क्या आप अभी भी पुराने जमाने की तरह सिर्फ अपने गट्स और तुक्के पर बिज़नस चला रहे हैं। बधाई हो। आप बहुत जल्द अपने कॉम्पिटिटर्स को अपनी बर्बादी का जश्न मनाने का मौका दे रहे हैं। जबकि दुनिया डेटा से नोट छाप रही है और आप बिना एनालिटिक्स के अंधेरे में तीर मार रहे हैं।
आज हम थॉमस डेवनपोर्ट की किताब कम्पेटिंग ऑन एनालिटिक्स से वह सीक्रेट्स जानेंगे जो आपके बिज़नस और करियर को फेल होने से बचाएंगे। चलिए इन ३ पावरफुल लेसन्स को गहराई से समझते हैं जो आपको डेटा का असली खिलाड़ी बना देंगे।
लेसन १ : डेटा को सिर्फ सजावट नहीं हथियार बनाओ
क्या आपको लगता है कि ऑफिस की दीवारों पर कलरफुल चार्ट्स टांगने से या एक्सेल शीट में हज़ारों नंबर्स भर देने से आप एनालिटिक्स के बादशाह बन गए हैं। अगर हाँ तो आप उसी गलतफहमी में जी रहे हैं जिसमें वो दुकानदार जीता है जो सोचता है कि सिर्फ दुकान पर सीसीटीवी कैमरा लगाने से चोरी रुक जाएगी भले ही उसने कैमरे का तार ही न जोड़ा हो। थॉमस डेवनपोर्ट अपनी किताब में साफ़ कहते हैं कि डेटा अपने आप में कचरा है जब तक आप उससे सही सवाल नहीं पूछते। आज के दौर में हर कंपनी के पास डेटा का पहाड़ है पर उस पहाड़ के नीचे दबे लोग ये नहीं जानते कि वहां से सोना कैसे निकालना है।
ज़रा सोचिए आप एक ई कॉमर्स स्टोर चलाते हैं और आपको पता चलता है कि पिछले महीने १००० लोगों ने आपकी वेबसाइट देखी। अब इस नंबर का आप क्या करेंगे। क्या इसे अपनी मम्मी को दिखाकर शाबाशी लेंगे। असली खेल तब शुरू होता है जब आप एनालिटिक्स का इस्तेमाल करके ये पता लगाते हैं कि वो लोग आए कहाँ से और उन्होंने सामान खरीदा क्यों नहीं। क्या उन्हें आपकी वेबसाइट का डिजाइन पसंद नहीं आया या फिर आपकी शिपिंग फीस देखकर उनके होश उड़ गए। एनालिटिक्स का मतलब है उस क्यों को ढूंढना जो आपके मुनाफे और नुकसान के बीच की दीवार है। अगर आप डेटा का इस्तेमाल सिर्फ ये देखने के लिए करते हैं कि कल क्या हुआ था तो आप एक इतिहासकार हैं बिज़नस मैन नहीं। असली खिलाड़ी वो है जो डेटा देखकर ये बता दे कि कल क्या होने वाला है।
मान लीजिए आप एक रेस्टोरेंट चलाते हैं। आपके पास एक रेगुलर कस्टमर आता है जो हमेशा पनीर टिक्का आर्डर करता है। अब एक नॉर्मल मैनेजर सोचेगा कि चलो भाई कस्टमर खुश है। लेकिन एक एनालिटिकल माइंड वाला बंदा डेटा चेक करेगा। उसे पता चलेगा कि ये कस्टमर महीने के आखिरी हफ्ते में कभी नहीं आता। क्यों। क्योंकि तब उसकी जेब खाली होती है। अब अगर आप उसे उस आखिरी हफ्ते में २० परसेंट का डिस्काउंट कूपन भेज दें तो आपने डेटा को हथियार बना लिया। आपने सिर्फ खाना नहीं बेचा बल्कि एक इंसान की साइकोलॉजी को डेटा से ट्रैक किया। ज़्यादातर लोग डेटा को सिर्फ एक रिपोर्ट की तरह देखते हैं जिसे मीटिंग में दिखाकर बॉस को इम्प्रेस किया जा सके। ये बिलकुल वैसा ही है जैसे आप जिम जाएं और वर्कआउट करने के बजाय डम्बल्स के साथ सेल्फी लेकर घर आ जाएं।
