अभी भी लग रहा है कि वीडियो गेम्स बस टाइम पास हैं। आपके कंपीटीटर्स गेम्स वाली स्ट्रेटजी लगाकर आपका मार्केट शेयर और कस्टमर्स दोनों उड़ा ले जा रहे हैं और आप अभी भी एक्सेल शीट में डूबे हैं। मुबारक हो। आप बिजनेस के फ्यूचर को इग्नोर करके खुद को बर्बाद करने की रेस में सबसे आगे हैं।
चेंजिंग द गेम बुक हमें बताती है कि कैसे गेमिंग की दुनिया बिजनेस के नियम बदल रही है। अगर आप भी पुराने तरीकों से चिपके रहे तो पीछे छूट जाएंगे। चलिए समझते हैं वो ३ बड़े लेसन जो आपके काम करने का तरीका बदल देंगे।
लेसन १ : एंगेजमेंट का असली जादू और आपके कस्टमर्स की भूख
अगर आपको लगता है कि आप एक बहुत बढ़िया प्रोडक्ट बेच रहे हैं और लोग उसे पागलों की तरह खरीदेंगे तो शायद आप अभी भी नब्बे के दशक में जी रहे हैं। आज के दौर में कस्टमर को सिर्फ सामान नहीं चाहिए। उसे चाहिए एक एक्सपीरियंस। उसे चाहिए वो नशा जो उसे एक वीडियो गेम खेलने पर मिलता है। डेविड एडेरी और एथन मॉलिक अपनी बुक में बहुत साफ कहते हैं कि गेम्स दुनिया के सबसे बड़े एंगेजमेंट टूल्स हैं।
जरा सोचिए। एक लड़का पूरी रात जागकर एक गेम के लेवल पार करता है। उसे नींद नहीं आती। उसे भूख नहीं लगती। क्यों। क्योंकि उस गेम को डिजाइन ही ऐसे किया गया है कि उसे हर स्टेप पर एक छोटी जीत का अहसास होता है। अब जरा अपने बिजनेस को देखिए। वही बोरिंग बिलिंग। वही फीका कस्टमर सपोर्ट। और वही पुरानी घिसी पिटी सेल्स पिच। आप अपने कस्टमर से उम्मीद करते हैं कि वो आपका वफादार बना रहे जबकि आपने उसे बोरियत के अलावा कुछ दिया ही नहीं है।
आजकल के कई सफल बिजनेस इसी गेमिंग माइंडसेट को अपना रहे हैं। आपने देखा होगा कि कई ऐप्स अब आपको 'बैज' देते हैं या 'लीडरबोर्ड' दिखाते हैं। ये सब क्या है। ये आपको यह महसूस कराने का तरीका है कि आप खास हैं। मान लीजिए आप एक फिटनेस ऐप चला रहे हैं। अगर आप सिर्फ स्टेप्स काउंट करेंगे तो बंदा दो दिन बाद ऐप डिलीट कर देगा। लेकिन अगर आप उसे कहें कि 'भाई तूने आज शहर के १० हजार लोगों को पीछे छोड़ दिया है' तो उसका सीना चौड़ा हो जाता है। उसे वही डोपामिन मिलता है जो पबजी में चिकन डिनर मिलने पर मिलता है।
हम खुद को बहुत समझदार समझते हैं लेकिन असल में हम सब उस चूहे की तरह हैं जो एक छोटे से इनाम के पीछे भागता रहता है। अगर आप अपने बिजनेस में कस्टमर को वो रिवॉर्ड नहीं दे रहे हैं तो यकीन मानिए वो किसी और के गेम का खिलाड़ी बन जाएगा। आपको अपने प्रोडक्ट को एक सफर बनाना होगा। एक ऐसा सफर जहाँ कस्टमर को लगे कि वो सिर्फ पैसा नहीं खर्च कर रहा बल्कि कुछ अचीव कर रहा है।
