Competition Demystified (Hindi)


क्या आपको सच में लगता है कि आपका यूनिक आइडिया आपको करोड़पति बना देगा। बड़े आए नए जमाने के एंटरप्रेन्योर। जब तक आपके बिजनेस के आसपास कोई मजबूत दीवार नहीं है तब तक आप सिर्फ दूसरे बड़े खिलाड़ियों के लिए रास्ता साफ कर रहे हैं। बिना स्ट्रेटजी के बिजनेस करना मतलब खुद के पैसों में आग लगाना है।

आज हम ब्रूस ग्रीनवाल्ड की बुक कॉम्पिटिशन डीमिस्टिफाइड से वो सीक्रेट्स समझेंगे जो आपके कॉम्पिटिशन को पानी पिला देंगे। चलिए जानते हैं वो ३ बड़े लेसन जो आपके डूबते हुए बिजनेस को एक प्रॉफिटेबल साम्राज्य बना सकते हैं।


लेसन १ : बैरियर्स टू एंट्री का असली पावर

अगर आप सोचते हैं कि मार्केट में घुसकर सबको डिस्काउंट देकर आप बाजी मार लेंगे, तो आप दुनिया के सबसे बड़े मुगालते में जी रहे हैं। ब्रूस ग्रीनवाल्ड सीधा कहते हैं कि अगर आपके बिजनेस में कोई भी एरा गेरा नत्थू खैरा आसानी से घुस सकता है, तो आप बिजनेस नहीं बल्कि चैरिटी कर रहे हैं। इसे कहते हैं बैरियर्स टू एंट्री। यानी आपके बिजनेस के चारों तरफ एक ऐसी ऊंची दीवार जो दूसरों को अंदर आने से पहले दस बार सोचने पर मजबूर कर दे।

सोचिए आप अपने शहर के चौराहे पर एक मोमोज की दुकान खोलते हैं। आपकी चटनी एकदम आग लगा देने वाली है। पहले हफ्ते खूब भीड़ हुई। दूसरे हफ्ते आपके बगल में ठीक वैसी ही एक और दुकान खुल गई। अब क्या होगा। अब शुरू होगी प्राइस वॉर। आप दस के पांच देंगे, वो दस के छह देगा। अंत में आप दोनों के पास सिर्फ आंसू बचेंगे और प्रॉफिट गायब हो जाएगा। क्यों। क्योंकि आपकी दुकान में कोई बैरियर टू एंट्री नहीं था। चटनी बनाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है।

असली बिजनेस वो है जहां घुसना नामुमकिन जैसा हो। जैसे कि मान लीजिए आपके पास अपने शहर की इकलौती ऐसी जमीन है जहां से सबसे शुद्ध पानी निकलता है। अब कोई दूसरा कितनी भी बड़ी मशीन ले आए, वो आपके जैसा पानी नहीं निकाल पाएगा। यही आपका असली डिफेंस है। कॉम्पिटिशन डीमिस्टिफाइड हमें सिखाती है कि बिना एंट्री बैरियर के आप सिर्फ एक परफेक्ट कॉम्पिटिशन वाली दुनिया में जी रहे हैं, जहां मेहनत गधों वाली होती है और कमाई चवन्नी वाली।

ज्यादातर स्टार्टअप फाउंडर्स को लगता है कि उनकी सर्विस बहुत फास्ट है इसलिए वो जीत जाएंगे। भाई साहब, सर्विस तो कल कोई और भी फास्ट कर देगा। क्या आपके पास कोई पेटेंट है। क्या आपके पास कोई ऐसी सरकारी परमिशन है जो किसी और को नहीं मिल सकती। या क्या आपका नेटवर्क इतना बड़ा हो चुका है कि नया बंदा उसे छू भी नहीं सकता। अगर जवाब ना है, तो आप खतरे में हैं।

बिजनेस का मतलब सिर्फ बेचना नहीं होता, बल्कि खुद को बचाना भी होता है। लोग अक्सर ग्रोथ के पीछे भागते हैं, लेकिन ये किताब कहती है कि ग्रोथ बिना प्रॉफिट के सिर्फ एक वजन है। अगर आपकी इंडस्ट्री में एंट्री आसान है, तो कितनी भी ग्रोथ कर लो, अंत में नया कॉम्पिटिटर आकर आपकी मलाई खा जाएगा। इसलिए मार्केट में घुसने से पहले ये देखिये कि क्या आप दूसरों के लिए दरवाजा बंद कर सकते हैं। जब तक आपके पास कॉम्पिटिटिव एडवांटेज नहीं है, तब तक आप सिर्फ भीड़ का हिस्सा हैं। और भीड़ में पहचान नहीं, सिर्फ धक्का मिलता है।