बिज़नस की दुनिया में डेटा का मतलब सिर्फ सेल्स फिगर्स नहीं होता। ये आपके कस्टमर की धड़कन है। अगर आप उस धड़कन को पढ़ना नहीं जानते तो आप बस एक अंधी रेस में दौड़ रहे हैं। दुनिया की टॉप कंपनियाँ जैसे नेटफ्लिक्स या अमेज़न सिर्फ इसलिए सफल नहीं हैं कि उनके पास अच्छा सामान है। वो इसलिए सफल हैं क्योंकि उन्हें आपसे बेहतर पता है कि आपको अगले पल क्या चाहिए। उन्हें पता है कि अगर आपने कल एक सैड मूवी देखी थी तो आज शायद आपको कॉमेडी की ज़रूरत होगी। इसे कहते हैं प्रिडिक्टिव एनालिटिक्स। आप अभी सोच ही रहे होते हैं कि क्या खरीदूँ और उनके ऐप पर उसका सजेशन आ जाता है। ये कोई जादू नहीं है बल्कि डेटा का सही इस्तेमाल है।
अगर आप अभी भी पुराने तरीके से चल रहे हैं जहाँ डिसीजन ऊपर बैठे बॉस के मूड पर लिए जाते हैं तो आपका डूबना तय है। पुराने जमाने में लोग कहते थे कि मेरा दिल कह रहा है कि ये आइडिया चलेगा। भाई साहब दिल का काम खून साफ़ करना है बिज़नस चलाना नहीं। बिज़नस चलाने के लिए डेटा की ठंडी और कड़वी सच्चाई देखनी पड़ती है। थॉमस कहते हैं कि एनालिटिकल कॉम्पिटिटर बनने के लिए आपको अपनी ईगो को साइड में रखकर नंबर्स की बात माननी होगी। अगर डेटा कह रहा है कि आपका सबसे पसंदीदा प्रोडक्ट फ्लॉप है तो उसे कचरे के डिब्बे में डालिए। ये कड़वा घूँट ही आपको मार्केट का राजा बनाएगा। वरना आप बस अपनी पुरानी यादों के सहारे बैठे रह जाएंगे और आपके पड़ोस वाला लड़का लैपटॉप पर डेटा देखकर आपसे आगे निकल जाएगा।
लेसन २ : एनालिटिक्स कोई साइड प्रोजेक्ट नहीं पूरी कंपनी की आत्मा है
ज़रा सोचिए कि आपने एक बहुत महँगी फरारी कार खरीदी है लेकिन आप उसे चलाने के लिए गली के किसी ऐसे लड़के को दे देते हैं जिसे साइकिल तक ठीक से बैलेंस करना नहीं आता। क्या होगा। कार तो बर्बाद होगी ही साथ में आपकी इज्जत का भी कचरा हो जाएगा। ज़्यादातर कंपनियां एनालिटिक्स के साथ यही करती हैं। वो लाखों करोड़ों रुपये के सॉफ्टवेयर खरीद लेती हैं लेकिन उन्हें चलाने की जिम्मेदारी सिर्फ एक छोटे से आईटी डिपार्टमेंट के कोने में बैठे चश्माधारी लड़के को दे देती हैं। थॉमस डेवनपोर्ट कहते हैं कि अगर आप वाकई जीतना चाहते हैं तो एनालिटिक्स को एक अलग कमरा नहीं बल्कि अपनी कंपनी का ऑक्सीजन बनाना होगा। यह कोई ऐसा काम नहीं है जो आप संडे के संडे फ्री टाइम में करें। यह तो सुबह की चाय की तरह ज़रूरी है।
असली दिक्कत तब आती है जब कंपनी का सेल्स हेड कहता है कि मुझे डेटा की क्या ज़रूरत मैं तो २५ साल से मार्केट में धूल छान रहा हूँ। भाई साहब आपने धूल छानी है तभी तो आपकी विज़न धुंधली हो गई है। पुराना एक्सपीरियंस अच्छी बात है लेकिन आज का मार्केट आपके एक्सपीरियंस की इज़्ज़त नहीं करता वो सिर्फ रिजल्ट्स देखता है। अगर आपका मार्केटिंग वाला बंदा कुछ और कह रहा है और डेटा कुछ और दिखा रहा है तो समझ लीजिए कि आपकी कंपनी के अंदर ही महाभारत चल रही है। सफल कंपनियां वो होती हैं जहाँ चपरासी से लेकर सीईओ तक सबको पता होता है कि आज का स्कोर क्या है। वहां फैसले टेबल ठोक कर नहीं बल्कि स्क्रीन पर मौजूद नंबर्स को देखकर लिए जाते हैं। इसे ही थॉमस एंटरप्राइज वाइड एनालिटिक्स कहते हैं।
