आप अभी भी बैंक के चक्कर काट रहे हैं और वो खडूस मैनेजर आपको लोन के लिए मना कर रहा है। सच तो यह है कि आपकी खाली जेब और घटिया क्रेडिट स्कोर ही आपकी सबसे बड़ी संपत्ति है। लेकिन आप तो ईएमआई के बोझ तले दबकर सुसाइडल जोक्स क्रैक करने में बिजी हैं।
बिना एक रुपया खर्च किए रियल एस्टेट का मालिक बनना कोई जादू नहीं बल्कि एक सोची समझी स्ट्रेटेजी है। आज हम पीटर कोंटी और डेविड फिंकेल की किताब से वो ३ लेसन सीखेंगे जो आपको बिना कैश और क्रेडिट के प्रॉपर्टी का राजा बना देंगे।
लेसन १ : क्रिएटिव फाइनेंसिंग का जादू और बैंक को 'बाय बाय' बोलना।
जरा सोचिए आप अपने दोस्त की शादी में गए हैं और वहां कोई आपसे पूछ ले कि भाई अपना घर कब ले रहे हो। आप अपनी कोल्ड ड्रिंक का घूंट भरते हैं और मन ही मन सोचते हैं कि भाई बैंक वाले तो मेरा सिबिल स्कोर देखकर ऐसे मुंह फेर लेते हैं जैसे कोई एक्स गर्लफ्रेंड हो। हम में से ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि अगर हाथ में मोटा कैश नहीं है या क्रेडिट कार्ड का रिकॉर्ड चमचमाता हुआ नहीं है तो प्रॉपर्टी का सपना सिर्फ एक सपना ही रह जाएगा। लेकिन पीटर कोंटी और डेविड फिंकेल कहते हैं कि भाई यह सब आपकी गलतफहमी है। असली खेल तो तब शुरू होता है जब आपके पास कुछ नहीं होता।
लेखक हमें 'सेलर फाइनेंसिंग' का एक ऐसा तरीका सिखाते हैं जो इंडिया में शायद ही कोई डिस्कस करता है। मान लीजिए एक अंकल हैं जिन्हें अपनी प्रॉपर्टी बेचनी है क्योंकि उन्हें पैसों की सख्त जरूरत है या फिर वो उस मकान की देखभाल करते करते थक चुके हैं। अब आप उनके पास जाते हैं। आप उन्हें ये नहीं कहते कि अंकल मैं बैंक से लोन लेकर आऊंगा और फिर आपको पैसे दूंगा। आप उनसे कहते हैं कि अंकल मैं आपको हर महीने एक फिक्स अमाउंट दूंगा और एक तय समय के बाद प्रॉपर्टी मेरी हो जाएगी। इसे कहते हैं दिमाग का इस्तेमाल करना। बैंक बीच में आता ही नहीं। बैंक मैनेजर जो कल तक आपको देखकर अपना केबिन बंद कर लेता था अब वो बाहर खड़ा होकर आपको देख सकता है।
मान लीजिए राहुल नाम का एक लड़का है जो मुंबई में रेंट पर रहता है। उसे एक घर पसंद आता है लेकिन उसकी सैलरी इतनी नहीं है कि बैंक उसे करोड़ों का लोन दे। अब राहुल उस घर के मालिक से मिलता है जो खुद शहर छोड़कर जा रहा है। राहुल उसे एक 'लीज ऑप्शन' डील ऑफर करता है। वो कहता है कि मैं आपको अगले ३ साल तक मार्केट से थोड़ा ज्यादा रेंट दूंगा और ३ साल बाद मैं ये घर एक फिक्स कीमत पर खरीद लूंगा। मालिक खुश क्योंकि उसे रेंट मिल रहा है और राहुल खुश क्योंकि उसने बिना डाउन पेमेंट दिए एक करोड़ की प्रॉपर्टी कंट्रोल कर ली।