बिजनेस में गेमिंग का मतलब यह नहीं है कि आप ऑफिस में प्ले स्टेशन लगा दें। इसका मतलब है कि आप यह समझें कि इंसान का दिमाग रिवॉर्ड और प्रोग्रेस के लिए कैसे काम करता है। अगर आप अपने एम्प्लॉई या कस्टमर को यह नहीं बता पा रहे कि वो कल से बेहतर कहाँ पहुँचे हैं तो आप गेम हार रहे हैं। आपके कंपीटीटर्स शायद पहले से ही लेवल २ पर पहुँच चुके हैं और आप अभी भी 'स्टार्ट' बटन ढूंढ रहे हैं।
लेसन २ : फेलियर का डर छोड़ो और रिस्क को गेम बनाओ
लेसन ०१ में हमने देखा कि एंगेजमेंट कितनी जरूरी है। लेकिन एंगेजमेंट के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है फेल होने का डर। हमारे कॉर्पोरेट जगत में गलती करना किसी पाप जैसा माना जाता है। लेकिन जरा वीडियो गेम्स की दुनिया को देखिए। वहाँ जब आप गेम में मरते हैं तो क्या आप रोने लगते हैं। नहीं। आप तुरंत 'रीस्टार्ट' बटन दबाते हैं। डेविड एडेरी और एथन मॉलिक कहते हैं कि बिजनेस को भी इसी 'सेफ फेलियर' वाले माहौल की जरूरत है।
जरा सोचिए। अगर सुपर मारियो में सिर्फ एक ही जान होती और गिरने पर गेम हमेशा के लिए खत्म हो जाता तो क्या कोई उसे खेलता। बिल्कुल नहीं। गेम्स हमें सिखाते हैं कि हारना असल में जीतने का एक छोटा सा हिस्सा है। लेकिन हमारे ऑफिसों में हाल यह है कि अगर किसी ने एक नया आईडिया ट्राई किया और वो फेल हो गया तो उसे ऐसे देखा जाता है जैसे उसने कंपनी की तिजोरी चोरी कर ली हो। इसी डर की वजह से लोग कुछ नया करना छोड़ देते हैं और कंपनी एक बोरिंग म्यूजियम बन जाती है।
आज के सफल स्टार्टअप्स ने गेमिंग से यही सीखा है कि 'जल्दी फेल हो और आगे बढ़ो'। इसे हम 'ए/बी टेस्टिंग' कहते हैं। मान लीजिए आपने एक वेबसाइट का बटन लाल रंग का बनाया और किसी ने क्लिक नहीं किया। गेमिंग माइंडसेट कहता है कि कोई बात नहीं। ये एक मरा हुआ प्लेयर है। इसे हटाओ और नीले रंग का बटन लगाओ। यहाँ ह्युमर की बात यह है कि हम अपनी ईगो को बीच में ले आते हैं। हमें लगता है कि हमारा आईडिया तो बेस्ट था। भाई अगर कस्टमर को वो पसंद नहीं आया तो आपका आईडिया किसी काम का नहीं है।
बिजनेस में रिस्क लेना एक गेम के बॉस लेवल की तरह है। हो सकता है आप पहली बार में हार जाएं। हो सकता है आपकी स्ट्रेटजी काम न करे। लेकिन गेम्स आपको बार-बार कोशिश करने का जो हौसला देते हैं वही बिजनेस की जान है। जब आप अपने एम्प्लॉई को यह आजादी देते हैं कि वो गलती कर सकते हैं तो वो ऐसे-ऐसे आईडिया लेकर आते हैं जो आपने कभी सोचे भी नहीं होंगे।
सच्चाई तो यह है कि जो बिजनेसमैन रिस्क लेने से डरता है वो उस खिलाड़ी जैसा है जो डर के मारे गेम ही शुरू नहीं कर रहा। जबकि उसका पड़ोसी रोज हार रहा है लेकिन हर बार एक नया लेसन सीखकर लेवल अप कर रहा है। अंत में जीत उसी की होगी जिसने रिस्क को एक टास्क की तरह लिया न कि किसी कयामत की तरह। अगर आप भी अपनी हार को दिल से लगाकर बैठेंगे तो याद रखियेगा कि बिजनेस की दुनिया में 'गेम ओवर' होने में देर नहीं लगती।