मान लीजिए आप एक बड़ी शादी मैनेज कर रहे हैं। अब हलवाई कह रहा है कि ५०० किलो दूध लगेगा क्योंकि उसे लगता है कि मेहमान बहुत ज्यादा पीते हैं। लेकिन आपके पास पिछले साल की शादियों का डेटा है जो कहता है कि लोग कोल्ड ड्रिंक ज़्यादा पसंद करते हैं और सिर्फ २०० किलो दूध ही काफी है। अब अगर आप हलवाई की बात मानकर दूध मंगवा लेते हैं तो आप सिर्फ एक इमोशनल इंसान हैं जो फालतू का खर्चा कर रहा है। लेकिन अगर आप डेटा की मानकर हलवाई को चुप करा देते हैं तो आप एक एनालिटिकल लीडर हैं। बिज़नस में भी यही होता है। हर डिपार्टमेंट अपनी अलग ही धुन बजाता रहता है जब तक कि उन्हें एनालिटिक्स की एक ही लय में न बांधा जाए।
यहाँ पर सबसे बड़ी रुकावट आती है लोगों की सोच। हम इंसानों को लगता है कि हम बहुत समझदार हैं और हमारी इंटुइशन कभी गलत नहीं हो सकती। लेकिन सच तो ये है कि हमारी सोच पक्षपाती होती है। हमें वो देखना पसंद है जो हम देखना चाहते हैं। एनालिटिक्स आपको वो दिखाता है जो सच है भले ही वो आपको कितना ही बुरा क्यों न लगे। यह वैसा ही है जैसे आप वजन कम करने का दावा करें लेकिन तराजू आपको सच बता दे कि आपने कल रात को छुपकर मिठाई खाई थी। कंपनियां जो डेटा को सीरियसली लेती हैं वो अपने हर डिपार्टमेंट को एक दूसरे से जोड़ देती हैं। सप्लाई चेन को पता होता है कि मार्केटिंग क्या कैंपेन चलाने वाली है और फाइनेंस को पता होता है कि इन्वेंटरी में कितना माल पड़ा है।
अगर आपकी कंपनी में डेटा सिर्फ रिपोर्ट्स में बंद रहता है और उन रिपोर्ट्स पर सिर्फ धूल जमती है तो आप एनालिटिक्स से कॉम्पीट नहीं कर रहे हैं। आप बस टाइम पास कर रहे हैं। थॉमस बताते हैं कि टॉप कंपनियां अपनी पूरी पहचान ही एनालिटिक्स के इर्द-गिर्द बुनती हैं। वो ये नहीं कहतीं कि हम जूते बेचते हैं। वो कहती हैं कि हम डेटा के जरिए ये समझते हैं कि एक एथलीट को किस तरह के जूते की ज़रूरत है। जब आपकी सोच इतनी गहरी हो जाती है तब जाकर आप मार्केट में एक छत्र राज करते हैं। वरना आप भी उसी भीड़ का हिस्सा बने रहेंगे जो हर साल दिवाली सेल में नुकसान होने पर भगवान को दोष देती है कि इस बार मुहूर्त अच्छा नहीं था। मुहूर्त हमेशा अच्छा होता है बस आपकी कैलकुलेशन खराब होती है।
लेसन ३ : सिर्फ सॉफ्टवेयर नहीं अपनी सोच का सॉफ्टवेयर बदलो
क्या आपने कभी ऐसे जिम जाने वाले को देखा है जो दुनिया का सबसे महँगा प्रोटीन पाउडर खरीदता है और सबसे महँगे जूते पहनता है लेकिन जिम जाकर सिर्फ बेंच पर बैठकर मोबाइल चलाता है। एनालिटिक्स की दुनिया में भी ऐसी कंपनियों की कमी नहीं है। वो सबसे महँगे सॉफ्टवेयर खरीद लेंगी और डेटा साइंटिस्ट्स की फौज खड़ी कर देंगी लेकिन जब फैसला लेने की बारी आएगी तो वही घिसा पिटा तरीका अपनाएंगी जो उनके दादाजी के जमाने से चला आ रहा है। थॉमस डेवनपोर्ट समझाते हैं कि असली एनालिटिक्स आपके कंप्यूटर में नहीं बल्कि आपके दिमाग के सॉफ्टवेयर में होना चाहिए। जब तक कंपनी का कल्चर डेटा को इज़्ज़त नहीं देगा तब तक बड़े से बड़ा सुपर कंप्यूटर भी आपके लिए सिर्फ एक शो पीस है।