लेसन २ : कस्टमर कैप्टिविटी और लॉयल्टी

आजकल के जमाने में लोग वफादारी की बातें बहुत करते हैं, पर बिजनेस में वफादारी सिर्फ एक वहम है। ब्रूस ग्रीनवाल्ड हमें बताते हैं कि असली पैसा तब बनता है जब कस्टमर आपको छोड़कर जाना तो चाहे, लेकिन जा न सके। इसे कहते हैं कस्टमर कैप्टिविटी। मतलब आपने उनके गले में एक ऐसी अदृश्य जंजीर बांध दी है कि दूसरी दुकान पर जाने में उन्हें आलस भी आता है और डर भी।

सोचिए आपने एक बहुत महंगा आईफोन खरीदा। अब आपने उसमें अपनी सारी फोटो, कॉन्टैक्ट्स और एप्स सेट कर लिए। अगले महीने एक नया फोन आता है जो शायद थोड़ा बेहतर हो। क्या आप अपना फोन बदलेंगे। बिल्कुल नहीं। क्योंकि डेटा ट्रांसफर करने का सिरदर्द और नए सिस्टम को सीखने की मेहनत आपको रोक देगी। एप्पल ने आपको कैद नहीं किया है, बस आपके लिए बाहर जाने का रास्ता इतना मुश्किल बना दिया है कि आप वहीं रुकना बेहतर समझते हैं। इसे कहते हैं स्विचिंग कॉस्ट। अगर आपके बिजनेस में कस्टमर को आपका साथ छोड़ने में दुख या मेहनत हो रही है, तभी आप असली खिलाड़ी हैं।

लेकिन हमारे यहाँ लोग क्या करते हैं। वो सोचते हैं कि बस स्माइल देकर और 'सर-मैम' बोलकर कस्टमर को अपना बना लेंगे। भाई साहब, अगर पड़ोस वाला दुकानदार दो रुपये सस्ता देगा, तो वही कस्टमर आपकी स्माइल भूलकर वहां चला जाएगा। असलियत ये है कि कस्टमर बहुत शातिर होता है। उसे आपकी शक्ल से नहीं, अपनी सहूलियत से मतलब है। अगर आपका प्रोडक्ट ऐसा है जिसे इस्तेमाल करने की आदत पड़ चुकी है, जैसे कि वो अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर जिसे सीखने में मुनीम जी को छह महीने लगे थे, तो अब वो मुनीम जी मालिक को सॉफ्टवेयर बदलने नहीं देंगे। चाहे नया सॉफ्टवेयर फ्री में क्यों न मिल रहा हो।

इसे कहते हैं हैबिट फॉर्मेशन। जब आपका प्रोडक्ट किसी की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है, तो कॉम्पिटिशन खुद-ब-खुद खत्म हो जाता है। आप चाहे जितना मर्जी खराब बर्ताव करें या दाम बढ़ा दें, कस्टमर मजबूरी में आपके पास ही आएगा। ये सुनने में थोड़ा जालिम लग सकता है, लेकिन बिजनेस कोई सत्संग नहीं है। यहाँ अगर आप दूसरों को अपनी वैल्यू की आदत नहीं डालेंगे, तो लोग आपको टिश्यू पेपर की तरह इस्तेमाल करके फेंक देंगे।

इतना ही नहीं, लोकल डोमिनेंस भी कस्टमर को बांध कर रखने का एक तरीका है। अगर आपके पूरे मोहल्ले में सिर्फ आपकी ही दुकान पर सबसे ताजा दूध मिलता है, तो कोई भी दो किलोमीटर दूर जाकर पेट्रोल फूंकना पसंद नहीं करेगा। सुविधा ही आज के दौर का सबसे बड़ा नशा है। अगर आपने कस्टमर को इस नशे की आदत लगा दी, तो वो खुशी-खुशी आपकी गुलामी करेगा। याद रखिये, मार्केट में राजा वो नहीं है जिसके पास सबसे ज्यादा कस्टमर हैं, बल्कि राजा वो है जिसके कस्टमर कहीं और जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।