लेसन ३ : वर्चुअल इकॉनमी और डेटा की असली पावर
पिछले लेसन में हमने समझा कि हार से डरना नहीं है। लेकिन जीतने के लिए आपके पास सही हथियार होने चाहिए। और आज के बिजनेस का सबसे बड़ा हथियार है डेटा। बुक 'चेंजिंग द गेम' का यह तीसरा लेसन हमें सिखाता है कि कैसे वीडियो गेम्स ने वर्चुअल इकॉनमी खड़ी कर दी है। आप सोच रहे होंगे कि गेम में दिखने वाली तलवार या कपड़ों के लिए कोई असली पैसे क्यों खर्च करता है। जवाब है उनकी 'वर्चुअल वैल्यू'।
यही बात आपके बिजनेस पर भी लागू होती है। आज कल लोग सिर्फ सामान नहीं खरीदते। वो उस सामान से जुड़ी अपनी पहचान खरीदते हैं। गेम्स में एक प्लेयर अपनी स्किन या अवतार पर इसलिए पैसा लगाता है ताकि वो दूसरों से अलग दिख सके। अगर आप अपने कस्टमर को यह महसूस करा सकते हैं कि आपका प्रोडक्ट उनकी सोशल वैल्यू बढ़ा रहा है तो आप एक ऐसी इकॉनमी खड़ा कर लेंगे जिसे कोई नहीं हिला सकता।
डेटा ही वह चीज है जो आपको बताती है कि कस्टमर असल में चाहता क्या है। गेम्स हर पल ट्रैक करते हैं कि प्लेयर कहाँ अटक रहा है। उसे क्या पसंद आ रहा है। उसे गुस्सा कब आ रहा है। बिजनेस में भी आपको यही करना होगा। अगर आप अपनी सेल्स रिपोर्ट को बस महीने के अंत में देखते हैं तो आप अंधेरे में तीर चला रहे हैं। आपको पता होना चाहिए कि आपके ऐप पर आने वाला बंदा किस कोने में जाकर वापस मुड़ गया।
जरा सोचिए। एक गेम बनाने वाली कंपनी को पता होता है कि किस लेवल पर जाकर खिलाड़ी को सबसे ज्यादा चिड़ मच रही है। वो तुरंत उस लेवल को थोड़ा आसान कर देते हैं ताकि बंदा गेम न छोड़े। क्या आप अपने बिजनेस में ऐसा कर रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि आपका कस्टमर चेकआउट पेज पर जाकर पेमेंट क्यों नहीं कर रहा। शायद उसे वहाँ आपकी लंबी फॉर्म भरने की आदत से नफरत है। डेटा आपको वो कड़वा सच बताता है जो आपकी सेल्स टीम कभी नहीं बताएगी।
बिजनेस अब सिर्फ ईंट और पत्थर की दीवारें नहीं रहा। यह एक बड़ा डिजिटल और इमोशनल गेम बन चुका है। जो डेटा को पढ़ना जानता है और जो वर्चुअल वैल्यू की ताकत समझता है वही असली विनर है। बाकी लोग तो बस उस भीड़ का हिस्सा हैं जो तालियां बजाने के लिए खड़ी रहती है। अब फैसला आपके हाथ में है कि आपको गेम का लीडर बनना है या सिर्फ एक दर्शक।
अगर आपको भी लगता है कि आपका बिजनेस अब एक लेवल अप मांग रहा है तो आज ही इन गेमिंग स्ट्रेटजी को अपनाएं। अपने काम करने के तरीके को बदलिए और रिस्क लेने से मत डरिए। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। कमेंट्स में बताएं कि आपको कौन सा लेसन सबसे ज्यादा काम का लगा। चलिए साथ मिलकर इस गेम को जीतते हैं।
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