनी ईगो को ऑफिस के बाहर उस गार्ड के पास छोड़ आएं जो आपकी गाड़ी पार्क करवाता है। अगर आप सिर्फ इसलिए एक गलत डिसीजन पर अड़े हुए हैं क्योंकि वह आइडिया आपका था तो आप बिजनेस नहीं कर रहे बल्कि आप एक महंगे खिलौने के साथ खेल रहे हैं।

असली प्रोफेशनल वह नहीं है जिसके पास हर बात का जवाब हो बल्कि वह है जो यह मानने की हिम्मत रखता है कि वह गलत हो सकता है। इमेजिन कीजिए कि आप एक रेस्टोरेंट चला रहे हैं। आपने मेन्यू में एक ऐसी डिश रखी है जो आपको बहुत पसंद है लेकिन उसे कोई ऑर्डर नहीं कर रहा। अब ईगो वाला मालिक कहेगा कि लोगों को स्वाद की समझ ही नहीं है और वह उसे मेन्यू में रखे रखे अपना नुकसान करवाता रहेगा। लेकिन एक बिजनेसथिंक वाला इंसान तुरंत समझ जाएगा कि मार्केट को यह नहीं चाहिए। वह उस डिश को हटाएगा और वही बेचेगा जो लोग मांग रहे हैं। ईगो पालना बहुत महंगा पड़ता है और मार्केट को आपके इमोशन्स से कोई लेना देना नहीं है।

जब आप अपनी ईगो हटा देते हैं तो आपके सामने सिर्फ डेटा और फैक्ट्स बचते हैं। तब आप यह नहीं देखते कि कौन सही है बल्कि यह देखते हैं कि क्या सही है। यह सुनने में आसान लगता है लेकिन जब मीटिंग रूम में चार लोग आपकी बेइज्जती कर रहे हों तब चुप रहकर सच को स्वीकार करना असली जिगरे का काम है। लोग सोचते हैं कि झुकने से उनकी इज्जत कम हो जाएगी लेकिन असल में सच को अपना लेने से आपकी बैंक बैलेंस बढ़ जाती है। फैसला आपका है कि आपको इज्जत वाली गरीबी चाहिए या बिना ईगो वाली अमीरी।

सक्सेसफुल होने के लिए आपको अपनी सोच को एक वैज्ञानिक की तरह बनाना होगा। एक साइंटिस्ट अपने एक्सपेरिमेंट के फेल होने पर दुखी नहीं होता बल्कि वह खुश होता है कि उसे एक ऐसा तरीका मिल गया जो काम नहीं करता। ठीक वैसे ही बिजनेस में भी हर फेलियर एक फीडबैक है। अगर आप अपने आइडिया से प्यार कर बैठेंगे तो आप उसकी कमियां कभी देख ही नहीं पाएंगे। अपनी ईगो को साइड में रखकर दूसरों के सुझावों को सुनना शुरू कीजिए क्योंकि कभी कभी एक छोटा सा इंटर्न भी वह बात बोल जाता है जो आपके लाखों के कंसल्टेंट नहीं बता पाते। तो क्या आप तैयार हैं अपनी ईगो की बलि चढ़ाने के लिए या अभी भी वही पुराना राग अलापना है।


लेसन २ : वैल्यू बनाना सीखें

क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो दिन भर ऑफिस में कीबोर्ड तोड़ते रहते हैं और शाम को सोचते हैं कि आज तो बहुत काम किया। अगर आपका जवाब हाँ है तो जरा रुकिए। बिजनेस की दुनिया में आपके पसीने की कोई कीमत नहीं है जब तक वह पसीना पैसा या वैल्यू पैदा न करे। बिजनेसथिंक कहता है कि सिर्फ बिजी रहना सक्सेस की निशानी नहीं है बल्कि यह एक बीमारी है जिसे बिजीनेस कहा जाता है। लोग सोचते हैं कि अगर वे दस घंटे काम कर रहे हैं तो वे बहुत महान हैं। लेकिन हकीकत यह है कि अगर आप दस घंटे में वही रिजल्ट ला रहे हैं जो कोई दूसरा दो घंटे में ला सकता है तो आप मेहनती नहीं बल्कि आप स्लो हैं।

मान लीजिए आप एक सेल्समेन हैं और आप दिन भर में ५० लोगों को कॉल करते हैं। आप शाम को थक कर चूर हो जाते हैं और अपनी पीठ थपथपाते हैं कि वाह आज तो बहुत मेहनत की। लेकिन अगर उन ५० कॉल्स में से एक भी सेल क्लोज नहीं हुई तो आपकी उस मेहनत की वैल्यू जीरो है। मार्केट को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने कितनी रातें काली की हैं। मार्केट सिर्फ एक चीज देखता है और वह है रिजल्ट। क्या आपने कस्टमर की कोई प्रॉब्लम सॉल्व की। क्या आपने कंपनी का रेवेन्यू बढ़ाया। अगर नहीं तो आप सिर्फ शोर मचा रहे हैं काम नहीं कर रहे।

अक्सर लोग अपनी टू डू लिस्ट को ही अपनी दुनिया मान लेते हैं। वे उन छोटे छोटे कामों में उलझे रहते हैं जिनसे कुछ खास फर्क नहीं पड़ता। इसे कहते हैं जरूरी काम को छोड़कर फालतू के काम में बिजी रहना। असली वैल्यू तब क्रिएट होती है जब आप वह काम करते हैं जिससे सीधा इम्पैक्ट पड़ता है। एक पेंटर अगर दस साल तक एक ऐसी पेंटिंग बनाए जिसे कोई देखना भी न चाहे तो उसकी उस मेहनत का क्या फायदा। वहीं अगर कोई दो घंटे में एक ऐसा स्केच बना दे जो लोगों के दिल को छू जाए तो उसकी वैल्यू करोड़ों में होती है। बिजनेस में भी आपको वही पेंटर बनना है जो सही जगह ब्रश चलाता है।