यह सुनने में जितना आसान लगता है उसके लिए आपको थोड़ा बेशर्म बनना पड़ता है। लोग क्या कहेंगे वाला भूत उतार कर फेंकना पड़ता है। हम इंडियंस की सबसे बड़ी प्रॉब्लम यही है कि हम पड़ोसी की राय को बैंक की गारंटी से ज्यादा वैल्यू देते हैं। अगर आप सेलर की असली प्रॉब्लम समझ लेते हैं तो आप बिना एक रुपया अपनी जेब से निकाले डील क्लोज कर सकते हैं। यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है बल्कि एक सिंपल सा ह्यूमन कनेक्शन है। आप सामने वाले की मदद कर रहे हैं और बदले में वो आपको अमीर बनने का मौका दे रहा है। तो अगली बार जब कोई बैंक वाला आपको रिजेक्ट करे तो उसे थैंक यू बोलिए क्योंकि वो आपको क्रिएटिव बनने का रास्ता दिखा रहा है।
लेसन २ : प्रॉब्लम सॉल्विंग माइंडसेट और लोगों की मजबूरी का हल।
ज्यादातर लोग जब रियल एस्टेट के बारे में सोचते हैं तो उन्हें सिर्फ नंबर्स, कैलकुलेशन और ईएमआई दिखाई देती है। लेकिन पीटर और डेविड कहते हैं कि रियल एस्टेट असल में ईंट-पत्थर का नहीं बल्कि 'लोगों' का बिजनेस है। आप किसी मकान को नहीं खरीद रहे होते, आप किसी इंसान की परेशानी को खरीद रहे होते हैं और बदले में उसे सुकून दे रहे होते हैं। अब आप कहेंगे कि भाई ये तो बड़ी फिलोसॉफिकल बात हो गई। पर जरा रुकिए।
सोचिए आपके मोहल्ले में शर्मा जी हैं। शर्मा जी ने एक बड़ा सा फ्लैट लिया था इस उम्मीद में कि वहां से अच्छा रेंट आएगा। लेकिन किस्मत ऐसी कि किराएदार ने कब्जा कर लिया या फिर वो फ्लैट अब खंडहर बन रहा है। शर्मा जी हर रात यही सोचकर जागते हैं कि इस सिरदर्द से छुटकारा कैसे मिले। अब यहां आता है आपका रोल। एक आम इंसान वहां जाकर रेट कम करने की कोशिश करेगा। लेकिन एक स्मार्ट इन्वेस्टर यानी 'आप', शर्मा जी से जाकर पूछेंगे कि अंकल आपको असल में चाहिए क्या? क्या आपको कैश चाहिए या सिर्फ इस टेंशन से मुक्ति?
जब आप लोगों की प्रॉब्लम सॉल्व करते हैं तो पैसा अपने आप पीछे आता है। इंडिया में हम अक्सर 'डील' को एक जंग की तरह देखते हैं जहाँ एक को जीतना है और दूसरे को हारना है। लेकिन असली मास्टर वो है जो ऐसी सिचुएशन बनाए जहाँ दोनों जीतें। इसे कहते हैं 'विन-विन' सिचुएशन। अगर आप किसी सेलर की ऐसी मदद कर देते हैं जो बैंक नहीं कर सकता, तो वो आपको अपनी प्रॉपर्टी बिना किसी एडवांस के देने को तैयार हो जाएगा।
मान लीजिए एक कपल का डिवोर्स हो रहा है। अब उन्हें अपना घर जल्दी बेचना है क्योंकि वो एक-दूसरे की शक्ल नहीं देखना चाहते। अब ऐसे में बैंक के प्रोसेस का इंतजार करना उनके लिए टॉर्चर जैसा है। आप वहां फरिश्ता बनकर जाते हैं और कहते हैं कि मैं इस घर की सारी जिम्मेदारी आज से ही लेता हूं और आपको अगले महीने से पेमेंट देना शुरू कर दूंगा। आपने उनकी नफरत वाली आग में पानी डाला और बदले में आपको एक प्राइम लोकेशन की प्रॉपर्टी मिल गई बिना किसी क्रेडिट चेक के।
लोग अक्सर कहते हैं कि अमीर बनने के लिए पैसा चाहिए। मैं कहता हूं कि अमीर बनने के लिए सिर्फ थोड़ी सी सहानुभूति और सही सवाल पूछने की हिम्मत चाहिए। अगर आप सामने वाले का दुख दर्द सुनकर उसे एक ऐसा रास्ता दे सकते हैं जिसमें उसका फायदा हो, तो यकीन मानिए आप बिना बटुआ निकाले ही करोड़पति बन सकते हैं। बस याद रखिए, आपको घर नहीं खरीदना है, आपको उनकी चिंता खरीदनी है।