लेसन ३ : इकॉनमी ऑफ स्केल का जादू

लोग अक्सर कहते हैं कि बड़ा सोचो और पूरी दुनिया पर राज करो। लेकिन ब्रूस ग्रीनवाल्ड कहते हैं कि पूरी दुनिया के पीछे भागने से अच्छा है कि अपने मोहल्ले के दादा बन जाओ। इसे कहते हैं इकॉनमी ऑफ स्केल। इसका मतलब ये नहीं है कि आप बहुत बड़े हैं, बल्कि इसका मतलब ये है कि आप अपने कॉम्पिटिटर के मुकाबले उस खास एरिया में कितने बड़े हैं। अगर आपकी पहुंच और आपका साइज आपके दुश्मन से ज्यादा है, तो आपकी लागत कम होगी और मुनाफा मोटा होगा।

मान लीजिये आप एक कूरियर कंपनी चलाते हैं और आपके पास एक ही इलाके में सौ पार्सल डिलीवर करने के लिए हैं। वहीं आपका एक छोटा कॉम्पिटिटर है जिसके पास उसी इलाके में सिर्फ दो पार्सल हैं। अब आप एक ही टेम्पो भेजकर सौ लोगों का काम कर देंगे, जिससे हर पार्सल पर आपका खर्चा बहुत कम आएगा। लेकिन उस बेचारे छोटे वाले को उन दो पार्सल के लिए भी उतनी ही दूर टेम्पो दौड़ानी होगी। अंत में वो घाटे में मरेगा और आप ऐश करेंगे। यही वजह है कि बड़े खिलाड़ियों को हराना मुश्किल होता है क्योंकि वो अपने फिक्स्ड खर्चे को बहुत सारे कस्टमर्स के बीच बांट देते हैं।

अक्सर नए लोग जोश में आकर सोचते हैं कि वो सीधे अमेज़न या रिलायंस को टक्कर देंगे। भाई साहब, उनके पास इकॉनमी ऑफ स्केल है। वो जितना पैसा सिर्फ विज्ञापन पर फूंक देते हैं, उतना तो आपकी पुश्तैनी जायदाद भी नहीं होगी। इस किताब का असली मंत्र ये है कि पहले एक छोटे मार्केट को पकड़ो और वहां के शेर बनो। जब आप एक खास जगह पर कब्जा कर लेते हैं, तो वहां नया बंदा आने की हिम्मत नहीं करेगा क्योंकि आपकी लागत इतनी कम होगी कि वो आपसे कभी मुकाबला नहीं कर पाएगा।

बिजनेस में स्केल का मतलब सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि रसूख भी होता है। जब आप बड़े होते हैं, तो सप्लायर आपको सस्ता माल देता है, सरकार आपकी बात सुनती है और बेस्ट टैलेंट आपके पास काम करना चाहता है। लेकिन ये सब तब मिलता है जब आप अपनी जड़ें गहरी जमा लेते हैं। अगर आप हर जगह थोड़ा-थोड़ा हाथ मारेंगे, तो आप कहीं के भी नहीं रहेंगे। जैसे वो धोबी का कुत्ता होता है ना, बिल्कुल वैसे ही।


कॉम्पिटिशन डीमिस्टिफाइड हमें ये सिखाती है कि बिजनेस कोई लक का खेल नहीं है, बल्कि ये ठंडे दिमाग से खेली जाने वाली शतरंज है। अगर आपके पास बैरियर टू एंट्री नहीं है, अगर आपके कस्टमर कहीं भी जाने के लिए आजाद हैं, और अगर आपके पास स्केल का फायदा नहीं है, तो आप बस वक्त गुजार रहे हैं। असली खिलाड़ी वो है जो मार्केट में घुसने से पहले अपनी जीत का किला तैयार कर लेता है। अब फैसला आपका है कि आप सिर्फ एक दुकानदार बनकर रहना चाहते हैं या अपने बिजनेस के बेताज बादशाह बनना चाहते हैं। उठिये, इन लेसन को अपने काम में उतारिये और कॉम्पिटिशन को हमेशा के लिए खत्म कर दीजिये।

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