अपनी वैल्यू बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका है यह पूछना कि क्या मेरा यह काम किसी की लाइफ आसान बना रहा है। अगर आप एक सॉफ्टवेयर डेवलपर हैं और आपने ऐसा फीचर बनाया जो कोई यूज ही नहीं करता तो आपने अपनी कंपनी का टाइम और पैसा दोनों बर्बाद किया है। आपको अपनी मेहनत को इम्पैक्ट के साथ जोड़ना होगा। जब आप वैल्यू क्रिएट करने पर फोकस करते हैं तो पैसा और सक्सेस आपके पीछे भागते हुए आते हैं। लेकिन जब आप सिर्फ मेहनत का ढोंग करते हैं तो आप वहीं रह जाते हैं जहाँ से शुरू किया था। तो अगली बार जब आप कहें कि मैं बहुत बिजी हूं तो खुद से पूछिएगा कि क्या मैं वैल्यू बना रहा हूं या सिर्फ समय काट रहा हूं।


लेसन ३ : सही सवाल पूछने की कला

हम अक्सर जवाब ढूंढने की जल्दी में इतने अंधे हो जाते हैं कि यह देखना भूल जाते हैं कि क्या हम सवाल भी सही पूछ रहे हैं। बिजनेसथिंक का यह लेसन आपको एक जासूस की तरह सोचना सिखाता है। ज्यादातर लोग जब किसी प्रॉब्लम में फंसते हैं तो वे तुरंत सोल्यूशन की तरफ भागते हैं। जैसे ही सेल कम हुई, बॉस चिल्लाने लगता है कि डिस्काउंट बढ़ा दो या मार्केटिंग पर ज्यादा पैसा खर्च करो। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सेल कम क्यों हुई। हो सकता है प्रॉब्लम आपकी मार्केटिंग में नहीं बल्कि आपके प्रोडक्ट की क्वालिटी में हो। गलत सवाल का सही जवाब ढूंढना वक्त की सबसे बड़ी बर्बादी है।

मान लीजिए आपके घर की छत टपक रही है। एक आम इंसान तुरंत बाल्टी लेकर आएगा और नीचे रख देगा। वह हर घंटे बाल्टी खाली करेगा और खुद को बहुत मेहनती समझेगा। लेकिन एक बिजनेसथिंक वाला इंसान ऊपर जाएगा, छत की जांच करेगा और देखेगा कि पाइप कहाँ से फटा है। बाल्टी बदलना एक टेम्परेरी जवाब है, लेकिन पाइप ठीक करना असली सोल्यूशन है। ऑफिसों में भी हम यही करते हैं। हम दिन भर बाल्टियां खाली कर रहे हैं और सोच रहे हैं कि हम बिजनेस चला रहे हैं। असली खिलाड़ी वह है जो 'क्यों' पूछने से नहीं डरता।

सही सवाल पूछने के लिए आपको थोडा बेशर्म बनना पड़ता है। जब कोई आपको आकर कहता है कि हमें यह नया सॉफ्टवेयर खरीदना चाहिए, तो तुरंत हां मत कहिए। उससे पूछिए कि यह सॉफ्टवेयर हमारी कौन सी ऐसी प्रॉब्लम सॉल्व करेगा जो अभी नहीं हो रही। क्या इससे हमारा पैसा बचेगा या काम आसान होगा। जब आप गहराई में जाकर सवाल पूछते हैं, तो आधे से ज्यादा फालतू के आइडियाज अपने आप दम तोड़ देते हैं। लोग आपसे चिढ़ सकते हैं क्योंकि आप उनकी मेहनत बढ़ा रहे हैं, लेकिन यकीन मानिए, अंत में वे आपकी इज्जत करेंगे क्योंकि आपने उन्हें एक बड़ी गलती करने से बचा लिया होगा।

बिजनेस में क्लैरिटी ही असली पावर है। और यह क्लैरिटी तब आती है जब आप सतह के नीचे देखते हैं। किसी भी बड़े डिसीजन से पहले खुद से पांच बार 'क्यों' पूछिए। यह तकनीक सुनने में बचकानी लग सकती है, लेकिन यह बड़े बड़े कॉर्पोरेट ब्लंडर्स को रोक सकती है। जब आप सही सवाल पूछते हैं, तो रास्ते अपने आप साफ होने लगते हैं। बिना सोचे समझे एक्शन लेना वैसा ही है जैसे बिना मैप के रेगिस्तान में दौड़ना, आप थकेंगे भी और कहीं पहुंचेंगे भी नहीं। इसलिए अपनी जुबान से पहले अपने दिमाग का इस्तेमाल कीजिए और वह सवाल पूछिए जिसे पूछने से सब डर रहे हैं।


तो दोस्तों, क्या आप आज भी बाल्टी खाली करने में बिजी हैं या अब छत की मरम्मत करने का इरादा है। बिजनेसथिंक सिर्फ एक किताब नहीं, एक आईना है जो हमें हमारी बेवकूफियां दिखाता है। अगर आप अपनी प्रोफेशनल लाइफ में सच में बदलाव लाना चाहते हैं, तो आज से ही इन तीन लेसन्स को अपनी लाइफ का हिस्सा बनाइए। नीचे कमेंट में बताएं कि आपका सबसे बड़ा ईगो मोमेंट कौन सा था जिसने आपको बहुत महंगा सबक सिखाया। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो बहुत मेहनत तो करता है लेकिन रिजल्ट के नाम पर सिर्फ जीरो लाता है।

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