लेसन ३ : रिस्क मैनेजमेंट और क्रेडिट की गुलामी से आजादी।
अब आप सोच रहे होंगे कि भाई ये सब तो ठीक है पर अगर डील उल्टी पड़ गई तो? क्या मैं सड़क पर आ जाऊंगा? यही वो डर है जो ९९ परसेंट इंडियंस को कभी अमीर नहीं बनने देता। पीटर कोंटी और डेविड फिंकेल कहते हैं कि रिस्क तब होता है जब आप अपना खुद का पैसा और क्रेडिट दांव पर लगाते हैं। लेकिन जब आप इस किताब की टेक्नीक्स यूज करते हैं तो आप असल में 'रिस्क फ्री' गेम खेल रहे होते हैं।
सोचिए एक ऐसी सिचुएशन जहाँ आपने एक प्रॉपर्टी कंट्रोल की है लेकिन आपका नाम किसी बैंक के डिफाल्टर लिस्ट में नहीं है। अगर कल को मार्केट गिर भी जाए तो आपका घर नहीं बिकेगा और न ही कोई रिकवरी एजेंट आपके दरवाजे पर आकर ढोल बजाएगा। इसे कहते हैं स्मार्ट इन्वेस्टमेंट। इंडिया में हमारे माता-पिता ने हमें सिखाया है कि बेटा उतना ही पैर पसारो जितनी लंबी चादर हो। लेकिन लेखक कहते हैं कि चादर बड़ी करने के लिए दूसरों की चादर का सही इस्तेमाल करना सीखो।
मान लीजिए आपने एक ऐसी प्रॉपर्टी पकड़ी जिसे कोई नहीं पूछ रहा था। आपने मालिक से डील की कि आप उसे हर महीने एक फिक्स अमाउंट देंगे। अब आप उस प्रॉपर्टी को थोड़ा सजा धजाकर किसी तीसरे इंसान को रेंट पर दे देते हैं जो आपको उससे ज्यादा पैसा दे रहा है। बीच का जो मोटा मुनाफा है वो आपकी जेब में सीधा जाता है। बिना किसी इन्वेस्टमेंट के आप एक 'कैश काउ' चला रहे हैं। अगर कल को किराएदार भाग भी जाए तो आपका क्या गया? आपने तो अपनी जेब से कुछ लगाया ही नहीं था।
यह पूरा खेल आपके माइंडसेट का है। हम लोग सिबिल स्कोर के पीछे ऐसे भागते हैं जैसे वो स्वर्ग का टिकट हो। लेकिन सच तो ये है कि बड़े-बड़े बिजनेसमैन कभी अपने क्रेडिट पर निर्भर नहीं रहते। वो सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं। आप भी इस गुलामी से आजाद हो सकते हैं। बस आपको अपनी ईगो साइड में रखनी होगी और यह समझना होगा कि बिना पैसे के भी आप मार्केट के सबसे बड़े खिलाड़ी बन सकते हैं।
तो दोस्तों, अब बहाने बनाना बंद कीजिए। यह मत कहिए कि आपके पास पैसा नहीं है या बैंक आपको घास नहीं डाल रहा है। पीटर कोंटी और डेविड फिंकेल ने आपको रास्ता दिखा दिया है। अब यह आप पर है कि आप वही पुरानी ९ से ५ की जिंदगी जीना चाहते हैं या फिर क्रिएटिव तरीके अपनाकर अपनी किस्मत खुद लिखना चाहते हैं। आज ही अपने आस-पास ऐसी प्रॉपर्टीज ढूंढना शुरू कीजिए जहाँ आप किसी की प्रॉब्लम सॉल्व कर सकें। याद रखिए, पहली डील हमेशा सबसे मुश्किल होती है, लेकिन वही आपको फाइनेंशियल फ्रीडम का रास्ता दिखाएगी। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया तो इसे अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिए जो हमेशा अपनी खाली जेब का रोना रोता रहता है। कमेंट में बताइए कि आप अपनी पहली डील कब शुरू कर रहे हैं।
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