ज़रा सोचिए एक मीटिंग चल रही है। वहां एक नया लड़का डेटा के साथ आता है और कहता है कि सर हमारा ये प्रोजेक्ट घाटे में जा रहा है। अब अगर कंपनी का कल्चर खराब है तो बॉस उसे ये कहकर चुप करा देगा कि बेटा तुम्हारी उम्र जितनी है उतना मेरा एक्सपीरियंस है। ये उस पल की बात है जहाँ एनालिटिक्स का गला घोंट दिया जाता है। एनालिटिकल कॉम्पिटिटर बनने का मतलब है कि सच्चाई की ताकत कुर्सी की ताकत से बड़ी होनी चाहिए। अगर डेटा कहता है कि बॉस गलत है तो बॉस को मुस्कुराकर अपनी गलती मान लेनी चाहिए। लेकिन हम इंसानों को अपनी गलती मानना पहाड़ चढ़ने जैसा लगता है। हम तो वो लोग हैं जो रास्ता भटकने पर भी जीपीएस की आवाज़ म्यूट कर देते हैं ताकि हमें कोई टोकने वाला न रहे।
मान लीजिए आप एक ऑनलाइन ग्रोसरी स्टोर चलाते हैं। आपका मैनेजर कहता है कि इस बार हमें आम बहुत स्टॉक करने चाहिए क्योंकि उसे लग रहा है कि गर्मी बहुत पड़ेगी। लेकिन आपका डेटा दिखा रहा है कि पिछले तीन सालों में लोग गर्मी में आम से ज़्यादा तरबूज़ खरीद रहे हैं। अब अगर आप मैनेजर की गट फीलिंग पर चलते हैं तो आप बस एक जुआ खेल रहे हैं। बिज़नस और जुए में यही फर्क है कि बिज़नस में आप रिस्क को कैलकुलेट करते हैं। जब आप डेटा को कल्चर बना लेते हैं तो हर छोटा फैसला भी एक सॉलिड लॉजिक पर टिका होता है। वहां ये मायने नहीं रखता कि कौन सबसे तेज़ चिल्ला रहा है बल्कि ये मायने रखता है कि किसके नंबर्स में दम है।
दुनिया की सबसे बड़ी एयरलाइन्स इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। वो पल-पल की जानकारी का इस्तेमाल करती हैं ताकि टिकट के दाम तय कर सकें। उन्हें पता है कि अगर आज बारिश हो रही है तो लोग फ्लाइट बुक करने के लिए कितनी देर इंतज़ार करेंगे। ये कोई रॉकेट साइंस नहीं है बल्कि डेटा को अपनी कंपनी की रगों में दौड़ाना है। लेकिन याद रखिए एनालिटिक्स का मतलब ये नहीं कि आप रोबोट बन जाएं और इंसानी जज़्बात भूल जाएं। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि आप अपने फैसलों को अंधेपन से बाहर निकालें। जैसे एक डॉक्टर पहले आपकी रिपोर्ट देखता है और फिर इलाज शुरू करता है वैसे ही एक एनालिटिकल लीडर पहले डेटा देखता है और फिर कंपनी की दिशा तय करता है।
थॉमस डेवनपोर्ट यही संदेश देते हैं कि ये कोई एक दिन की रेस नहीं है। एनालिटिकल बनने के लिए आपको हर दिन अपने काम करने के तरीके को चुनौती देनी होगी। आपको ये स्वीकार करना होगा कि दुनिया बदल रही है और पुराने ढर्रे अब काम नहीं आएंगे। अगर आप डेटा की भाषा नहीं सीखेंगे तो आने वाले समय में आप खुद को एक आउटडेटेड मशीन की तरह महसूस करेंगे। मार्केट बहुत बेरहम है वो सिर्फ उन्हीं को इनाम देता है जो वक्त के साथ अपनी सोच को डेटा से अपडेट करते हैं। तो क्या आप तैयार हैं अपने ईगो को किनारे रखकर डेटा की उंगली थामने के लिए। फैसला आपका है क्योंकि नंबर्स कभी झूठ नहीं बोलते बस उन्हें सुनने वाला कान चाहिए।
अगर आपको आज भी लगता है कि बिज़नस सिर्फ किस्मत का खेल है तो शायद आप अपनी बर्बादी की स्क्रिप्ट खुद लिख रहे हैं। उठिए और डेटा की ताकत को पहचानिए। कमेंट में बताइए कि क्या आप अपनी लाइफ के फैसले डेटा के आधार पर लेते हैं या सिर्फ अपने दिल की सुनते हैं। इस लेख को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो आज भी पुराने तरीकों से बिज़नस चलाने की ज़िद पर अड़ा है।
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